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‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कछुओं का बुरा मानना कुछ नाजायज तो नहीं
सुनील कुमार ने लिखा है
19-Jan-2026 7:47 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : कछुओं का बुरा मानना कुछ नाजायज तो नहीं

न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर में न्यायपालिका के बारे में आंखों पर पट्टी बंधी होने की प्रतीकात्मक प्रतिमा प्रचलन में रहती है। भारत की न्यायपालिका के बारे में एक और बात चलन में है कि वह कछुआ चाल से चलती है। हालांकि कुछ जानकार लोगों ने बताया है कि कछुओं को इस बात पर बड़ी आपत्ति रहती है कि रोजाना ही हिलने-डुलने, और आगे बढऩे वाले कछुओं को भारतीय अदालतों की रफ्तार के लिए क्यों इस्तेमाल किया जाता है। अभी मुंबई की एक जिला अदालत ने 7 रूपए 65 पैसे की चोरी का एक मामला 50 साल बाद बंद किया है, जो कि 1977 से चले आ रहा था। इसमें जिन दो अज्ञात लोगों के खिलाफ चोरी का आरोप था, वे कभी मिले ही नहीं, और शिकायतकर्ता भी इस मामले की सुनवाई में बरसों से गायब था, आ ही नहीं रहा था। ऐसे में यह मामला दूसरे मामलों के तले दबा हुआ था, लेकिन जिंदा था। कई बार गिरफ्तारी वारंट जारी हुए, लेकिन अज्ञात आरोपी मिले ही नहीं। अब जाकर जज ने लिखा कि इस मामले को पर्याप्त से अधिक समय दिया जा चुका है, इसे और लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है। दरअसल भारतीय कानून में दो हजार रूपए से कम की चोरी जैसे छोटे अपराधों के लिए त्वरित सुनवाई का प्रावधान है, लेकिन यह मामला 50 साल लटके रहा। मुंबई की इसी जिला अदालत ने हाल ही में पासपोर्ट से जुड़े एक मामले को बंद किया जो 30 साल से चल रहा था, और जिसमें 1995 के आरोपपत्र के बाद से आरोपी लापता था। अदालत ने यह माना कि इतने बरसों बाद आरोपी को ढूंढ पाने की कोई असल संभावना नहीं बची है। ऐसा ही एक मामला 2003 का लापरवाह ड्राइविंग का था, जिसे बंद किया गया, इसमें पुलिस ने बताया कि न सिर्फ आरोपी, बल्कि शिकायतकर्ता, और सारे गवाह अब लापता हैं, कोई नहीं मिल रहे हैं। अदालत ने लिखा कि केस को हमेशा के लिए खुला रखना न्यायसंगत नहीं है।

अब ऐसे मामले गिनती में कम हो सकते हैं, लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठाने के लिए ऐसी असल कहानियां काफी रहती हैं। एक-एक खबर लोगों को यह सोचने और बोलने का मौका देती है कि अदालत से शायद उनके जीते-जी इंसाफ न मिल सके। 1984 के भोपाल गैसकांड में आखिरी सजा 2010 में हुई, तब तक अधिकांश आरोपी मौत के करीब पहुंच चुके थे, और गैस त्रासदी के सैकड़ों शिकार मर चुके थे। ऐसा ही मामला केरल का 1996 का एक नाबालिग लडक़ी के यौन शोषण का था, जिसे निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट पहुंचने, और फैसला पाने तक दो दशक से ज्यादा लग गए, मामले से जुड़े लोगों का सामाजिक जीवन बिखर गया था। दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड में मुआवजे की कानूनी लड़ाई 20 साल से अधिक चली, जिसमें करीब 60 लोगों की मौत हुई थी, और ये दो दशक पीडि़त परिवार अदालत के चक्कर काटते रहे। उत्तरप्रदेश का हाशिमपुरा हत्याकांड 1987 में हुआ था, जिसमें हथियारबंद पुलिस पर अल्पसंख्यकों की हत्या का आरोप था, वे निचली अदालत से बरी हो गई थे, और हाईकोर्ट में उन्हें सजा होते हुए 31 साल लग गए थे।

अभी 2024 में भारत में जो तीन नए आपराधिक कानून लागू हुए हैं, उनमें ऐसी देरी से निपटने के कुछ इंतजाम किए गए हैं। ऐसा अंदाज है कि इससे अदालतों का बोझ घटेगा, क्योंकि मामलों की तेज रफ्तार सुनवाई होगी। अदालतों के लिए समय सीमा भी तय की गई है, और छोटे-मोटे मामलों में अदालत की निगरानी में वादी-प्रतिवादी के बीच समझौते का प्रावधान भी जोड़ा गया है। नई टेक्नॉलॉजी के कई तरह के इस्तेमाल को भी इस कानून में जगह दी गई है, और सरकार उम्मीद करती है कि उससे भी सुबूत और दीगर चीजें तेज रफ्तार से आगे बढ़ेंगी। लेकिन ये नया कानून पहले से दर्ज और चल रहे मामलों पर लागू नहीं होगा, इसलिए आज अदालतों पर जो बोझ है, उस पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। भारत के कानून में किसी व्यक्ति को ऐसे कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती जो जुर्म होने के समय अस्तित्व में नहीं था। कानून पिछली तारीख से लागू नहीं होता। भारत का नया अपराध-कानून भविष्य को सुधार सकता है, भूतकाल को नहीं। अब अलग-अलग अदालतों के जज पहले से चले आ रहे कानूनों के तहत उन्हें जो अधिकार हासिल हैं, उनका इस्तेमाल करके छोटे-मोटे मामलों का तेज रफ्तार निपटारा कर सकते हैं, वर्ना मौजूदा कानून अगले दस-बीस बरस तक अपना असर नहीं दिखा पाएगा, क्योंकि अदालतें मौजूदा मामलों के बोझ से अगले दस-बीस बरस आजाद नहीं हो पाएंगी। अब यही हो सकता है कि पहले से चले आ रहे मामलों को किस तरह जल्द से जल्द निपटाया जा सकता है, उसका रास्ता निकाला जाए। ऐसा लगता है कि भारत को अपना कानून सुधारने में बहुत ही गैरजरूरी लंबा वक्त लगा, और कई सरकारें आई-गईं, संसद कई कानूनों पर बहस करते रही, लेकिन सुधार हो नहीं पाया। भारत में लोक अदालतों का भी एक प्रावधान है जहां कई तरह के मामलों को तेजी से निपटाया जाता है, उनका इस्तेमाल करके भी मौजूदा बोझ घटाया जाना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


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