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गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया था कार्यक्रम
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
बिलासपुर, 8 जनवरी। छत्तीसगढ़ के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद विवादों में घिर गया है। कुलपति ने अपने वक्तव्य के दौरान मंच पर मौजूद एक वरिष्ठ कथाकार मनोज रुपड़ा को अपमानित कर कार्यक्रम से बाहर जाने को कह दिया। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संयुक्त आयोजन में हुई इस घटना के बाद साहित्यिक जगत की तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही हैं।
बुधवार को आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद के प्रथम सत्र में स्वागत भाषण हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. गौरी त्रिपाठी ने दिया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. अनुराग चौहान और मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. बसंत पंडा मौजूद थे। परिसंवाद की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आलोक चक्रवाल कर रहे थे।
इसी दौरान कुलपति ने चुटकुलों व व्यंग्य के लहजे में अपनी बात रखी। सामने सोफे पर बैठे नागपुर के वरिष्ठ कथाकार मनोज रुपड़ा से कुलपति ने पूछा कि- आप बोर तो नहीं हो रहे?, कथाकार ने सहज प्रतिक्रिया में कहा कि विषय पर बात कीजिए। मगर, इस जवाब से कुलपति नाराज हो गए। कुलपति ने कथाकार से मंच की मर्यादा का हवाला दिया और कहा कि एक कुलपति को क्या बोलना है, क्या नहीं यह उन्हें नहीं सिखाया जाए। उन्होंने तीखी भाषा में बात की और उन्हें कार्यक्रम से चले जाने के लिए कह दिया। कथाकार रूपड़ा बिना किसी विवाद को बढ़ाए हॉल से बाहर निकल गए। वे इस परिसंवाद में “समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ” विषय पर वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित थे।
घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए मनोज रूपड़ा ने कहा कि उनसे प्रश्न पूछा गया था, जिस पर उन्होंने सामान्य ढंग से उत्तर दिया। उन्हें यह भी पता नहीं था कि प्रश्न करने वाले कुलपति हैं। उन्होंने कहा कि असहमति का अर्थ शत्रुता नहीं होता, लेकिन उनकी बात को गलत अर्थों में लिया गया।
इधर, विश्वविद्यालय के मीडिया सेल प्रभारी डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने कहा कि परिसंवाद की अध्यक्षता कुलपति कर रहे थे और मंच की गरिमा बनाए रखना आवश्यक था। उनके अनुसार कथाकार का आचरण मंच की मर्यादा के अनुरूप नहीं था, इसलिए उन्हें बाहर जाने के लिए कहा गया।
घटना के बाद जन संस्कृति मंच से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने कुलपति के व्यवहार की कड़ी निंदा की है। दुर्ग-भिलाई, रायपुर, अंबिकापुर, धमतरी और बिलासपुर इकाइयों ने इसे तानाशाही रवैया बताते हुए कुलपति को पद से हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि साहित्यिक मंचों पर संवाद और असहमति को सम्मान के साथ सुना जाना चाहिए।



