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वेदांता नाम की कंपनी के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने अभी फेसबुक पर बहुत दर्द के साथ लिखा कि उनका अधेड़ बेटा एक रोमांचक खेल हादसे के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान चल बसा। किसी भी बुजुर्ग पिता के लिए यह बहुत तकलीफ की बात रहती है, या सच कहें, तो इससे अधिक तकलीफ की और भला क्या बात हो सकती है। ऐसे में अनिल अग्रवाल ने यह भी लिखा कि उन्होंने अपने बेटे से कंपनी की कमाई का समाज सेवा में उपयोग करने का जो वायदा किया था, वे उस काम को आगे बढ़ाएंगे, और कंपनी की तीन चौथाई कमाई समाज सेवा में लगाएंगे। छत्तीसगढ़ के रायपुर में बालको के समाज सेवा फंड से एक कैंसर अस्पताल चलता भी है, यह कंपनी, बालको अनिल अग्रवाल के वेदांता उद्योग समूह का ही हिस्सा है। कुछ और लोगों ने इस मौके पर फेसबुक पर यह भी लिखा है कि वेदांता के समाज सेवा मद से छत्तीसगढ़ में कुछ और भी प्रोजेक्ट चल रहे हैं।
दुनिया में बड़े कारोबारियों का दान देने का रूख अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग रहते आया है। एक समय राजाओं से अधिकतर दान धर्म को मिलता था, जो कि धर्म की मेहरबानी से समाज से सुरक्षा पाने की एक बीमा पॉलिसी जैसा भी रहता था। धर्म लोगों को समझाता था कि राजा ईश्वर का दूत होता है। इसके एवज में राजा पुरोहितों के मार्फत धर्म के नाम पर दान करता था। इसके साथ-साथ समाज के कुछ अधिक जिम्मेदार लोग कुआं, बावड़ी, धर्मशाला भी बनवाते थे। भारत जैसे देश में जब चर्च आया, तो उसने स्कूल, कुष्ठ आश्रम, और अनाथाश्रम भी बनाए। बाद के दशकों में अमरीका और योरप में बड़े उद्योगपतियों ने विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, लाइब्रेरी, और अस्पताल बनाने के लिए दान दिया। लोगों को अपनी कमाई का एक हिस्सा दान करना चाहिए, यह जरूरत रईसों को इसलिए भी लगी कि एक अमरीकी अरबपति ने यह कहा था, जो आदमी अमीर मरता है, वह बदनाम मरता है।
अपने जीते-जी अपनी कमाई के खासे हिस्से को समाज सेवा के लिए दे देना चाहिए, यह सोच अभी पिछले कुछ दशकों में अधिक जोर पकड़ चुकी है। पन्द्रह बरस पहले अमरीकी अरबपतियों ने अपनी आधी सम्पत्ति दान करने की एक मुहिम छेड़ी, और एक-दूसरे से ऐसा करने की अपील की। यह एक अलग बात है कि बिल गेट्स जैसे लोगों ने जो अथाह दान दिया है, उसके साथ वे अपने ट्रस्ट की नीतियों के रास्ते रणनीतियां भी तय करते हैं कि टीकाकरण या इलाज के कौन से तरीके अपनाए जाएं। कुछ लोगों का यह भी मानना रहता है कि दान देने के लिए ऐसे अरबपति अपने खुद के ट्रस्ट रखते हैं जो कि उनकी मर्जी से चलते हैं। जो भी हो, ऐसा दान देना उन हिन्दुस्तानी खरबपतियों के मुकाबले तो बेहतर है ही जिनके हाथ से कुछ नहीं निकलता। वैसे भारत में अजीम प्रेमजी जैसे जागरूक कारोबारी समाज सेवा के बड़े प्रोजेक्ट कर रहे हैं, जिनमें शिक्षा पर बड़ा जोर है।
अनिल अग्रवाल की ताजा घोषणा से आज इस मुद्दे पर चर्चा का एक मौका मिला है। भारत में सरकारी कानून से बड़े कारोबारियों को अपनी कमाई का बहुत छोटा सा हिस्सा अनिवार्य रूप से समाज सेवा के लिए देना जरूरी कर दिया गया है। लेकिन बहुत से राज्यों में राज्य सरकारें ही अपनी पसंद के समाज सेवा के काम तय कर लेती हैं, और उद्योगों या दूसरे कारोबारियों को उन्हीं में यह रकम खर्च करनी होती है। अब इसमें से कितना हिस्सा सदुपयोग होता है, और कितना नहीं, यह एक अलग बात हो सकती है। लेकिन सरकारी नियम कमाई के बहुत ही छोटे हिस्से को सीएसआर के रूप में देने की शर्त रखते हैं। अजीम प्रेमजी जैसे कारोबारी अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा समाज सेवा में लगाते हैं, जो कि सरकारी अनिवार्यता को बहुत पीछे छोडक़र अपनी निजी उत्साह से इस काम को करने की मिसाल है।
