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व्हेल और डॉल्फ़िन का सामाजिक जीवन संक्रामक रोगों के प्रसार को करता है प्रभावित : अध्ययन
19-Jan-2026 12:39 PM
व्हेल और डॉल्फ़िन का सामाजिक जीवन संक्रामक रोगों के प्रसार को करता है प्रभावित : अध्ययन

( कैटलिन निकोलस, गुइडो जे पारा एवं लुसियाना मिलर - फ्लाइंडर यूनिवर्सिटी )

एडिलेड, 19 जनवरी। व्हेल, डॉल्फ़िन और सील जैसे समुद्री स्तनधारी अत्यंत सामाजिक जीव होते हैं, जो समूहों में रहते हैं, दीर्घकालिक संबंध बनाते हैं और वर्षों तक, कभी तो दशकों तक उन्हीं साथियों के संपर्क में रहते हैं। यह सामाजिक जीवन उन्हें कई फायदे देता है, लेकिन एक नए अध्ययन में सामने आया है कि ये सामाजिक संबंध संक्रामक रोगों के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

जर्नल ‘मैमल रिव्यू’ में प्रकाशित इस शोध में दुनियाभर के दशकों पुराने अध्ययनों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन के अनुसार, समुद्र में रोग प्रकोप केवल इस बात पर निर्भर नहीं करते कि किसी क्षेत्र में कितने जानवर मौजूद हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करते हैं कि कौन, किसके संपर्क में और कितनी बार आता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर वन्यजीवों के लिए संक्रामक रोग बढ़ता खतरा बनते जा रहे हैं और समुद्री स्तनधारी भी इससे अछूते नहीं हैं।

जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, आवास में हस्तक्षेप और मानवीय गतिविधियों का दबाव इन जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर रहा है, जिससे वे संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इसके बावजूद, समुद्री स्तनधारियों में रोग प्रकोप अक्सर अचानक सामने आते हैं और उनका पूर्वानुमान लगाना मुश्किल होता है।

अध्ययन में बताया गया है कि कुछ वर्षों तक आबादी पूरी तरह स्वस्थ दिखती है, लेकिन अगले ही वर्ष बड़ी संख्या में जानवर बीमार या मृत पाए जाते हैं। खसरे से संबंधित मोर्बिलिवायरस जैसे अत्यधिक संक्रामक वायरस यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में डॉल्फ़िन और सील की सामूहिक मौतों का कारण बन चुके हैं। वहीं, लोबोमाइकोसिस जैसी त्वचा संबंधी बीमारियां भी डॉल्फ़िन समुदायों में फैलकर उनकी त्वचा में दीर्घकालिक घाव और कमजोर स्वास्थ्य की स्थिति पैदा कर रही हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि समुद्र में निगरानी की सीमाओं के कारण रोग के प्रसार को समझना और भी कठिन हो जाता है। वैज्ञानिक न तो हर सामाजिक संपर्क को देख सकते हैं और न ही समय रहते बीमार जानवरों को अलग कर पाते हैं। इसके अलावा, रोग किसी आबादी में समान रूप से नहीं फैलते, बल्कि सामाजिक रिश्तों और व्यवहार के अनुसार विशेष ‘रास्तों’ से आगे बढ़ते हैं।

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने सामाजिक नेटवर्क विश्लेषण का उपयोग करने वाले 14 वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा की, जो मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया पर केंद्रित थे। इसमें यह देखा गया कि किसी जानवर के कितने साथी हैं, वह कितनी बार दूसरों के संपर्क में आता है और क्या वह सामाजिक नेटवर्क के केंद्र में है।

एक अहम निष्कर्ष यह रहा कि अत्यधिक संपर्क में रहने वाले कुछ जानवर, जिन्हें ‘सुपर-स्प्रेडर’ कहा जा सकता है, रोग फैलाने में असामान्य रूप से बड़ी भूमिका निभाते हैं। डॉल्फ़िन समुदायों में ऐसे जानवरों के जरिये संक्रमण तेजी से फैल सकता है। कुछ मामलों में रोग प्रकोप केवल कुछ सामाजिक रूप से केंद्रीय व्यक्तियों पर निर्भर पाया गया।

अध्ययन में यह भी कहा गया कि समूहों की संरचना भी महत्वपूर्ण है। कुछ आबादियों में उपसमूह रोग प्रसार को धीमा कर सकते हैं, जबकि अन्य स्थितियों में यही उपसमूह संक्रमण को लंबे समय तक बनाए रखते हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि केवल जानवरों की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक संबंधों को समझना, समय रहते रोग की पहचान करने और रोगों की या संक्रमण की रोकथाम के लिए जरूरी है।

शोध के अनुसार, बदलते पर्यावरण में समुद्री स्तनधारियों के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उनके सामाजिक जीवन को समझना उतना ही जरूरी है जितना कि रोगजनकों को। (द कन्वरसेशन)


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