कोण्डागांव

ढोल-नगाड़ों की थाप और तालाब में उछलती मछलियां
23-May-2026 10:54 PM
ढोल-नगाड़ों की थाप और तालाब में उछलती मछलियां

बरकई का ‘बंधा मतौर’ बना बस्तर की अनोखी पहचान

प्रकाश नाग

केशकाल, 23 मई (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। बस्तर संभाग की लोकसंस्कृति और परंपराएं आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। कोंडागांव जिले के ग्राम बरकई में हर तीन साल में आयोजित होने वाला ‘बंधा मतौर’ ऐसा ही अनोखा आयोजन है, जिसे देखने के लिए हजारों लोग दूर-दूर से पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, तालाब में उछलती मछलियां और एक साथ मछली पकड़ते ग्रामीण इस आयोजन को बेहद खास बना देते हैं।

दशकों पुरानी परंपरा आज भी जीवित

गांव के मालगुजार देशमन पांडे ने बताया कि वर्षों पहले उनके पूर्वजों ने ग्रामीणों के श्रमदान से इस विशाल तालाब का निर्माण करवाया था। तालाब बनने के बाद यह परंपरा शुरू की गई कि हर तीन साल में एक बार तालाब की मछलियां गांववासियों और आयोजन में शामिल होने वाले लोगों के लिए छोड़ दी जाएंगी। तभी से ‘बंधा मतौर’ लगातार आयोजित किया जा रहा है।

पूजा-अर्चना के बाद शुरू

 होता है रोमांच

स्थानीय बुजुर्ग चमराराम के अनुसार कार्यक्रम की शुरुआत गांव के मालगुजार, पुजारी और पटेल द्वारा ग्राम देवी की पूजा-अर्चना से होती है। इसके बाद जैसे ही ढोल-नगाड़ों की आवाज गूंजती है, तालाब की मछलियां पानी में उछलने लगती हैं। ग्रामीण इसे आयोजन का सबसे अद्भुत और आकर्षक दृश्य मानते हैं।

हजारों लोग एक साथ उतरते हैं तालाब में

पूजा के बाद ग्रामीण जाल और पारंपरिक उपकरण लेकर तालाब में उतरते हैं और सामूहिक रूप से मछली पकडऩे का सिलसिला शुरू हो जाता है। आयोजन में शामिल होने के लिए लोगों को शुल्क भी जमा करना पड़ता है। चारों ओर उत्साह, लोकगीत और ग्रामीण संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

समापन का सबसे खास क्षण

कार्यक्रम के अंत में गांव के मालगुजार तालाब के पानी को स्पर्श कर ‘बंधा मतौर’ समाप्त होने की घोषणा करते हैं। ग्रामीणों के लिए यह आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण और भावुक क्षण माना जाता है।

बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है आयोजन

गांव के पटेल जीवनलाल पांडे ने बताया कि बरकई बस्तर का एकमात्र ऐसा गांव है, जहां यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। इस बार आयोजन को देखने और इसमें शामिल होने के लिए कोंडागांव समेत आसपास के कई जिलों से रिकॉर्ड संख्या में लोग पहुंचे। ग्रामीणों का कहना है कि ‘बंधा मतौर’ अब केवल मछली पकडऩे का आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत लोकसंस्कृति और ग्रामीण एकता का बड़ा उत्सव बन चुका है।


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