राष्ट्रीय
इतिहास का पहला ऐसा दल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहुंच गया है, जिसमें सभी सदस्य किसी संस्था या देश के भेजे नहीं हैं बल्कि एक निजी अभियान पर गए हैं. शनिवार को यह दल अंतरिक्ष में पहुंचा.
एक हफ्ते के अभियान पर चार सदस्यों वाला एक निजी दल अंतरिक्ष में पहुंचा है. यह दल ह्यूस्टन की एक स्टार्टअप कंपनी एग्जिओम स्पेस इंक की तरफ से अंतरिक्ष में रिसर्च करने के लिए भेजा गया है. शुक्रवार को अमेरिका के कैनेडी स्पेस सेंटर से इस दल ने स्पेस एक्स के एक रॉकेट से उड़ान भरी थी और 21 घंटे की उड़ान के बाद ये लोग स्पेस स्टेशन पहुंच गए.
आखिरी पलों में माहौल तब तनावपूर्ण हो गया था जब एक तकनीकी खामी के कारण अंतरिक्ष यान के इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक पहुंचने में 45 मिनट की देरी हुई. इसके अलावा उड़ान में सब कुछ ठीकठाक रहा.
एग्जिओम के इस दल में चार देशों के लोग हैं, जो आठ दिन तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहकर शोध करेंगे. इस दल का नेतृत्व स्पेन के जन्मे नासा एस्ट्रोनॉट माइकल लोपेज-अल्जीरिया कर रहे हैं. 63 वर्षीय लोपेज-अल्जीरिया कंपनी के वाइस प्रेजीडेंट भी हैं.
उनके डिप्टी लैरी कॉनर हैं जो ओहायो स्थित उद्योगपति और पायलट हैं. वही इस अभियान के मुख्य पायलट भी हैं. कॉनर 70 को पार कर चुके हैं. अभियान दल में निवेशक और पूर्व इस्राएली फाइटर पायलट 64 वर्षीय एतान स्टीबे और कनाडा के उद्योगपति 64 वर्षीय मार्क पैथी भी शामिल हैं.
मुस्कुराहटों से स्वागत
दल का स्वागत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मौजूत सात वैज्ञानिकों ने किया. ये सातों वैज्ञानिक इंटरनेशल स्पेस स्टेशन पर नियमित रूप से रहने वाले दल का हिस्सा हैं. इनमें तीन अमेरिकी, एक जर्मन और तीन रूसी अंतरिक्ष यात्री हैं.
इस पूरी यात्रा का लाइव प्रसारण अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी नासा ने किया था. प्रसारण में चारों एग्जिओम अंतरिक्ष यात्रियों को मुस्कुराते हुए कैप्सूल से बाहर निकलते देखा जा सकता था. आईएसएस के क्रू ने गले लगाकर उनका स्वागत किया. उसके बाद एक औपचारिक स्वागत समारोह हुआ जिसमें दल के प्रमुख लोपेज-अल्जीरिया ने एस्ट्रोनॉट होने की निशानी को बाकी सदस्यों के कंधों पर लगाया गया.
स्टीबे अंतरिक्ष की यात्रा करने वाले दूसरे इस्राएली हैं. इससे पहले इलान रामोन 2003 में अंतरिक्ष गए थे. वह भारतीय मूल की कल्पना चावला वाले उसी दल का हिस्सा थे जिसका विमान उतरते वक्त हादसे का शिकार हो गया था और सभी छह सदस्य मारे गए थे.
वैज्ञानिक अभियान
एग्जिओम दल अंतरिक्ष में दो दर्जन से ज्यादा वैज्ञानिक परीक्षण करने वाला है. इनमें बायोमेडिकल और अन्य परीक्षण शामिल हैं. मुख्य परीक्षणों में मस्तिष्क की सेहत, स्टेम सेल, कैंसर और उम्र का बढ़ना जैसे विषय होंगे. मिसाल के तौर पर इस्राएल की कंपनी ब्रेन डॉट स्पेस का बनाया एक विशेष हेल्मेट अंतरिक्ष में प्रयोग के लिए ले जाया गया है. इसमें खास तरह की तकनीक इस्तेमाल की गई है जो अंतरिक्ष यात्रियों की मस्तिष्क गतिविधियों का आंकलन करेगी.
यह अभियान इलॉन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स, नासा और एग्जिओम का साझा अभियान है जिसे अंतरिक्ष में व्यवयसायिक गतिविधियों की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है. नासा अधिकारियों ने कहा कि निजी अभियानों के अंतरिक्ष में जाने का यह चलन सुनिश्चित करेगा कि उसके संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए किया जाए.
वैसे तो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहले भी निजी क्षमता में कई आम नागरिक गए हैं, लेकिन एग्जिओम का अभियान पहला ऐसा दल है जिसमें सभी सदस्यों को एक निजी कंपनी ने, अपने ही विशेष मकसद से भेजा है. दो साल के भीतर यह स्पेस एक्स का अंतरिक्ष में छठा अभियान है.
वीके/सीके (रॉयटर्स, एपी)
रामनवमी पर निकाली गई यात्राओं के बीच कम से कम चार राज्यों में हिंसक झड़पें हुईं, जिनमें कई लोग घायल हो गए और काफी संपत्ति का नुकसान हुआ. गुजरात में हिंसा के दौरान एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
10 अप्रैल को रामनवमी से जुड़ी शोभायात्रा के दौरान हिंसक घटनाएं गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में हुईं. गुजरात के आणंद और साबरकांठा जिलों के दो शहरों में यात्राओं के दौरान दो समुदायों के बीच पहले पत्थरबाजी हुई.
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, देखते ही देखते हिंसक झड़पें शुरू हो गईं. गाड़ियों और दुकानों को आग लगा दी गई. पुलिस ने भी लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले दागे. कई लोग घायल हो गए, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे.
एक व्यक्ति की मौत
देर शाम आणंद के खंभात शहर में पुलिस को घटनास्थल से एक व्यक्ति का शव बरामद हुआ. पुलिस ने मृतक की उम्र 60-65 साल बताई है. उसकी अभी तक पहचान नहीं हो पाई है. मृत्यु का कारण पोस्टमार्टम के बाद ही पता चलेगा.
इसी तरह के घटनाक्रम की खबरें मध्य प्रदेश के खरगोन, पश्चिम बंगाल के हावड़ा और झारखंड के लोहरदगा और बोकारो जिलों से भी आईं. खरगोन में कम से कम 10 घरों में आग लगा दी गई और दो दर्जन से भी ज्यादा लोग घायल हो गए. स्थानीय पुलिस अधीक्षक के भी घायल होने की खबर आई. शहर के कुछ हिस्सों में कर्फ्यू लगा दिया है.
जेएनयू में भी हिंसा
इसके अलावा दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रामनवमी पर मांसाहारी भोजन खिलाए जाने को लेकर छात्र परिषद्व (जेएनयूएसयू) और एबीवीपी के बीच विवाद हुआ और वह भी हिंसक झड़प में बदल गया. दोनों तरफ से कम से कम 16 छात्र घायल हो गए.
दिल्ली पुलिस ने मामले में एक एफआईआर दर्ज की है. घायलों को आस पास के अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाया गया. लगभग सभी घटनाओं में दोनों समुदायों के लोगों ने एक दूसरे पर झगड़ा शुरू करने का आरोप लगाया है. सोशल मीडिया पर भी कई तरह के वीडियो डाले गए हैं जिनमें अलग अलग दावे किए जा रहे हैं. (dw.com)
हिरासत में लिए गए लोगों तक की निजी जानकारियों और शरीर के नाप आदि को जुटाने का अधिकार देने वाला दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक 2022 लोकसभा में पास हो गया है. लगभग पूरे विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया था.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट-
भारत की संसद के निचले सदन लोकसभा ने क्रिमिनल प्रोसीजर (शिनाख्त) बिल पास कर दिया है. सोमवार को इस बिल के पारित होने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस कानून का कोई गलत इस्तेमाल नहीं होगा. अमित शाह ने कहा, "सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेगी कि कानून का कोई गलत इस्तेमाल ना हो.”
विपक्ष ने इस बिल को लेकर चिंताएं जताई थीं कि इस कानून का इस्तेमाल अधिकारियों द्वारा आम लोगों को परेशान करने में किया जा सकता है. इसके अलावा इस कानून के तहत जुटाई गईं आम लोगों की जानकारियों के गलत प्रयोग की आशंकाएं विपक्षी दलों के अलावा मानवाधिकार और डेटा प्राइवेसी के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता भी जताते रहे हैं. शिवसेना सदस्य विनायक राउत ने इस बिल को ‘मानवता के साथ क्रूर मजाक' बताया था.
सभी दलों की मांग पर गृह मंत्री ने भरोसा दिलाया कि बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजा जाएगा. बिल पारित करने से पहले संसद की बहस के जवाब में गृह मंत्री ने कहा, "यह बिल सुनिश्चित करेगा कि जांच करने वाले अपराध करने वालों से दो कदम आगे रहें.” उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों की बात करने वालों को पीड़ितों के अधिकारों की भी बात करनी चाहिए.
विपक्ष ने किया था विरोध
लोकसभा में लगभग समूचे विपक्ष ने इस बिल का विरोध किया था. विरोध करने वालों में नवीन पटनायक के बीजू जनता दल के सांसद भी शामिल थे. विपक्षी सांसदों ने आशंका जताई कि पुलिस और अन्य कानून एजेंसियां इस कानून का इस्तेमाल आम नागरिकों को परेशान करने के लिए कर सकती हैं. यह तर्क भी दिया गया कि अब तक देश में डाटा सुरक्षा को लेकर कोई कानून नहीं है, ऐसे में डाटा जमा करना उचित नहीं है.
बड़ी टेक कंपनियों पर नकेल कसने की कवायद
विपक्ष में वाईएस जगमोहन रेड्डी की अध्यक्षता वाली वाईएसआई कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने बिल का समर्थन किया. हालांकि पार्टी के सांसद मिधुन रेड्डी ने मांग की कि सरकार गारंटी दे कि इस कानून का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ नहीं होगा और डाटा की सुरक्षा की जाएगी. समूचे विपक्ष ने मांग की कि इस बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजा जाए. इसके बावजूद सोमवार शाम को यह बिल ध्वनिमत से पास कर दिया गया.
‘कोई स्पष्टता नहीं'
चर्चा के दौरान कई सांसदों ने इस प्रावधान पर भी आपत्ति जताई कि थाने के हेड कांस्टेबल या जेल के वॉर्डन को हिरासत में बंद लोगों से लेकर सजा पाए अपराधियों तक के ‘नाप लेने का' अधिकार होगा. आरएसपी सांसद एनके प्रेमचंद्रन ने इन पंक्तियों में बदलाव की मांग की, जिसे स्वीकार नहीं किया गया.
बिल पर बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि यह एक निर्दयी बिल है जो सामाजिक स्वतंत्रताओं का विरोधी है.‘' उन्होंने कहा कि यह बिल पहचान के मकसद से अपराधियों और अन्य लोगों के शरीर का नाप लेने और उस रिकॉर्ड को संरक्षित रखने का विकल्प देता है, जो संविधान की धारा 14, 19 और 21 के विरुद्ध है जिनमें मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के अधिकारों की बात है.
यूपी में महिला सुरक्षा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्राइवेसी का मुद्दा
डीएमके नेता दयानिधि मारन ने भी इस बिल को जन विरोधी और संघीय भावना के विरुद्ध बताया. उन्होंने सरकार पर एक ‘सर्विलांस स्टेट' बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस बिल में बहुत कुछ अस्पष्ट छोड़ दिया गया है और यह नागरिकों की निजता का उल्लंघन करता है. (dw.com)
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी सरकार की दूसरी पारी में अनजान मुस्लिम चेहरे दानिश आजाद अंसारी को राज्य मंत्री बनाया गया है.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट-
यूपी के बलिया जिले के रहने वाले 31 वर्षीय दानिश आजाद अंसारी किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं और बीजेपी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं. मुसलमानों के सुन्नी समाज में पिछड़े वर्ग यानी पसमांदा समाज से आने वाले दानिश अंसारी को मंत्री बनाकर बीजेपी ने अपने ऊपर लगे उस धब्बे को धुंधला करने की कोशिश की है कि मुसलमान उससे दूर रहते हैं और वो भी मुसलमानों से दूरी बनाकर रहती है.
हालांकि बीजेपी के कई बड़े नेता अक्सर ऐसे बयान देते हैं कि उन्हें मुस्लिम समाज का वोट नहीं मिलता और विधानसभा चुनाव या फिर लोकसभा चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट ना देने के पीछे भी यही तर्क दिया जाता है लेकिन दानिश अंसारी का दावा है कि अब मुस्लिम समाज तेजी से बीजेपी की ओर आ रहा है और इस बार यूपी विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है.
पिछड़े मुस्लिम तबके को रिझाने की कोशिश
डीडब्ल्यू से बातचीत में दानिश अंसारी कहते हैं, "यूपी में एक युवा को मंत्री बनाया गया है इसके लिए बीजेपी और मोदी-योगी की तारीफ होनी चाहिए. सच्चाई यह है कि बीजेपी ही मुस्लिमों के बारे में वास्तव में सोचती है, बाकी पार्टियों ने सिर्फ इस्तेमाल किया है. सभी सरकारी योजनाओं का लाभ मुस्लिम तबके के लोगों को मिला है और यही वजह है कि मुसलमानों ने इस बार बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट किया है. मुसलमान अब गुमराह नहीं हो रहा है. उसे भी पता है कि वास्तव में उनका हित किसके साथ है.”
दानिश अंसारी को मंत्री बनाकर यह संदेश देने की भी कोशिश की गई है कि सुन्नी मुसलमानों से भी बीजेपी अब नजदीकी बढ़ाने की कोशिश कर रही है. मंत्रिपरिषद से शिया समुदाय से आने वाले मोहसिन रजा को हटा कर दानिश अंसारी को मंत्री बनाए जाने से यह स्पष्ट संदेश है कि महज कुछ शिया समुदाय के लोग ही नहीं बल्कि सुन्नी और पसमांदा मुसलमान भी बीजेपी की ओर आकर्षित हो रहे हैं और बीजेपी भी उन्हें महत्व दे रही है.
लखनऊ, बरेली, रामपुर जैसे जिलों में शिया मुसलमानों का एक वर्ग बीजेपी से जुड़ाव रखता रहा है लेकिन सुन्नी मुसलमानों में अब तक बीजेपी के प्रति किसी तरह का झुकाव नहीं देखने में आया है. बताया यह भी जा रहा है कि बीजेपी सरकार के दौरान जो कल्याणकारी योजनाएं चलाई गई थीं, मसलन, राशन, आवास इत्यादि का लाभ मुसलमानों के इसी वर्ग को हुआ है और इस वर्ग ने कहीं-कहीं बीजेपी को वोट भी दिया है. हालांकि इसे लेकर आशंकाएं भी जताई जा रही हैं लेकिन कुछ हद तक इसमें सच्चाई भी है.
चुनावों में बीजेपी का कोई मुस्लिम उम्मीवार नहीं
दानिश आजाद अंसारी बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के महामंत्री हैं और विद्यार्थी जीवन से ही बीजेपी की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं. साल 2017 में यूपी में बीजेपी सरकार आने के बाद उन्हें भाषा समिति का सदस्य बनाया गया और वे मुस्लिम समाज, खासकर युवाओं में लगातार सक्रिय बने रहे. पिछली योगी सरकार में एकमात्र मुस्लिम मंत्री मोहसिन रजा थे और वो भी मंत्री बनते वक्त किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. बीजेपी ने इस बार भी विधानसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया था. मोहसिन रजा पिछली सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण, वक्फ और हज मंत्री थे, दानिश आजाद को भी यही विभाग सौंपे गए हैं.
