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पीआईएल के लिए अब 15 हजार की सुरक्षा राशि, कम या माफ करने की अर्जी हाईकोर्ट ने नामंजूर की
03-Jan-2026 12:56 PM
पीआईएल के लिए अब 15 हजार की सुरक्षा राशि, कम या माफ करने की अर्जी हाईकोर्ट ने नामंजूर की

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 3 जनवरी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए सुरक्षा राशि बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दी है। यह राशि जमा किए बिना किसी भी जनहित याचिका पर सुनवाई नहीं की जाएगी। सुरक्षा राशि को कम या माफ करने से जुड़े एक आवेदन को अदालत ने अस्वीकार कर दिया है।

गौरतलब है कि पूर्व में जनहित याचिका दाखिल करने पर 5,000 की सुरक्षा राशि ली जाती थी, लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने नियमों में संशोधन कर इसे बढ़ाकर 15,000 कर दिया है। इसी संशोधित प्रावधान को चुनौती भी दी गई, जिस पर शुक्रवार को अदालत में सुनवाई हुई।

यह याचिका कोरबा जिले के लक्ष्मी चौहान, अरुण श्रीवास्तव और सपूरन दास द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने कोरबा जिला डीएमएफ फंड के उपयोग में अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है। याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद वर्मा की खंडपीठ के समक्ष हुई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव और सुदीप वर्मा ने निवेदन किया कि पहले यह राशि 5,000 थी, जिसे अब तीन गुना बढ़ा दिया गया है, इसलिए इसे कम किया जाए।
इस पर खंडपीठ ने असहमति जताते हुए कहा कि जो याचिकाकर्ता गंभीर और वास्तविक जनहित के मुद्दों पर अदालत आते हैं, उन्हें 15,000 रुपये जमा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सुनवाई के बाद यह पाया जाता है कि याचिका वास्तव में जनहित में है, तो सुरक्षा राशि वापस की जा सकती है। वहीं, यदि याचिका निराधार या गलत उद्देश्य से दायर पाई जाती है, तो याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध कार्रवाई भी संभव है।

खंडपीठ ने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता अगले शुक्रवार तक 15,000 की सुरक्षा राशि जमा करें। इसके बाद 12 जनवरी (सोमवार) को जनहित याचिका पर सुनवाई की जाएगी।
यदि तय समय-सीमा में राशि जमा नहीं की जाती, तो याचिका स्वतः निरस्त मानी जाएगी।

प्रस्तुत जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि पिछले 10 वर्षों में डीएमएफ फंड के तहत लगभग 4000 करोड़ रुपये के उपयोग में नियमों और गाइडलाइंस का खुला उल्लंघन हुआ। याचिका में यह भी कहा गया है कि फंड से होने वाली नियुक्तियों में प्रभावित लोगों को अवसर नहीं दिया गया, भवन निर्माण में मनमाने ढंग से खर्च हुआ और कई पात्र परिवारों को लाभ से वंचित रखा गया।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने बताया कि अदालत के आदेश के अनुपालन में वे शीघ्र ही सुरक्षा राशि जमा करेंगे और 12 जनवरी को मामले की विस्तृत सुनवाई का अनुरोध करेंगे।

 


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