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बांग्लादेश में बीएनपी की जीत को विदेशी मीडिया भारत के लिए कैसे देख रहा है?
13-Feb-2026 3:43 PM
बांग्लादेश में बीएनपी की जीत को विदेशी मीडिया भारत के लिए कैसे देख रहा है?

बांग्लादेश के आम चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) भारी बहुमत से जीत की ओर बढ़ रही है.

ऐसे में यह सवाल बहुत ही स्वाभाविक हो जाता है कि बीएनपी सरकार का रुख़ पड़ोसी देश भारत को लेकर क्या होगा?

बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार जब भी रही है, तब भारत के साथ संबंधों में गर्मजोशी नहीं रही है. ऐसे में तारिक़ रहमान की अगुआई वाली बीएनपी का रुख़ क्या होगा?

इस सवाल को लेकर पश्चिम के मीडिया में भी काफ़ी बात हो रही है.

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भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीएनपी की जीत पर बधाई दी है.

पीएम मोदी ने कहा कि यह 'जीत' तारिक़ रहमान के नेतृत्व पर बांग्लादेश की जनता के भरोसे को दिखाती है.

उन्होंने एक्स पर लिखा, "भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा. मैं बहुआयामी संबंधों को मज़बूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके (तारिक़ रहमान) साथ काम करने के लिए उत्सुक हूँ."
मोदी की बधाई का एक संदेश यह भी जा रहा है कि भारत बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संबंधों को सुधारना चाहता है.

विदेशी मीडिया में क्या कहा जा रहा है?

 

बांग्लादेश भारत की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी सीमाएँ भारत के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से लगती हैं.

चीन के लिए यह 'बेल्ट एंड रोड' का एक प्रमुख केंद्र है और बंगाल की खाड़ी के किनारे एक महत्वपूर्ण सामरिक मौजूदगी भी है.

भारत ने अपना बड़ा प्रभाव शेख़ हसीना के साथ व्यक्तिगत संबंधों पर आधारित किया था जो अब भारत में स्व-निर्वासन में रह रही हैं.

वहीं चीन ने लंबी अवधि के निवेशों के माध्यम से अपनी स्थिति को मज़बूत किया, जो राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद टिके रह सकें.

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''अमेरिका ने इसमें में एक नया आयाम जोड़ा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी कच्चे माल से बने कुछ बांग्लादेशी वस्त्र निर्यात पर ज़ीरो टैरिफ़ कर दिया है. बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है. चीन के बाद बांग्लादेश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक है. भारत के वस्त्र निर्माताओं के लिए यह संकेत है कि इस सेक्टर में उसका आर्थिक वर्चस्व अब नहीं रहा.''

''भारत की बांग्लादेश नीति हसीना पर ज़्यादा निर्भर थी, जो अब एक गंभीर रणनीतिक भूल के रूप में देखी जा रही है. सुरक्षा और व्यापार में घनिष्ठ सहयोग के बदले भारत ने लोकतंत्र से जुड़ी चिंताओं को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया. हसीना की भारत में निरंतर उपस्थिति ने कूटनीतिक संबंधों को और जटिल बनाया है.

बांग्लादेश में विशेषकर उन युवा प्रदर्शनकारियों के बीच जिन्होंने उनकी सरकार को हटाया, इस विषय पर तीखी आलोचना देखी गई है.''

ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''बीएनपी जो अगली सरकार का नेतृत्व करने जा रही है, न तो स्पष्ट रूप से भारत-विरोधी है और न ही खुलकर चीन-समर्थक. उसकी विदेश नीति भारत के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं है और उसने संकेत दिया है कि किसी भी पड़ोसी को विशेषाधिकार प्राप्त दर्जा नहीं दिया जाएगा. इसके बजाय, वह अपने युवा मतदाताओं के हितों को प्राथमिकता देगी."

"यह परिस्थिति चीन के लिए अवसर उत्पन्न करती है, जो पहले से ही बांग्लादेश का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता है. दोनों देशों की निकटता तब स्पष्ट दिखी जब अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने अपनी एक महत्वपूर्ण विदेश यात्रा के लिए चीन को चुना, जो परंपरागत रूप से पहले भारत जाने की प्रथा से अलग था.''

ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''इन घटनाक्रमों का यह अर्थ नहीं कि चीन निर्णायक बढ़त बना चुका है. भौगोलिक वास्तविकताएँ सुनिश्चित करती हैं कि भारत की भूमिका निर्णायक बनी रहेगी. लेकिन नई दिल्ली और बीजिंग दोनों को ऐसे देश में बढ़त हासिल करने के लिए ज़्यादा प्रयास करने होंगे, जहाँ मतदाता अब ख़ुद को महज़ जियोपॉलिटिकल मोहरा मानने को तैयार नहीं हैं.''

बांग्लादेश को 'इंडिया लॉक्ड' मुल्क कहा जाता है. दरसअल, बांग्लादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है. भारत और बांग्लादेश के बीच 4,367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और यह उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 फ़ीसदी है. यानी बांग्लादेश लगभग चारों तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है.

ऐसे में बांग्लादेश सुरक्षा और व्यापार के मामले में भारत पर निर्भर है. वहीं बांग्लादेश से भारत को पूर्वोत्तर के राज्यों में सस्ता और सुलभ संपर्क में मदद मिलती है. पूर्वोत्तर के राज्यों से बाक़ी भारत को जोड़ने में बांग्लादेश की अहम भूमिका है.

कहा जा रहा है कि बांग्लादेश के लोग राजनीतिक साझेदारों में एकाधिकार की नीति के ख़िलाफ़ है. बांग्लादेश ने हाल ही में पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग को भी मज़बूत किया है, जो स्वाभाविक रूप से भारत के लिए संवेदनशील विषय है.

1971 के युद्ध के बाद पहली बार दोनों देशों ने सीधा व्यापार फिर से शुरू किया है और सैन्य अधिकारियों के बीच नियमित संवाद भी बहाल हुआ है.

अमेरिकी मैगज़ीन टाइम ने अपनी वेबसाइट पर एक रिपोर्ट में लिखा है, ''हसीना के तख्तापलट के बाद नई दिल्ली के साथ संबंध ख़राब हो गए. हसीना और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंधों में भरोसा था. संबंधों में आई कड़वाहट का संकेत जनवरी में तब दिखा, जब स्टार बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान का इंडियन प्रीमियर लीग का अनुबंध अचानक रद्द कर दिया गया, जिसके जवाब में ढाका ने लीग के प्रसारण पर प्रतिबंध लगा दिया.''

टाइम ने लिखा है, ''फिर भी संकेत हैं कि भारत व्यावहारिक रूप से बीएनपी के साथ काम करने को तैयार है और रहमान ने दिसंबर के अंत में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाक़ात की. हालांकि, कई विवादित मुद्दे अब भी बने हुए हैं, जिनमें तीस्ता नदी का प्रश्न शामिल है, जहां बीएनपी 1997 के यूएन वाटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर कर पानी में न्यायसंगत हिस्सेदारी का दावा करता है.''

''रहमान का कहना है कि हसीना के दौर में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए कई समझौतों में असंतुलन हैं, जिन्हें द्विपक्षीय संबंधों को सही मायने में रीसेट करने के लिए ठीक करना होगा. रहमान कहते हैं, "बिल्कुल, हम पड़ोसी हैं. बांग्लादेश का हित, हमारे लोगों के हितों की रक्षा, सबसे पहले आती है, फिर हम संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे."

ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन की वेबसाइट ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''बांग्लादेश की नई सरकार के सामने सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियों में से एक अपने पड़ोसी भारत के साथ संबंधों को बहाल करना होगा. हसीना के शासन में भारत बांग्लादेश का सबसे क़रीबी सहयोगी था लेकिन उनकी सरकार के गिरने के बाद संबंध बुरी तरह बिगड़ गए और हाल के महीनों में खुलकर शत्रुतापूर्ण हो गए हैं.''

''रहमान ने माना है कि भारत के साथ मुद्दे हैं और वे केवल पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक समझ पर आधारित संबंध चाहते हैं. इस पर पूछे जाने पर कि क्या भारत और बांग्लादेश दोस्ती फिर से बना सकते हैं जबकि दिल्ली हसीना और उनकी पार्टी के सैकड़ों सदस्यों को सुरक्षित ठिकाना देता रहा है, रहमान ने सीधा जवाब देने से परहेज किया."

मोहम्मद यूनुस का शासन

शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद 18 महीनों तक बांग्लादेश ग़ैर-निर्वाचित अंतरिम सरकार के अधीन रहा. इस अंतरिम सरकार के साथ भारत के संबंध सबसे निचले स्तर पर पहुँच गए थे.

