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सूडान में लोग जीवित रहने के लिए कोयला और पत्ते खाने को मजबूर हैं. एक सहायता एजेंसी ने बीबीसी को बताया कि अल-फशर शहर के निकट विस्थापित लोगों के शिविर पर हमले के बाद स्थिति इस स्तर पर पहुंच गई है.
नॉर्वेजियन रिफ़्यूजी काउंसिल की हेड ऑफ़ ऑपरेशंस नोआ टेलर ने बीबीसी के न्यूज़डे कार्यक्रम में बताया, "जो कहानियां हम सुन रहे हैं, वे वास्तव में भयावह हैं."
टेलर ने कहा कि लोग अल-फशर से तावीला की ओर भाग रहे हैं लेकिन यहां "पहुंचते ही" उनकी मौत हो रही है.
उन्होंने कहा, "ज़मज़म शिविर से चिलचिलाती गर्मी में 40 किलोमीटर की यात्रा करते समय कुछ लोग "प्यास से मर गए. हमने सुना है कि अल-फशर और तावीला के बीच सड़क पर अभी भी शव पड़े हैं."
"हमने एक परिवार से बात की तो उन्होंने एक लड़की के बारे में बताया जो अल-फशर से अकेले पैदल चली थी, यात्रा के दौरान उसके साथ कई बार बलात्कार किया गया और जब वह तावीला पहुंची तो उसकी मृत्यु हो गई."
अल-फशर सूडान के पश्चिमी क्षेत्र दारफुर में सेना और उसके सहयोगियों के नियंत्रण में आखिरी शहर है.
इसी महीने सूडान की अर्ध सैनिक रैपिड सपोर्ट फोर्सेज ने पास के ज़मज़म शिविर पर हमला कर दिया था. इसके कारण हज़ारों लोगों को अपना अस्थायी आश्रय छोड़कर भागना पड़ा.
ज़मज़म के कई निवासी पिछले दो दशकों से दारफ़ुर में हुए संघर्षों से बचकर वहां रह रहे थे. सूडान में रैपिड सपोर्ट फोर्सेज और सूडान की सेना के बीच बीते दो सालों से संघर्ष जारी है. इसमें अब तक हज़ारों लोग मारे गए हैं और लगभग 13 लाख लोग बेघर हो गए हैं.
सहायता एजेंसियों का कहना है कि यह विश्व का सबसे बुरा मानवीय संकट है. (bbc.com/hindi)


