राष्ट्रीय
पश्चिम बंगाल सरकार ने अवैध घुसपैठियों को रखने के लिए असम के डिटेंशन सेंटर की तर्ज पर राज्य के 23 जिलों में 'होल्डिंग सेंटर' बनाने का फैसला किया है.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट –
बीजेपी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में अवैध तरीके से बंगाल आने और रहने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या लोगों की पहचान कर उनको खदेड़ने का वादा किया था. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सत्ता संभालते ही अवैध घुसपैठियों के लिए 'डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट' यानी शिनाख्त, उनके नाम हटाने और सीमा पार भेजने की नीति का एलान किया था. राज्य के गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में तमाम जिला शासकों से केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश के मुताबिक 'होल्डिंग सेंटर' खोलने का निर्देश दिया है. शिनाख्त होने के बाद सीमा पार भेजे जाने से पहले घुसपैठियों को तीस दिनों तक ऐसे केंद्रों में रखा जा सकेगा.
नागरिकता अधिनियम के तहत उन विदेशियों को अवैध अप्रवासी कहा जाता है जो या तो बिना वैध कागजात के भारत में आए हैं या फिर वैध कागजात पर आने के बाद वीजा की अवधि पार होने के बावजूद अवैध तरीके से देश में रह रहे हैं. इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बांग्लादेश और म्यांमार के अप्रवासियों के लिए राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को हर जिले में 'होल्डिंग सेंटर' बनाने का अधिकार दिया था.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल में यहां अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, घुसपैठियों को वापस भेजने के मामले में राज्य की पूर्व तृणमूल कांग्रेस सरकार ने केंद्र के निर्देशों का पालन नहीं किया था. लेकिन अब ऐसे लोगों को शीघ्र गिरफ्तार कर उनको सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के हाथों सौंप दिया जाएगा. बीएसएफ उनको उनके देश वापस भेज देगी. अधिसूचना में कहा गया है कि ऐसे केंद्रों में हिरासत में लिए जाने वाले दो तरह के लोगों को रखा जाएगा. इनमें गिरफ्तार किए गए विदेशी लोगों के अलावा उन विदेशी कैदियों को भी रखा जाएगा जो सजा पूरी करने के बाद अपने देश भेजे जाने का इंतजार कर रहे हैं.
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राज्य सरकार के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताया, "इन होल्डिंग सेंटर 30 दिनों तक रहने के दौरान घुसपैठियों के बायोमेट्रिक आंकड़े और उनकी नागरिकता से संबंधित तथ्यों की जानकारी जुटाई जाएगी. नागरिकता की पुष्टि होने पर उनको उनके देश वापस भेज दिया जाएगा." उस अधिकारी का कहना था कि तीस दिनों के बाद बीएसएफ ऐसे घुसपैठियों को ले जाकर उनको देश की सीमा से बाहर खदेड़ सकती है.
असम में ऐसे केंद्र पर विवाद
साल 2023 में असम में भी ऐसे डिटेंशन सेंटर की स्थापना की गई थी. उस पर तब काफी विवाद भी हुआ था. राज्य के ग्वालपाड़ा जिले के मातिया में बना ट्रांजिट कैंप नामक डिटेंशन शिविर वहां रहने वाले लोगों की बदहाली के कारण दो साल पहले सुर्खियों में रहा था.
असम सरकार ने वर्ष 2008-09 के बाद पहले छह अस्थायी डिटेंशन सेंटर खोले थे. यह सेंटर क्रमशः सिलचर, ग्वालपाड़ा, जोरहाट, डिब्रूगढ़, तेजपुर और कोकराझार जिला जेल परिसर में खोले गए थे. उनमें अवैध तरीके से राज्य में पहुंचे विदेशी नागरिकों को गिरफ्तारी के बाद रखा जाता था.
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वर्ष 2021 में इन डिटेंशन सेंटर का नाम बदल कर ट्रांजिट कैंप कर दिया गया. वर्ष 2023 में मातिया कैंप शुरू होने के बाद विभिन्न जिलों में बने डिटेंशन सेंटर में रहने वालो को वहां शिफ्ट कर दिया गया था. मातिया अवैध घुसपैठियों के लिए देश का सबसे बड़ा डिटेंशन सेंटर है. करीब 20 बीघा जमीन पर 46.5 करोड़ की लागत से बने इस सेंटर में तीन हजार विदेशी नागरिकों और घुसपैठियों को रखने की क्षमता है. वर्ष 2020 में गौहाटी हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इस सेंटर का निर्माण शुरू हुआ था. वर्ष 2024 में यहां रहने वाले करीब एक सौ रोहिंग्या और चिन नागरिकों ने भूख हड़ताल कर खुद को संयुक्त राष्ट्र को सौंपने या यहां से बाहर भेजने की मांग उठाई थी.
फैसले पर विवाद
पश्चिम बंगाल में भी इस फैसले पर विवाद हो रहा है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सवाल है कि पहले यह तो बताए कि राज्य में कितने बांग्लादेशी और रोहिंग्या नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं?
एक मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रसेनजित बसु डीडब्ल्यू से बातचीत में कहते हैं, "आखिर बंगाल में ऐसे होल्डिंग सेंटर खोलने की जरूरत क्यों पड़ी? पहले सरकार को यह बताना चाहिए कि राज्य में कितने बांग्लादेशी और रोहिंग्या अवैध तरीके से रह रहे हैं."
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सिलीगुड़ी के एक कालेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रोफेसर रही डा. मिनती सेनगुप्ता कहती हैं कि असम में ऐसे डिटेंशन सेंटर पर काफी विवाद होता रहा है. अब बंगाल में भी वही दोहराया जा रहा है. वो डीडब्ल्यू से कहती हैं, "इससे पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में और कड़वाहट का अंदेशा है."
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, "बीजेपी घुसपैठियों को खदेड़ने के वादे पर सत्ता में आई है. ऐसे में उसे यह दिखाना होगा कि वह इस मामले में सचमुच गंभीर है. वैसे, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद अब तक चुनाव आयोग भी इसका कोई आंकड़ा नहीं दे सका है कि बंगाल में कितने विदेशी लोग अवैध तरीके से रह रहे हैं."
विश्लेषकों का कहना है कि इस फैसले की आड़ में अल्पसंख्यक समुदाय के बेकसूर लोगों को भी जबरन होल्डिंग सेंटर में भेजा जा सकता है. इससे पहले भी कई लोगों को पुश बैक कर बांग्लादेश भेजा गया था. लेकिन बाद में उनके भारतीय नागरिक होने की पुष्टि होने पर वापस बुलाना पड़ा था.


