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राष्ट्रीय परिसंवाद के दौरान वरिष्ठ साहित्यकार के अपमान का मामला
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 9 जनवरी। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में बुधवार को आयोजित राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक–शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल के कथित आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। आरोप है कि कार्यक्रम के मंच पर हुई घटनाओं से न केवल शैक्षणिक मर्यादा प्रभावित हुई, बल्कि देशभर से आए साहित्यकारों, शिक्षाविदों और छात्रों की भावनाएं भी आहत हुईं।
मामले को गंभीर मानते हुए कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर कुलपति को तत्काल पद से हटाने और उनके पूरे कार्यकाल की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।
विधायक के पत्र में उल्लेख है कि “समकालीन हिन्दी कहानी : बदलते जीवन संदर्भ” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद जैसे गरिमामय मंच पर कुलपति द्वारा अतिथियों से संवाद की शालीनता का पालन नहीं किया गया। शैक्षणिक विमर्श के लिए बने मंच पर अनावश्यक विवाद की स्थिति बनी, जिससे विश्वविद्यालय की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचा। कार्यक्रम में मौजूद साहित्यकारों और शिक्षाविदों में इस व्यवहार को लेकर नाराजगी देखी गई, वहीं मीडिया रिपोर्ट्स और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों ने इसे संस्थागत अनुशासन से जुड़ा गंभीर मामला बताया है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि प्रो. आलोक चक्रवाल का कार्यकाल शुरू से ही विवादों से घिरा रहा है। एनएसएस कैंप से जुड़े मामलों में शिक्षकों के उत्पीड़न के आरोप, छात्र प्रतिनिधियों से संवाद न करना, मिलने की मांग करने वाले एक छात्र को बिना स्पष्ट कारण टीसी जारी करना, छात्रावासों में सुरक्षा मानकों की अनदेखी और विश्वविद्यालय परिसर में छात्र की मृत्यु जैसी घटनाएं पहले भी सवाल खड़े कर चुकी हैं। इसके साथ ही शिक्षकों की नियुक्तियों में कथित लेन-देन के आरोपों का जिक्र करते हुए विश्वविद्यालय की साख पर असर पड़ने की बात कही गई है।
विधायक ने यह भी रेखांकित किया कि छत्तीसगढ़ के संत शिरोमणि गुरु घासीदास के नाम पर स्थापित यह केंद्रीय विश्वविद्यालय अनुसूचित जाति और जनजाति बहुल क्षेत्र में स्थित है, जहां देश के विभिन्न हिस्सों से छात्र पढ़ने आते हैं। ऐसे में कुलपति का आचरण केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ है। विधायक का आरोप है कि वर्तमान नेतृत्व में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा और छात्रों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है।
वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता प्रियंका शुक्ला ने इस घटना को असहनीय बताते हुए कहा कि जब विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी स्वयं किसी लेखक को आमंत्रित करती हैं, तो फिर सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करना पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में विश्वविद्यालय के शिक्षकों की चुप्पी भी चिंता का विषय है।


