राष्ट्रीय
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, दिवंगत प्रणब मुखर्जी का मानना था कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद कांग्रेस ने पॉलिटिकल फोकस खो दिया था और मनमोहन सिंह यूपीए गठबंधन को बचाने के बारे में सोचते रहे जिसका असर शासन-व्यवस्था पर पड़ा.
ये दावा किया गया है दिवंगत प्रणब मुखर्जी के आगामी संस्मरणों में, जिसके अंश रूपा पब्लिकेशंस ने जारी किए हैं.
संस्मरणों के अनुसार, प्रणब मुखर्जी मानते थे कि नरेंद्र मोदी की शैली 'निरंकुशता' वाली है.
इसमें प्रणब मुखर्जी के हवाले से कहा गया है कि ''कांग्रेस के कुछ नेता मानते थे कि साल 2004 वो यदि प्रधानमंत्री बन गए होते, तो साल 2014 की बड़ी पराजय से बचा जा सकता था. हालांकि मैं इससे सहमत नहीं हूं. मेरा मानना है कि जब मैं राष्ट्रपति बना तो कांग्रेस नेतृत्व ने अपना पॉलिटिकल फोकस खो दिया. सोनिया गांधी पार्टी के मामलों को संभालने में सक्षम नहीं थीं और सदन में डॉक्टर सिंह की लंबी ग़ैर-मौजूदगी ने अन्य सांसदों के साथ व्यक्तिगत संपर्क को ख़त्म कर दिया.''
संस्मरणों के अंशों में कहा गया है, ''मेरा मानना है कि शासन का नैतिक अधिकार प्रधानमंत्री के पास होता है. प्रधानमंत्री और उनके प्रशासन के काम करने के तौर-तरीक़े, देश की समग्र दशा में प्रदर्शित होते हैं.''
इसमें आगे कहा गया है, डॉक्टर सिंह गठबंधन को बचाने के बारे में सोचते रहे, जिसका असर शासन-व्यवस्था पर हुआ.
प्रणब ने यह भी लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान निरंकुश तरीके से शासन किया, जिससे सरकार, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधों में कटुता आई. केवल समय ही बता सकेगा कि इन मामलों पर इस सरकार के दूसरे कार्यकाल में क्या कोई बेहतर तालमेल हुआ है.
नरेंद्र मोदी की सरकार ने ही प्रणब मुखर्जी को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' दिया था. पीएम मोदी कांग्रेस की आलोचना करते वक़्त हमेशा प्रणब मुखर्जी की तारीफ़ करते थे. (बीबीसी)