दानिश अंसारी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का करीबी माना जाता है. उनके पक्ष में एक बात यह भी है कि वे पूर्वांचल से आते हैं और पूर्वांचल के मुसलमानों में बीजेपी की पैठ ना के बराबर है. हालांकि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए मुसलमानों को बीजेपी और संघ से जोड़ने की कोशिशें पिछले काफी समय से चल रही हैं लेकिन पूर्वांचल में अब तक इसका ज्यादा असर नहीं दिखा है. माना जा रहा है कि लखनऊ से पढाई करने वाले और बलिया के मूल निवासी दानिश अंसारी के माध्यम से बीजेपी अपने इस अभियान को धार में देने में कुछ हद तक सफल हो सकती है.
भावी चुनावों पर हैं निगाहें बीजेपी की
दरअसल, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी जिस तरह से अपने राजनीतिक और सामाजिक दायरे को बढ़ा रही है, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि वह इतने बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को पूरी तरह से अपने से अलग नहीं रहने देगी. उत्तर प्रदेश की बात करें तो दलित और पिछड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ही उसके साथ आ चुका है लेकिन मुस्लिम तबका अभी भी उससे दूरी बनाए हुए है. हालांकि मुसलमानों का शिया वर्ग अटल बिहारी वाजपेयी के समय से ही बीजेपी के प्रति कुछ हद तक हमदर्दी रखता था लेकिन बड़ा सुन्नी वर्ग उससे दूरी बनाए हुए था.
यूपी में योगी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद अब बीजेपी की निगाहें 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर हैं और वह अपना जनाधार बढ़ाने का अभियान जारी रखे हुए है और हर नए प्रयोग करने से पीछे नहीं हट रही है. ऐसा माना जा रहा है कि दानिश अंसारी को मंत्री बनाकर और उनके जरिए मुसलमानों के अति पिछड़े वर्ग को अपनी तरफ करने की यह उसकी दूरगामी रणनीति का हिस्सा है. यही नहीं, दलितों में जाटव समाज की नजदीकी भी बीजेपी के इसी अभियान का हिस्सा है.
बीजेपी ने दानिश आजाद अंसारी को मंत्री पद देकर साल 2024 के लोक सभा चुनाव से पहले ही कुछ नए राजनीतिक समीकरण गढ़ने की कोशिश की है. दानिश अंसारी मुस्लिम समुदाय में जिस अंसारी समाज से आते हैं, वह आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा भले ही हो लेकिन संख्या बल में ज्यादा होने के बावजूद राजनीति में इस वर्ग की भागीदारी बहुत कम है. यदि इस समाज को बीजेपी अपने साथ जोड़ने में कुछ हद तक भी कामयाब हो पाती है तो निश्चित तौर पर यह उसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है. (dw.com)
भारत में कंपनियां अब नौकरी मांगने वाले कर्मचारियों की सोशल मीडिया प्रोफाइल की गहनता से पड़ताल कर रही हैं. राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले कर्मचारियों की नौकरी पाने की संभावनाओं पर भी इसका असर पड़ने लगा है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
हरीश (बदला हुआ नाम) जब दिल्ली के पास नोएडा में सिनेमाघरों के टिकट ऑनलाइन बुक करने की सुविधा देने वाली कंपनी के लिए काम करते थे तो वह अपने राजनीतिक विचार सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर साझा करते थे. अपने विचारों को लेकर अपने सहकर्मियों से बहस तक करते, जो कि अक्सर सरकार विरोधी (केंद्र में बीजेपी सरकार) होते थे. खाने की मेज हो या फिर चाय ब्रेक, हरीश और उनके सहकर्मियों के बीच सरकार की नीतियों को लेकर लंबी बहस होती. लेकिन हरीश को एक दिन यह ख्याल आया कि कहीं यह बहसबाजी उनके करियर के लिए नकारात्मक ना हो जाए.
हरीश कहते हैं, "मैंने इस बात पर तब और गंभीरता से विचार किया जब मेरी बेटी पैदा हुई. मैंने सोचा क्या मेरे पोस्ट से कहीं मेरा करियर दांव पर तो नहीं लग रहा है. कहीं मेरे प्रति दफ्तर के लोगों में अलग सोच तो नहीं पैदा हो रही है. कहीं मैं समस्या पैदा करने वालों के रूप में जाने अनजाने में तो नहीं जाना जा रहा हूं."
हरीश कुछ साल पहले दिल्ली से बेंगलुरू चले गए और उन्होंने सोशल मीडिया पर राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी ही करना बंद कर दिया. बेटी पैदा होने से पहले तक वह महंगाई, सरकार की नीतियों और अहम राजनीतिक मुद्दों पर अपने विचार साझा करते थे. इस तरह से उनके सहकर्मियों और उनके बीच एक राजनीतिक लकीर भी खिंच गई. हरीश कहते हैं, "पहले की बात अलग थी, अब मेरी बेटी है और जॉब मार्केट में उतनी नौकरियां नहीं हैं. मैं किसी तरह का भी जोखिम नहीं उठाना चाहता."
सोशल मीडिया पोस्ट से परहेज
भारत में अब नौकरी करने वाला एक तबका राजनीतिक और धार्मिक मुद्दों पर खुलेआम सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने से बच रहे हैं. खासकर सत्ताधारी दल बीजेपी के खिलाफ. सिर्फ यही नहीं बल्कि कंपनियां अपने कर्मचारियों के सोशल मीडिया खाते को लिंक्डिन खाते से मिलाती हैं, यह जानने के लिए कहीं कर्मचारी अपनी नौकरी को लेकर सोशल मीडिया पर डींग तो नहीं मार रहा है.
सिंपली एचआर सॉल्यूशंस के मैनेजिंग पार्टनर रजनीश सिंह कहते हैं कि सोशल मीडिया तेजी से एक ऐसा स्थान बनता जा रहा है जहां भर्ती के फैसले पर पहुंचने के दौरान व्यक्ति के द्वारा पोस्ट की गई सामग्री पर ध्यान दिया जाता है. वह बताते हैं कि कुछ कंपनियों के पास अब उनके एचआर मैनुअल के हिस्से के रूप में सोशल मीडिया पॉलिसी है. सिंह के मुताबिक, "सोशल मीडिया पॉलिसी स्पष्ट रूप से बताती है कि अगर किसी कर्मचारी द्वारा विशेष रूप से कंपनी का नाम लेते हुए पोस्ट साझा किए गए तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा."
साथ ही सिंह कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति निजी क्षमता में पोस्ट कर रहा है तो उसे गंभीरता से नहीं लिया जाएगा लेकिन कंपनी के बारे में नकारात्मक बातें पोस्ट करना स्पष्ट रूप से एक कदाचार के रूप में देखा जाता है. सिंह के मुताबिक, "ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कर्मचारियों को इस तरह के कदाचार के लिए बर्खास्त तक कर दिया गया है."
बढ़ रहे हैं मामले
2019 में मैकफी द्वारा किए 1,000 लोगों पर सर्वे में यह तथ्य सामने आया था 21 प्रतिशत भारतीय किसी ऐसे व्यक्ति को जानते थे जिनके करियर की संभावनाओं पर उनके सोशल मीडिया पोस्ट से नकारात्मक प्रभाव पड़ा था. वहीं 25.7 प्रतिशत भारतीयों ने अपने वर्तमान कार्यस्थल के बारे में नकारात्मक सामग्री पोस्ट करने की बात स्वीकार की. 21 प्रतिशत भारतीयों को डर था कि उनकी सोशल मीडिया सामग्री उनके करियर की संभावनाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी.
एक पहलू यह भी है कि सोशल मीडिया ही सरकारों पर दबाव बनाने का काम करती है. भ्रष्टाचार, सरकार की नाकामी जैसे मामले जब सोशल मीडिया पर आते हैं तो जाहिर तौर पर दबाव बनता है. बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर भारत के युवा ट्विटर पर सवाल करते हैं और उसे ट्रेंड भी कराने में सफल रहते हैं. लेकिन वही व्यक्ति अगर नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाता है तो उसके द्वारा सोशल मीडिया कॉमेंट्स और शेयर उसे मुसीबत में भी डाल सकते हैं. सिंह बताते हैं, "संभावित कर्मचारी की सोशल मीडिया प्रोफाइल की जांच का ट्रेंड आने वाले समय में और बढ़ेगा ही. यह निर्भर करता है कि कंपनी खुद या थर्ड पार्टी से संभावित कर्मचारी की जांच कराती है."
सिंह का कहना है कि अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर व्यक्ति के आचरण से पता चल जाता है कि वह किस तरह का है और वह कंपनी को किस तरह का लाभ पहुंचाएगा या पहुंचाएगी.
मानव संसाधन में भर्ती प्रक्रिया पर राजनीतिक दखल की बात पर सिंह का कहना है, "अगर भर्ती प्रक्रिया में शामिल मैनेजर भी उसी स्वभाव का है तो हो सकता है कि उम्मीदवार को भर्ती में मदद मिल जाए." लेकिन साथ ही वे कहते हैं कि एक पेशेवर होने के नाते हमें इस बात के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है कि हम राजनीति के इर्द-गिर्द कितना पोस्ट कर रहे हैं और हम अपने विचारों, टिप्पणियों या पसंद को साझा करने में कितने संतुलित हैं.
सूचना क्रांति के इस आधुनिक युग में सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रगति में सूचना क्रांति ने अहम भूमिका निभाई है. लेकिन एक सवाल यह भी खड़ा हो जाता है कि क्या उसने समाज में बंटवारे की स्थिति पैदा तो नहीं कर दी. (dw.com)
दिल्ली में पहली बार पेट्रोल की कीमतें सौ रुपये प्रति लीटर के पार हो गई है. पिछले आठ दिन में सात बार ईंधन की कीमतें बढ़ाई गई हैं, जो एक नया रिकॉर्ड है.
दिल्ली में पेट्रोल सौ रुपया प्रति लीटर बिक रहा है, जो पहली बार हुआ है. सोमवार को पेट्रोल की कीमतों में 80 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि के बाद यह राजधानी में 100.21 रुपये प्रति लीटर हो गया, जो एक रिकॉर्ड है. पिछले एक हफ्ते में पेट्रोल के दाम 4.80 रुपये प्रति लीटर बढ़ चुके हैं.
डीजल की कीमत में 70 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की गई है जिसके बाद यह 90.77 रुपये से बढ़कर 91.47 रुपये प्रति लीटर हो गया है. देशभर में बढ़ाई गई कीमतों का असर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हुआ है, इसलिए विभिन्न शहरों के दाम अलग-अलग हो सकते हैं.
22 मार्च से अब तक ईंधन की कीमतें आठ बार बढ़ाई गई हैं. इससे पहले साढ़े चार महीने तक लगातार कीमतें स्थिर रही थीं, जिसकी वजह जानकारों ने यूपी और चार अन्य राज्यों में जारी विधानसभा चुनावों को बताया था.
इस हफ्ते में पहली चार बार लगातार पेट्रोल के दाम 80 पैसे प्रति लीटर बढ़ाए गए जो 2017 के बाद एक बार में हुई सबसे बड़ी वृद्धि थी. पांचवीं बार दाम 50 पैसे प्रति लीटर और फिर 30 पैसे प्रति लीटर बढ़ाए गए. डीजल के दाम 55 पैसे और 35 पैसे प्रति लीटर बढ़ाए गए थे.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटे दाम
सोमवार को कच्चे तेल के दामों में 7 फीसदी की कमी आई जब चीन ने अपने वित्तीय केंद्र शंघाई पर नए सिरे से लॉकडाउन लागू कर दिया. इस कारण बाजार में फिर से मांग घटने का डर छा गया और कच्चे तेल के दाम घट गए. ब्रेंट क्रूड ऑयल 8.17 डॉलर घटकर 112.48 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ जबकि यूएस वेस्ट टेक्सस इंटरमीडीएट क्रूड के दाम में 7.94 डॉलर प्रति बैरल की कमी आई और यह 105.96 पर बंद हुआ.
यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से ही कच्चे तेल के दामों में अस्थिरता बनी हुई है. पिछले हफ्ते कच्चे तेल के दाम औसतन करीब 10 प्रतिशत बढ़ गए थे. लेकिन शंघाई में दो चरण के लॉकडाउन के ऐलान के बाद सोमवार से करीब ढ़ाई करोड़ लोगों पर कहीं आने जाने की पाबंदी लग गई है. अधिकारियों ने ट्रैफिक बंद करने के लिए पुलों और सुरंगों को भी बंद कर दिया है.
अमेरिका के ह्यूस्टन में लिपो ऑयल एसोसिएट्स के मुखिया एंड्रयू लिपो ने बताया, "यह डर है कि लॉकडाउन और जगहों पर भी फैल सकता है. साथ ही लंबे समय से बाजार में जारी धन की आमद के चलते कीमतें घट रही हैं.” चीन कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है. अनुमान है कि अप्रैल महीने में वहां तेल की मांग औसत से आठ लाख बैरल प्रति दिन कम रह सकती है.
वीके/एए (रॉयटर्स, एपी)
लोकसभा में सोमवार को केंद्र सरकार ने दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक 2022 पेश किया. इसमें किसी अपराध के मामले में गिरफ्तार और दोषसिद्ध अपराधियों का रिकॉर्ड रखने के लिए तकनीक के इस्तेमाल की इजाजत देने का प्रस्ताव है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
इस विधेयक को लोकसभा में 58 के मुकाबले 120 मतों से पेश करने की मंजूरी मिली. इस विधेयक को हाल में केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. विधेयक पेश करते हुए गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने कहा कि मौजूदा अधिनियम को बने 102 साल हो गए हैं. मंत्री ने लोकसभा में कहा कि उसमें सिर्फ उंगली के निशान और पांव के निशान लेने की अनुमति दी गई, जबकि अब नई प्रौद्योगिकी आई है और इस संशोधन की जरूरत पड़ी है.
सरकार का कहना है कि संशोधन से जांच एजेंसियों को मदद मिलेगी और दोषसिद्धि भी बढ़ेगी. वहीं इस विधेयक के विरोध में लोकसभा में कांग्रेस सांसदों ने कहा कि यह अनुच्छेद 20 और 21 का उल्लंघन है.
कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आरएसपी, बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों ने इस पर इतना विरोध किया कि इसे पेश करने को लेकर वोटिंग करानी पड़ी. विपक्ष की मांग पर हुई वोटिंग में विरोधी 58 मतों के मुकाबले पक्ष में आए 120 मतों के आधार पर सदन में इस पेश करने की मंजूरी दी गई. कांग्रेस ने कहा कि यह बिल निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है.
पुलिस को मिलेगी और ताकत?
विधेयक के पारित होने के बाद पुलिस के पास यह अधिकार आ जाएगा कि वह आरोपी या सजायाफ्ता लोगों के शारीरिक और जैविक नमूने ले सकेगी. पुलिस आंखों की पुतलियों की पहचान, हथेली-पैरों की छाप, फोटो और लिखावट के नमूने भी ले सकेगी.
