ताजा खबर
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
यहाँ तो हर चीज बिकती है
कहो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
लालाजी तुम क्या-क्या
मियाँ जी तुम क्या-क्या
बाबू जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
सुनो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे
कहो जी तुम...
ये बलखाती हुई जुल्फें,
ये लहराते हुए बाज़ू ये होठों की जवाँ मस्ती,
ये आँखों का हसीं जादू
अदाओं के खजाने,
जवानी के तराने
बहारों के जमाने
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
तड़पती शोखियाँ दे दूँ,
मचलता बाँकपन दे दूँ
अगर तुम एक कली माँगो,
तो मैं सारा चमन दे दूँ
ये मस्ती के घेरे,
ये महके अँधेरे
ये रंगीन डेरे
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
मोहब्बत बेचती हूँ मैं,
शराफत बेचती हूँ मैं
ना हो गैरत तो ले जाओ,
के गैरत बेचती हूँ मैं
निगाहें तो मिलाओ,
अदाएँ न दिखाओ
यहाँ न शर्माओ
कहो जी तुम क्या-क्या खरीदोगे...
गाने में तवायफ (वैजयंतीमाला) खुद को बाजार का माल बता रही है। एपस्टीन के ‘लिटिल सेंट जेम्स’ आइलैंड और न्यूयॉर्क मैनहट्टन टाउनहाउस में भी वही था, एक प्राइवेट ‘बाजार’ जहां पावरफुल लोग ‘खरीद’ सकते थे। क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स, प्रिंस एंड्र्यू, कुछ ताकतवर भारतीय नाम भी फाइल्स में आए। ये लोग ‘खरीद’ रहे थे, न सिर्फ सेक्स, बल्कि ब्लैकमेल पावर, बिजनेस डील्स, और साइलेंस। साहिर की ये लाइन बहुत कड़वी है, एक औरत को अपनी भावनाएं, सम्मान और शर्म भी बेचनी पड़ रही है। एपस्टीन ने सैकड़ों नाबालिग लड़कियों को ‘ग्रूम’ किया, उन्हें बताया कि ये ‘मॉडलिंग’ या ‘मसाज’ जॉब्स हैं। फिर उन्हें ताकतवर लोगों से ‘मिलवाया’। उसकी पार्टनर ने कई लड़कियों को रिक्रूट किया। फाइल्स में दिखता है कि ये सब ‘डील्स’ थे, एक लडक़ी की बॉडी के बदले आर्थिक या राजनीतिक एहसान। गैरत, शर्म का कोई मतलब नहीं रहता था।
लालाजी, मियांजी, बाबूजी गाने में हर क्लास के ‘खरीदार’ को न्यौता दिया गया है। एपस्टीन का नेटवर्क भी ऐसा ही था, अरबपति, राजनेता, साइंटिस्ट, सेलिब्रिटी, नोबल पुरस्कार विजेता, और राजकुमार। हर तरह के ‘बाबूजी’ वहां थे। भारत के मंत्री हरदीप पुरी के दर्जनों मेंशन (ईमेल और मीटिंग्स) से लगता है कि ये ग्लोबल नेटवर्क भारत तक फैला हुआ था, और इसमें अंबानी जैसे ताकतवर भारतीय भी शामिल थे। अदाओं के खजाने, जवानी के तराने। ये लाइनें जवानी और आकर्षण को ‘प्रोडक्ट’ की तरह बेचने की बात करती हैं। एपस्टीन की लड़कियां ज्यादातर 14-17 साल की थीं, जवानी का ‘तराना’। वो उन्हें ट्रेन करता था कि कैसे ‘अदा’ दिखानी है, कैसे ‘मिलना’ है। फाइल्स में वीडियो और फोटोज हैं जो ब्लैकमेल के लिए यूज होते थे। गाने की तरह, ये सब ‘बिकने’ के लिए था।
एपस्टीन स्कैंडल दिखाता है कि सभ्यता की चमड़ी बहुत पतली है। त्वचा के नीचे वही प्राचीन इंसान है, जो वासना, दौलत, ताकत, और काबू के लिए कुछ भी कर सकता है। साहिर लुधियानवी ने 1958 में ही ये लिख दिया था कि समाज में औरत को (या कमजोर को) माल की तरह देखा जाता है। एपस्टीन ने इसे ग्लोबल स्केल पर किया। वासना सब ओवरटेक कर लेती है, क्लिंटन, ट्रंप, गेट्स जैसे लोग, जो दुनिया बदल सकते थे, लेकिन अपनी इच्छाओं के आगे झुक गए। पावर इम्यूनिटी देता है, ब्रिटेन के हटाए गए राजकुमार एंड्र्यू की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन दुनियाभर में कई ताकतवर लोग बचे हुए हैं। एपस्टीन फाइलों से परे भी भारत में भी प्तरूद्गञ्जशश में कई ताकतवर आरोपी बिना सजा के घूम रहे हैं। ग्लोबल ब्रोकर, एपस्टीन जैसे लोग नेटवर्क बनाते हैं। वो पैसे, लक्जरी, और ‘प्राइवेसी’ देते हैं, बदले में ब्लैकमेल। नाबालिग देह उनका सामान और सेवा बन जाते हैं। भारत में भी अंबानी और हरदीप पुरी का नाम आना दिखाता है कि ये स्कैंडल सरहदों से परे है। भारत के भी पावरफुल लोग (पॉलिटिशियन, सेलिब्रिटी, बिजनेसमैन) ऐसे नेटवर्क में फंस सकते हैं। हैरानी यह भी है कि जो इंटरपोल दुनिया भर के चाइल्ड-सेक्स मुजरिमों की जानकारी दुनिया भर की सरकारों को देता है, वह एपस्टीन से अनजान रहा!
