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पश्चिम बंगाल में कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा एसआईआर
07-Jan-2026 1:43 PM
पश्चिम बंगाल में कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा एसआईआर

बिहार में हाल में हुए विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) भले कोई मुद्दा नहीं बन सका हो, बंगाल में इस साल अप्रैल में होने वाले चुनाव में इसके अहम मुद्दे के तौर पर उभरने के संकेत मिल रहे हैं.

 डॉयचे वैल पर प्रभाकर मणि तिवारी की रिपोर्ट -

 

बिहार में बीते साल के आखिर में हुए विधानसभा चुनाव में एसआईआर कोई मुद्दा नहीं बन सका था. लेकिन पश्चिम बंगाल में बीते नवंबर से शुरुआत के बाद से ही यह ममता बनर्जी सरकार, केंद्र और चुनाव आयोग के बीच टकराव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. अब इस साल अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी इसके एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभरने की संभावना बन रही है.

राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले दिन से ही एसआईआर के मुद्दे पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक मूड में है. उन्होंने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को कई पत्र भेजे हैं. शनिवार को भेजे अपने पत्र में मुख्यमंत्री ने आयोग पर बिहार और बंगाल में एसआईआर के लिए अलग-अलग मापदंड तय करने का आरोप लगाया है.

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दरअसल, यहां यह कवायद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीति का मजबूत हथियार बन गई है. ममता बनर्जी सरकार जहां इसके विरोध में सड़कों पर उतर आई है, वहीं बीजेपी भी जवाबी रणनीति तैयार करने में जुटी है.

अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए दोनों राजनीतिक अपने-अपने सियासी हित साधने में इसका जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस ने चेतावनी दी है कि अगर एक भी वैध वोटर का नाम कटा तो पार्टी लाखों लोगों के साथ दिल्ली जाकर विरोध प्रदर्शन करेगी.

क्या कहती है बीजेपी

बीजेपी का दावा है कि मतदाता सूची से लाखों फर्जी नाम कटने और अपना अल्पसंख्यक वोट बैंक बिखरने की आशंका से तृणमूल कांग्रेस डरी हुई है.

इस मुद्दे पर राज्य में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार तेज हो रहा है. एसआईआर शुरू होने से पहले बीजेपी ने दावा किया था कि इसके तहत एक करोड़ अवैध वोटरों के नाम सूची से हटाए जाएंगे. लेकिन ड्राफ्ट सूची जारी होने पर करीब 58.20 लाख लोगों के ही नाम कटे हैं. इनमें मृत और पता बदलने वाले लोग शामिल हैं. इसके अलावा एक करोड़ लोगों की पहचान और नागरिकता सुनिश्चित करने के लिए सुनवाई होगी और उनके कागजात की जांच की जाएगी. मतदाता सूची में बांग्लादेशी घुसपैठियों का नाम होने के भी कोई संकेत नहीं मिला है.

अब ममता और उनकी पार्टी का आरोप है कि सुनवाई के बहाने वैध वोटरों के नाम काटने की साजिश रची जा रही है. उन्होंने आयोग को भेजे अपने पत्र में सवाल किया है कि आकिर बिहार और बंगाल के लिए अलग नियम क्यों बनाए गए हैं? बिहार में पारिवारिक रजिस्टर को वैध दस्तावेज माना गया था. लेकिन बंगाल में आयोग इसे स्वीकार नहीं कर रहा है.

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दूसरी ओर, ममता के पत्र के जवाब में बीजेपी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी आयोग को एक पत्र भेज कर ममता के आरोपों का खंडन किया है. लेकिन तृणमूल कांग्रेस का सवाल है कि जब आरोप आयोग पर लग रहे हैं तो बीजेपी सफाई क्यों दे रही है? पार्टी के प्रवक्ता कुणाल घोष डीडब्ल्यू से कहते हैं, "इससे साफ है कि यह दोनों मिले हुए हैं और बीजेपी की शह पर ही राज्य में मनमाने तरीके से यह कवायद चल रही है."

मौतों पर विवाद

एसआईआर के कथित आतंक के कारण राज्य में होने वाली मौतों ने इस विवाद की आग में घी डालने का काम किया है. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते 29 दिसंबर को दावा किया था कि अब तक इसकी वजह से 50 लोगों की मौत हो चुकी है जिनमें पांच बूथ लेवल आफिसर (बीएलओ) भी शामिल हैं. लेकिन उसके बाद बीते एक सप्ताह के दौरान एक और बीएलओ समेत चार लोगों की मौत हो चुकी है. ममता ने इसके लिए केंद्र सरकार, बीजेपी और चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया है. उनका का कहना है कि बिना किसी ठोस तैयारी और ट्रेनिंग के हड़बड़ी में एसआईआर की कवायद शुरू करने की वजह से आम लोगों को भारी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है.

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पार्टी की वरिष्ठ नेता और मंत्री शशी पांजा ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा, "एसआईआर की वजह से राज्य के लोग भारी आतंक में दिन काट रहे हैं. कई लोग इसी आतंक के कारण अपनी जान दे चुके हैं. लेकिन चुनाव आयोग या बीजेपी ने अब तक इन मौतों पर एक शब्द भी नहीं कहा है."

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बीजेपी ने इन मौतों के लिए तृणमूल कांग्रेस की गलतबयानी को ही जिम्मेदार ठहराया है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने डीडब्ल्यू से कहा, "तृणमूल कांग्रेस एसआईआर के मुद्दे पर शुरू से ही गलतबयानी कर आम लोगों को गुमराह कर रही है. उसकी नीतियों के कारण फैले आतंक के कारण ही लोगों की मौत हुई है."

वैसे, अब तक जितने भी बीएलओ की मौत हुई है उसके लिए उनके परिजनों ने एसआईआर के दबाव को ही जिम्मेदार ठहराया है. बीएलओ के संगठन काम के दबाव के विरोध में धरना भी देते रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर और इससे होने वाली मौतों को सत्ता के दोनों प्रमुख दावेदार यानी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी अपने सियासी हितों के लिए भुनाने में जुटे हैं.

 

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक तापसी मंडल डीडब्ल्यू से कहती हैं, "तृणमूल कांग्रेस पहले से ही बंगाल के प्रवासी मजदूरों के उत्पीड़न को बांग्ला अस्मिता से जोड़ कर आंदोलन करती रही हैं. अब इस कड़ी में एसआईआर का मुद्दा भी जुड़ गया है."

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राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, "एसआईआर की ड्राफ्ट सूची में बांग्लादेशी वोटरों के नाम नहीं मिलने की वजह से तृणमूल कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ औऱ आक्रामक हो गई है. यह तय है कि तृणमूल कांग्रेस इसे अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाएगी."

विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर के मुद्दे पर राज्य में जारी विवाद के लगातार तेज होने का अंदेशा है. अगले चुनाव में इसके एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभरने की संभावना है.


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