हसीना का भारत आना और वहीं से उनके सार्वजनिक वक्तव्यों ने तनाव को और बढ़ाया. शेख़ हसीना को बांग्लादेश में मौत की सज़ा सुनाई गई है.

बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि है, लेकिन नई दिल्ली ने अब तक यह कहते हुए प्रत्यर्पण से इनकार किया है कि अपराध 'राजनीतिक प्रकृति' का हो तो अनुरोध ठुकराने का अधिकार है.

हसीना के सत्ता से हटने के बाद कहा जाता है कि बांग्लादेश में भारत समर्थक आवाज़ कमज़ोर हुई है. बांग्लादेश में बढ़ती भारत-विरोधी बयानबाज़ी और हिंसा ने भी चिंता बढ़ाई है.

बांग्लादेश में लगभग 1.3 करोड़ हिंदू हैं और भारत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मु्द्दा उठाता रहता है. वहीं बांग्लादेश सरकार का कहना है कि ऐसे हमलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है.

भारत ने अपने हालिया सलाना बजट में बांग्लादेश के लिए वित्तीय सहायता को आधा कर दिया.

दूसरी तरफ़ बांग्लादेश सरकार ने चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ संपर्क बढ़ाया है, जिनके भारत के साथ संबंध ऐतिहासिक रूप से जटिल रहे हैं.

हालांकि चीन के साथ निकटता कोई नई बात नहीं है. बीजिंग लंबे समय से बांग्लादेश का व्यापार, निवेश और रक्षा साझेदार रहा है.

मार्च 2025 में चीन यात्रा के दौरान बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का उल्लेख करते हुए बांग्लादेश को इस इलाक़े में 'समुद्र का एकमात्र संरक्षक' कहा था.

चीन बांग्लादेश में कई की कई प्रमुख परियोजनाओं में शामिल है, जिनमें मोंगला बंदरगाह का आधुनिकीकरण और तीस्ता नदी से संबंधित जल प्रबंधन परियोजना शामिल हैं.

तीस्ता नदी परियोजना विशेष रूप से भारत के लिए संवेदनशील है क्योंकि नदी जल बँटवारे पर दोनों देशों के बीच वार्ता लंबे समय से लंबित है.

अंतरिम सरकार के दौरान पाकिस्तान के साथ ढाका के संबंधों में अपेक्षाकृत अहम बदलाव देखे गए हैं. कहा जा रहा है कि हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा नई सरकार में भी द्विपक्षीय समीकरण को प्रभावित करता रहेगा.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टिट्यूट के फ़ेलो सदानंद धुमे ने एक्स पर लिखा है, ''बांग्लादेश के संभावित नए प्रधानमंत्री 60 वर्षीय तारिक़ रहमान हैं. उनकी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी है, जो आज के चुनाव में उसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी, कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी से अलग है."

"बांग्लादेशी मतदाताओं ने जमात को निर्णायक रूप से अस्वीकार किया. यह एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है. लेकिन इससे ज़्यादा उत्साहित होकर यह अपेक्षा करना उचित नहीं होगा कि बीएनपी सुशासन स्थापित कर देगी."

"लीक हुए अमेरिकी कूटनीतिक संदेशों के अनुसार, पिछली बार जब बीएनपी सत्ता में थी, तब रहमान को 'बांग्लादेश के सबसे भ्रष्ट व्यक्तियों में से एक' माना जाता था. संदिग्ध प्रतिष्ठा वाले एक वंशानुगत नेता का चुनाव उन बांग्लादेशियों के लिए निराशाजनक हो सकता है, जो अलग तरह की राजनीति की आकांक्षा रखते हैं.''

यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन के एसओएएस में राजनीति पढ़ाने वाले अविनाश पालिवाल ने एक्स पर लिखा, बांग्लादेश को बधाई. राजनीतिक कभी परफ़ेक्ट नहीं होती और बड़े सवाल अब भी बने हुए हैं. लेकिन आज के शांतिपूर्ण चुनावों में भारी संख्या में लोगों की भागीदारी को देखकर यह साफ़ हो जाता है कि बांग्लादेश के लोग किस प्रकार की राजनीतिक चाहते हैं. यह एक महत्वपूर्ण पल है."

भारत ने संवाद के रास्ते खुले रखे

बीबीसी संवाददाता सौतिक बिस्वास के अनुसार, दिल्ली के लिए यह चुनाव व्यक्तियों की बजाय स्थिरता के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण है.

