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छत्तीसगढ़ में ताजा राजनीतिक विवाद पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की वर्तमान उपमुख्यमंत्री अरूण साव की एक आलोचना को लेकर खड़ा हो गया है। भूपेश ने साव के सरकारी कामकाज को लेकर उनकी तुलना बंदर से कर दी और कोई पुरानी बंदर राजा की कहानी सुना दी। उन्होंने साव के साहू समाज के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन भूपेश के राजनीतिक बयान के बाद साहू समाज के कुछ लोग साव की आलोचना को साहू समाज की आलोचना मानकर भूपेश से दस दिन में माफी मांगने को कह रहे हैं। कांगे्रस और भाजपा के बीच वैसे भी तलवारें कम नहीं खिंची हुई हैं, फिर उसके बाद अब इसमें जातिवाद का तडक़ा और लग गया। अरूण साव वजनदार मंत्री हैं, उपमुख्यमंत्री भी हैं, सांसद भी रह चुके हैं, वे हाईकोर्ट में सरकारी वकील भी थे, और वे भूपेश बघेल के जितने ही छत्तीसगढ़ी भी हैं। वे अपना राजनीतिक बचाव करने में पर्याप्त सक्षम हैं। ऐसे में उनके खिलाफ भूपेश के किस्सा-कहानी अंदाज के एक राजनीतिक बयान को अगर साव का समाज अपना सामाजिक अपमान मानकर प्रदेश स्तर के आंदोलन की चेतावनी दे रहा है, तो यह सिलसिला आगे बढऩे पर कहां तक पहुंचेगा?
छत्तीसगढ़ में न सिर्फ साहू और कुर्मी जातियां राजनीति में हैं, बल्कि अनुसूचित जाति और जनजाति की तो विधानसभा और लोकसभा की सीटें भी आरक्षित हैं। उनके निर्वाचित जनप्रतिनिधि पंच से लेकर सांसद तक हर स्तर पर हैं। फिर सरकारी ओहदों पर छत्तीसगढ़ की तमाम जातियों के अलावा भी अलग-अलग धर्मों के लोग भी रहते हैं, और कुछ ऐसी जातियों के लोग भी रहते हैं जिन्हें घोर छत्तीसगढ़वाद के लोग परदेसिया कहते हैं। अब बृजमोहन अग्रवाल सरीखे लोग इसी शहर में पैदा होकर अपने घर के सामने बिना कपड़ों के बचपन खेलकर पूरी जिंदगी से सार्वजनिक जीवन में रहकर जनता के बीच निर्वाचित राजनीति कर रहे हैं, इसके बाद भी अगर उग्र छत्तीसगढ़वाद के झंडाबरदार अगर महाराज अग्रसेन और भगवान झूलेलाल के खिलाफ बयानबाजी करके स्थानीयता की अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, और अपने छत्तीसगढ़ी होने के दावे का नगदीकरण करना चाहते हैं, तो यह छत्तीसगढ़ में हाल के महीनों में खड़ा हुआ एक अलग किस्म का बवाल है। इसने पर्याप्त तनाव खड़ा कर दिया है, और गिरफ्तारियों से लेकर छत्तीसगढ़ या शहरों का बंद भी हो चुका है। इस तनाव को देखते हुए अब साहू समाज और भूपेश के बीच का यह तनाव ऐसा लग रहा है कि साव या उनकी तरफ से राजनीतिक जवाब देने के बजाय जात की राजनीति को सत्ता और विपक्ष की राजनीति पर हावी किया जा रहा है।
अब हम इससे जुड़ी हुई एक दूसरी बात पर आना चाहते हैं, जो कि पहली नजर में अलग लग सकती है, लेकिन अगर एक पंछी की विहंगम दृष्टि से, आसमान से छत्तीसगढ़ को एक नजर में देखें, तो बस्तर के इलाके में चल रहा एक अलग किस्म का विवाद दिखेगा, जिसमें आदिवासियों के ईसाई बनने पर ऐसे लोगों को मतांतरित कहा जा रहा है, उनका आरक्षित दर्जा खत्म करने की मांग हो रही है, उन्हें गांवों में दफन नहीं होने दिया जा रहा है, और उनमें से बहुत से लोगों की ‘मूल धर्म’ में वापिसी का अभियान चलाया जा रहा है। यह भी पता लग रहा है कि ईसाई धर्म को छोडऩे वाले कुछ लोग हिन्दू धर्म में आ रहे हैं, और कुछ लोग अपनी मूल आदिवासी संस्कृति में लौट रहे हैं। पहले भी बस्तर में यह बात चलती आ रही थी कि आदिवासियों में कुछ लोग अपने को हिन्दू मानते हैं, और बाकी लोग अपने को आदिवासी ही मानते हैं। इस तरह बस्तर अभी आदिवासी से ईसाई, और फिर ईसाई से आदिवासी, या हिन्दू आवागमन देख रहा है। यह तनाव कम नहीं है।
