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बारनवापारा से उदंती लाए जाएंगे वनभैंसे, सिंघवी ने अब तक के खर्चों की जांच मांगी
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 3 जनवरी। यह एक ऐसा मामला है जिसमें वन भैंसों के संरक्षण-संवर्धन के नाम पर करोड़ों खर्च किए गए, और फिर हाईब्रिड होने का पता चला, तो दर्जनभर भैंसों को खदेड़ दिया गया। अब नए सिरे से वन भैंसों के संवर्धन का प्लान तैयार किया गया, और इसके लिए केन्द्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण से अनुमति मांगी गई है।
यह पूरा मामला उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व का है। जिसमें सालों तक बाड़े में रख कर वन भैंसे के बच्चों को जन्म दिलवाया गया। इसकी संख्या दर्जनभर से अधिक हो गई, तो हाईब्रिड बताकर सौ किलोमीटर दूर ओडि़शा की तरफ खदेड़ दिया गया।
इस पूरे मामले उदंती-सीतानदी रिजर्व के उपनिदेशक वरूण जैन ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में बताया कि पहले दिन से वन भैंसों के हाईब्रिड होने की जानकारी थी। पहले प्योर वन भैंसों से प्रजनन कराने की योजना थी लेकिन केंद्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण ने अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद मई वर्ष-2023 में सभी हाईब्रिड भैंसों को छोड़ दिया गया।
जैन ने कहा कि वर्तमान में उदंती में एकमात्र ‘छोटू’ ही प्योर वनभैंसा है। राज्य के वन भैंसों का संवर्धन हो सके, इसलिए बार नवापारा से मादा वन भैंसे लाकर ‘छोटू’ से प्रजनन कराने की योजना है। इसके लिए केन्द्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण को प्रस्ताव भेजा गया है। अनुमति मिलने की दशा में संभवत: अगले महीने बार नवापारा से मादा वन भैंसे उंदती लाए जाएंगे। उन्होंने बताया कि असम के चिडिय़ाघर से 6 प्योर वनभैंसे लाए गए थे, जिनकी संख्या बढक़र अब 11 हो चुकी है। छत्तीसगढ़ के वनभैंसों के संवर्धन के लिए कोशिश हो रही है।
दूसरी तरफ, रायपुर के वन्य जीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है, और सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने हाईब्रिड वनभैंसों की जानकारी देते बताया कि 2007 में एक ग्रामीण से वन विभाग जबरदस्ती आशा नामक मादा को ले कर आए, इसे शुद्ध नस्ल का बताया गया। आशा ने राजा, प्रिंस, मोहन, वीरा, सोमू, खुशी और हीरा को जन्म दिया। बाद में रु. सत्ताईस हजार में विभाग ने ग्रामीणों से रंभा और मेनका नाम की दो क्रॉस मादा खरीदी। रंभा और मेनका ने मालती और भानुमति को जन्म दिया। चारों ने पार्वती, विष्णु, दुर्गा, किरण, कान्हा, प्रह्लाद, रवि, सोमवती, जानकी, उर्वशी और सूर्या (15 से ज्यादा) को जन्म दिया।
उन्होंने कहा कि वन विभाग को पहले दिन से ही पता था कि आशा सहित ये सभी हाइब्रिड वन भैंसे हैं। रंभा और मेनका की खरीदी के कागज़ में ही लिखा है कि दोनों क्रॉस ब्रीड हैं। वन विभाग की पोल तब खुली जब केंद्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण ने इन वन भैसों को हाइब्रिड बता कर, असम के प्योर ब्रीड वन भैंसों के साथ प्रजनन के लिए स्वीकृति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अचानक वन विभाग को समझ में आया और उसे भारत के संविधान की याद आई। अनुच्छेद 48(ए) और 51(ए)(जी) के प्रावधानों का हवाला देते हुए, उप निदेशक यूएसटीआर ने सभी हाइब्रिड वन भैंसों को छोडऩे का प्रस्ताव रखा। बाद में अक्टूबर 2023 में इन्हें बाड़े से भगा दिया। बताया गया कि बाड़ा तोडक़र भाग गए।
भागने के बाद, यूएसटीआर में बड़ी संख्या में गांव होने के कारण, इन हाइब्रिड वन भैंसों ने कुछ फसल नुकसान पहुंचाया। ग्रामीणों ने मुआवज़े की मांग की, लेकिन वन विभाग ने हाइब्रिड वन जानवरों के कारण होने वाले फसल नुकसान की भरपाई के लिए प्रावधानों की कमी का हवाला देते हुए इनकार कर दिया। नतीजा यह निकला कि अगस्त 2024 में, लाठी-डंडे की मदद से ग्रामीणों ने हाइब्रिड वन भैंसों को पुराने बोमा में रख दिया। बाद में फसल के समय ये बाड़े में रहते थे, बाकी समय जंगल में। जानकारी के अनुसार अब दस दिन पहले इन्हें उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व से बाहर 100 किलो मीटर दूर छोड़ दिया गया है।
इतने सालों से जिन्हें प्यार से पाला, उनसे अब क्यों नफरत?
सिंघवी ने कहा कि वर्ष 2013-14 से 2024-25 तक वन विभाग ने इन पर भोजन और पूरक आहार, बाड़े का रख-रखाव और कई मदों पर 2,46,38,831.00 रुपए खर्च किए। अब वन विभाग पिछले छ: साल से बारनवापारा में बाड़े में कैद तीन मादा वन भैसों को उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व में एक मात्र बचे 26 वर्ष के छोटू वन भैंसे से—जिसे बुढ़ापे के कारण बिलकुल कम दिखता है — क्रॉस कराने लाने की तैयारी कर रहा है। बारनवापारा से लाने के 45 दिनों बाद इन्हें छोटू के साथ जंगल में छोड़ दिया जाएगा। ऐसे में अगर हाइब्रिड वन भैंसे भी उदंती-सीता नदी के जंगल में रहते, तो असम की प्योर ब्रीड मादा से इन हाइब्रिड नर वन भैंसों की मैटिंग की सम्भावना रहती। इसलिए इन्हें वन विभाग ने उदंती-सीता नदी टाइगर रिज़र्व के इलाके के बाहर छोड़ दिया है।
उन्होंने हाइब्रिड वन भैंसों पर करोड़ों खर्चा किए जाने को लेकर, एक हाई-पावर जांच कमेटी को सौंपने की मांग करते हुए कहा कि जांच कर दोषी अधिकारियों से पूरे खर्च की वसूली की जानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) को बताना चाहिए कि जब असम के वन भैंसों को उदंती-सीता नदी ही लाना था, तो 2020 में बारनवापारा में ला कर क्यों बाड़े में कैद कर रखा है। 2020 में वे ही अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) थे। 2020 में जब छोटू 20-21 साल का था, तब असम की मादा को छोटू के पास लाया जाता, तो शायद प्रजनन की सम्भावना रहती। अब जब छोटू पूरी तरह बूढ़ा हो गया है, जो कि प्रजनन भी न कर सके। तब यह प्रयोग क्यों किया जा रहा है? जिन तीन मादा को लाया जा रहा है, उनके छोटे बच्चे हैं। वे बारनवापारा में ही रहेंगे, जबकि उनकी उम्र माँ से सीखने की है।