सरकार का कहना है कि ज्यादा रिकॉर्ड होने से अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने के काम में तेजी आएगी.
बिल पुलिस थाना प्रभारी या हेड कांस्टेबल रैंक के पुलिसकर्मी को आरोपियों के नमूने लेने का अधिकार देता है. इन मापों के रिकॉर्ड संग्रह की तारीख से 75 वर्षों तक बनाए रखा जाएगा. यह बिल अपराधियों की पहचान अधिनियम 1920 को खत्म कर नया कानून बनाने के लिए लाया गया है. (dw.com)
रूस के प्रति रुख को और कड़ा करने की मांगों के बीच भारत सरकार ने कहा है कि वो रूस से कोयला आयात करना भी जारी रखना चाह रही है. स्टील के उत्पादन के लिए आवश्यक कोकिंग कोयला का आयात दोगुना किया जा सकता है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
पश्चिमी देश लगातार भारत को रूस के प्रति अपना रुख कड़ा करने की अपील कर रहे हैं लेकिन भारत सरकार इन मांगों के बीच अपने हितों को प्राथमिकता देती नजर आ रही है. पहले रक्षा सौदों पर बात हुई, फिर सस्ते दामों पर रूसी तेल खरीदने पर और अब कोयले पर चर्चा चल रही है.
भारत के केंद्रीय इस्पात मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह ने नई दिल्ली में पत्रकारों को बताया, "हम रूस से कोकिंग कोयला आयात करने की दिशा में बढ़ रहे हैं." कोकिंग कोयला स्टील के उत्पादन के लिए आवश्यक होता है. भारत पहले से ही रूस से इसे आयात करता रहा है.
आ रहा है लाखों टन कोयला
सिंह ने बताया कि भारत अब रूसी कोकिंग कोयले के आयात को दोगुना करने की योजना बना रहा है. उन्होंने बताया कि 45 लाख टन कोयले का आयात हो चुका है, लेकिन उन्होंने इस आयात की अवधि नहीं बताई.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि रूस से कोकिंग कोयले की आपूर्ति बाधित हुई है. माना जा रहा है कि वो यूक्रेन युद्ध के विषय में बोल रहे थे. उन्होंने इस बारे में आगे विस्तार से नहीं बताया. कंसल्टेंसी कंपनी केपलर के अनुसार इस महीने कम से कम 10 लाख टन कोकिंग कोयला और थर्मल कोयला समुद्र के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचा दिया जाएगा.
इतनी बड़ी मात्रा में रूसी कोयला जनवरी 2020 के बाद भारत में नहीं आया. कोकिंग कोयले का इस्तेमाल मुख्य रूप से स्टील बनाने में किया जाता है और थर्मल कोयले का बिजली बनाने के लिए.
रूस भारत के लिए इन दोनों का छठा सबसे बड़ा पूर्तिकर्ता है. व्यापारियों का कहना है कि चूंकि प्रतिबंधों की वजह से यूरोपीय और दूसरे ग्राहकों ने रूस से दूरी बना ली है, ऐसे में रूस चीनी और भारतीय ग्राहकों को और सस्ते दामों की पेशकश कर सकता है.
प्रतिबंधों के बीच व्यापार
उन्होंने कहा कि रुपये-रूबल व्यापार के इस्तेमाल से इस व्यापार को और मजबूत भी किया जा सकता है. कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि भारत सरकार रुपये-रूबल व्यापार को फिर से शुरू करने पर विचार कर रही है.
दोनों मुद्राओं के बीच सही विनिमय दर स्थापित करने के लिए दोनों को किसी तीसरी विदेशी मुद्रा से जोड़ना होगा. संभावना है कि रूस से तेल खरीदने के लिए भी इसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है.
यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिमी देशों और जापान ने रूस सरकार और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से जुड़े कई लोगों पर कई प्रतिबंध लगाए हैं. भारत ने इन प्रतिबंधों में साथ नहीं दिया है और रूस के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते जारी रखे हैं.
मनोहर परिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस में एसोसिएट फेलो स्वस्ति राव ने डीडब्ल्यू को बताया कि रूस ने भारत को कच्चे तेल के दामों में 27 प्रतिशत छूट की पेशकश की थी. कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भारत ने इस दाम पर करीब 60 लाख बैरल कच्चे तेल का ऑर्डर दे दिया है. (dw.com)
केंद्रीय श्रम संगठनों के एक साझा मंच ने केंद्र सरकार की कई नीतियों के खिलाफ दो दिनों के भारत बंद का ऐलान किया है. इस वजह से पूरे देश में बैंक, यातायात, बिजली और टेलीकॉम जैसी सेवाएं प्रभावित रह सकती हैं.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
श्रम संगठनों ने दावा किया है कि बंद लागू करने में संगठित और असंगठित क्षेत्र के 20 करोड़ से भी ज्यादा कर्मचारी साथ देंगे. बैंक, सड़क यातायात, रेल, स्टील, तेल, टेलीकॉम, कोयला, डाक, आय कर और बीमा जैसे क्षेत्रों के कर्मचारियों के हड़ताल भी शामिल होने की संभावना है.
बंद में आइएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीआईटीयू जैसे कई श्रम संगठन हिस्सा ले रहे हैं. संगठनों के साझा मंच ने कहा है की उनकी प्रमुख मांगें हैं लेबर कोड को खत्म करना, सरकारी कंपनियों के निजीकरण को रोकना, नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (एनएमपी) को खत्म करना, मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाना और अनुबंध पर काम करने वाले कर्मचारियों को पक्का रोजगार देना.
संयुक्त किसान मोर्चा ने भी बंद को समर्थन देने की घोषणा की है और पूरे देश में किसानों से बंद में सक्रीय रूप से हिस्सा लेने के लिए कहा है.
बंद की वजह से कई क्षेत्रों में सेवाओं पर असर पड़ सकता है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया समेत कई बैंकों ने अपने ग्राहकों से कहा है कि वो बंद के दौरान कुछ सेवाओं के प्रभावित होने के लिए तैयार रहें. ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं सुचारू रूप से चल सकती हैं.
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने बंद के आयोजन को देखते हुए सभी सरकारी बिजली कंपनियों से कहा है कि वो हाई अलर्ट पर रहें, बिना रुकावट बिजली की आपूर्ति और राष्ट्रीय ग्रिड की स्थिरता सुनिश्चित करें. विशेष रूप से अस्पतालों, रक्षा संस्थानों और रेल सेवाओं के लिए बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है.
पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार ने आदेश जारी कर सरकारी कर्मचारियों को बंद में शामिल नहीं होने के लिए कहा है. इसके बावजूद राज्य में बंद का असर दिख रहा है.
बंद के मुद्दों की गूंज संसद में भी पहुंच सकती है. विपक्ष के कुछ सांसदों ने बंद पर चर्चा करने के लिए कार्य स्थगन प्रस्ताव दिए हैं. (dw.com)
भारत छोड़कर विदेशों में बसना चाहने वालों की संख्या में तेज वृद्धि देखी जा रही है. एक ताजा रिपोर्ट कहती है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में भारत के धनी लोग देश छोड़ने के इच्छुक हैं.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट-
लोगों को दूसरे देशों की नागरिकता और वीजा दिलाने वाली ब्रिटेन स्थित अंतरराष्ट्रीय कंपनी हेनली ऐंड पार्टनर्स का कहना है कि गोल्डन वीजा यानी निवेश के जरिए किसी देश की नागरिकता चाहने वालों में भारतीयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है.
हेनली ग्लोबल सिटिजंस रिपोर्ट के मुताबिक नागरिकता नियमों के बारे में पूछताछ करने वालों में 2020 के मुकाबले 2021 में भारतीयों की संख्या 54 प्रतिशत बढ़ गई. 2020 में भी उससे पिछले साल के मुकाबले यह संख्या 63 प्रतिशत बढ़ी थी.
रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे नंबर पर अमेरिका के लोग रहे जिनकी संख्या में 2020 के मुकाबले 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इस सूची में ब्रिटेन तीसरे और दक्षिण अफ्रीका चौथे नंबर पर रहा. ब्रिटेन के लोगों की संख्या तो दोगुनी से भी ज्यादा हो गई.
धनी लोगों की चाह
हेनली ऐंड पार्टनर्स में अधिकारी डॉमिनिक वोलेक कहते हैं, "सबसे ज्यादा पूछताछ जिन देशों से आई, उनमें दुनिया के दक्षिणी हिस्से के देश ज्यादा हैं, सिवाय कनाडा के जो नौवें नंबर पर है. 2022 में भी हम ऐसा ही रूझान देख रहे हैं और शुरुआत में ही पूछताछ की संख्या को देखकर लग रहा है कि 2021 से भी ज्यादा वृद्धि हो सकती है.”
वोलेक के मुताबिक ‘माइग्रेशन बाई इनवेस्टमेंट' यानी निवेश के जरिए दूसरे देशों में बसने की इच्छा रखने वालों में धनी लोगों की संख्या ही ज्यादा है. वह कहते हैं, "विदेशों में बसने के पारंपरिक फायदे तो हैं ही, निवेश के जरिए नागरिकता जैसी योजनाएं लोगों को अपने धन के निवेश में विविधता का विकल्प भी देती हैं.”
दक्षिण एशिया में हेनली ऐंड पार्टनर्स के अधिकारी निर्भय हांडा कहते हैं कि दक्षिण एशिया में निवेश के जरिए माइग्रेशन लगातार बढ़ रहा है और लोगों में इसकी स्वीकार्यता में भी वृद्धि देखी जा रही है. उन्होंने कहा, "धनी और अत्याधिक धनी निवेशक अपने परिवारों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए लगातार नए विकल्प खोज रहे हैं. 2020 के मुकाबले 2021 में हमने 52 प्रतिशत का इजाफा देखा है और 2022 भी बड़ी वृद्धि वाला साल होता दिख रहा है.”
मध्यमवर्गीय भी इच्छुक
मेलबर्न स्थित माइग्रेशन एजेंट चमनप्रीत कहती हैं कि यही रूझान समाज के अन्य वर्गों में भी है. माइग्रेशन ऐंड एजुकेशन एक्सपर्ट्स की डायरेक्टर चमनप्रीत ने डॉयचे वेले को बताया, "विदेशों का वीजा चाहने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कोविड के दौरान, जबकि आना-जाना बंद था, तब भी लोग लगातार पूछताछ कर रहे थे. और इनमें स्टूडेंट्स से लेकर प्रोफेशनल तक हर तबके के लोग शामिल थे.”
भारत सरकार के आंकड़े कहते हैं कि 2016 से 2021 के बीच आठ लाख से ज्यादा भारतीय अपनी नागरिकता त्याग कर विदेशी नागरिकता अपना चुके हैं. पिछले साल संसद को दी जानकारी में सरकार ने बताया था कि दिसंबर 2021 तक पांच साल में लगभग 6,10,000 लोग भारत की नागरिका छोड़ गए थे जिनमें से सबसे ज्यादा 42 प्रतिशत ने अमेरिका की नागरिकता हासिल की. 2021 के पहले नौ महीनों में ही 50 हजार से ज्यादा भारतीयों ने अमेरिकी नागरिकता ग्रहण कर ली थी.
भारत छोड़कर जाने वालों की दूसरी पसंद कनाडा रहा जहां 2017 से 2021 के बीच 91 हजार भारतीय ने नागरिकता अपनी. तीसरे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया रहा जहां कि 86,933 भारतीय पांच साल में नागरिक बन गए. उसके बाद इंग्लैंड (66,193) और फिर इटली (23,490) का नंबर है.
यूके, अमेरिका भी छोड़ना चाहते हैं लोग
इस सूची में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे धनी देश भी हैं जहां के लोग निवेश के जरिए दूसरे देशों की नागरिकता पाना चाहते हैं. रिपोर्ट कहती है कि बीते दो साल में उत्तरी गोलार्थ की भू-राजनीतिक परिस्थितियां बहुत ज्यादा अस्थिर हो गई हैं, जिसका असर इस सूची में नजर आ रहा है. हेनली के अमेरिका अध्यक्ष मेहदी कादरी कहते हैं, "2019 से 2021 तक पूछताछ करने वाले अमेरिकी लोगों की संख्या में 320 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. यह मांग अमेरिका में भू-राजनीतिक अस्थिरता के चलते बढ़ी है. साथ ही कई दक्षिण अमेरिकी देशों में राजनीतिक बदलाव, कोरोनावायर और इसका खराब प्रबंधन व यात्रा प्रतिबंधों के कारण आने-जाने में हुईं दिक्कतें भी शामिल हैं.”
ब्रिटेन के लोगों की विदेशी नागरिकता में बढ़ती दिलचस्पी के पीछे ब्रेक्जिट को भी एक महत्वपूर्ण कारक के तौर पर देखा जा रहा है. संस्था के लंदन प्रमुख स्टुअर्ट वेकलिंग कहते हैं, "यूरोप में सबसे ज्यादा पूछताछ करने वालों में अब भी ब्रिटिश नागरिक सबसे ऊपर हैं. 2020 के मुकाबले 2021 में इनमें 110 प्रतिशत का उछाल आया है. ज्यादातर लोग ब्रेक्जिट के बाद रहने और बसने आदि के विकल्पों से प्रेरित हैं.”
लेकिन यूरोप में सबसे ज्यादा बढ़त तुर्की में देखी गई है, जहां के 148 प्रतिशत ज्यादा लोगों ने विदेशों की नागरिकता पाने के बारे में पूछताछ की. हेनली ने कहा है कि तुर्की के लोगों की विदेशों में बसने की बढ़ती चाह को देखकर उसने तो देश में नया दफ्तर ही खोल लिया है.
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कोविड ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को भारी नुकसान पहुंचाया तो कुछ सबक भी सिखाए. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सबकों के सही समय पर इस्तेमाल करने को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति जग पाएगी?
2020-21 में जब कोविड ने भारत पर कहर बरपाया और लाखों लोगों की जान ले ली, तब एक और घातक महामारी जारी थी, जिसकी ओर ध्यान छूट गया. वह महामारी थी टीबी. कोविड के खिलाफ लड़ाई ने उस महामारी से निपटने में जरूरी कोशिशों को भी प्रभावित किया. लेकिन अब कोविड के शांत हो जाने के बाद टीबी की ओर ध्यान दोबारा लौट रहा है.
भारत दुनियाभर के टीबी मरीजों में से लगभग एक चौथाई का घर है. एक अनुमान के मुताबिक 2020 में भारत में लगभग पांच लाख लोगों की मौत टीबी से हुई, जो कि पूरी दुनिया में हुई मौतों का एक तिहाई है. करीब एक दशक में पहली बार 2020 में टीबी से मौतों में वृद्धि हुई और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक सालों की मेहनत पर पानी फिर गया.
हालांकि भारत में 2020 में मिले नए मामलों की संख्या लगभग एक चौथाई घटकर 18 लाख पर आ गई, लेकिन उसकी वजह कोविड के कारण लगे प्रतिबंध थे. इस कारण संसाधनों को टीबी से हटाकर कोविड पर लगा दिया गया और जांच से लेकर इलाज तक हर चरण प्रभावित हुआ.
बीते गुरुवार विश्व टीबी दिवस के मौके पर भारत ने एक नई रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट के मुताबिक 2019-21 के दौरान लगभग दो तिहाई लोग ऐसे थे जिनके अंदर टीबी के लक्षण पाए गए लेकिन उन्हें इलाज नहीं मिला.
