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कल छत्तीसगढ़ में एक नौजवान ने खुदकुशी कर ली। कुछ अरसा पहले पिता की मौत हुई थी, और आपदा राहत राशि हड़पने वाले एक गिरोह ने परिवार को झांसा दिया कि अगर सांप के काटने से मौत दिखाई जाए तो सरकार से चार लाख मिल सकते हैं। ऐसे में कई तरह के फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए, और निकली रकम में से विधवा महिला को कुल 50 हजार रूपए मिले, और बाकी रकम इस गिरोह के लोगों ने बांट ली। जब दस्तावेज फर्जी पाए गए, तो इस महिला को कल गिरफ्तार किया गया, और बेटे ने सदमे में आकर थाने से घर जाकर खुदकुशी कर ली। हम आत्महत्या की कई अलग-अलग वजहों को लेकर कई बार लिखते हैं क्योंकि उन्हें ठीक से समझने की समाज को जरूरत लगती है। अभी दो-चार दिन पहले ही या तो इसी जगह, या अपने अखबार के यूट्यूब चैनल इंडिया-आजकल पर हमने बच्चों की खुदकुशी का मुद्दा भी उठाया था। अब यह आत्महत्या सामने आई है, इसलिए समाज में आत्महत्या की वजहों के बारे में कुछ अधिक खुलासे से सोचने-समझने, और उस पर चर्चा करने की जरूरत है।
जब समाज में तरह-तरह के जुर्म, जालसाजी, और ठगी-धोखाधड़ी का चलन बढ़ गया हो, तो धीरे-धीरे लोगों को यह आसान कमाई सुहाने लगती है, और मेहनत के कामकाज को जरूरी मानना बंद कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि कुछ लोग लगातार जुर्म करते रहते हैं, और बहुत से लोग लगातार जुर्म के शिकार होते रहते हैं। हवा में एक नकारात्मकता छाई रहती है। कई लोग जुर्म करके खतरे की आशंका में तनावग्रस्त रहते हैं, और बहुत से लोग जुर्म के शिकार होकर, नुकसान झेलकर एक अलग किस्म की कुंठा में चलते हैं। हवा में तनाव घुला रहता है। इससे परे जब कभी जिस देश-प्रदेश में, किसी शहर-समाज में जातिवाद या साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद या भाषा के विवाद चलते रहते हैं, तो उससे भी एक तनाव रहता है। जब किसी इलाके में स्थानीय और बाहरी-परदेसिया का मुद्दा रहता है, तो दोनों ही तबकों के लोग एक अलग तरह के तनाव में रहते हैं। जिन्हें बाहरी-परदेसिया कहा जाता है, वे संख्या में कम रहते हैं, और वे आशंका से भर जाते हैं, उन्हें अपने काम और कारोबार, संपत्ति और परिवार को लेकर आशंकाएं रहती हैं। दूसरी तरफ जो स्थानीय होने का दावा करते हैं, रहते हैं, उन्हें जब स्थानीयता का कोई अतिरिक्त फायदा नहीं दिखता, तो उनके भीतर भी भड़ास का गुबार बढ़ते चलता है।
जब लोगों को यह लगता है कि उनके दिए हुए वोट से सत्ता पर आने वाले लोग भ्रष्ट हैं, दुष्ट हैं, और वोट के दिन उनके पास ऐसे ही लोगों में से किसी एक को छांटने की मजबूरी है, तो उनके भीतर भी लोकतांत्रिक-निराशा बढ़ती चलती है। इसी तरह कहीं किसी सरकारी दफ्तर की भ्रष्ट व्यवस्था से लोग निराश रहते हैं, कहीं पर अदालत की धीमी रफ्तार लोगों को बेइंसाफी लगती है, और वह रहती भी है। ऐसे बहुत से कारण रहते हैं जो कि लोगों में निराशा बढ़ाते हैं। लोगों को किसी आत्महत्या के पीछे इतनी सारी वजहों को हमारा गिनाना हो सकता है कि गैरजरूरी लगे, लेकिन हमारा यह साफ-साफ मानना है