दूसरी तरफ मैदानी इलाकों में जगह-जगह हिन्दुत्व का झंडा लिए हुए बजरंग दल, और उसके संगी-साथी संगठन ईसाई घरों में इतवार की सुबह होने वाली सामान्य प्रार्थना सभाओं पर भी हमले कर रहे हैं, पुलिस मौजूदगी में ईसाईयों को पीट रहे हैं, और पुलिस है कि उन्हीं पर हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करने, या धर्मांतरण करने के लगाए गए आरोपों पर जुर्म कायम कर रही है। अभी क्रिसमस के पहले बजरंग दल के लोगों ने रायपुर के एक मॉल में क्रिसमस की साज-सज्जा पर हिंसक हमला किया, और सांता क्लॉज की प्रतिमाओं को तोड़ा। इसके वीडियो पूरी दुनिया में छत्तीसगढ़ को भारी शर्मिंदगी दिला गए। लेकिन इसमें गिरफ्तार बजरंग दल के लोग अभी जब जेल से छूटकर बाहर आए, तो पगड़ी और माला पहनाकर उनका स्वागत किया गया। यह हिन्दुत्व के ईसाई धर्म पर हमले का एक नया आयाम है, जिसमें तमाम हमलों के वक्त पुलिस पॉपकॉर्न खाते हुए दर्शक की भूमिका निभाती है, और आखिर में हिन्दी फिल्म की पुलिस की तरह सायरन बजाते पहुंचती है।
अरूण साव के समर्थन में साहू समाज के किए जा रहे हमले से हमने यह बात शुरू की थी। लेकिन हाल के बरसों में छत्तीसगढ़ में जातिवाद और धार्मिक टकराव में जो ज्वार-भाटा आया है, उसे अनदेखा करना परले दर्जे की लापरवाही होगी। भारतमाला परियोजना में हुए भयानक संगठित और सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार में गिरफ्तार लोगों को लेकर भी छत्तीसगढ़ में यह बात उठी है कि छत्तीसगढ़ी मूल के अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, और ‘बाहरी’ अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई है। लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीनों में ही मध्यप्रदेश में दो-तीन बड़े अफसरों पर सरकार ने कार्रवाई की है जिन्होंने आरक्षित अधिकारी-कर्मचारी संघों के कार्यक्रम में आरक्षित जातियों के कर्मियों को एकजुट होने के फतवे दिए थे, और अनारक्षित जातियों के खिलाफ आक्रामक और अपमानजनक बातें कही थीं। छत्तीसगढ़ ऐसी नौबत के बस दो कदम पीछे दिख रहा है।
प्रदेश में मानो कांग्रेस और भाजपा के बीच सांप-नेवले जैसे संबंध पर्याप्त तनाव न हों, बाकी तरह-तरह के तनाव और जोड़े जा रहे हैं। कहीं आदिवासी और ईसाई के बीच टकराव, कहीं हिन्दुत्व और ईसाई के बीच टकराव, कहीं छत्तिसगढिय़ा और ‘परदेसिया’ का टकराव चल रहा है, अभी अगर लोगों को याद न हों, तो गुरू घासीदास जयंती के एक कार्यक्रम में बिलासपुर में सतनामी समाज के लोगों ने वहां पहुंचे आरएसएस के लोगों को वापिस जाने कह दिया था, इस घटना को बलौदाबाजार कलेक्ट्रेट आगजनी के समय से चले आ रहे एक तनाव से जोडक़र देखना होगा। अभी हम आज की इस विहंगम दृष्टि में अलग-अलग समाजों के भीतर चल रहे अंतरविरोधों को नहीं देख रहे हैं। लेकिन जो तनाव सतह पर दिख रहे हैं, हो सकता है वे पेशेवर राजनीतिक दलों को आज अपनी फिक्र का सामान न लग रहे हों, लेकिन हमको तो ये समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न करने वाले लग रहे हैं, और सतह पर आ चुके ऐसे तनावों की सतह के नीचे की जड़ों की भी फिक्र होती है कि ये तनाव कहां तक गहरे बैठ चुके हैं, और ऊपर इनके कंटीले तने कहां तक जाएंगे। किसी भी देश-प्रदेश के लिए इस किस्म के गैरजरूरी तनाव प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) होते हैं, और दुनिया के किसी भी देश की प्रगति को लकवाग्रस्त करने की ताकत रखते हैं। जात और धरम के जहर से छत्तीसगढ़ को बचाने की जरूरत है, और इन दोनों बातों को अपने परिवार में निजी रूप से अमल करने की चीजें बनाए रखना चाहिए, न कि हिंसक संघर्ष का हथियार बनाना चाहिए।
जिन लोगों को लगता है कि छत्तीसगढ़ में जातियों के तनाव में यूपी-बिहार के मुकाबले कुछ कमी है, उन्हें आज की सरगुजा की एक खबर देखनी चाहिए। वहां के एक आंगनबाड़ी केन्द्र की शिकायत आई है कि वहां हरिजन पारा के बच्चों को आंगनबाड़ी केन्द्र न लाने का दबाव डाला जाता है, और अगर ऐसे बच्चे आते हैं, तो उन्हें अलग बिठाकर खाना दिया जाता है, और उनसे जूठे बर्तन मंजवाए जाते हैं। यह सरकार के अपने इंतजाम की शिकायत है, जो सरकार तक वहीं की कार्यकर्ता से पहुंची है।