पीछे हो गई टीबी के खिलाफ जंग
29 साल के आशना अशेष में चार साल पहले टीबी का पता चला था. उनकी टीबी ऐसी थी जिस पर कई दवाओं का असर नहीं होता. उन्होंने देखा कि कैसे उन मरीजों को संघर्ष करना पड़ा जिनके पास लॉकडाउन के कारण नौकरी भी नहीं थी और उन्हें क्वॉरन्टीन में रहना पड़ा.
सर्वाइवर्स अगेंट्स टीबी नाम एक संगठन चलाने वाले अशेष कहते हैं, "वे बेहद डरे हुए थे. वे किसी भी तरह की सूचना, टेस्ट और इलाज आदि के लिए बेचैन थे. असर बहुत बुरा रहा है. कोविड ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को बहुत पीछे पहुंचा दिया है. भारत और दुनिया में टीबी के खिलाफ लड़ाई पुनर्जीवित करने के लिए एक योजना की तुरंत जरूरत है.”
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 तक, यानी संयुक्त राष्ट्र की समयसीमा से पांच साल पहले देश से टीबी खत्म करने का लक्ष्य तय किया था. लेकिन कोविड के कारण अब इस लक्ष्य को हासिल करना बेहद मुश्किल हो चुका है. यही वजह है कि विशेषज्ञ की मांग है कि ऐसे मामलों को खोजने के लिए जमीनी स्तर पर विशेष अभियान चलाया जाए, जो कोविड के दौरान छूट गए थे. वे अतिरिक्त फंडिंग और टीबी के लिए बड़ी वजह माने जाने वाले कुपोषण के खिलाफ नई लड़ाई की भी मांग कर रहे हैं.
इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट टीबी ऐंड लंग डिजीज के कुलदीप सिंह सचदेवा कहते हैं कि राज्य सरकारों को घर-घर जाकर जांच और सामूहिक जांच जैसे अभियान बढ़ाने होंगे. सचदेवा कहते हैं, "अब तो टीवी के समूल नाश का यही एक रास्ता है.”
कोविड से मिले सबक
आधिकारिक तौर पर भारत में कोविड से पांच लाख 20 हजार लोगों की जान जा चुकी है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा है. इस बीमारी ने दुनिया का सबसे घातक संक्रामक रोग होने का तमगा टीबी से छीन लिया था. लेकिन एक अच्छी बात हुई. कोविड के कारण मास्क का प्रयोग सामान्य हो गया.
सचदेवा अनुमान लगाते हैं कि मास्क की वजह से टीबी का प्रसार भी 20 प्रतिशत तक कम हुआ होगा. वह कहते हैं कि एक और फायदा यह हुआ है कि कोविड की जांच के लिए खरीदी गईं मशीनें अब टीबी के लिए काम आ सकेंगे.
भारत में टीबी का गढ़ कहा जाने वाले दो करोड़ से ज्यादा की आबादी का शहर मुंबई अब टीबी के लिए विशेष अभियान शुरू कर रहा है, जिसका फायदा सीमा कुंचीकोरवे जैसे युवा लोगों को होगा. टीबी से ठीक हो चुकीं कुंचीकोरवे को पांच साल पहले 20 साल की उम्र में यह बीमारी हुई थी. नई योजना के तहत उन जैसे युवाओं के लिए दवाओं की निगरानी की जाएगी. कुंचीकोरवे जगह-जगह जाकर लोगों को टीबी के प्रति जागरूक करती हैं वह बताती हैं, "इलाज के बहुत से दुष्प्रभाव भी होते हैं जिन्हें मरीज झेल नहीं पाते.”
डॉक्टर विदाउट बॉर्डर्स से जुड़े मुंबई के डॉक्टर विजय चव्हाण पांच साल के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर तरह के टीबी मरीजों का इलाजा करते हैं. वह कहते हैं कि कोविड महामारी ने टीबी महामारी के लड़ाई को लेकर कई सबक दिए हैं. वह कहते हैं, "अगर टीबी के लिए भी कोविड जैसी राजनीतिक इच्छा हो तो अच्छे नतीजे जरूर मिलेंगे.”
वीके/सीके (एएफपी)
श्रीलंका का आर्थिक संकट अब वहां के लोगों के लिए इतना असहनीय हो गया है कि कई लोग देश छोड़ कर समुद्र के रास्ते भारत आ रहे हैं. 16 श्रीलंकाई तमिल नावों में तमिलनाडु के रामेश्वरम पहुंच गए हैं.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
रामनाथपुरम के जिला कलेक्टर शंकर लाल कुमावत ने डीडब्ल्यू संवाददाता अपर्णा राममूर्ति को बताया कि 22 मार्च को कुल 16 लोग नावों में तमिलनाडु तट पर पहुंचे और 23 मार्च को 31 और लोगों के आने की उम्मीद है.
कुमावत ने यह भी बताया कि शरणार्थियों को अभी समुद्री पुलिस की निगरानी में रखा गया है क्योंकि इस समय उन्हें अवैध प्रवासी माना जा रहा है. उनके पास उनके पासपोर्ट नहीं हैं. लेकिन कुमावत ने कहा कि मानवीय आधार पर जिला प्रशासन उनके लिए प्रबंध करने के लिए तैयार है.
हजारों लोग आ सकते हैं
अन्य मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि मंगलवार को श्रीलंका के जाफना और मन्नार इलाकों से ये लोग समुद्र के रास्ते दो जत्थों में तमिलनाडु पहुंचे. सबसे पहले जत्थे में तीन बच्चों समेत छह शरणार्थी थे. सबसे छोटा बच्चा चार महीने का है.
वो लोग रामेश्वरम के नजदीक एक द्वीप पर फंस गए थे जहां से भारतीय कोस्ट गार्ड ने उन्हें निकाल लिया. दूसरे जत्थे में 10 और लोग मंगलवार देर रात रामेश्वरम पहुंचे.
मीडिया रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि तमिलनाडु में खुफिया अधिकारियों को जानकारी मिली है कि आने वाले हफ्तों में करीब 2,000 शरणार्थी श्रीलंका से तमिलनाडु आ सकते हैं.
तमिलनाडु सरकार आने वाली स्थिति से निपटने के लिए क्या तैयारियां कर रही है, यह अभी सामने नहीं आया है. शरणार्थियों ने बताया कि उनके अपना देश छोड़ कर भारत आ जाने का कारण श्रीलंका का गंभीर आर्थिक संकट है.
भारी संकट
पर्यटन पर निर्भर श्रीलंका की अर्थव्यवस्था पर पहले ही कोविड के दौरान पर्यटन बंद रहने से मार पड़ी थी. अब देश में विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई जिसकी वजह से सरकार आम जरूरत के सामान के आयात की कीमत नहीं चुका पा रही है. इस वजह से दवाओं, ईंधन, दूध का पाउडर, रसोई गैस आदि जैसी चीजों की भारी कमी हो गई है.
जितना भंडार उपलब्ध है उसके दाम छप्पर फाड़ कर निकल गए हैं. इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मुताबिक श्रीलंका में चावल और चीनी के दाम लगभग 300 रुपए किलो तक पहुंच गए हैं और आने वाले दिनों में 500 रुपए किलो तक पहुंच सकते हैं. दूध का पाउडर करीब 1600 रुपए किलो बिक रहा है.
ईंधन की कमी की वजह से बिजली संयंत्र भी ठीक से नहीं चल पा रहे हैं और रोज बिजली कट रही है. पेट्रोल पंपों और किरासन तेल की दुकानों के बार लंबी लंबी कतारें लग रही हैं जिनमें लोगों को घंटों खड़े रहना पड़ रहा है.
इसी सप्ताह इन्हीं कतारों में खड़े खड़े कम से कम तीन बुजुर्गों की मौत हो गई, जिसके बाद सरकार ने पेट्रोल पंपों और किरासन की दुकानों पर सेना के सिपाहियों को तैनात कर दिया है. इन्हीं हालत से परेशान हो कर जो लोग कुछ रकम जुटा कर तस्करों को देने में सफल हो पा रहे हैं, तस्कर उन्हें भारत भेज दे रहे हैं.
श्रीलंका के वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे पिछले हफ्ते ही भारत आए थे और उनकी यात्रा के दौरान भारत ने उनके देश को एक अरब डॉलर का कर्ज देने की घोषणा की. श्रीलंका सरकार ने आईएमएफ से भी मदद की गुहार लगाई है.
(एपी, एएफपी, रॉयटर्स से जानकारी के साथ)
वर्चस्व की लड़ाई में छोटी-मोटी घटनाएं तो अक्सर होती रहती थीं. लेकिन अचानक इन छोटे से गांव में इतनी बड़ी घटना हो जाएगी और उसके बदले आठ लोगों को जिंदा जला कर मार दिया जाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट-
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले करीब सौ परिवारों वाले बगटूई गांव का नाम भी मंगलवार से पहले शायद लोगों ने नहीं सुना होगा. लेकिन अब तृणमूल कांग्रेस के एक उप-प्रधान की हत्या और कथित रूप से उसका बदला लेने के लिए 8-10 घरों में लगाई गई आग में झुलस कर आठ लोगों की मौत ने इसे रातों रात सुर्खियों में ला दिया है. गांव के एक व्यक्ति नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं, "सोमवार शाम को भादू की हत्या के बाद ही गांव का चेहरा बदल गया था. लेकिन रात को जो कुछ हुआ उसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.”
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कल करेंगी मौके का दौरा, कहा कि किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा. सुबह मौके पर पहुंचे सीपीआईएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया है कि एसआईटी सबूत मिटाने का प्रयास कर सकती है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने घटना का संज्ञान लेते हुए इसे बेहद हैरान करने वाला बताया. कई जनहित याचिकाएं भी दायर हुई हैं.
अब इन घटनाओं के बाद यह गांव राजनीति का अखाड़ा बन गया है और खासकर विपक्षी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुट गए हैं. दूसरी ओर, राज्यपाल जगदीप धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इस मुद्दे पर आमने-सामने हैं. बंगाल में बीते करीब 11 साल में यह पहला मौका है जिसमें एक साथ इतने लोगों की मौत हुई है. इससे पहले सात मार्च, 2011 को पश्चिम मेदिनीपुर के नेताई में एक साथ नौ लोगों की हत्या हुई थी.
अब इस घटना के बाद इलाके के तमाम पुरुष पुलिस और जवाबी हमले के डर से गांव छोड़ कर फरार हो गए हैं. हालांकि पुलिस प्रशासन ने इसकी पुष्टि नहीं की है. राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए विशेष कार्यबल (एसआईटी) का गठन कर दिया है. इसमें सीआईडी के एडीजी ज्ञानवंत सिंह के अलावा पश्चिमी रेंज के एडीजी संजय सिंह और सीआईडी के डीआईजी मिराज खालिद शामिल हैं. इस घटना के बाद त्वरित कार्रवाई करते हुए रामपुरहाट के ओसी त्रिदीप प्रामाणिक और एसडीपीओ सायन अहमद को उनके पद से हटा दिया गया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले पर राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है.
तृणमूल कांग्रेस के साथ ही पुलिस प्रशासन का भी कहना है कि इस घटना का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है और इसकी वजह निजी दुश्मनी हो सकती है. लेकिन विपक्ष ने इसे बंगाल में कानून-व्यवस्था का मुद्दा बना लिया है और केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग कर रहा है. आग में झुलस कर मरने वाले आठों लोगों का मंगलवार शाम को पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन पूरे गांव में अब भी खौफ और सन्नाटा छाया है. कोई भी जल्दी इस बारे में बात नहीं करना चाहता. इस घटना के बाद से ही पूरा गांव छावनी में तब्दील हो गया है. हाईवे से गांव की ओर से जाने वाली सड़क को करीब चार किमी पहले ही घेर कर बैरिकेड लगा दिया गया है और किसी बाहरी व्यक्ति को वहां जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है.
कैसे हुई घटना
दरअसल, इलाके की पंचायत के उप-प्रधान और टीएमसी के वरिष्ठ नेता भादू शेख सोमवार शाम को गांव के पास एक चाय दुकान में चाय पी रहे थे. उसी समय कुछ अज्ञात लोगों ने उन पर बम से हमला किया. इससे गंभीर रूप से घायल शेख को रामपुरहाट अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उनको मृत घोषित कर दिया. बगटूई गांव में दो मोहल्ले हैं—पूर्व पाड़ा और पश्चिम पाड़ा. शेख का मकान पूर्व पाड़ा में था. उनकी मौत की सूचना मिलते ही गांव में भारी उत्तेजना फैल गई और एक घंटे के भीतर ही कुछ लोगों ने पश्चिम पाड़ा में आठ से दस घरों में आग दी जिसमें कम से तीन महिलाएं और दो बच्चे भी शामिल हैं. इसके अलावा गंभीर रूप से झुलसे कई लोग जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं.
पुलिस ने इस मामले में अब तक 11 लोगों को गिरफ्तार किया है. पुलिस महानिदेशक मनोज मालवीय बताते हैं, "सोमवार रात तृणमूल के उप-प्रधान बहादुर शेख की हत्या की खबर आई थी. उसके एक घंटे बाद देखा गया कि पास के ही 7-8 घरों में आग लग गई है. इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. वहां के एसडीपीओ और रामपुरहाट के ओसी को हटा दिया गया है.” उनका कहना था कि पहले 10 लोगों की मौत की बात कही गई थी. वह सही नहीं थी. कुल आठ लोगों की मौत हुई है. एक ही मकान से सात लोगों के शव बरामद हुए हैं. एक घायल ने अस्पताल में दम तोड़ा है. जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया है. पुलिस महानिदेशक के मुताबिक, फिलहाल गांव में परिस्थिति नियंत्रण में है.
गरमाती राजनीति
इस घटना के बाद राजनीति अचानक गरमा गई है. बीजेपी और लेफ्ट पार्टियों ने ने राज्य सरकार पर इस मामले को दबाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है. राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने इस मामले पर सरकार की खिंचाई करते हुए मुख्य सचिव से इस घटना पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. उधर, बीजेपी ने राज्य में कानून और व्यवस्था के ध्वस्त होने का आरोप लगाते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इस्तीफे की मांग की है. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सुकांत मजूमदार कहते हैं, "बंगाल धीरे-धीरे राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है.” बीजेपी की एक पांच सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग टीम शुक्रवार को मौके का दौरा करेगी. इसमें बंगाल के दो नेता भी शामिल. इस समिति का गठन पार्टी प्रमुख जे.पी.नड्डा ने किया है. इससे पहले बीजेपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में नड्डा से मुलाकात कर बंगाल में केंद्रीय हस्तक्षेप की मांग उठाई थी.
जगदीप धनखड़ ने अपने एक बयान में कहा है कि यह घटना इस बात का संकेत है कि राज्य हिंसा और अराजकता की संस्कृति की गिरफ्त में है और कानून-व्यवस्था की स्थिति लगातार बिगड़ रही है. राज्यपाल ने ट्वीट में कहा, "प्रशासन को दलीय हित से ऊपर उठने की जरूरत है जो आगाह किए जाने के बाद भी हकीकत में नजर नहीं आ रही है.” मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल पर पलटवार करते हुए उनको अनुचित बयान देने से बचने को कहा है. देर रात राज्यपाल को भेजे अपने पत्र में उन्होंने कहा कि आपके बयानों में बंगाल सरकार को धमकाने के लिए दूसरे राजनीतिक दल का समर्थन करने वाले स्वर सुनाई दे रहे हैं. ऐसे बयानों से जांच के काम में बाधा पहुंचेगी.