नीति निर्माताओं ने इस बात को माना है कि ढाका में कोई भी सरकार भारत को नज़रअंदाज़ करने का जोख़िम नहीं ले सकती.

भौगोलिक जुड़ाव, व्यापार, खाद्य सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और साझा सुरक्षा ख़तरे ऐसे क्षेत्र हैं जो दोनों पड़ोसियों के लिए कड़वी सच्चाई हैं.

हालांकि शेख़ हसीना की दिल्ली में मौजूदगी और निर्वासन में रहते हुए समय-समय पर उनके राजनीतिक बयान एक ऐसा नाज़ुक मुद्दा है जो दोनों देशों के संबंधों के पटरी पर आने में बाधा पैदा कर सकता है.

हिंदू राष्ट्रवादी बयानबाज़ी ने बांग्लादेश के लोगों को और खिन्न किया है और इससे वास्तविक सुलह का रास्ता और संकरा हो गया है.

यह चुनाव भारत के लिए डैमेज कंट्रोल की तरह है साथ ही, उसकी कोशिश होगी कि अगर पुराने संबंध बहाल न हों तो भी आगे और रणनीतिक दूरी न पैदा हो.

बांग्लादेश के चुनाव पर भारत की क़रीब नज़र है, क्योंकि दोनों देशों के संबंध कई दशकों में सबसे निचले स्तर पर हैं.

ढाका में यह धारणा व्यापक है कि दिल्ली ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का समर्थन कर लोकतांत्रिक गिरावट को बढ़ावा दिया.

इस सोच ने भारत विरोधी भावनाओं को तेज़ किया है और उस संबंध को कमज़ोर कर दिया है, जिसे कभी आदर्श पड़ोसी संबंध कहा जाता था.

अब, जब अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है और उसके जल्द सत्ता में लौटने की संभावना कम है, भारत नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की कोशिश कर रहा है.

ऐसा लगता है कि भारत बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ काम करने के लिए तैयार है, ख़ासकर तब जब पार्टी ने जमात से दूरी बनाई है, दिल्ली के साथ संवाद की इच्छा जताई है और उग्रवाद के ख़िलाफ़ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है.

साथ ही, भारत ने सभी प्रमुख राजनीतिक पक्षों के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे हैं. यह एक व्यावहारिक प्रयास माना जा रहा है, जिसका मक़सद कमज़ोर पड़ चुके रिश्तों को सुधारना है.

भारत के साथ संबंधों पर बीएनपी रुख़

बीएनपी की भारी जीत के बीच पार्टी की नेता ज़ेबा अमीना ख़ान ने भारत के साथ संबंधों पर बात की.

ज़ेबा अमीना ख़ान ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए कहा, "हम पड़ोसी हैं, हम दोस्त हैं और हमें दोस्त ही बने रहना चाहिए. हम बहुत लंबी सीमा साझा करते हैं. भारत के लिए जो सुरक्षा जोखिम है, वही हमारे लिए भी सुरक्षा ख़तरा है. इसलिए हमें एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए."

"हमारी सीमा के कुछ इलाकों में कुछ छोटे मुद्दे हैं, जिन्हें आपसी सहमति और मिलकर हल किया जाना चाहिए ताकि हम सद्भाव के साथ रह सकें. भारत के ख़िलाफ़ हमारे पास क्या हो सकता है. कुछ भी नहीं."

भारत को बांग्लादेश के लोगों के साथ काम करना चाहिए. यह बीजेपी या किसी राजनीतिक दल का मामला नहीं है, यह इस बारे में है कि बांग्लादेश के लोग क्या चाहते हैं. अगर भारत इसे समझे, तो हम वास्तव में सबसे अच्छे दोस्त बन सकते हैं. मुझे भारत से कोई समस्या नहीं है."

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर उन्होंने कहा, "व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि किसी भी देश को अपराधियों को शरण नहीं देनी चाहिए. चाहे वे राजनीतिक अपराधी हों, वित्तीय अपराधी हों या किसी और तरह के अपराधी हों, उन्हें किसी भी देश में संरक्षण नहीं मिलना चाहिए. उन्हें न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए. मैं यह बात किसी एक व्यक्ति के संदर्भ में नहीं कह रही हूं, क्योंकि कई लोग भारत गए हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.


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