कि किसी देश-प्रदेश या समाज में लोगों के खुश रहने का अपना एक असर होता है, जहां जिंदगी बेहतर, सुख से भरी हुई, संभावनाओं वाली, और खुशहाल होती है, वहां तो लोग इतनी खुदकुशी नहीं करते होंगे। आज अगर हिन्दुस्तान में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक बड़ी संख्या में खुदकुशी होती है, तो वह उनके सामने की एक तात्कालिक वजह के साथ-साथ बहुत सी परोक्ष वजहें भी उनके मामले में रहती है, जो कि उनकी दिमागी हालत को आत्मघाती बनाने का काम करती हैं।
जिस देश-प्रदेश, या समाज को खुश रहना है, उन्हें नफरत, हिंसा, और बाकी किस्म के नकारात्मक कारणों से छुटकारा पाने की तरकीबें ढूंढनी चाहिए। आज लोग अपने घरों में अगर नफरत की बातें करते हैं, तो घर के दूसरे बालिग सदस्यों के साथ-साथ बच्चों की रगों में भी लहू के साथ-साथ नफरत भी दौडऩे लगती है। बच्चे स्कूलों में उस नफरत का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं, और फिर उस नफरत के शिकार दूसरे बच्चों में उसकी एक प्रतिक्रिया भी होने लगती है। आत्महत्या हो, या हत्या, दोनों के पीछे एक हिंसक इरादे की जरूरत रहती है, चाहे वह अपने खिलाफ हो, चाहे दूसरों के खिलाफ। कुछ बच्चे दूसरों के हाथों परेशान होकर खुदकुशी कर सकते हैं, और कुछ दूसरे बच्चे दूसरों का कत्ल। अभी कुछ महीने पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग में कुछ मुस्लिम स्कूली बच्चों को पाकिस्तान के एक आतंकी-हैंडलर के साथ संपर्क में पकड़ा गया। इन बच्चों को इनकी स्कूल के दूसरे गैरमुस्लिम बच्चे धर्म की वजह से आतंकी कहते हुए, पाकिस्तानी कहते हुए प्रताडि़त करते थे। नतीजा यह हुआ कि किसी तरह यह घटना पता लगने पर पाकिस्तान में बैठे भारत में आतंक फैलाने वाले एक एजेंट ने इन मुस्लिम बच्चों को भडक़ाना शुरू किया, और इन बच्चों ने इंटरनेट पर डार्क वेब वाली जुर्म की दुनिया में जाकर हथियारों की पूछताछ शुरू कर दी थी। इसी वक्त भारत की एजेंसियों की नजर इन पर पड़ी, तो पता लगा कि स्कूल में दूसरे बच्चों की प्रताडऩा की वजह से इन बच्चों के मन में हिंसक भावनाएं भडक़ रही थीं।
इस तरह हर हत्या या आत्महत्या के पीछे तात्कालिक कारण जो भी हों, ऐसी हिंसा करने की दिमागी सोच, उतनी ताकत या नफरत लोगों में रातोंरात नहीं जुटती हैं, इसके पीछे हवा में फैली हुई नफरती हिंसा, दूसरे किस्म के तनाव, या कि किसी दाखिला इम्तिहान या नौकरी के मुकाबले में बेईमानी जैसी कोई बेइंसाफी भी एक वजह हो सकती है। समाज में दिमागी सुकून आसानी से नहीं आता है। जो लोग यह सोचते हैं कि बहुसंख्यक तबके का राज आ जाने से पूरे देश में अमन-चैन आ जाएगा, उन लोगों को दुनिया के दूसरे देशों का इतिहास और वर्तमान भी देखना चाहिए। लोकतंत्र में बहुसंख्यक तंत्र खुशहाली नहीं ला सकता, बहुलतावादी तंत्र ला सकता है। और जब तक खुशहाली नहीं आती, तब तक लोगों के पास की निजी आत्मघाती वजहों को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक तनाव हमेशा ही हाथ बंटाता रहेगा। बात थोड़ी जटिल है, लेकिन पूर्वाग्रहों को अलग रखकर अगर सोचेंगे, तो यह बहुत जटिल भी नहीं लगेगी।