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी को घटनास्थल का जायजा लेने के लिए बीरभूम भेजने का भी फैसला किया है.बीरभूम की घटना के साथ राजनीति का कोई लेना-देना नहीं है, यह बात टीएमसी भी कह चुकी है और पुलिस भी. इससे साफ है कि यह घटना इलाके पर कब्जे की लड़ाई का नतीजा है. पुलिस ने भी निजी दुश्मनी के चलते भादू शेख की हत्या की बात कही है. उसके बाद आगजनी की घटना उसका बदला लेने के लिए हुई. टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है कि रामपुरहाट में आग से मौत का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. यह स्थानीय ग्रामीणों संघर्ष है. एक दिन पहले टीएमसी नेता की हत्या की गई थी. वे बेहद लोकप्रिय थे. उनकी मौत के कारण लोगों में भारी नाराजगी थी. जिले के एसपी नागेंद्र नाथ त्रिपाठी ने पत्रकारों को बताया कि फिलहाल मामले की जांच चल रही है. उसके बाद ही हकीकत सामने आएगी.
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भले ही इस मामले का राजनीति से कोई संबंध नहीं हो, इसने बंगाल में मजबूती से कदम जमाने का प्रयास कर रही बीजेपी को सरकार और टीएमसी के खिलाफ एक मजबूत हथियार तो दे ही दिया है. फिलहाल इस मुद्दे पर अगले कुछ दिनों तक राजनीति लगातार गरमाने के आसार हैं. (dw.com)
यूपी में योगी सरकार ने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर उनके घर और अन्य प्रतिष्ठान बुलडोजर से तोड़े. बीजेपी ने इसे चुनाव में खूब भुनाया भी. अब पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में भी इस तरीके को अपनाया जा रहा है.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट-
मध्य प्रदेश में सोमवार को सिवनी जिले के कुरई थाने में दुष्कर्म के एक अभियुक्त का अवैध निर्माण बुलडोजर से ढहा दिया गया. इससे पहले श्योपुर जिले में नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप के तीन अभियुक्तों के मकान बुलडोजर से जमींदोज कर दिए गए. उन्हीं में से एक अभियुक्त के खेतों की फसल को भी जेसीबी से नष्ट कर दिया गया.
रायसेन जिले में एक सांप्रदायिक विवाद में शामिल अभियुक्तों के घरों को भी बुलडोजर से ढहा दिया गया और इस तरह की घटनाएं मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं. लेकिन राजधानी भोपाल होते हुए ये कार्रवाइयां राज्य के बाहर तब पहुंचीं जब एक विधायक ने अपने घर पर बुलडोजर चलाने की तारीफ करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ‘बुलडोजर मामा' बताते हुए होर्डिंग्स लगवा दीं. भोपाल की हुजूर सीट से बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने अपने आवास पर एक होर्डिंग लगवाया है जिसमें लिखा है- 'बेटी की सुरक्षा में जो बनेगा रोड़ा, मामा का बुलडोजर बनेगा हथौड़ा.'
दरअसल, अपराधियों और रेप और हत्या जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त होने वाले अभियुक्तों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई के लिए यूपी के निवर्तमान मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने जमकर प्रसिद्धि पाई और बुलडोजर चलाने को अपनी सरकार की मुख्य उपलब्धि के तौर पर पेश किया. यही नहीं, विधानसभा चुनाव के दौरान इन कार्रवाइयों पर गीत बने, जनसभाओं में इसकी जमकर चर्चा हुई और लोगों को बताया गया कि जीतकर दोबारा आने पर इसे और तेज किया जाएगा. इन्हीं कार्रवाइयों के चलते योगी आदित्यनाथ को ‘बुलडोजर बाबा' के तौर पर भी प्रचारित किया जाने लगा. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी चुनाव जीतकर दोबारा सत्ता में वापस आ चुकी है. हालांकि अभी नई सरकार ने कार्यभार नहीं संभाला है और शपथ ग्रहण समारोह 25 मार्च को होना है लेकिन बुलडोजर की कार्रवाई और उसका खौफ अभी भी बना हुआ है.
दो दिन पहले प्रतापगढ़ जिले में रेलवे स्टेशन पर शौचालय के एक संचालक ने एक महिला से दुष्कर्म किया. पुलिस ने तलाश की लेकिन उसका सुराग नहीं मिला. सोमवार को जब पुलिस वाले अभियुक्त के घर पर बुलडोजर लेकर पहुंचे तो कुछ ही घंटों में उसने थाने में जाकर समर्पण कर दिया. यही नहीं, चुनाव परिणाम आने के ठीक बाद 15 मार्च को मेरठ में माफिया बदन सिंह बद्दो की उस आलीशान निर्माण को ढहा दिया गया जो सरकारी जमीन पर अवैध तरीके से बना हुआ था. बदन सिंह बद्दो वांछित अपराधी हैं जो तीन साल से फरार चल रहे हैं.
बताया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ का ‘बुलडोजर मॉडल' काफी सफल साबित हुआ है और यही वजह है कि दूसरे राज्य भी अपराध के खिलाफ इस ‘बुलडोजर संस्कृति' की ओर आकर्षित हो रहे हैं. तीन दशक बाद यूपी में किसी सरकार की वापसी हुई है और उसका श्रेय तमाम अन्य कारकों के अलावा योगी आदित्यनाथ की अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के तरीके को भी दिया जा रहा है. यही वजह है कि उनके कामकाज का तरीका बीजेपी के दूसरे मुख्यमंत्री भी रोड मॉडल की तरह अपना रहे हैं और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस दिशा में सबसे ज्यादा प्रयत्नशील दिख रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने दो दर्जन से ज्यादा माफिया किस्म के लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाए हैं और 1500 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जब्त की है. इन लोगों में प्रयागराज में पूर्व सांसद और विधायक अतीक अहमद, मऊ में मुख्तार अंसारी, भदोही में पूर्व विधायक विजय मिश्र, गौतमबुद्धनगर के सुंदर भाटी जैसे लोग प्रमुख हैं.
योगी सरकार ने बुलडोजर संस्कृति की शुरुआत कानपुर के बिकरू में सीओ समेत आठ पुलिसकर्मियों की हत्या के प्रमुख अभियुक्त विकास दुबे के आलीशान घर को ढहाने से की थी. इस घटना के अभियुक्तों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था और विकास दुबे के अलावा अन्य अभियुक्तों की भी संपत्तियों पर बुलडोजर चला था. उसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा और योगी सरकार की उपलब्धियों में दर्ज हो गया.
हालांकि कानूनी जानकार इसे सही नहीं ठहराते हैं. सुप्रीम कोर्ट में वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि अभियुक्त की गिरफ्तारी न होने पर उसकी संपत्ति जब्त की जाती है, घर की कुर्की होती है लेकिन घर ढहाना तो पूरी तरह से सरकारी और पुलिस की ‘गुंडागर्दी' है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं, "82-83 यानी कुर्की का मतलब है कि घर से सामान निकाल दीजिए, खिड़की दरवाजे निकाल दीजिए, यानी घर रहने लायक न रहे. यह तो विधिक प्रक्रिया है, जब अभियुक्त कई बार नोटिस भेजने के बावजूद हाजिर न हो. लेकिन बुलडोजर चलाने या घर को नष्ट कर देने का कानून में कोई प्रावधान नहीं है और कानूनी तौर पर ऐसा किया भी नहीं जा सकता.
कानून में एनकाउंटर का भी कोई प्रावधान नहीं है. कानून में खुद ही इतनी ताकत है कि अभियुक्त बिना सजा पाए नहीं रह सकता है लेकिन उसके लिए प्रॉजीक्यूशन को मजबूत करना होगा. प्रॉजीक्यूशन मजबूत होगा यानी अच्छी तरह से पैरवी होगी तो अपराधी खुद जेल जाएंगे.” (dw.com)
काबुल के साथ राजनयिक रिश्ता खत्म होने के कारण भारत के विश्वविद्यालयों में फंसे हजारों अफगानी स्टूडेंट. अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद से बिगड़े हालात.
डॉयचे वैले पर ऋतिका पाण्डेय की रिपोर्ट-
भारतीय विश्वविद्यालयों में इस समय 13,000 से ज्यादा अफगान छात्रों ने दाखिला लिया हुआ है. यह आंकड़ा नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास से मिला है. उनसे मिले आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि अगस्त 2021 में तालिबान के जबरन सत्ता हथियाने से पहले इनमें से करीब 2,000 छात्र अफगानिस्तान लौट गए थे. उनके वापस लौटने का कारण यह था कि भारत में कोविड 19 महामारी के कारण कॉलेज, यूनिवर्सिटी बंद हो गए थे और लेक्चर, सेमिनार सब ऑनलाइन होने लगे थे.
ऐसे कदमों से वायरस का संक्रमण को फैलने से रोकने की कोशिश की जा रही थी. जब छात्रों को फिर से क्लास में बुलाया जाने लगा उस समय तक अफगानिस्तान में तालिबान का राज आ चुका था और हालात बदल गए थे. काबुल के रहने वाले ईसा सादत बताते हैं, "अब यूनिवर्सिटी खुली है और हमारी क्लास में हाजिरी जरूरी है. लेकिन मेरा तो वीजा ही नहीं मिल सकता है." सादत कुछ महीने पहले तक भारत में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन एंड इकॉनोमिक्स की पढ़ाई कर रहे थे.
तालिबान के सत्ता में आने से बाद जब भारत ने अफगानिस्तान में अपनी राजनयिक सेवाएं बंद कर दीं तो उनके जैसे कई छात्रों का भविष्य अधर में अटक गया. भारत ने अफगानिस्तान के साथ हवाई यात्रा और बैंक से भुगतान की सुविधाएं भी रोक दीं जिसका सीधा असर भारत में पढ़ने वाले अफगानों पर पड़ा.
ईसा को वीजा के लिए चक्कर लगाते पांच महीने से ज्यादा वक्त हो गया है. वह बताते हैं, "पहले मैंने काबुल में ऑनलाइन अप्लाई किया. लेकिन उससे काम नहीं बना. फिर मैं ईरान गया और वहां तेहरान के भारतीय दूतावास से वीजा के लिए आवेदन किया. वहां मुझे बताया गया कि केवल उन बीमार अफगानों का ही वीजा लग सकता है जो इलाज के लिए भारत जाना चाहते हैं."
ईरान या पाकिस्तान के रास्ते वीजा
ईसा के जैसे और भी कई हैं जो ईरान के रास्ते होकर किसी तरह भारत पहुंचना चाहते हैं. शकील राजी को ही लीजिए जो भारत में डॉक्टरेट कर रहे हैं. शकील तो वीजा के लिए ईरान के साथ साथ पाकिस्तान भी हो आए. दोनों देशों से भारतीय वीजा के लिए कोशिशें कीं लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. अब हताश हो रहे शकील कहते हैं, "मैं अपनी पढ़ाई में बहुत कुछ लगा चुका हूं और अब समय था कि मैं अपनी डॉक्टोरल थीसिस को डिफेंड करता. लेकिन अब मुझे सब कुछ बर्बाद होता नजर आ रहा है. मैं तो अपनी पढ़ाई की फीस भी ट्रांसफर नहीं कर पा रहा हूं."
उनके जैसे कई युवा अफगान छात्रों को लगने लगा है जैसे संकट की घड़ी में भारत ने उनसे मुंह मोड़ लिया है.
तालिबान के वापस सत्ता में आने से पहले के दो दशकों में भारत अफगान युवाओं का एक पसंदीदा ठिकाना बन गया था. 2001 में जब अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से हटाया था तबसे अफगानिस्तान में भारत सबसे बड़े क्षेत्रीय दानदाता के रूप में उभरा था. अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत ने करीब 3 अरब डॉलर (2.7 अरब यूरो) का निवेश किया. कई जानकार इसकी व्याख्या पाकिस्तान के मुकाबले अपना प्रभाव बढ़ाने की भारत की कोशिश बताते थे.
भारत ने अफगानिस्तान में ना केवल सड़कें बनवाईं, स्कूल, बांध और अस्पताल बनवाए बल्कि शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग के मामले में भी कई अहम कदम उठाए.
साल 2005 से 2011 के बीच, हर साल अफगान छात्रों को 500 छात्रवृत्तियां दी गईं. 2011 से 2021 के बीच तो यह संख्या 1,000 थी. इसके अलावा भी ऐसे बहुत से अफगान छात्र भारत में पढ़ने आए जो अपनी पढ़ाई का खर्चा खुद ही उठाते हैं.
नई दिल्ली में अफगान दूतावास के मुताबिक, पिछले 16 सालों में 60,000 से ज्यादा अफगानों ने अपनी पढ़ाई भारत में पूरी की.
कैसे खोजे जा रहे हैं उपाय
अफगान दूतावास के प्रवक्ता अब्दुलहक आजाद ने डीडब्ल्यू से बताया, "हम भारत सरकार से संपर्क में हैं और साथ ही भारतीय विश्वविद्यालयों के भी, ताकि कोई रास्ता निकाला जा सके."
मौजूदा अफगान दूतावास के प्रमुख अफगानिस्तान की अशरफ गनी की अगुवाई वाली पूर्ववर्ती सरकार द्वारा नियुक्त किए गए थे, जिनकी अब सत्ता नहीं रही. भारत ने अब तक अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में अफगान शिक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता मौलवी अहमद तागी ने कहा कि छात्रों की ऐसी दुर्दशा के लिए तालिबान पर आरोप नहीं मढ़ने चाहिए. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि "इस्लामिक एमिरेट्स ऑफ अफगानिस्तान के कारण यह समस्या पैदा नहीं हुई है. दोष तो और देशों का है."
दोषारोपण तो चलता ही जा रहा है लेकिन अफगान शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि वे किसी तरह छात्रों की समस्या का जल्दी से जल्दी हल निकालने की कोशिश में हैं. (dw.com)
कोविड से उबर रही भारतीय अर्थव्यवस्था में जनता पर दोहरी मार पड़ी है. महामारी से उबरने की शुरुआत ही हुई थी कि एक बार फिर महंगाई ने झटका दे दिया है. असर रसोईघर पर दिख रहा है.
भारत में लोगों ने बाहर के खाने, ईंधन और यहां तक कि सब्जियों में भी कटौती करनी शुरू कर दी है क्योंकि महंगाई के कारण घर का खर्च बढ़ गया है. कोविड-19 से उबर रही अर्थव्यवस्था पर अब यूक्रेन युद्ध का असर दिखने लगा है और आवश्यक उपभोक्ता चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिसका असर जन-जीवन पर नजर आने लगा है.
एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत में कंपनियां बढ़ती लागत को अब आम उपभोक्तों से वसूल रही हैं. हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पांच महीनों में पहली बार वृद्धि हुई है. खाने के तेल के दाम भी आसमान छू रहे हैं.
घर का बजट मुश्किल में
कोलकाता में रहने वाली इंद्राणी मजूमदार कहती हैं, "भगवान जाने हम इतनी महंगाई में घर कैसे चलाएंगे.” इंद्राणी मजूमदार अपने परिवार में अकेली कमाने वाली हैं और दो साल की महामारी के दौरान उनकी तनख्वाह आधी हो चुकी है. वह बताती हैं कि उनके परिवार ने कई खर्चों में कटौती की है. वह बताती हैं कि परिवार अब ज्यादातर उबला हुआ खाना खाता है ताकि खाने के तेल का खर्च बचाया जा सके. ऐसी ही छोटी-छोटी कटौतियों की बात दर्जनों परिवारों ने कही है.
