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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : दुनिया की फौजी तैयारियां बेलबॉटम जैसी आउटडेटेड
सुनील कुमार ने लिखा है
08-Feb-2026 3:45 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : दुनिया की फौजी तैयारियां बेलबॉटम जैसी आउटडेटेड

भारतीय संसद में थलसेना के एक भूतपूर्व मुखिया की लिखी किताब में चीनी मोर्चे की बातों पर बवाल मचते रहा, और अभी कुछ बरस पहले के इस मामले में यह दिखते रहा कि भारत और चीनी की फौजी तैयारियों में कितना फर्क है, किस तरह टैंक एक-दूसरे के सामने तन गए थे, लेकिन दोनों देशों की फौजी ताकत का फर्क भी इस किताब के सिलसिले में सामने आया। यह भी सामने आया कि इस थलसेनाध्यक्ष को किस तरह यह सोचना पड़ा कि जब उसी पर फैसला छोड़ दिया गया था, तो चीन और पाकिस्तान के दो मोर्चे एक साथ खुल जाने के खतरे की हालत में भारत को क्या करना चाहिए। लेकिन इस किताब पर लिखना हमारा आज का मकसद नहीं है। अब जिस रफ्तार से यूक्रेन के मामले में जंग की नई तकनीक सामने आई है, उससे दुनिया की फौजी तैयारियों पर कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं। रूस और यूक्रेन के बीच आज अगर कोई एक हथियार सबसे अधिक असरदार, और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला साबित हुआ है, तो वह मानवरहित ड्रोन है। और आज दुनिया की अधिकांश परंपरागत फौजों की तैयारी ड्रोन-आधारित नहीं हैं, इनमें भारत भी है। लेकिन ड्रोनकेन्द्रित तैयारियां भी दुनिया के देशों को अधिक देर तक झांसे में नहीं रख पाएंगी, वह दिन दूर नहीं है कि जब एआई-आधारित फौजी तैयारियां किसी देश की हिफाजत, या हमले की ताकत तय करेंगी। हम पिछले कुछ बरसों में ड्रोन की ताकत की इस ताजा नुमाइश के पहले से यह लिखते आए हैं कि भविष्य के युद्ध सरहदों पर नहीं, इंटरनेट पर लड़े जाएंगे। 

वे दिन अब लद गए हैं जब किसी देश की फौज की वर्दी पहने हुए लोग, उस देश के झंडे लिए हुए, टैंकों पर सवार, या समुद्री जहाजों पर लड़ाकू विमानों का बेड़ा लिए हुए जंग के लिए जाते थे। अब हवाई हमले, या ड्रोन के हमले भी बहुत अधिक समय तक चलने वाले नहीं हंै। एक तो यह कि ये सब बहुत अधिक खर्चीले हैं, दूसरी बात यह कि इनमें रूस-यूक्रेन की तरह कोई फैसला होने के पहले लाखों लोग मारे जा सकते हैं। ये सब पुरानी फैशन की जंग हैं, और अब आने वाला वक्त इनसे आजाद रहने वाला है, और हमारी कल्पना यह है कि भविष्य के युद्ध खूनखराबे से आजाद भी हो सकते हैं। आज भी रूस या दक्षिण कोरिया जैसे कुछ देशों में बैठे हुए साइबर-हैकर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले, या ब्रिटिश स्वास्थ्य सेवा को चौपट करने वाले साबित हो चुके हैं। अभी तक ऐसे हमलों में एआई का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हुआ है, लेकिन जो दुनिया रासायनिक हथियार देखती है, जैविक हथियारों से कई देश लैस हैं, जहां दुनिया के देश परमाणु हथियार बढ़ाते चल रहे हैं, वहां पर एआई जैसी टेक्नॉलॉजी, और हैकिंग जैसी तकनीक पर आधारित हथियार नहीं बनेंगे, ऐसा तो कोई मासूम बच्चे भी नहीं सोच सकते। फिर हमारा यह मानना है कि एआई, इंटरनेट, साइबर-हैकिंग, और डिजिटल-तबाही पर आधारित हथियारों से दुनिया की कोई भी जंगी-ताकत मुकाबला नहीं कर सकेगी। 

हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में, एआई के आने के पहले से यह लिखते आए हैं कि किस तरह साइबर-हैकर किसी देश के बिजली उत्पादन को ठप्प कर सकते हैं, रेलगाडिय़ों, और हवाई जहाज का नियंत्रण तबाह कर सकते हैं, बैंकिंग को ध्वस्त कर सकते हैं, हर तरह की ट्रैफिक को ठप्प कर सकते हैं, सारे मोबाइल फोन, और इंटरनेट बंद कर सकते हैं, और इस तरह किसी भी देश की जिंदगी को लकवाग्रस्त कर सकते हैं। इनमें से कोई भी चीज आज कल्पना से परे की नहीं है, इनका अंदाज लगाने के लिए किसी अपराधकथा लेखक की तरह की कल्पनाओं की जरूरत नहीं है, इनमें से हर चीज आज जमीन पर है, तरह-तरह से इस्तेमाल हो रही है, बस यही है कि आज या तो सरकारों का सुरक्षातंत्र इतना मजबूत है कि हैकर वहां घुस नहीं पा रहे हैं, या हैकरों को अभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हो रही है। लेकिन जब सरकारें साइबर-फौज बनाकर चल रही हैं, तो यह सोचना नादानी की बात होगी कि ये सरकारें अपने दुश्मन देशों की कंप्यूटर और साइबर प्रणालियों को खत्म करने की तैयारी नहीं कर चुकी होंगी। दुनिया की सभी बड़ी ताकतें अपने-अपने निशाने के देशों को साइबर-हमले से ठप्प कर देने की तकनीक और ताकत विकसित कर चुकी होंगी। इसलिए सरहद पर जंग अब बेलबॉटम पैंट की तरह फैशन और चलन से बाहर होने जा रही हैं, अब बंद कमरों से ऑनलाईन जंग लड़ी जाएगी, और दुनिया के देशों को सरहदों पर हिफाजत की जरूरत कम रहेगी, अपने कंप्यूटरों और संचार प्रणाली की हिफाजत उन्हें ज्यादा लगेगी। 

एआई की क्षमता को देखें तो वह साइबर-जंग के लिए बिना खूनखराबे सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाकर भी किसी देश को गृहयुद्ध में झोंक सकता है, किसी अर्थव्यवस्था को ठप्प कर सकता है, लोगों के बीच नफरत, दहशत, और बेचैनी फैला सकता है। सच तो यह है कि आज भारत जैसे 140 करोड़ की आबादी वाले देश में वॉट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, और इंस्टाग्राम पर एआई की मदद से गढ़ी गई साजिशों से ही इस देश को ठप्प किया जा सकता है। और यह कोई अधिक कमजोर देश नहीं है, दुनिया के अधिकतर देशों में यह काम किया जा सकता है। एआई के आने के बरसों पहले से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखल से फेसबुक के रास्ते जनमत को प्रभावित करने की साजिशें खबरों में थीं। अब उसके बाद एआई ने एक ऐसा नया मोर्चा खोल दिया है, जिसकी शुरूआत भर हुई है, और जिसका कोई ओर-छोर अभी दिख नहीं रहा है कि वह कहां तक पहुंचेगा।

आज परंपरागत हथियारों से लडऩे वाले देश पत्थर और डंडों से लडऩे वाले देश जैसे ही रहेंगे। आज एआई की मदद से ऐसी जंग लडऩा शुरू हो जाएगा जिसमें किसी देश के सारे डिजिटल रिकॉर्ड मिटा दिए जाएं, वहां की संचार प्रणाली खत्म कर दी जाए, पूरी बैंकिंग मिटा दी जाए, आधार कार्ड सरीखे डेटाबेस को मिटा दिया जाए, फोन-इंटरनेट खत्म कर दिए जाएं। आज कम से कम दर्जनभर देश, और कई दर्जन आतंकी-समूह इस किस्म की तैयारी में लगे हुए होंगे, और उनमें से कई ऐसी तैयारी कर चुके होंगे। उन्हें वक्त और जरूरत का इंतजार होगा कि वे कब, किसके खिलाफ, किस हद तक ऐसे हमले करें। ऐसा लगता है कि जिस तरह आज आग बुझाने वाले उपकरण, हेलमेट और सीटबेल्ट, कंप्यूटर-वायरस-वैक्सीन प्रचलन में हैं, उसी तरह एआई के हमलों से बचाव की तरह-तरह की ढाल भी प्रचलन में आएगी, और वैसी बुलेटप्रूफ जैकेट को छेदने वाली पिस्तौलें भी चलन में आएंगी। यह भी हो सकता है कि किसी देश की साइबर-आर्मी अपनी सरकार से असहमत होने पर खुद भी फैसले अपने हाथ में ले ले, और अपनी सरकार की सहमति के बिना, या सहमति के खिलाफ किसी देश को तबाह करने में जुट जाए। जिन लोगों को यह पूरी बात किसी विज्ञान कथा की साजिश लग रही हो, उन लोगों को छलांगें लगाकर आगे बढऩे वाली एआई की रफ्तार और ताकत, दोनों का ही अंदाज नहीं है। 

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