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धरती का तापमान आने वाले 20 सालों में 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा, जो बेहद चिंताजनक
03-Mar-2022 10:51 AM
धरती का तापमान आने वाले 20 सालों में 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा, जो बेहद चिंताजनक

निमली में अनिल अग्रवाल डायलॉग का दूसरा दिन

नई दिल्ली/ लिमनी, 2 मार्च। भारतीय मौसम विज्ञान के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने बताया कि बीते साल मौसम की चरम घटनाओं के कारण सबसे ज्यादा मौतें महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्य प्रदेश में हुई।

महापात्र अनिल अग्रवाल डायलॉग (एएडी) के दूसरे दिन के सम्मेलन में बुधवार को बात कर रहे थे।
इस मौके पर पत्रिका डाउन टू अर्थ के सीनियर रिपोर्टर अक्षित संगोमला ने बताया कि मौसम की चरम घटनाओं के लिहाज से सन 2021 बहुत महत्वपूर्ण साल था। यह अब तक दर्ज किए गए सबसे गर्म सालों में से एक था। जलवायु परिवर्तन की आपदाओं का सामना करने में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। जलवायु परिवर्तन से संबंधित मौतों की अधिक संख्या के लिए बिजली और गरज के साथ आने वाली तूफानी घटनाएं जिम्मेदार होती हैं।

जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतरराष्ट्रीय समिति यानी आईपीसीसी की छठवीं आकलन रिपोर्ट के अनुसार अगर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी नहीं की जाएगी तो अगले 20 साल में धरती के सतह के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी, जो सदी के मध्य तक 2 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाएगी। भले ही 21वीं सदी के मध्य तक उत्सर्जन को जीरो पर ले आया जाए फिर भी तापमान में 0.1 की वृद्धि होगी। आने वाले दशकों में उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं की गई तो यह 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा 21वीं सदी के दौरान पार कर जाएगी।

संगोमला के मुताबिक एक डरावना पूर्वानुमान यह है कि अर्कंटिका के सितंबर में बर्फ मुक्त हो जाने की आशंका है, जो चरम गर्मी का महीना होता है। ऐसा 2050 से पहले कम से कम एक बार हो सकता है।

इसी कड़ी में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर एपी डिमरी ने पर्यावरण की खतरनाक चुनौतियों को लेकर सहमति जताई। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर घट रहे हैं और इसके चलते उत्तर भारत में नदियों का प्रवाह बढ़ रहा है। इसके चलते देश के उत्तरी हिस्सों में, पूर्वी हिस्से की तुलना में अधिक बारिश होगी। बादल का फटना आम होता जा रहा है। हमने पाया है कि हिमालय की तलहटी में बादल फटने की स्थिति में बारिश 14 फ़ीसदी तक बढ़ जाती है।

भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू ने कहा कि अपेक्षाकृत कम पता घटना है कि हिंद महासागर दुनिया में सबसे तेजी से गर्म होने वाला महासागर है। इसका दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। समुद्री गर्मी की लहरें समुद्र में पाए जाने वाले छोटे जीवो की आबादी में गिरावट का कारण बन रही है और समुद्र के मत्स्य पालन को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की करीब 93 फ़ीसदी गर्मी समुद्र में जाती है। गर्म पानी चक्रवातों के लिए एक ऊर्जा स्रोत है और बढ़ते तापमान के साथ चक्रवात की भी आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ जाती है। इस बारे में किया गया शोध दर्शाता है कि गर्म होने के साथ-साथ हिंद महासागर चक्रवात के लिए अनुकूल हो जाएगा। समुद्री गर्मी की लहरें इसमें मौजूद मूंगे के चूरा बनने और समुद्री घास के क्षय होने के लिए जिम्मेदार होगा। साथ ही कल्प वनों के नुकसान के चलते समुद्री आवास के विनाश का कारण बनेगा जिससे मत्स्य क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

सत्र के प्रारंभ में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि खतरे की घंटी बज चुकी है। आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट यह बता रही है कि दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से बचने के विकल्प बहुत सीमित रह गए हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव विनाशकारी हैं। दुनिया की आधी आबादी विनाशकारी परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है और समय रहते अगर हम इसके प्रति चेतना नहीं लाते तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। रिपोर्ट बता रही है कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ा है। वे इसके भुक्तभोगी है, जबकि उन्होंने ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ाने में कोई भूमिका नहीं निभाई है। पहली बार इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले विस्थापन के बारे में भी बात की गई है यह हमारी दुनिया में अनिश्चितता को और बढ़ाएगी।
अनिल अग्रवाल डायलॉग निमली में 1 मार्च से शुरू हुआ है जो 4 मार्च तक चलेगा। इस कांक्लेव का उद्घाटन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने किया था।


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