चुनावों के खत्म होते ही जनता पर फिर पड़ी महंगाई की मार
दरअअसल, बीते अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही के बीच भारत की अर्थव्यवस्था में वृद्धि की रफ्तार उतनी तेज नहीं रही, जितनी कि उम्मीद की जा रही थी. अब अर्थशास्त्रियों ने आशंका जाहिर की है कि तेल की बढ़ी हुई कीमतों का असर मौजूदा रफ्तार पर पड़ेगा क्योंकि इसके कारण महंगाई बढ़ रही है.
कोलकाता में सब्जी बेचने वाले देबाशीष धारा कहते हैं कि फरवरी से अब तक उनकी बिक्री आधी हो चुकी है क्योंकि ट्रांसपोर्ट के महंगा होने के कारण सब्जियों का दाम बढ़ रहा है. दूध कंपनियां मदर डेयरी और अमूल भी दाम बढ़ा चुकी हैं. हिंदुस्तान यूनिलीवर और नेस्ले ने नूडल, चाय और कॉफी के दाम बढ़ा दिए हैं.
मुंबई में रहने वालीं गृहिणी रचना पवार कहती हैं, "घर का बजट संभालना बहुत मुश्किल हो गया है. इस तरह की महंगाई ने खरीदना कम करने को ही मजबूर कर दिया है.”
हर ओर महंगाई
भारत के कुल घरेलू उत्पाद में व्यक्तिगत उपभोग का हिस्सा लगभग 60 प्रतिशत है. 24 फरवरी को यूक्रेन द्वारा रूस पर हमले के बाद, जिसे रूस ‘विशेष सैन्य अभियान' कहता है, भारतीय कंपनियों ने दूध, नूडल, चिकन और अन्य सामोनों के दाम पांच से 20 प्रतिशत तक बढ़ाए हैं.
कोविड महामारी का असर भारत के लगभग 80 प्रतिशत परिवारों पर पड़ा था. करीब 1.4 अरब आबादी में से लगभग 80 करोड़ लोगों को महामारी के कारण सरकार से राशन मिला था. अब कीमतों में मामूली वृद्धि भी इन परिवारों के बजट को प्रभावित कर सकती है.
भारत के मुख्य सांख्यिकीविद रह चुके प्रणब सेन कहते हैं कि लगातार तीसरा साल ऐसा हो सकता है जब परिवारों का बजट तंग होगा. उन्होंने कहा, "महामारी के बाद बचत बढ़ाने की प्रक्रिया बस शुरू ही हो रही थी. इस नए झटके के बाद लोगों को अपना उपभोग कम करना पड़ेगा.”
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने आयात पर निर्भर करने वाले देशों को ईंधन की कीमतें बढ़ाने को मजबूर कर दिया है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है और इस साल उसने ईंधन की कीमतें लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ाई हैं. भारत खाने के तेलों का भी दुनिया का सबसे बड़ा आयातक है. उसकी कुल जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आता है.
भारत में पाम ऑयल सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला खाने का तेल है. इस साल उसकी कीमतें 45 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं. यूक्रेन जिस सूरजमुखी के तेल के सबसे बड़े उत्पादक हैं, उसकी सप्लाई प्रभावित होने से भी बाजार पर असर पड़ा है. कुछ थोक व्यापारियों का कहना है कि पिछले एक महीने में दाम बढ़ने के साथ-साथ खाने के तेलों की बिक्री में लगभग एक चौथाई की कमी आ चुकी है.
मुश्किल अर्थव्यवस्था
फरवरी में लगातार दूसरे महीने मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत से ऊपर रही है जबकि थोक मुद्रास्फीति 13 प्रतिशत से ज्यादा है. वित्तीय सेवाएं देने वाली संस्ता जेफरीज ने एक बयान जारी कर कहा, "चूंकि उपभोग कम हो रहा है इसलिए मुद्रास्फीति में वृद्धि के लिए इससे बुरा समय नहीं हो सकता था.”
भारत के केंद्रीय बैंक ने कहा है कि वह उपभोक्ता वस्तुओं के दामों पर नजर बनाए हुए है. अगले महीने बैंक को अपनी नई मौद्रिक नीति तय करने के लिए बैठक करनी है. लेकिन बाजार को उम्मीद नहीं है कि रिजर्व बैंक दरों में कोई बदलाव करेगा. ऐसा ही कई अन्य देशों में भी हुआ है, इस बात को लेकर ऊहापोह में हैं कि महंगाई रोकने के लिए दरें बढ़ाई जाएं या नहीं.
लेकिन, आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की कोई किरण नजर नहीं आ रही है. कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने कहा है कि इस महीने की तेल कीमतों की वृद्धि के चलते उत्पादकों की एफएमसीजी यानी तेजी से खत्म होने वालीं उपभोक्ता वस्तुओं की लागत 10-15 प्रतिशत तक बढ़नी तय है, जो अंततः आम ग्राहकों से ही वसूली जाएगी.
वीके/सीके (रॉयटर्स)
बीवी से बलात्कार के मामले पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि बलात्कार का मतलब बलात्कार होता है, चाहे वो पति ने क्यों न किया हो. हाईकोर्ट ने सांसदों से मैरिटल रेप पर ध्यान देने को कहा है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट
कर्नाटक हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने कहा कि एक व्यक्ति केवल इसलिए दुष्कर्म के मुकदमे से बच नहीं सकता क्योंकि पीड़िता उसकी बीवी है. बेंच ने कहा यह समानता के अधिकार के खिलाफ है. कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने कहा, "एक पुरुष एक पुरुष है, एक कृत्य एक कृत्य है; बलात्कार एक बलात्कार है, चाहे वह पुरुष 'पति' द्वारा 'पत्नी' पर किया जाए."
दरअसल हाईकोर्ट की बेंच ने बलात्कार के मामले को खारिज करने की पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की और उसने बलात्कार के आरोपों को हटाने से इनकार कर दिया.
हाईकोर्ट ने कहा कि सांसदों को "चुप्पी की आवाज" पर ध्यान देना चाहिए और कानून में असमानताओं को दूर करना चाहिए.
साथ ही हाईकोर्ट ने कहा, "सदियों पुरानी सोच है कि पति अपनी पत्नियों के शासक होते हैं, उनके शरीर, उनके मन और आत्मा के. इस सोच को मिटा दिया जाना चाहिए." हाईकोर्ट ने कहा कि इस मान्यता को बदलने की जरूरत है. उसने कहा महिलाओं के साथ अन्याय के मामले में सख्त कदम उठाने की जरूरत है.
"मैरिटल रेप के गंभीर परिणाम"
हाईकोर्ट ने मैरिटल रेप के बढ़ते मामलों पर कहा कि पति की ओर से अपनी बीवी पर यौन हमले के गंभीर परिणाम होते हैं. इसका पत्नी पर मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दोनों पर प्रभाव पड़ता है.
कर्नाटक हाई कोर्ट में आरोपी पति की ओर से दायर याचिका में पत्नी द्वारा उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करने के बाद आईपीसी की धारा 376 के तहत उसके खिलाफ लंबित बलात्कार के आरोपों को हटाने की मांग की गई थी. हालांकि हाईकोर्ट ने पति को कोई राहत नहीं दी और उसे सुनवाई का सामना करने को कहा.
आईपीसी की धारा 375 जो बलात्कार को परिभाषित करती है, उस धारा के तहत प्रावधान किसी व्यक्ति द्वारा उसकी पत्नी के साथ यौन संबंध या यौन कार्य को बलात्कार के अपराध से छूट देता, बशर्ते पत्नी की उम्र 18 साल से कम न हो.
दिल्ली हाईकोर्ट भी केंद्र सरकार से मैरिटल रेप के मामले में इसी साल अपना रुख साफ करने को कह चुका है. (dw.com)
नॉएडा की सड़कों पर आधी रात को दौड़ते हुए प्रदीप मेहरा की असली कहानी टीवी चैनलों के सर्कस में नहीं है. उस रात फिल्म निर्माता का कैमरा प्रदीप के रूप में देश के करोड़ों युवाओं के सपनों और जीवट से एक साथ टकरा गया.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
खुद को प्रदीप मेहरा की जगह रख कर देखिए. आप हिंदुस्तान के एक छोटे से शहर के रहने वाले हैं. परिवार में संसाधन कम हैं लेकिन आप की आंखों में जीवन में कुछ कर दिखाने का सपना है. आप दिल्ली एनसीआर आ जाते हैं और अपने सपने को हकीकत में बदलने के लिए कमर तोड़ मेहनत में जुट जाते हैं.
आप अपने लक्ष्य को साधने की तैयारी भी कर रहे हैं और साथ ही उस तैयारी का खर्च उठाने के लिए नौकरी भी. और इसी क्रम में एक रात आप नॉएडा की सड़कों पर एक फिल्म निर्माता से टकरा जाते हैं. फिल्मकार अपने मोबाइल पर आपकी वीडियो बना लेता है, फिर उसे सोशल मीडिया पर डाल देता है और फिर कुछ ही घंटों में वीडियो वायरल हो जाती है.
करोड़ों युवाओं की कहानी
वीडियो वायरल क्यों हुई यह आप समझ ही सकते हैं. उस रात प्रदीप मेहरा फिल्म निर्माता विनोद कापड़ी से नहीं टकराए. दर असल कापड़ी ही प्रदीप के रूप में देश के करोड़ों युवाओं के सपनों और जीवट से एक साथ टकरा गए.
प्रदीप की ही कहानी लीजिए. वीडियो में उन्होंने बताया कि वो उत्तराखंड के अल्मोड़ा से हैं. रोजगार के ताजा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में युवाओं के बीच बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा है.
जहां देश में करीब 15 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं, उत्तराखंड में करीब 20 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं. राज्य में बेरोजगारी पिछले एक दशक में दोगुनी हो गई है और अब आलम यह है कि कुल बेरोजगार लोगों में करीब 70 प्रतिशत युवा हैं.
दून विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख राजेंद्र ममगैन ने एक लेख में लिखा है कि अल्मोड़ा और राज्य के अन्य पहाड़ी इलाकों में समस्या और विकराल है. राज्य के कुल बेरोजगार युवाओं में आधे से ज्यादा पहाड़ी इलाकों में ही हैं. इन इलाकों के 24 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं.
नौकरी की तलाश
लिंग के हिसाब से भी आंकड़े उपलब्ध हैं जिनसे प्रदीप की कहानी को और बेहतर समझा जा सकता है. राज्य के पहाड़ी इलाकों के युवा पुरुषों में 30 प्रतिशत बेरोजगार हैं. अब लीजिये प्रदीप की कहानी के अगले अध्याय को.
वीडियो में उन्होंने बताया कि वो भारतीय सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे हैं. वो सेना में ही नौकरी क्यों करना चाहते हैं ये तो उन्होंने नहीं बताया, लेकिन इसका भी आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं. हिन्दुस्तान में हर साल लाखों युवा सेना में भर्ती होने के लिए अलग अलग परीक्षाएं देते हैं.
उन लाखों में से सिर्फ कुछ हजार को ही सेना में नौकरी मिल भी पाती है और बाकी फिर किसी और नौकरी की तलाश में लग जाते हैं. और पिछले दो सालों से तो सेना में भर्ती बंद ही पड़ी हुई है. सरकार का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया अस्थायी रूप से कोविड की वजह से स्थगित है और जल्द ही फिर से शुरू की जाएगी.
प्रदीप शायद तब तक रोज रात इसी तरह अपनी छह किलोमीटर की दौड़ पूरी करते रहेंगे. लेकिन क्या उनका देश उन्हें गारंटी दे सकता है कि उनकी मेहनत जल्द ही रंग लाएगी? भारतीय टीवी चैनलों को देख कर तो ऐसा नहीं लगता.
कैसे होंगे सपने पूरे
उन्हें तो प्रदीप के रूप में वायरल कंटेंट की सामग्री मिल गई है. वो उन्हें पकड़ के अपने अपने स्टूडियो ले जा रहे हैं, और उनकी कहानी के पीछे के मर्म पर रौशनी डालने की जगह उन्हें स्टूडियो में दौड़ कर दिखाने के लिए कह रहे हैं.
मीडिया का ये सर्कस जाना पहचाना है. इसमें प्रदीप जैसे वायरल कंटेंट की संभावना वाले लोगों को सड़क से उठा कर अस्थायी रूप से सेलिब्रिटी बना दिया जाता है और दो दिन के तमाशे के बाद फिर से सड़क पर ही पटक दिया जाता है.
प्रदीप की असली कहानी इन टीवी चैनलों के सर्कस में नहीं है. प्रदीप की कहानी उनके उस संकल्प में है जिससे मजबूती पा कर वो बार बार लिफ्ट लेने के प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं और अपनी मंजिल की तरफ दौड़ते रहते हैं.
कल आपको भी अगर कोई प्रदीप जिंदगी की सड़क पर अपने सपनों को हकीकत में बदलने की चाहत लिए यूं दौड़ता नजर आए तो उसे दौड़ने दीजिएगा. उसे जाते जाते पीछे से निहारिएगा और दुआ कीजिएगा कि इस संकल्प की धूल के कुछ जादुई कण आपकी जिंदगी में भी बिखर जाएं. (dw.com)
भारत में दूध के बाद अब पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ रसाई गैस की कीमतों में इजाफा हुआ है. पहले से ही जनता खाने-पीने के सामान के दाम बढ़ने से परेशान थी. दामों में आई ताजा बढ़ोतरी उनकी जेब पर और भारी पड़ने वाली है.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
137 दिनों के अंतराल के बाद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) ने बढ़ा दिए हैं. इससे देशभर में पेट्रोल-डीजल के दामों में 80 पैसे प्रति लीटर का इजाफा हुआ है. कीमतें बढ़ने के बाद दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल के लिए ग्राहक को 96.21 रुपये चुकाने होंगे और डीजल के लिए 87.47 रुपये अदा करने होंगे.
पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में और वृद्धि होने की संभावना है, क्योंकि ओएमसी ने रविवार को थोक डीजल की कीमत में 25 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी, जिससे थोक कीमतें पेट्रोल पंपों पर रिटेल कीमतों से काफी अधिक हो गईं.
चुनाव खत्म और महंगाई का हमला
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 2008 के बाद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी. आशंका जताई जा रही थी कि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के खत्म होते ही लोगों को महंगा तेल खरीदना पड़ेगा, चुनाव नतीजे घोषित होने के 11 दिनों बाद ही वह आशंका सही साबित हुई. हालांकि, ओएमसी ने एक साथ दाम में मोटा इजाफा नहीं किया है लेकिन हो सकता है कि आने वाले दिनों में इसमें धीरे-धीरे और बढ़ोतरी हो.
आमतौर पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को पेट्रोलियम उत्पादों के बेंचमार्क कीमतों के 15 दिवसीय रोलिंग औसत के अनुरूप हर रोज बदला जाता है. हालांकि, ओएमसी ने पिछले साल 4 नवंबर से दोनों की कीमतों को स्थिर रखा था. महंगे पेट्रोल और डीजल से आम लोगों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने 4 नवंबर 2021 को उत्पाद शुल्क में कटौती की थी. सरकार ने पेट्रोल पर शुल्क में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी, जिससे ईंधन की कीमतों में काफी कमी आई थी.