एपस्टीन का मामला बड़े-बड़े नामों की भागीदारी की वजह से दुनिया का आज तक का सबसे बड़े लोगों का सेक्स-स्कैंडल बन गया है। लेकिन इतने सारे नामों के एक साथ होने से परे अगर देखें तो इसमें नया कुछ भी नहीं है। दुनिया के जितने बड़े लोग हैं, खासकर ताकत, शोहरत, और दौलत के मालिक, उनमें से बहुत से लोग अक्सर ही यह मानकर चलते हैं कि उनकी ये ताकतें उन्हें किसी भी लडक़ी या महिला के बदन पर हाथ डालने का हक दे देती हैं। ट्रंप के उस बयान को दुनिया कैसे भूल सकती है जो उनकी ही आवाज में चारों तरफ फैला था जिसमें उसने कहा था कि एक कामयाब मर्द जिस औरत को चाहे उसे, उसके गुप्तांगों से दबोच सकता है। लेकिन दौलत-शोहरत जैसी ताकत से परे के कुछ दूसरे लोगों को देखें जो एपस्टीन फाइल्स में दर्ज हैं, तो उसमें नोबल पुरस्कार विजेता, बड़े-बड़े लेखक, या नोम चॉम्स्की जैसे वामपंथी विचारक भी हैं, जो कि एपस्टीन की बाल यौन शोषण की शोहरत के दस-दस बरस बाद भी उसकी मेहरबानियों के मोहताज रहे।
साइकॉलॉजी में इंसान की वासना मानव सभ्यता के पहले से चली आ रही एक अस्तित्व की जरूरत है, यह इंसानी पीढिय़ों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी देह-संबंधों से तो जुड़ी हुई है ही, यह फ्रॉयड के शब्दों में इंसान की (शायद मर्दों की) बुनियादी ऊर्जा है जो समाज के पैमानों पर एक अंहकार से भी जुड़ी रहती है। ताकतवर लोगों में अपनी वासना से जुड़े हुए देह-संबंधों को पाने का, मनचाही देह को जीतने का, और वर्जित संबंध बनाने का अहंकार इतना बड़ा होता है कि वे सामाजिकता के आम नियमों को भी तोड़ देते हैं। एपस्टीन मामले में नाबालिग बच्चियों की देह को पाकर दुनिया के ये सबसे ताकतवर मर्द सेक्स तो कम पा रहे थे अपने अहंकार के अधिक सहला रहे थे। मानव सभ्यता विकास के मनोविज्ञान में यह बात दर्ज है कि किस तरह पुरूष अधिक भागीदार चाहते हैं, शायद उनके भीतर की यह आदिम समझ रहती है कि उन्हें अधिक से अधिक देह-संबंध बनाकर अगली पीढ़ी बढ़ानी है, यह एक अलग बात हो सकती है कि वह वासना तो मानव सभ्यता के विकास के साथ जारी रही, लेकिन उसका पीढ़ी बढ़ाने वाला मकसद अब जरूरी नहीं रह गया। शायद यह भी एक वजह है कि बड़े-बड़े ओहदों पर पहुंचने वाले, शोहरत के आसमान को छूने वाले लोग भी अपनी इस आदिम लालसा के हाथों मजबूर होकर, सडक़ की जुबान में कहें, तो चारों तरफ मुंह मारने लगते हैं। एपस्टीन फाइल में दर्ज दुनिया के एक सबसे बड़े कारोबारी, और एक सबसे बड़े दानदाता बिल गेट्स ने अभी अपनी समाजसेवी संस्था के कर्मचारियों से यह मंजूर किया है कि उनके दो रूसी लड़कियों से संबंध थे। भारत में नारायण दत्त तिवारी से लेकर एमजे अकबर और तरुण तेजपाल तक ने अपनी शोहरत और अपने ओहदे से यही काम किया था।
अब हम एक बार फिर उसी गाने पर लौटें, जिससे आज की बात शुरू की थी, तो साहिर लुधियानवी का लिखा ये गाना और एपस्टीन फाइल्स एक ही बात कहते हैं, सत्ता और वासना मिलकर इंसान को जानवर बना देते हैं। ‘यहां तो हर चीज़ बिकती है’ आज भी सच है, बस तरीका बदल गया है। ऑनलाइन, प्राइवेट आइलैंड्स, और पावरफुल नेटवक्र्स में। दुनिया चकलाघर जैसी लगती है क्योंकि हमने सभ्यता के ऊपर सिर्फ एक पतली परत चढ़ाई है, नीचे वही गुफाकाल का इंसान है, जो वासना या ताकत के लिए सब कुछ बेच या खरीद लेता है। सवाल ये है, क्या हम कभी इस चक्र से निकल पाएंगे, या हमेशा ‘कहो जी, तुम क्या-क्या खरीदोगे’सुनते रहेंगे?


