Chhattisgarh
तस्वीर / ‘छत्तीसगढ़’ / विमल मिंज
जगदलपुर : इन दिनों बस्तर के जंगलों में पीले-सुनहरे महुआ के फूलों की बहार देखने को मिल रही है। महुआ के पेड़ों से गिरते फूलों को स्थानीय आदिवासी परिवार सुबह-सुबह जंगल पहुंचकर इकट्ठा कर रहे हैं। जगदलपुर से 45 किलोमीटर की दूर कोड़ेनार और किलेपाल के बीच, जहां आज सुबह सास और बहू महुआ बीनते दिखे,और यह इनका इस मौसम में महुआ के फूल को उठाना रोज का काम है,
महुआ बस्तर के ग्रामीणों और आदिवासी समुदाय के लिए केवल एक जंगल उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है। हर वर्ष मार्च से अप्रैल के बीच महुआ का सीजन रहता है। इस दौरान गांवों की महिलाएं, पुरुष सूर्योदय से पहले जंगल पहुंचकर जमीन पर गिरे फूलों को बटोरते हैं।
महिला ने बताया इनका परिवार रोजाना कई किलो महुआ इकट्ठा कर लेता है। बाद में इन फूलों को घर लाकर सुखाते हैं,और फिर स्थानीय हाट-बाजार में बेचकर अच्छी कीमत मिलने से इन्हें अतिरिक्त आय कमाते हैं। एक महुआ का पेड़ सालभर में लगभग 100 से 200 किलो तक फूल देता है।