महंगी हुई रसोई गैस
मंगलवार से ही घरेलू एलपीजी सिलेंडर 50 रुपये महंगा हो गया है. दिल्ली में 50 रुपये महंगा होने से पहले जो सिलेंडर (बिना सब्सिडी वाला 14.2 किलो) 899.50 रुपये में मिलता था, अब वह 949.50 रुपये में मिलेगा. आखिरी बार घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दाम अक्टूबर 2021 को बदले गए थे.
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी तेल आयात करता है. इसकी स्थानीय डीजल और पेट्रोल की कीमतें सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जुड़ी हुई हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव भारतीय बाजार पर असर डालते हैं.
इस बीच सोमवार को रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति कम होने के सवालों पर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में कहा कि रूस से कच्चे तेल का आयात एक प्रतिशत से भी कम है. पुरी ने कहा वित्त वर्ष 2020-21 में भारत ने कच्चे तेल की अपनी जरूरत का 85 फीसदी और प्राकृतिक गैस की जरूरत का 54 फीसदी आयात किया है.
वहीं भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने एक कार्यक्रम में कहा कि देश में महंगाई तय दायरे से ऊपर बनी हुई है. ऐसी ही स्थिति 2020 में दिखी थी. उन्होंने कहा है कि आने वाले समय में महंगाई में नरमी आएगी. (dw.com)
भारत-इस्राएल कूटनीतिक रिश्तों के 30 साल होने के मौके पर इस्राएल के प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भारत आएंगे. बेनेट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 2021 में ग्लासगो में मिले थे, लेकिन यह उनकी पहली आधिकारिक भारत यात्रा होगी.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय की रिपोर्ट-
बेनेट के कार्यालय द्वारा जारी किए गए एक बयान में बताया गया है कि वो मोदी द्वारा दिए गए निमंत्रण पर दो अप्रैल को भारत आएंगे. बयान में कहा गया, "यह यात्रा दोनों देशों और उनके नेताओं के बीच महत्वपूर्ण संबंध की पुनः पुष्टि करेगी और दोनों देशों के बीच संबंधों की स्थापना की 30वीं वर्षगांठ को चिह्नित करेगी."
बयान में यह भी बताया गया कि बेनेट की यात्रा का उद्देश्य "दोनों देशों के सामरिक मैत्रीपूर्ण संबंधों को और आगे बढ़ाना और मजबूत करना और आपसी रिश्तों का विस्तार करना है. इसके अलावा, दोनों नेता कई क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर भी चर्चा करेंगे, जिनमें इनोवेशन, अर्थव्यवस्था, शोध और विकास, कृषि और अन्य क्षेत्र शामिल हैं."
यूक्रेन युद्ध पर इस्राएल का रुख
मीडिया रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि बेनेट की यात्रा चार दिनों की होगी और वो पांच अप्रैल को वापस इस्राएल लौटेंगे. यह यात्रा ऐसे समय पर होगी जब यूक्रेन युद्ध के बीच अंतरराष्ट्रीय जगत में युद्ध को लेकर भारत के रुख पर काफी चर्चा हो रही है. भारत ने युद्ध की तुरंत समाप्ति की मांग की है लेकिन पश्चिमी देशों के खेमे की तरह रूस की आलोचना नहीं की है.
बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भारत ने रूस के खिलाफ प्रस्तावों पर मतदान में हिस्सा नहीं लिया, और रूस ने इस बात की तारीफ की थी. अमेरिका और कई यूरोपीय देश भारत को अपने रुख का फिर से मूल्यांकन करने की सलाह दे रहे है. ब्रिटेन ने तो साफ साफ कह दिया है कि वो भारत से निराश है. हालांकि जापान और ऑस्ट्रेलिया ने ऐसी निराशा जाहिर नहीं की है.
ऑस्ट्रेलिया ने तो यहां तक कहा है कि भारत के अलग रुख से कोई नाराज नहीं है और प्रधानमंत्री मोदी युद्ध को खत्म करने के लिए अपनी तरफ से कोशिशें कर रहे हैं. युद्ध पर इस्राएल का रुख काफी दिलचस्प रहा है. इस्राएल दोनों पक्षों के बीच एक मुश्किल संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है.
उसने संयुक्त राष्ट्र में तो रूस के हमले की आलोचना पर पश्चिमी खेमे के साथ ही मतदान किया लेकिन उसके कुछ ही दिनों बाद बेनेट रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने मॉस्को गए. बेनेट ने अपने सभी सार्वजनिक बयानों में रूस की आलोचना से परहेज किया है, जबकि उनके विदेश मंत्री याइर लैपिड ने रूस की कड़ी आलोचना की है.
मध्यस्थ की भूमिका
बेनेट पुतिन से मिलने के बाद यूरोप गए थे और कई यूरोपीय नेताओं से मिले थे. ऐसा कर उन्होंने युद्ध के बीच रूस और पश्चिमी खेमे के बीच एक मध्यस्थ की छवि दिखाने की कोशिश की है. रूस और यूक्रेन दोनों देशों में यहूदियों की बड़ी आबादी रहती है और इस लिहाज से भी यहूदी देश होने के नाते इस्राएल की भूमिका और दिलचस्प हो जाती है.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमीर जेलेंस्की भी यहूदी हैं और उन्होंने इस्राएल से यूक्रेन के यहूदियों की रक्षा का हवाला देते हुए यूक्रेन की मदद करने का अनुरोध किया है. विशेष रूप से उन्होंने इस्राएल से उसके मिसाइल डिफेंस सिस्टम को साझा करने का अनुरोध किया है.
संभव है भारत में भी बेनेट और मोदी के बीच बातचीत में यूक्रेन पर चर्चा हो. हालांकि उनके यात्रा के केंद्र में भारत-इस्राएल संबंध ही रहेंगे. भारत ने 1992 में तेल अवीव में अपने दूतावास की स्थापना की थी. कई सालों तक दोनों देशों के संबंध रक्षा और कृषि क्षेत्रों में केंद्रित रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में और भी क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ी है.
दोनों नेताओं के बीच नवंबर 2021 में ग्लासगो में सीओपी26 जलवायु शिखर सम्मेलन के मौके पर मुलाकात हुई थी. महामारी के दौरान भी दोनों देशों के बीच काफी सहयोग रहा. अप्रैल 2020 में ही भारत ने बड़ी मात्रा में मास्क और दवाएं इस्राएल भेजी थीं.
उसके बाद इस्राएल ने भी एक इस्राएली कंपनी से वेंटीलेटर और अन्य मेडिकल उपकरण खरीदने में भारत की मदद की थी. भारत में महामारी की दूसरी लहर के दौरान इस्राएल ने कई वेंटीलेटर, ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर और ऑक्सीजन बनाने वाले संयंत्र भी भारत को दिए थे. हालांकि पेगासस मामले में भारत-इस्राएल संबंधों को लेकर विवाद भी रहा. (dw.com)
मुंबई, 20 मार्च। बॉम्बे हाईकोर्ट ने शनिवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक माता-पिता जिंदा हैं, बेटों का संपत्ति पर कोई हक नहीं होगा। कोर्ट ने एक महिला की याचिका पर यह फैसला दिया है।
दरअसल, एक महिला अपने पति का इलाज कराने के लिए अपनी संपत्ति बेचना चाहती थी, लेकिन उसका बेटा मां को संपत्ति बेचने से रोक रहा था। इसके बाद उसकी मां ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता सोनिया खान के पक्ष में फैसला दिया।
याचिकाकर्ता सोनिया खान ने कहा था कि अपने पति की सभी संपत्ति की वह कानूनी अभिभावक बनना चाहती थी। याचिकाकर्ता का बेटा आसिफ खान उन्हें ऐसा करने से रोक रहा था। वह अपने पिता का फ्लैट बेचने के मां के फैसले के खिलाफ था, इसलिए उसने भी कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर दी।
आसिफ ने कहा था कि अपने पिता की पूरी संपत्ति का वह लीगल गार्जियन है। उसके माता-पिता के दो फ्लैट हैं। एक मां के नाम पर है और दूसरा पिता के नाम पर है। फ्लैट शेयर्ड हाउसहोल्ड की श्रेणी में आता है। ऐसे में फ्लैट पर उसका पूरा-पूरा हक है।
कोर्ट ने उसकी इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस माधव जामदार की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि आसिफ यह साबित करने में विफल रहा कि उसने पिता की कभी परवाह की थी। (एजेंसी)
भारत में बुधवार से 12 से 14 साल के बच्चों के लिए कोरोना का टीकाकरण शुरू हो गया. केंद्र सरकार ने कहा है कि इस आयु वर्ग के बच्चों को बॉयलोजिकल ई लिमिटेड द्वारा विकसित कॉर्बेवैक्स टीके की दो खुराक दी जाएगी.
डॉयचे वैले पर आमिर अंसारी की रिपोर्ट-
कॉर्बेवैक्स टीके की दो खुराक के बीच 28 दिनों का अंतराल जरूरी है. यानी दोनों वैक्सीन के बीच 28 दिनों का गैप रहेगा. 12 से 14 साल के बच्चों के टीकाकरण को लेकर केंद्र सरकार ने मंगलवार को गाइडलाइंस जारी की. एक मार्च 2021 को देश में 12-13 साल के 4.7 करोड़ बच्चे थे.
बच्चों के टीकाकरण को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने मंगलवार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ एक वर्चुअल बैठक में कहा कि टीका लेने वाले बच्चों को कोविन ऐप पर रजिस्ट्रेशन कराना होगा और बच्चों को सिर्फ तय की गई वैक्सीन ही दी जाएगी.
इसके अलावा 60 साल से अधिक उम्र वाले सभी बुजुर्गों को एहतियाती खुराक दी जा सकती है. एहतियाती खुराक को दूसरे टीके के लगाए जाने की तारीख के 9 महीने (39 सप्ताह) के पूरा होने के बाद बुजुर्गों को दी जानी है.
बच्चों के लिए टीके का रजिस्ट्रेशन 16 मार्च से शुरू हो गया, और इसे ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से किया जा सकता है. रजिस्ट्रेशन कोविन ऐप पर मौजूद परिवार के किसी सदस्य के अकाउंट से या फिर पोर्टल पर एक नए मोबाइल नंबर से नया अकाउंट बनाकर किया जा सकता है. रजिस्ट्रेशन टीका केंद्रों पर भी कराया जा सकता है. वैक्सीनेशन की तारीख ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह बुक हो सकेगी.
इसके साथ राज्यों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि टीकाकरण की तारीख को 12 वर्ष की आयु प्राप्त करने वालों को ही कोविड 19 टीका लगाया जाए. अगर लाभार्थी पंजीकृत है, लेकिन टीकाकरण की तारीख को 12 वर्ष की आयु पूरी नहीं है, तो कोविड 19 वैक्सीन नहीं दी जानी चाहिए.
गाइडलाइंस में कहा गया है कि 12 से 14 साल के बच्चों का टीकाकरण उनके लिए तय टीका केंद्रों पर समर्पित टीकाकरण सत्रों में किया जाएगा, ताकि किसी भी अन्य टीके के इस्तेमाल की गुंजाइश न रहे. टीकाकरण दलों को यह सुनिश्चित करने के लिए ट्रेनिंग देने के लिए भी कहा गया है.
गौरतलब है 15-18 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों को पहले से ही 3 जनवरी, 2022 से कोवैक्सिन का टीका लगाया जा रहा है. (dw.com)
कर्नाटक हाईकोर्ट के हिजाब प्रतिबंध को जायज ठहराने के फैसले की भारत में बड़ी प्रतिक्रिया हुई है. राजनीतिक दलों से लेकर आम लोगों तक में इस फैसले की चर्चा हो रही है.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट-
कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा कॉलेजों में हिजाब प्रतिबंध को वैध ठहराए जाने के बाद कई राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव समेत कई नेताओं ने इस फैसले को लेकर भारतीय जनता पार्टी की आलोचना की है.
राव ने भारत सरकार पर हिजाब पंचायती बनने का आरोप लगाते हुए कहा कि कौन क्या पहनता है, इसमें सरकार को पड़ने की क्या जरूरत है. राज्य विधानसभा में बजट प्रस्ताव पर बहस के दौरान उन्होंने कहा कि "बीजेपी सांप्रदायिक आधार पर लोगों को बांटने का कोई मौका नहीं चूकती." बीजेपी-शासित कर्नाटक में जारी हिजाब विवाद के परिप्रेक्ष्य में राव ने कहा, "कौन क्या पहनता है, इससे सरकार को क्या लेना देना है? आप माहौल को तनावग्रस्त क्यों बना रहे हैं."
क्यों हुआ विवाद?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पहनने पर रोक के खिलाफ मुस्लिम छात्राओं की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य नहीं है. मंगलवार को सुनाए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि हिजाब इस्लाम के अनिवार्य धार्मिक व्यवहार का हिस्सा नहीं है और इस तरह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं है. साथ ही हाईकोर्ट ने कहा छात्र स्कूल यूनिफॉर्म पहनने से मना नहीं कर सकते हैं और स्कूल यूनिफॉर्म पहनने का नियम वाजिब पाबंदी है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार के आदेश को चुनौती का कोई आधार नहीं है.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब कर्नाटक के उडुपी में एक कॉलेज की छह छात्राओं ने कक्षा में हिजाब पहनने से रोक जाने के बाद विरोध किया था. धीरे-धीरे विवाद अन्य जिलों तक फैल गया. छात्राओं के हिजाब पहनने के विरोध पर हिंदू छात्रों ने भगवा गमछा पहनकर कक्षाओं में आने की मांग की, और विरोध कर रहीं मुस्लिम छात्रों का रास्ता रोका जिससे कक्षाएं बाधित हुई थीं.
‘फिर पूजा क्यों होती है?'
ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) नेता असदुदीन ओवैसी ने भी कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने गुरुकुल, जेल या आर्मी कैंप जैसे उदाहरण दिए जिनकी तुलना स्कूलों से नहीं की जा सकती.
एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में ओवैसी ने कहा, "अगर आप संविधान को देखें तो बहुलता और विविधता उसका मूलभूत ढांचा है, एकरूपता नहीं." उन्होंने कहा कि "दीवाली की रात को राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज और पुलिस थानों में पूजा होती है. नई संसद की आधारशिला रखते वक्त प्रधानमंत्री पूजा करते हैं. वहां पूजा क्यों होनी चाहिए?"
ओवैसी ने कहा, "तो बात ये है कि बाकी हर धर्म के प्रतीक की इजाजत है. और भेदभाव किसके साथ होगा? हिजाब पहनने वालीं छात्राओं के साथ. यह अपने आप में संविधान की धारा 15 का उल्लंघन है जो कहता है कि आप धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते."
‘सत्य की जीत'
मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने भी कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को समानता के अधिकार के विपरीत बताया है. ट्विटर पर माकपा ने लिखा, "हिजाब के बारे में कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला संविधान द्वारा दी गई समानता के विपरीत है. न्यायपालिका से भेदभावकारी नीतियों का समर्थन करने की उम्मीद नहीं की जाती. सिर ढकने के लिए स्कार्फ पहनने को कभी भी वर्दी का उल्लंघन नहीं माना गया. सुप्रीम कोर्ट से त्वरित न्याय की उम्मीद है."
