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‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन का निधन, थमा एक महत्वपूर्ण रचनात्मक दौर
08-Jan-2026 10:54 AM
‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन का निधन, थमा एक महत्वपूर्ण रचनात्मक दौर

हिंदी साहित्य के बड़े और सम्मानित लेखक, तथा साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन अब हमारे बीच नहीं रहे। बुधवार रात लगभग 10:30 बजे जबलपुर में उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही देशभर के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर फैल गई।

ज्ञानरंजन पिछले कुछ वर्षों से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे, लेकिन अंत तक उनकी सोच की साफ़गोई और नैतिक दृढ़ता बनी रही। परिजनों के अनुसार, उनकी अंतिम यात्रा गुरुवार सुबह 11:30 बजे उनके राम नगर, आधारताल स्थित निवास से ग्वारीघाट मुक्तिधाम के लिए निकलेगी, जहां नर्मदा नदी के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

ज्ञानरंजन का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि हिंदी साहित्य के उस दौर का अंत है जिसने पिछले पचास से अधिक वर्षों तक लेखन और संपादन के ज़रिये साहित्य को दिशा दी। वे उन लेखकों में थे जिन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से मध्यवर्गीय जीवन की उलझनों, तनावों और विरोधाभासों को नई भाषा और नए अंदाज़ में रखा।
‘पिता’, ‘घंटा’ और ‘फेंस के इधर-उधर’ जैसी उनकी कहानियाँ आज भी हिंदी कथा साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती हैं।

1960 के बाद के दौर में, जब हिंदी कहानी वैचारिक बदलाव के दौर से गुजर रही थी, ज्ञानरंजन ने उसे नई दिशा दी। उनके लेखन और संपादन से अनेक लेखकों और कवियों को पहचान मिली। उनके जाने से साहित्य जगत ने एक ऐसा मार्गदर्शक खो दिया है, जिसने कई पीढ़ियों को गढ़ने में अहम भूमिका निभाई।

ज्ञानरंजन की सबसे बड़ी पहचान ‘पहल’ पत्रिका रही। यह सिर्फ़ एक साहित्यिक पत्रिका नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक मंच और सांस्कृतिक आंदोलन थी। जबलपुर जैसे शहर में रहते हुए उन्होंने ‘पहल’ के ज़रिये हिंदी साहित्य में गंभीर और स्वतंत्र विमर्श की परंपरा को मजबूत किया।
उन्होंने 125 अंकों तक ‘पहल’ का संपादन किया और कभी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। उनका मानना था कि वही रचना सार्थक है जो संघर्ष और सच्चाई से निकली हो।

वे युवा लेखकों को हमेशा यही कहते थे कि ताकतवर लोगों या सत्ता के दबाव में आए बिना वही लिखें जो उन्हें सही लगता है। उनका जीवन दूसरों की प्रतिभा को पहचानने और आगे बढ़ाने में बीता, न कि व्यक्तिगत लाभ या प्रतिष्ठा के पीछे।

ज्ञानरंजन के व्यक्तित्व का सबसे मजबूत पक्ष उनका नैतिक साहस था। वे बिना डर के सच कहने वाले लेखक थे—चाहे वह साहित्य की बड़ी हस्तियों पर टिप्पणी हो या समकालीन राजनीति पर राय। उन्हें कभी सरकारी पुरस्कारों या सम्मानों की लालसा नहीं रही।
जब उनसे साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर सवाल किया जाता, तो वे सहजता से कहते थे कि महादेवी वर्मा जैसी लेखिका से पीछे रहना भी उनके लिए सम्मान की बात है।

आज उनके न रहने से हिंदी समाज खुद को कुछ और अकेला महसूस कर रहा है। बीमारी के कारण उन्होंने भले ही ‘पहल’ का प्रकाशन बंद कर दिया था, लेकिन उनके विचार और मूल्य आज भी अनगिनत लेखकों को दिशा दे रहे हैं। उनका जाना हिंदी की उस परंपरा का टूटना है, जो साहित्य को समाज बदलने का माध्यम मानती थी।

आज जब ग्वारीघाट पर उन्हें अंतिम विदाई दी जाएगी, तो केवल एक व्यक्ति नहीं जाएगा, बल्कि सच, नैतिकता और स्वतंत्र सोच की एक पूरी परंपरा को विदा किया जाएगा।
हिंदी गद्य और संपादन की दुनिया में ज्ञानरंजन का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा, और उनकी कमी आने वाले लंबे समय तक महसूस की जाएगी।


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