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तालिबान के विदेश मंत्री की नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत की महिला पत्रकारों ने कहा- हमें बाहर रखा गया
11-Oct-2025 9:18 PM
तालिबान के विदेश मंत्री की नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर भारत की महिला पत्रकारों ने कहा- हमें बाहर रखा गया

अमीर ख़ान मुत्तक़ी की प्रेस कॉन्फ़्रेंस की तस्वीरों में कोई महिला नज़र नहीं आ रही है


तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की नई दिल्ली में शुक्रवार को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर कई महिला पत्रकारों ने कहा है कि उन्हें वहाँ नहीं बुलाया गया। महिला पत्रकारों ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

मुत्तक़ी गुरुवार को भारत पहुँचे हैं और शुक्रवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक हुई है। 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के कब्जे के बाद यह पहली उच्चस्तरीय बैठक भारत में हुई है।

शुक्रवार की शाम मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस नई दिल्ली स्थित अफगानिस्तान के दूतावास में थी। कई महिला पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि उन्हें इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से बाहर रखा गया। अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय के पब्लिक कम्युनिकेशन के निदेशक हाफिज जिया अहमद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की जो तस्वीर एक्स पर पोस्ट की है, उसमें साफ दिख रहा है कि कोई महिला पत्रकार नहीं है।

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार पर मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने पर पहले भी विवाद हुए हैं। तालिबान लड़कियों की शिक्षा को ग़ैर-इस्लामिक मानता है।

महिला पत्रकारों की गैरमौजूदगी को लेकर भारत की विपक्षी पार्टियों के नेता भी सवाल पूछ रहे हैं। कांग्रेस सांसद और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ती पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा है, ‘मैं जियोपॉलिटिकल मजबूरियां समझ सकता हूँ, जिसकी वजह से हम तालिबान के साथ बात कर रहे हैं लेकिन उनके भेदभावपूर्ण और आदिकालीन रीति-रिवाजों को स्वीकार करना पूरी तरह से हास्यास्पद है। यह बहुत ही निराशाजनक है कि तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस से महिला पत्रकारों को बाहर रखा गया।’ कार्ती चिदंबरम ने इस पोस्ट में विदेश मंत्री एस जयशंकर को भी टैग किया है।

वहीं तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने एक्स पर लिखा है, ‘हमारी सरकार तालिबान के विदेश मंत्री अमीर मुत्तकी को न्यूज कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को बाहर रखने की अनुमति देने की हिम्मत कैसे कर सकती है। भारत की जमीन पर पूरे प्रोटोकॉल के साथ ऐसा करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? जयशंकर इससे सहमत कैसे हो सकते हैं? हमारे रीढ़विहीन पुरुष पत्रकार इस न्यूज कॉन्फ्रेंस में कैसे रहे?’

महिला पत्रकारों ने क्या-क्या कहा

कई महिला पत्रकारों ने इसे ‘अस्वीकार्य’ बताया और कहा कि किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में लैंगिक आधार पर भेदभाव लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

कुछ ने सवाल उठाया कि अगर तालिबान भारत में आकर भी महिलाओं को नजरअंदाज कर सकता है, तो यह अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति के प्रति उनकी सोच को और साफ करता है।

विदेश मामलों को कवर करने वाली पत्रकार स्मिता शर्मा ने सोशल मीडिया वेबसाइट एक्स पर पोस्ट किया कि मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी भी महिला पत्रकार को नहीं बुलाया गया था।

‘विदेश मंत्री जयशंकर और मुत्तकी के साथ बातचीत के बाद शुरुआती वक्तव्य में अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं की भयानक दुर्दशा का कोई उल्लेख नहीं किया गया।’ ‘हमारी सुरक्षा चिंताओं की वजह से मुत्तकी का रेड कार्पेट बिछाकर उस देश में स्वागत किया गया जो महिलाओं की उपलब्धि और नेतृत्व पर गर्व करते हैं। यह है आज की वैश्विक राजनीति।’

स्मिता शर्मा के पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए पत्रकार निरुपमा सुब्रमण्यम ने सवाल किया कि ‘महिला सहकर्मियों को अलग रखने के मुद्दे पर क्या पुरुष पत्रकारों ने अपना विरोध नहीं दर्ज कराया?’