उधर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुस्लिम राष्ट्र मंच ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. मंच ने कहा, "यह सत्य की जीत है." कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी महिला ने चुनौती दी है जो हाई कोर्ट में दायर याचिका में शामिल नहीं थी. कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाली छात्राओं ने कहा है कि वे हिजाब पहनना नहीं छोड़ेंगी. (dw.com)
दो साल पहले नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश में अभियुक्तों से वसूली गई जुर्माने की राशि अब प्रशासन उन लोगों तक वापस देने की तैयारी कर रहा है जिनसे ये जुर्माने वसूले गए थे.
डॉयचे वैले पर समीरात्मज मिश्र की रिपोर्ट-
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सख्त निर्देश देते हुए रिकवरी नोटिस रद्द करते हुए वसूले गए जुर्माने की राशि अभियुक्तों को वापस करने को कहा था. कानपुर के अपर जिलाधिकारी नगर अतुल कुमार के मुताबिक, "कानपुर में 33 लोगों से 3 लाख 67 हजार रुपये वसूले गए थे. जुर्माना वापसी के लिए प्रशासन की ओर से चेक बनाकर तहसील को भेजा जा चुका है जहां से तहसील कर्मी संबंधित व्यक्तियों के घरों पर जाकर ये चेक उन्हें सौंप देंगे. चेक सौंपने की कार्रवाई शुरू की जा चुकी है.”
कानपुर में सोमवार और मंगलवार को कुल छह लोगों को जुर्माने की वापसी के चेक सौंपे गए. अधिकारियों के मुताबिक, कई ऐसे लोग जो किराये पर रहते थे और अब घरों को छोड़कर कहीं चले गए हैं, उनके फोन नंबरों के जरिए उन्हें ढूंढ़ा जा रहा है. उम्मीद है कि अगले दो-तीन दिन तक सभी 33 लोगों को चेक सौंप दिए जाएंगे. कानपुर के बाबूपुरवा के रहने वाले परवेज आलम के पास भी 6970 रुपये की वसूली का नोटिस आया था. परवेज आलम ने यह राशि जमा कर दी थी. हालांकि उन्हें अब तक वापसी के चेक नहीं मिले हैं. कानपुर के अलावा लखनऊ, मेरठ, फिरोजाबाद शहरों में भी वसूले गए जुर्माने की वापसी की कार्रवाई शुरू हो गई है.
अवैध थी वसूली
दो साल पहले नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के विरोध में हुई हिंसा के बाद राज्य सरकार ने हिंसा और तोड़-फोड़ में कथित तौर पर शामिल लोगों से न सिर्फ जुर्माना वसूला था बल्कि सार्वजनिक जगहों पर ऐसे लोगों के पोस्टर भी लगाए गए थे. जुर्माना वसूले जाने की नोटिस भी घरों पर चस्पा की गई थी. ऐसे लोगों में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, रिटायर्ड अफसरों से लेकर रेहड़ी-पटरी लगाने वाले और मजदूरी करने वाले लोग भी शामिल थे. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रशासनिक कार्रवाई को अवैध बताते हुए तत्काल प्रभाव से वसूले गए जुर्माने की वापसी के निर्देश दिए थे. इसके बाद अब कानपुर समेत कई अन्य जगहों पर भी जुर्माना वापस करने की कार्रवाई शुरू कर दी गई है.
यूपी में सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल लोगों की संपत्ति जब्त करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर योगी सरकार ने पिछले दिनों जवाब देते हुए कहा था कि इस मामले में जिलों के अपर जिलाधिकारियों की ओर से भेजे गए वसूली के 274 नोटिस को वापस ले लिया गया है. सरकार ने यह भी बताया था कि मामले को नए ट्रिब्यूनल में भेजा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार रिकवरी नोटिस वापस लेने के आदेश देते हुए चेतावनी भी दी थी कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो सुप्रीम कोर्ट को यह करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा.
दिसंबर 2019 में कानपुर, लखनऊ, फिरोजबाद समेत यूपी के कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई थी. उसके बाद भी कानपुर के बाबूपुरवा और बेकनगंज इलाके में हिंसा हुई थी. इन इलाकों के 33 लोगों से जुर्माना वसूला गया था. हालांकि तमाम लोगों ने जुर्माने की राशि जमा नहीं की थी क्योंकि कई लोगों के ऊपर इतना जुर्माना लगाया गया था जो उनकी हैसियत से कई गुना था और वे इसकी भरपाई नहीं कर सकते थे. प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रिकवरी नोटिस भी निरस्त कर दिए हैं.
लाखों के जुर्माने
लखनऊ मध्य सीट से कांग्रेस उम्मीदवार रहीं सदफ जफर सीएए विरोधी आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा थीं. उनके खिलाफ 64 लाख रुपये की वसूली नोटिस जारी हुई थी. हालांकि उन्होंने अब तक यह जुर्माना भरा नहीं था. सदफ जफर कहती हैं, "हम लोग एक असंवैधानिक कानून का लोकतांत्रिक ढंग से विरोध कर रहे थे जो हमारा मौलिक अधिकार है. इस आंदोलन में शामिल होने के लिए मुझे गिरफ्तार किया गया था, हिरासत में प्रताड़ित किया गया, मारा-पीटा गया, इन सबकी भरपाई कौन करेगा. हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. सुप्रीम कोर्ट ने आखिर बता ही दिया कि सरकार ने जो किया वह कितना गलत था.”
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में परवेज आरिफ याचिका दायर की गई थी. सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद राज्य सरकार की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया था कि राज्य भर में कुल 106 एफआईआर दर्ज की गई थीं जिनमें 833 लोग अभियुक्त बनाए गए थे और 274 लोगों के खिलाफ रिकवरी नोटिस जारी की गई थी. सरकार की ओर सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि कोर्ट के निर्देश के बाद सभी रिकवरी नोटिस निरस्त कर दिए गए.
हालांकि कुछेक गैर सरकारी संगठनों के मुताबिक, यह संख्या कहीं ज्यादा थी. पिछले महीने एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स यानी एपीसीआर ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि यूपी के 19 शहरों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 224 एफआईआर दर्ज की थीं और पचास हजार से ज्यादा लोगों को नामजद और अज्ञात के रूप में अभियुक्त बनाया गया था.
चुनाव में नही बना मुद्दा
रिपोर्ट के मुताबिक 19 शहरों में 1791 नामजद और 55645 अज्ञात को अभियुक्त बनाया गया है जबकि 927 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक, कई लोग दो साल के बाद भी जेलों में ही बंद हैं और उनकी रिहाई नहीं हुई है. एपीसीआर नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाने वाला एक संगठन है. संगठन के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान कहते हैं कि वो लोग चाहते हैं कि यूपी सरकार इस बारे में आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक करे.
दिसंबर 2019 में हुए इन प्रदर्शनों में यूपी के मेरठ, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, रामपुर, फिरोजाबाद, वाराणसी, लखनऊ, कानपुर और संभल में 23 लोगों की मौत भी हुई थी. कई मृतकों के परिजनों का आरोप है कि उनकी मौत पुलिस की गोली से हुई थी लेकिन पुलिस आज तक यह दावा कर रही है कि पुलिस की गोली से कोई मौत नहीं हुई थी.
राज्य सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती उस वक्त आई थी जब यूपी में विधानसभा चुनाव चल रहे थे लेकिन महज दो साल पहले हुए इन हिंसक प्रदर्शनों और उनमें मारे गए लोगों का मामला पूरे चुनाव में कहीं चुनावी मुद्दे के रूप में नहीं दिखा. यहां तक कि जिन इलाकों में सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई, यानी कानपुर, मेरठ और फिरोजाबाद में भी यह घटना चुनावी मुद्दे से नदारद रही.
सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई और मारे गए लोगों के लिए न्याय की मांग करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं. इन पर सरकार ने जवाब भी दिया है लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं आया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील और मामले में एमिकस क्यूरी एसएफए नकवी कहते हैं कि पिछले करीब डेढ़ साल से कोविड के कारण आगे सुनवाई भी नहीं हो पा रही है, इसीलिए फैसले में देरी हो रही है. (dw.com)
हिजाब से प्रतिबंध हटाने की मांग करने वाली याचिकाकर्ता कहती हैं, "जब मैं इसे एक मुसलमान के नजरिए से देखती हूं तो मुझे लगता है कि मेरा हिजाब दांव पर है, और एक भारतीय होने के नाते मेरे संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन हुआ है."
केवल 12 साल की उम्र में आलिया ने कराटे की प्रतियोगिता में अपने राज्य कर्नाटक का प्रतिनिधित्व हिजाब पहने हुए किया था. उसमें आलिया ने गोल्ड जीता. ठीक पांच साल बाद जूनियर कॉलेज में पढ़ने जाते हुए उसने हिजाब पहना तो उसे कैम्पस गेट से आगे नहीं जाने दिया गया. कारण बनी वह नीति जिसके हिसाब से स्कूल कॉलेजों में धार्मिक पहनावे के लिए कोई जगह नहीं.
आलिया असादी कहती हैं, "यह केवल एक कपड़ा नहीं है.'' अपनी सहेली के घर जाते समय वह निकाब पहनती हैं जो कि हिजाब से भी ज्यादा ढंकने वाला परिधान है. इसमें आंखों को छोड़ कर लगभग पूरा चेहरा ढंका होता है. आलिया कहती हैं, "हिजाब मेरी पहचान है और इस समय मुझ से मेरी पहचान छीनने की कोशिश हो रही है.''
कालेजों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने पर बहस छिड़ी हुई है. हिजाब को प्रतिबंधित करने का मुद्दा देश में हिन्दू राष्ट्रवाद को हवा देने का असर माना जा रहा है. कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में कहा है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है. आलिया उन छह छात्राओं में से एक हैं जिन्होंने सरकारी प्रतिबंध के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की. प्रतिबंध को वह अपने शिक्षा और धार्मिक आजादी के अधिकार का उल्लंघन मानती हैं.
हर महिला के लिए हिजाब के अलग मायने
दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक में हिन्दू धर्म के मानने वाले बहुलता में हैं लेकिन संवैधानिक रूप से भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. सिर ढंकने वाला हिजाब देश में मुसलमानों के अधिकार की लड़ाई का प्रतीक बन गया है. कर्नाटक राज्य के साथ साथ देश भर के कई मुसलमान इसे अल्पसंख्यकों को अलग थलग करने की कोशिश बता रहे हैं.
भारत में बहुत सारी महिलाएं इसे अपनी गरिमा बरकरार रखने और बाकी धार्मिक प्रतीक के रूप में पहनती हैं और इसे पहनने की आजादी बरकरार रखना चाहती हैं. हिजाब के विरोधी मानते हैं कि यह महिलाओं पर दबाव का प्रतीक है जिसे उन पर थोपा जाता है. वहीं हिजाब के समर्थक कहते हैं कि हर पहनने वाले के लिए इसके मायने अलग होते हैं, जिनमें से एक अपनी मुस्लिम पहचान पर गर्व करना भी है. करीब 1.4 अरब की जनसंख्या वाले भारत की 14 फीसदी आबादी मुसलमान है. यह संख्या इतनी बड़ी है जो विश्व में इंडोनेशिया के बाद भारत को सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बनाती है.
इसी साल जनवरी में कर्नाटक के उडुपी से शुरु हुए विवाद की चर्चा पूरे देश में हो रही है. पीयू कॉलेज की छह छात्राओं ने कक्षा में हिजाब पहनने से रोके जाने का विरोध किया था. हिजाब पर विवाद उसके बाद उडुपी के अलावा अन्य जिलों तक फैल गया. हिजाब के साथ कॉलेज जाने की मांग को लेकर कई हफ्ते प्रदर्शन चले और छात्राएं कर्नाटक हाईकोर्ट गईं. अपनी याचिका पर आए फैसले से निराश होने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है.
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिजाब इस्लाम के अनिवार्य धार्मिक व्यवहार का हिस्सा नहीं है और इस तरह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं है. साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि छात्र स्कूल यूनिफॉर्म पहनने से मना नहीं कर सकते हैं और स्कूल यूनिफॉर्म पहनने का नियम वाजिब पाबंदी है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार के आदेश को चुनौती का कोई आधार नहीं है.
इस्लामोफोबिया
इस बीच कई छात्राओं ने विवाद के कारण बने हालात के आगे हार मानते हुए बिना सिर ढंके ही कालेज जाने का कदम उठाया और क्लास में पढ़ने पहुंचीं. वहीं कई और लड़कियों ने इसे नहीं माना और विरोध करने पर दो महीने के लिए उनके क्लास आने पर रोक लग गई. 18 साल की आएशा अनवर जैसी छात्राओं की तो परीक्षा छूट गई और वह अपनी साथियों से पढ़ाई में पिछड़ गईं. इस पर अनवर कहती हैं, "मुझे ऐसा लग रहा है जैसे हर कोई हमें निराश कर रहा है."
कई अराजक तत्वों ने अनवर की निजी जानकारी सोशल मीडिया पर डाल दी जिसके कारण उन्हें ऑनलाइन दुर्व्यहार, गालियों और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा. उन दोस्तों का साथ छूट गया जो उन्हें कट्टरवादी मुस्लिम के तौर पर देखने लगे. इन सबके बावजूद अनवर हिजाब नहीं छोड़ना चाहतीं. वह बताती हैं कि बचपन से उन्होंने अपनी मां को इसे पहनते देखा और वे उनकी नकल किया करतीं. आज उन्हें हिजाब से मिलने वाली प्राइवेसी और धार्मिक पहचान का गर्व बहुत अच्छा लगता है.
याचिकाकर्ताओं में से एक 20 साल की छात्रा आएशा इम्तियाज कहती हैं कि उनके लिए यह श्रद्धा का मामला है लेकिन दूसरी महिलाओं की राय अलग हो सकती है. वह कहती हैं, "मेरी कई सहेलियां क्लास में हिजाब नहीं पहनतीं. उन्हें ऐसा करके सशक्त महसूस होता है और मुझे अपने तरीके से सशक्त महसूस होता है.'' उनकी नजर में ऐसा प्रतिबंद "इस्लामोफोबिया" है.
यूरोप में भी प्रतिबंध
भारत में ऐतिहासिक रूप से ना तो हिजाब पर कोई प्रतिबंध लगा और ना ही सार्वजनिक जगहों पर उसे पहनने में कोई पाबंदी रही है. भारत के कई इलाकों और समुदायों में मुस्लिम ही नहीं हिन्दू महिलाएं भी सिर को घूंघट, पल्लू या आंचल से ढंकती आई हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों का कहना है कि देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाया जा रहा है और इसके कारण मुसलमानों पर हमले बढ़ सकते हैं. इसी साल मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाने वाले 'बुल्ली बाई' और 'सुल्ली डील्स' जैसे अभियान चले जिनके पीछे कट्टरपंथी विचारों में विश्वास करने वाले पढ़े लिखे युवा हैं.
भारत के अलावा फ्रांस जैसे यूरोपीय देश में भी हिजाब पर प्रतिबंध का मुद्दा बन चुका है. फ्रांस में तो 2004 से ही स्कूलों में हिजाब पहनने पर पाबंदी है. कई और यूरोपीय देशों में भी सार्वजनिक जगहों पर निकाब और बुरका जैसे और भी ज्यादा चेहरा ढंकने वाले परिधानों को लेकर पाबंदियां हैं. मुस्लिम देशों में भी अलग अलग तरह के सिर ढंकने वाले कपड़ों को लेकर नियमों में काफी अंतर हैं.
आरपी/एनआर (एपी)


