ताजा खबर

असम में चुनाव से पहले सौगातों की बरसात, पत्रकारों को मोबाइल
08-Jan-2026 10:52 AM
असम में चुनाव से पहले सौगातों की बरसात, पत्रकारों को मोबाइल

 प्रभाकर मणि तिवारी

असम में इस साल अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सौगातों की बरसात हो रही है. मुख्यमंत्री ने महिलाओं के खाते में एकमुश्त रकम देने के साथ ही छात्रों के लिए वित्तीय सहायता की योजना का एलान किया है.

पूर्वोत्तर भारत के असम में इसी साल अप्रैल में विधानसभा चुनाव होना है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने साल की शुरुआत के साथ ही एकमुश्त कई योजनाओं का एलान किया है.

वैसे तो अक्टूबर 2020 में शुरू 'अरुणोदय योजना' के तहत राज्य की करीब 37 लाख महिलाओं को हर महीने 1,250 रुपए दिए जाते हैं. यह रकम सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है. इस बार सरकार ने एकसाथ चार महीनों की रकम के अलावा राज्य के सबसे बड़े त्योहार 'बहाग' यानी 'वैशाख बिहू' के उपहार के तौर पर इसमें 3,000 रुपये की अतिरिक्त रकम जोड़ दी है.

असम में मतदाता सूची का 'गहन' नहीं 'विशेष पुनरीक्षण' क्यों?

मुख्यमंत्री की दलील है कि चुनाव के दौरान 'अरुणोदय योजना' के तहत महिलाओं के खाते में रकम भेजने पर विपक्ष सवाल खड़े करता है. इसलिए, सरकार ने उनके खाते में एकमुश्त पैसा भेजने का फैसला किया है. जनवरी से अप्रैल के चार महीनों के लिए यह राशि बिहू के उपहार के साथ 20 फरवरी को महिलाओं के खाते में जमा हो जाएगी.

छात्रों को भी वित्तीय सहायता
राज्य सरकार ने वर्ष 2024 में बाल विवाह पर अंकुश लगाने के मकसद से 'निजुत मोइना' यानी आत्मनिर्भर कन्या योजना शुरू की थी. इसके तहत, हायर सेकेंडरी से पोस्ट ग्रेजुएशन तक की छात्राओं को हर महीने वित्तीय सहायता दी जाती है.

लड़कों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं थी. अब चुनावी साल में सरकार ने लड़कों के लिए भी एक योजना शुरू की है. इसके तहत पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई करने वाले छात्रों को हर महीने 2,000 और ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने वाले छात्रों को 1,000 रुपये की वित्तीय मदद दी जाएगी.

मुख्यमंत्री ने गुवाहाटी में पत्रकारों से कहा, "बाबू आसोनी नामक यह योजना पहली फरवरी से लागू होगी. यह रकम सीधे छात्रों के बैंक खातों में भेजी जाएगी. जिनके माता-पिता सरकारी नौकरी में हैं, या जिस परिवार की सालाना आय चार लाख से ज्यादा है उनको इस योजना में शामिल नहीं किया जाएगा."

मुख्यमंत्री ने एक सोशल पोस्ट में इसका जिक्र करते हुए लिखा है कि यह योजना छात्रों से किए गए पुराने वादे को पूरा करेगी. इसका मकसद छात्रों पर आर्थिक दबाव कम कर पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में उनकी मदद करना है.

उन्होंने बताया कि 'निजुत मोइना' का दूसरा संस्करण बीते साल शुरू किया गया था. इसमें 11वीं से पोस्ट ग्रेजुएशन तक की छात्राओं को शामिल किया गया है. इस योजना का लाभ समाज के हर तबके को मिलेगा. इसके लिए सालाना आय की कोई सीमा नहीं तय की गई है.

कई कल्याणकारी योजनाएं
वैसे, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई नई योजना के अलावा सरकार बीते कुछ साल में कई ऐसी योजनाएं शुरू कर चुकी है. सरकार ने पिछले साल 'मुख्यमंत्री उद्यमिता अभियान' के तहत स्वयं सहायता समूह में कार्यरत महिला उद्यमियों को तीन साल के दौरान 85 हजार रुपए की शुरुआती पूंजी देने का भी एलान किया था.

असम में दूसरे धर्म के लोगों को जमीन की बिक्री करना हुआ कठिन

मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को बताया, "इस योजना के तहत अब तक 15 लाख से ज्यादा महिला उद्यमियों को 10-10 हजार रुपए की शुरुआती पूंजी मुहैया कराई जा चुकी है."

पिछले कुछ महीनों के दौरान सरकार ने ऐसी कई अन्य योजनाएं भी शुरू की हैं. इनमें 'जीवन प्रेरणा योजना' के तहत सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से पास होने वाले स्नातक छात्रों को एक साल तक 2,500 रुपये महीने की सहायता और राज्य सरकार व केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शोध छात्रों को एकसाथ 25,000 रुपये का शोध अनुदान देना भी शामिल है.

आदिवासी बनाम बिहारी के झगड़े ने भड़काई असम में हिंसा

सरकार ने राज्य के करीब 6.9 लाख चाय बागान मजदूरों को भी एकमुश्त 50 हजार की वित्तीय सहायता देने का एलान किया है.

जिस सरकारी योजना पर ज्यादा विवाद हो रहा है, वह है राज्य के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को उपहार के तौर पर महंगे मोबाइल बांटना. राज्य में ऐसे पत्रकारों की संख्या करीब 2,200 है.

सूचना और जनसंपर्क विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, "यह फैसला सरकार ने किया था. राज्य में नए साल और बिहू के मौके पर उपहार देने की परंपरा बहुत पुरानी रही है और यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है. इससे पहले भी इस मौके पर पत्रकारों को चमड़े के बैग और लैपटॉप जैसे उपहार दिए जाते रहे हैं."

साल 2011 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी मान्यताप्राप्त और 10 साल का पेशेवर अनुभव रखने वाले पत्रकारों में लैपटॉप बांटा था. लेकिन, हिमंता सरकार के मौजूदा फैसले पर विवाद खड़ा हो गया है. अब तक कम-से-कम दो पत्रकारों ने सरकार की ओर से दिए गए मोबाइल लौटा दिए हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव से ठीक पहले पत्रकारों में महंगे मोबाइल बांटना उनको अपने पाले में खींचने की कवायद है.

मीडिया विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी ने डीडब्ल्यू से बात करते हुए कहा, "सरकार की बाकी योजनाएं तो ठीक हैं, लेकिन पत्रकारों को महंगे मोबाइल बांटने के फैसले की टाइमिंग ने उसकी नीयत पर सवाल खड़ा कर दिया है."

वरिष्ठ पत्रकार शुभमिता मजूमदार डीडब्ल्यू से कहती हैं, "चुनाव से ठीक पहले सरकार की ओर से की गई लुभावनी घोषणाओं पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. अगर उनको घुमाकर नाक पकड़ने की कोशिश कहें, तो पत्रकारों को मोबाइल बांटना तो नाक को सीधे पकड़ने की कोशिश है."


अन्य पोस्ट