दुनिया का इतिहास बताता है कि दौलत छोडक़र जाने से किसी का सम्मान नहीं बढ़ता। हमारे अपने शहर में एक सब्जी बेचने वाली बिन्नी बाई ने अपनी जिंदगी भर की कमाई देकर सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आने वाले मरीजों के परिजनों के लिए एक धर्मशाला बनवाई थी, जो कि पूरे प्रदेश के बाकी अरबपतियों को आईना दिखाना का काम भी था। हालांकि बिन्नी की कोई नीयत दूसरों को चुनौती देने की नहीं थी, लेकिन हमारा पक्का भरोसा है कि इस धर्मशाला की चर्चा जब-जब होती होगी, राज्य के दूसरे अरबपति दाएं-बाएं देखने लगते होंगे। संपन्न और अतिसंपन्न तबकों को यह भी समझने की जरूरत है कि एक सीमा के बाद का खर्च उन्हें लोगों की नजरों में गिराता ही है क्योंकि लोगों को यह दिखता है कि अभाव के समंदर के बीच वे फिजूलखर्ची की ऐसी नुमाइश कर रहे हैं जो कि हैवानियत से कम कुछ नहीं है। भारत के एक सबसे बड़े कारोबारी के बेटे की शादी के जलसे हफ्तों तक दुनिया के कई देशों में बिखरे हुए चलते रहे, और उनमें जितने अरब खर्च हुए होंगे, उतने में किसी एक देश का टीकाकरण कार्यक्रम चल गया रहता। इसलिए जब चारों तरफ अभाव हो, तो पैसों की ताकत रहने पर भी लोगों को फिजूलखर्ची के अपने स्वभाव पर काबू रखना चाहिए।
भारत में किसी कारोबारी की ऐसी मुहिम अभी शुरू नहीं हुई है जो कि दूसरे लोगों को सहमत करा सके कि वे भी अपनी आधी दौलत समाजसेवा के लिए दें। वेदांता के अनिल अग्रवाल ने अपनी तीन चौथाई कमाई के बारे में कहा है, उन्होंने अपनी पूरी दौलत के बारे में कुछ कहा हो, ऐसा अभी याद नहीं पड़ता है। लोगों को गांधी की वह सोच याद रखनी चाहिए जिसमें वे व्यापारी को समाज के एक ट्रस्टी की तरह देखते थे कि उनका कारोबार समाज की भलाई के लिए चलने वाला एक ट्रस्ट है, समाजसेवा उनकी जिम्मेदारी है। ट्रस्टीशिप को लेकर गांधी ने काफी कुछ कहा था। लेकिन जिस तरह भारत की आज की सत्ता, और यहां के प्रदेशों की भी सत्ता, गांधीवाद की सादगी और किफायत को आग लगाकर सरकारी फिजूलखर्ची के नए रिकॉर्ड रोज बना और तोड़ रही हैं, उनमें गांधी की बाकी सोच की अधिक चर्चा का कोई मतलब नहीं है। अब तो आज के उद्योगपति ही एक-दूसरे को अगर यह पे्ररणा दें कि वे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा, और अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा समाज के लिए लगाएं, तो ही कुछ हो सकता है। भारत में ही टाटा सरीखे कुछ ऐसे उद्योग समूह हैं जिन्होंने कई प्रदेशों में कैंसर जैसे इलाज के लिए अस्पतालों पर खासा पूंजीनिवेश किया है। मिसालें तो हैं, लेकिन उन पर चलने के लिए अपना स्वार्थ छोडऩा पड़ेगा, और अपनी दौलत को बढ़ाते चलने की दीवानगी भी छोडऩी पड़ेगी।
देखते हैं कि ईश्वर के नाम पर चलने वाले इस देश में समाज सेवा के लिए कितने बड़े लोगों की जेब से क्या-क्या निकलता है। जिन्हें सीखना हो वे अजीम प्रेमजी जैसे लोगों से सीख सकते हैं जो हजारों करोड़ का दान करते हैं, लेकिन विमान में रियायती दर्जे की मामूली सीट पर चलते हैं, और अपना निजी खर्च कम से कम रखते हैं। उनकी सादगी और किफायत देखकर देश के उनसे सैकड़ों और हजारों गुना बड़े कारोबारियों को वैसी ही हीनभावना पैदा होती होगी जैसी कि छत्तीसगढ़ में सब्जी वाली बिन्नी बाई की धर्मशाला को देखकर इस राज्य के अरबपतियों में पैदा होती होगी। समाज को बेहतर बनाने के लिए ऐसी मिसालों की चर्चा अधिक से अधिक होनी चाहिए, जाने किस दिन किस अरब-खरबपति में हीनभावना का स्तर बहुत ऊपर चले जाए, और उनकी जेब से कुछ निकल सके। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