‘प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को शामिल कराने की कोशिश की’

एनडीटीवी के सीनियर एग्जीक्यूटिव एडिटर आदित्य राज कौल ने लिखा, ‘अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी नई दिल्ली स्थित अफगानिस्तान दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। दुर्भाग्य से, इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक भी महिला पत्रकार को अनुमति नहीं दी गई। मैंने दूतावास के गेट पर सुरक्षाकर्मियों से इस मुद्दे पर बात की लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी।’

इंडिपेंडेंट की पत्रकार अर्पण राय ने कौल के समर्थन में लिखा, ‘आदित्य राज कौल उन दो पत्रकारों में से एक थे जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को शामिल कराने की कोशिश की। उन्होंने वहीं खड़े होकर पूछा कि महिलाओं को अनुमति कैसे नहीं दी जा सकती! यह तब हुआ जब सभी महिला पत्रकारों ने ड्रेस कोड का सम्मान किया, खुद को पूरी तरह से ढका हुआ था! लेकिन तालिबान के लिए कुछ भी काम नहीं आया!’

वहीं द हिंदू अख़बार की डिप्लोमैटिक अफ़ेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर ने स्मिता शर्मा के पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए लिखा, ‘सरकार पूरे आधिकारिक प्रोटोकॉल के साथ तालिबान प्रतिनिधिमंडल की मेज़बानी कर रही है। वहीं इससे भी अधिक हास्यास्पद बात यह है कि तालिबान के विदेश मंत्री को महिलाओं को लेकर उनके घिनौने और अवैध भेदभाव को भारत में लाने की अनुमति है।’

वहीं पत्रकार गीता मोहन ने लिखा, ‘अफगान तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को निमंत्रण नहीं दिया गया। अस्वीकार्य।’

हिंदू ग्रुप की डायरेक्टर मालिनी पार्थसारथी ने कहा, ‘मैं सहमत हूं। बतौर समाचार संस्थान, हमें उन प्रेस कॉन्फ्ऱेंसों को कवर नहीं करना चाहिए जहां महिला पत्रकारों के प्रवेश को रोका जाता है। मीडिया को तालिबान के विदेश मंत्री की दिल्ली में हुई बैठकों की रिपोर्टें भी प्रकाशित या प्रसारित नहीं करनी चाहिए।’

द हिंदू की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने लिखा, ‘मेरी राय में पुरुष पत्रकारों को विरोध के तौर पर उस प्रेस कॉन्फ्रेंस से निकल जाना चाहिए था।’

स्तंभकार और लेखक स्वाति चतुर्वेदी ने लिखा, ‘पहले तो आप बर्बर तालिबान को हमारे देश में घुसने देकर भारत की धरती को अपवित्र करते हैं और फिर खुशी-खुशी उन्हें महिलाओं के प्रति अपने लैंगिक भेदभाव वाले कानूनों को लागू करने देते हैं, जो भारत में पाषाण युग से चले आ रहे हैं। अविश्वसनीय! आपको महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने से रोकने के बजाय उन्हें लैंगिक समानता का पाठ पढ़ाना चाहिए था। क्या आप में हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खड़े होने की हिम्मत नहीं है?’

इतिहासकार रुचिका शर्मा ने लिखा, ‘ये भारत है, अफग़़ानिस्तान नहीं! उनकी हिम्मत कैसे हुई कि उन्होंने महिला पत्रकारों को भारतीय धरती पर तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने की इजाजत नहीं दी? भारत सरकार को क्या हो गया है?’

तालिबान पर लगते रहे हैं मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप

अगस्त 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था। तब से देश में तालिबान की सरकार है। इस दौरान महिलाओं पर कई पाबंदियां लगाई गई हैं और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं।

इससे पहले अफगान महिलाओं ने बीबीसी से कहा था कि जब से 12 साल से बड़ी लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाया गया है, इंटरनेट उनके लिए बाहरी दुनिया से जुडऩे का एकमात्र सहारा बन गया है।

महिलाओं के रोजग़ार के अवसरों में भी भारी कमी आई है। पिछले साल विश्वविद्यालयों से महिला लेखिकाओं की किताबें हटाई गईं।

(bbc.com/hindi)


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