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छत्तीसगढ़ के एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर स्थित गुरू घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी में वहां के कुलपति ने एक राष्ट्रीय परिसंवाद में आमंत्रित जाने-माने कथाकार का सार्वजनिक रूप से जो अपमान किया है, वह हक्का-बक्का करता है, और यह सवाल भी खड़ा करता है कि ऐसा घटिया आदमी क्या किसी घटिया विश्वविद्यालय का कुलपति बनने लायक भी है? यह तो एक बहुत प्रतिष्ठित केन्द्रीय विश्वविद्यालय है, जो कि महान संत गुरू घासीदास के नाम पर है।
इस विश्वविद्यालय में साहित्य अकादमी, दिल्ली के साथ संयुक्त रूप से ‘समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ’ विषय पर एक आयोजन किया गया था। इसमें देश के कई सुपरिचित साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें कथाकार मनोज रूपड़ा भी थे। विश्वविद्यालय के कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल अपने वक्तव्य में चुटकुले सुना रहे थे, और उन्हें अहसास हुआ होगा कि उनकी बातें कुछ लोगों पर भारी पड़ रही हैं। उन्होंने मंच पर बैठे मनोज रूपड़ा की तरफ देखते हुए पूछा कि वे उनकी बातों से बोर तो नही हो रहे हैं? इस पर मनोज रूपड़ा ने कहा कि आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं। इतनी सी बात पर भडक़कर कुलपति ने मंच और माइक से ही उन्हें खूब भला-बुरा कहा, बदतमीज बताया, और पूछा कि इन्हें किसने बुलाया है? इस पूरी घटना का वीडियो देखना भी भारी पड़ता है कि एक कुलपति विश्वविद्यालय के आयोजन में आमंत्रित साहित्यकार को किस तरह दुत्कार कर वहां से निकाल रहा है। कुलपति ने मनोज रूपड़ा को वहां से निकल जाने के लिए कहा, और अपने लोगों को कहा कि ऐसे आदमी को दुबारा न बुलाया जाए। आयोजन में कई लोग तो इस कथाकार को सुनने भी आए हुए थे, और वीडियो में दिखता है कि कई लोग उनके साथ वहां से बाहर निकल गए। एक जाने-माने साहित्यकार के साथ मेजबान कुलपति का ऐसा बर्ताव उसे कुर्सी से हटा देने के लिए काफी होना चाहिए।
विश्वविद्यालय का कुलपति होना एक गरिमा की बात रहती है, और ऐसे व्यक्ति का बर्ताव भी गरिमापूर्ण होना चाहिए। ऐसे ही कुलपति आज की सरकारी व्यवस्था में जब मंत्रालय बुलाए जाते हैं, तो सचिवों के कमरों के बाहर उनके पीए के साथ बैठे रहते हैं, और तब उन्हें अपने मान-सम्मान की फिक्र नहीं रहती। अपने ही कार्यक्रम के मंच से अनर्गल बातें करते हुए इसी कुलपति के पूछने पर अगर मेहमान साहित्यकार उन्हें याद दिला रहे हैं कि वे विषय पर बात नहीं कर रहे हैं, तो उनका अहंकार ऐसा जाग जाता है कि साहित्यकार को कुलपति से बात करने की तमीज नहीं है। मानो यह कुलपति न हो गया, ट्रम्प हो गया। ऐसी कोई दूसरी घटना हमें याद नहीं पड़ती जिसमें आयोजक विश्वविद्यालय, या कोई और संस्थान आए हुए मेहमान के साथ ऐसी बदतमीजी करें। इस विश्वविद्यालय के कुलपति बनने के पहले वे गुजरात के राजकोट के सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। छत्तीसगढ़ की धरती पर पहले कुलपति से लेकर आज तक ऐसी बदतमीजी करने वाला कोई और कुलपति याद नहीं पड़ता जो कि आमंत्रित मेहमान को हाथ हिला-हिलाकर सभागृह के बाहर निकल जाने को कहे।
हमको कोई उम्मीद तो नहीं है कि केन्द्र सरकार, या राज्यपाल ऐसे कुलपति को कोई नोटिस भी देंगे, क्योंकि गरिमा के दिन लद चुके हैं, और अब बदतमीजी एक आम बात मान ली गई है, उसे नवसामान्य करार दे दिया गया है। लेकिन क्या ऐसी घटना का बिल्कुल साफ-साफ वीडियो देखने के बाद बाहर के वक्ताओं, और साहित्यकारों-पत्रकारों को इस कुलपति के रहने तक इस विश्वविद्यालय का बहिष्कार नहीं कर देना चाहिए? और यह बहिष्कार करने के पहले विश्वविद्यालय के किसी न्यौते का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि खुद होकर घोषित करना चाहिए कि ऐसे कुलपति के रहते वे इस संस्थान में पांव नहीं धरेंगे। आज उच्च शिक्षा के, और दूसरे संस्थानों में उत्कृष्टता भी घटती चली गई है, और गरिमा भी। इसलिए पता नहीं यह उम्मीद करना ज्यादती तो नहीं होगा कि दूसरे विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक भी इस विश्वविद्यालय का बहिष्कार करें।
हम किसी लेखक संगठन की राजनीति पर नहीं जाते, वे अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के मुताबिक उन्हें जो करना हो, वह करें। लेकिन वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक के बीच में एक मानवपंथ भी रहना चाहिए जो कि लोगों को राजनीतिक रूझान से परे थोड़ी सी इंसानियत भी सिखाए। इंसानियत के साथ-साथ शिष्टाचार सिखाने वाली कुछ अच्छी किताबें बिलासपुर के इस केन्द्रीय विश्वविद्यालय के इस कुलपति को भेजनी चाहिए कि आपकी जरूरत को देखते हुए समाज की तरफ से आपको ये किताबें उपहार में भेजी जा रही हैं। समाज में गरिमा अगर कायम नहीं रहेगी, तो राजनीतिक पसंद पर किसी कुर्सी पर बिठा दिए लोग अपने आपको तानाशाह समझने लगेंगे, और जनता के पैसों पर पलते हुए समाज के लोगों, और आमंत्रित अतिथियों से भी ऐसी बदतमीजी करते रहेंगे। अगर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल को अपनी जिम्मेदारी का जरा भी अहसास हो, तो उन्हें इस बदतमीजी के वीडियो को लगातार दस-बीस बार देखना चाहिए, और इस कुलपति को बुलाकर उसकी मौजूदगी में इस वीडियो को बड़ी स्क्रीन पर दिखाना चाहिए, और पूछना चाहिए कि इस बदतमीजी का हक उन्हें किसने दिया है? फिलहाल तो हमारे पास ऐसे अहंकार का एक छोटा सा इलाज है, छत्तीसगढ़ और बाकी देश के लोग इस कुलपति के नाम पर एक चिट्ठी भेज सकते हैं, और उसमें महज इतना लिखना काफी होगा- लानत है।


