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स्टेट बार काउंसिल चुनाव रोकने पर हाई कोर्ट नाराज, बीसीआई से दो दिन के भीतर मांगा जवाब
10-Jan-2026 1:29 PM
स्टेट बार काउंसिल चुनाव रोकने पर हाई कोर्ट नाराज, बीसीआई से दो दिन के भीतर मांगा जवाब

'छत्तीसगढ़' संवाददाता

बिलासपुर, 10 जनवरी। छत्तीसगढ़ स्टेट बार काउंसिल के चुनाव को आखिरी समय में रोके जाने पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव केवल अफवाह या आशंका के आधार पर नहीं रोके जा सकते। चुनाव टालने के लिए ठोस और प्रमाणिक कारण होना जरूरी है।

हाई कोर्ट ने बार कौंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया है कि वह 48 घंटे के भीतर स्पष्ट जवाब दाखिल करे। अदालत ने कहा कि यह बताना होगा कि चुनाव रोकने के पीछे क्या ठोस आधार था। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी को तय की गई है।

छत्तीसगढ़ स्टेट बार काउंसिल के पदाधिकारियों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के लिए प्रदेश के प्रतिनिधि का चुनाव 9 जनवरी को होना था। लेकिन चुनाव से महज तीन दिन पहले, 6 जनवरी को बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन ने आदेश जारी कर चुनाव पर रोक लगा दी। आदेश में चुनाव के दौरान लग्जरी कार और पैसे बांटे जाने की अफवाहों का हवाला दिया गया था।

अदालत ने चुनाव रोकने के आदेश को अस्पष्ट बताते हुए सवाल किया कि इसके समर्थन में सबूत कहां हैं। कोर्ट ने कहा कि आदेश में किसी ठोस घटना या प्रमाण का उल्लेख नहीं है। वैधानिक संस्थाओं के चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ होते हैं और उन्हें बिना मजबूत कारण के स्थगित करना अनुचित है। पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन केवल अपुष्ट जानकारी के आधार पर चुनाव रोकना गलत है।

चुनाव रोकने के आदेश के खिलाफ बीपी सिंह, जेके त्रिपाठी, अशोक तिवारी, फैजल रिजवी, संतोष वर्मा और चंद्र प्रकाश जांगड़े सहित 19 निर्वाचित सदस्यों ने हाई कोर्ट का रुख किया है।
वहीं, बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से दलील दी गई कि चुनाव में हॉर्स ट्रेडिंग यानी सदस्यों की खरीद-फरोख्त की आशंका थी। इसी कारण चुनाव टाले गए और हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की गई है, जिसे 10 दिन में रिपोर्ट सौंपनी है।

हाई कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि लंबे समय तक छत्तीसगढ़ बार कौंसिल का कामकाज ठप रहा था। फरवरी 2025 में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप और सख्त आदेशों के बाद ही चुनाव प्रक्रिया शुरू हो पाई थी। ऐसे में चुनाव में दोबारा देरी करना वकीलों के हितों के खिलाफ है।

 


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