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अभी लगातार भोपाल सहित दूसरे कुछ शहरों में दहेज हत्या के इतने चर्चित मामले सामने आए कि एक बार फिर दहेज प्रताडऩा पर नजर डालना जरूरी लगने लगा। भारत सरकार के दर्ज जुर्म के आंकड़े बताते हैं कि देश में दहेज से जुड़ी हिंसा के कारण हर 30 मिनट में एक जुर्म दर्ज होता है। अब मानो यह काफी न हो, तो दूसरा और भयानक आंकड़ा यह है कि हर दिन 16 महिलाओं की दहेज हत्या होती है, यानी हर 90 मिनट पर एक दहेज हत्या! इससे भयानक और क्या हो सकता है? यह भी समझने की जरूरत है कि दहेज हत्या तो आमतौर पर छुपने लायक बात नहीं रहती है, लेकिन दहेज प्रताडऩा और दहेज हिंसा की शिकायतें तब तक पुलिस तक नहीं पहुंचतीं, जब तक पानी सिर के ऊपर नहीं निकल जाता। जब शादीशुदा लड़कियों के माँ-बाप को यह पक्का भरोसा हो जाता है कि लडक़ी की शादी बचने का अब कोई जरिया नहीं है, और यह भी कि प्रताडऩा झेलते-झेलते वह मर भी सकती है, तभी जाकर दहेज प्रताडऩा की पुलिस रिपोर्ट होती है। यह एक अलग बात है कि जैसा कि हर कड़े कानून के साथ होता है, कुछ फीसदी मामलों में ऐसी झूठी रिपोर्ट भी होती है, लेकिन उस झूठ को देश की बड़ी अदालतें अब साफ-साफ देखने लगी हैं, और ऐसे कई मामलों में झूठी रिपोर्ट लिखाने वालों के खिलाफ ही अदालती आदेश भी हुए हैं।
अब अगर पुलिस में दर्ज मामलों को देखें, तो इतनी बड़ी संख्या में दहेज प्रताडऩा या दहेज हत्या के मामले जारी रहने, दर्ज होने, और अदालत तक पहुंचने की एक बड़ी वजह यह लगती है कि अब अधिकतर लड़कियों और महिलाओं के हाथ में ऐसे मोबाइल फोन रहते हैं जिनमें हिंसा या प्रताडऩा के सुबूत संदेशों के रूप में दर्ज हो जाते हैं, या मामूली समझ रखने वाली नवविवाहिताएं भी प्रताडऩा की किसी न किसी तरह की रिकॉर्डिंग करना सीख जाती हैं, और इन्हें संदेशों के रूप में अपने फोन से सहेलियों, और मायके को भेज देती हैं। पहले ये सुबूत इतने आसान नहीं थे, और कोई खबर भिजवाना भी मुश्किल रहता था। अब आसान संदेश पुख्ता सुबूत बन जाते हैं। अदालतों का काम भी डिजिटल और साइबर सुबूत के बाद कुछ आसान हो जाता है, जांच एजेंसियों का काम तो आसान हो ही जाता है। हम बिना किसी तंज के यह कहना चाहते हैं कि समाज में बदलती हुई स्थिति के मुताबिक अब लड़कियों और महिलाओं का जो एक नया सशक्तिकरण हुआ है, उससे भी अब दहेज प्रताडऩा का उजागर होना बढ़ गया है। आज जब कुछ गिनी-चुनी महिलाएं शादी तोडक़र बाहर निकलने की हिम्मत रखती हैं, जब वे शादीशुदा रहते हुए भी अपने किसी पुराने या नए प्रेमी के साथ मिलकर पति का कत्ल करने की हिम्मत रखती हैं, तो यह जाहिर है कि वे प्रताडऩा के सुबूत भी अधिक चतुराई से जुटा सकती हैं।
लेकिन भारतीय समाज में दहेज प्रताडऩा का विस्तार संतानमोह, और पुत्रमोह तक हो जाता है। ससुराल में प्रताडऩा के जो मामले दहेज से जुड़े हुए नहीं भी रहते, उनमें भी बहू से संतान की उम्मीद, और संतान में भी बेटा लाकर देने की उम्मीद हिंसा तक पहुंच जाती है। जहां पर उसके साथ रियायत होती है, और शारीरिक हिंसा नहीं होती, वहां भी मानसिक प्रताडऩा और हिंसा तो आम बात रहती है। ससुराल के लोग अपनी अगली पीढ़ी की चाह में मरे पड़े रहते हैं, और यह चाह कन्या शिशु से पूरी नहीं होती, क्योंकि भारत के अधिकतर तबकों में वंश कन्याओं से आगे नहीं बढ़ता, बेटों से आगे बढ़ता है। लड़कियों को तो यह मान लिया जाता है कि वे पराए घर की रहती हैं, और उनकी शादी करने तक उनकी देखभाल करना ही मायके का जिम्मा रहता है। बहनों को बराबरी का हक न देना पड़ जाए, इसलिए डरे-सहमे भाई लोग भी बहन से सीमित रिश्ता ही रखते हैं, और वे भी आखिरी दम तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं कि डोली माँ-बाप के घर से उठती है, अर्थी तो पति के घर से ही उठनी चाहिए। भाईयों की संपत्ति पर एकाधिकार की चाह लड़कियों को मायके से भावनात्मक रूप से भी बेदखल कर देती है। ऐसे में जिस लडक़ी को मायके का भावनात्मक और रोजमर्रा का साथ कम रहता है, उसे ससुराल भी बेसहारा और बेबस मानकर उसके साथ मनचाही बदसलूकी करता है। जिस लडक़ी को मायके का साथ अधिक रहता है, उससे अधिकतर ससुराल वाले यह उम्मीद करते हैं कि किसी सुख में न सही, किसी दुख की नौबत में तो बहू के मायके वालों को आकर साथ देना ही चाहिए। यह कही या अनकही सामाजिक उम्मीद देश की संस्कृति सी बन गई है, और लोग जुबानी जमा-खर्च के लिए उन्हें कोई दहेज नहीं चाहिए, कहते हुए भी साथ में कॉमा के बाद यह जोड़ देते हैं, अपनी बेटी को जो देना हो, वो दें। कुल मिलाकर लेने से परहेज बहुत कम लोगों का रहता है, कुछ चाकू-पिस्तौल की नोंक पर लेते हैं, कोई कुछ सामाजिक और मानसिक प्रताडऩा खड़ी करके लेते हैं, और कुछ लोग मासूम बने हुए हमें कुछ नहीं चाहिए के अंदाज में सब कुछ पाने की उम्मीद रखते हैं। जुर्म के सरकारी आंकड़ों के जानकार विश्लेषक भी यह कहते हैं कि दहेज प्रताडऩा, या बहू की दूसरे किस्म की प्रताडऩा के मामले इससे बहुत अधिक हो सकते हैं, और सामाजिक अपमान की आशंका से शिकायत दर्ज नहीं कराई जाती है। कई परिवार इसलिए भी शिकायत दर्ज करवाने से कतराते हैं कि घर में बची हुई और छोटी लड़कियों का रिश्ता तय होना इससे मुश्किल हो जाएगा।
हम जब सिर्फ आंकड़ों के आधार पर कोई नतीजा निकालने की कोशिश करते हैं, तो वह कई वजहों से नाजायज लगती है। बीते बरसों में दहेज हत्या के दर्ज मामलों में कुछ गिरावट आई है, लेकिन जब हम इन्हीं बीते बरसों में तलाक के आंकड़ों को देखते हैं, तो यह समझ पड़ता है कि शहरों, पढ़े-लिखे तबकों, और मध्य वर्ग में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। महानगरों में तलाक के अदालती मामलों में 30-40 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है, और बीते पांच बरसों में कुछ शहरों में 25 फीसदी तक अधिक मामले फैमिली कोर्ट में पहुंचे हैं। अब हम जब ससुराली हिंसा के आंकड़ों में कुछ गिरावट देखते हैं, तो उसी के साथ-साथ तलाक के मामलों में बढ़ोत्तरी को जोडक़र देखना इसलिए जरूरी है कि बहुत से मामलों में हिंसा की रिपोर्ट लिखाने के पहले ही अब लड़कियां तलाक की तरफ आगे बढ़ जाती हैं। अब वे अबला की तरह हिंसा बर्दाश्त करने से परे एक दूसरे विकल्प का इस्तेमाल करके सबला की तरह अदालत चली जाती हैं। इसलिए ससुराली हिंसा में गिरावट की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि अब जुल्म एक सीमा से अधिक सहने के बजाय बहू निकलकर अदालत चली जाती है।
इन दोनों ही मामलों को देखें, तो समझ पड़ता है कि भारत में लड़कियों, और महिलाओं की हालत अड़ोस-पड़ोस और रिश्तेदारी में बचपन से बलात्कार झेलने के पहले से खराब है। अब तक जगह-जगह सोनोग्राफी से डॉक्टर अजन्मी संतान का सेक्स बता रहे हैं, और कड़े कानून, कड़ी कैद के बावजूद किसी मोटे लालच में ही ऐसा किया जा रहा होगा। बाद में स्कूल-कॉलेज में लड़कियों का शोषण तो जारी रहता ही है, कामकाज की जगहों से लेकर ससुराल तक उनका कई तरह का शोषण चलता है। इनमें जिन मामलों में जुर्म दर्ज होता है, उनको लेकर ही अगर विश्लेषण किया जाए, तो भी समाज और सरकार को महिलाओं की हिफाजत के लिए बहुत कुछ करना बाकी है। देखते हैं कि देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू होने के बाद आम महिलाओं की स्थिति में भी किसी तरह का बदलाव आ सकता है, या उसके बावजूद नहीं आएगा?


