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दुनिया में न्याय दो तरह के होते हैं, एक तो न्याय की देवी की तरह आंखों पर पट्टी बंधा हुआ न्याय, जिसके बारे में कहा जाता है कि कानून अंधा होता है, या अंधा कानून है। यह भाषा हमें इसलिए नाजायज लगती है कि यह एक खराब बात के लिए मिसाल के तौर पर अंधों का इस्तेमाल करती हैं, जो कि लोगों की एक शारीरिक दिक्कत रहती है, जिस पर उनका बस नहीं चलता। किसी की बेबसी को गाली की तरह इस्तेमाल करना बहुत ही खराब दर्जे की बात रहती है। इसलिए कानून को अंधा कहने के बजाय हम उसे तकनीकी जटिलताओं में उलझा हुआ, या उलझाया हुआ कानून कहना बेहतर समझेंगे। और दूसरी तरह का कानून होता है प्राकृतिक न्याय, जिसके लिए कानून पढऩे की जरूरत भी नहीं रहती है, महज इंसाफ की एक मजबूत समझ काफी होती है। ऐसे दो तरह के कानूनों की समझ जरूरी इसलिए रहती है कि कई लोग कानूनों की जटिलताओं को पवित्र मान लेते हैं, और उन्हीं के कैदी हो जाते हैं, जैसा कि अभी सुप्रीम कोर्ट यूएपीए नाम के आतंकविरोधी कानून का कैदी हो गया है।
अभी लगातार दो दिनों में सुप्रीम कोर्ट से आई हुई दो खबरें आज की इस बात के लिए मजबूर कर रही हैं। पहला मामला पांच बरस से अधिक समय से बिना सुनवाई के जेल में बंद सामाजिक आंदोलनकारी उमर खालिद, और शरजील इमाम का है, जिन्हें केन्द्र सरकार की पुलिस ने यूएपीए नाम के आतंकविरोधी कानून के तहत बंद रखा हुआ है। इनकी जमानत की अर्जियां नीचे की अदालत से शुरू होकर ऊपर तक तकरीबन दर्जनों बार खारिज हो चुकी हैं, और तकनीकी जटिलताओं में उलझे कानून के कैदी जज यह बात नही देख पा रहे हैं कि बिना सुनवाई किसी को इस तरह अंतहीन कैद रखने से, उनकी जमानत का अंतहीन विरोध करते चले जाने से न्याय की प्रक्रिया ही सजा बन गई है। इंसाफ की नजरिए से होना तो यह चाहिए कि न्याय की प्रक्रिया के बाद मुजरिम साबित होने पर किसी को सजा हो, लेकिन इन दिनों हिन्दुस्तान में बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें प्रक्रिया को ही सजा बनाकर बरसों तक कैद रखा जा रहा है। किसी मामले में देश की सबसे बड़ी अदालतें इस साजिश को देख और समझ पाती हैं, लेकिन कुछ दूसरे मामलों में वे इसे समझने से इंकार कर देती हैं। तर्क यह रहता है कि यूएपीए जैसे कानून में जमानत का आसान प्रावधान ही नहीं रखा गया है। कानून तो इसी लोकतंत्र के तहत है, और इसी लोकतंत्र के तहत देश का यही सुप्रीम कोर्ट कल ही एक बड़ी कंपनी एमटेक के चेयरमेन के आर्थिक अपराध के चल रहे मामले में कहता है कि तेज रफ्तार सुनवाई आरोपी का मौलिक अधिकार है, अगर सुनवाई में देर हो रही है, तो जमानत दी जा सकती है, अपराध चाहे जो भी हो। दिलचस्प और दहलाने वाली बात यह है कि एक ही दिन पहले यही सुप्रीम कोर्ट उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में कहता है कि सुनवाई में देरी और लंबे समय तक जेल में रहना अपने आपमें जमानत का आधार नहीं है।
अब इसे किस किस्म का कानून कहा जाए? क्या महज इसलिए कि सरकार अपने को नापसंद लोगों पर देश के कुछ अधिक कड़े कानूनों का इस्तेमाल करती है, और फिर उन्हें बिना जमानत जेल में रखकर बिना अदालती फैसले के ही कैद बरोबर सजा दे देती है। गरीब आंदोलनकारी ऐसे कानून में ठूंस दिए जाते हैं, और पांच-पांच बरस बिना सुनवाई निकल जाते हैं। दूसरी तरफ करोड़पति-अरबपति कारोबारियों के आर्थिक अपराधों पर जमानत देने के लिए अदालत यह कहती है कि सुनवाई में देर हो रही है तो जमानत दी जा सकती है, अपराध चाहे जो हो!
इन दो मामलों को देखें, तो यह साफ हो जाता है कि देश की सरकार, संसद, और अदालतें अलग-अलग भी, और मिलकर भी, गरीब, अल्पसंख्यक, सामाजिक आंदोलनकारी, और असहमत लोगों के खिलाफ किस हद तक जा सकती हैं। सरकार ऐसे कड़े कानून बनाने के विधेयक संसद में रखती है, संसद उसे पास करती है, राष्ट्रपति नाम की रबर स्टैम्प उस पर अपना ठप्पा लगाती है, और अदालत इस कानून को अपनी आंखों पर उसी तरह का कवर बनाकर लगा लेती हैं जिस तरह तांगे के घोड़े को दाएं-बाएं देखने से रोकने से बचाने के लिए उसकी आंखों पर कवर लगा दिया जाता है। हैरानी यह है कि लोकतंत्र में जनता के पैसों से तनख्वाह पाने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि सरकार को नापसंद लोगों को पांच-पांच बरस बिना सुनवाई भी जेल में रखा जा रहा है, और बिना जमानत के भी। और इस पर संविधान की व्याख्या करने के अधिकार वाले जजों को कोई दिक्कत भी नहीं है, क्या ऐसे जजों की इज्जत पर ऐसी अनदेखी से आंच नहीं आती? क्या इन्हें प्राकृतिक न्याय, और लोकतांत्रिक इंसाफ दोनों की समझ पूरी तरह खत्म हो चुकी है? इस देश ने ऐसे जज भी देखे हैं जो सरकारों के बनाए हुए तंग कानूनों की व्याख्या करते हुए संविधान की बुनियादी भावना को भी ध्यान में रखने का हौसला रखते थे, उसकी समझ रखते थे। आज का भारत का अदालती सिलसिला संविधान की बुनियादी भावना, इंसानियत की बुनियादी जरूरत, इन सबके आधार पर तंगनजरिए वाले कानूनों की व्याख्या करने की मशक्कत से बचने का दिखता है। ऐसी अदालतें अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह चुराने वाली रहती हैं, और इतिहास में उसी तरह दर्ज भी होती हैं। सरकारों और संसद के बनाए हुए कानून बहुत बार राजनीतिक नीयत के रहते हैं, सरकारों की सहूलियत के रहते हैं, नाजायज रहते हैं, और उनमें लोकतांत्रिक इंसाफ के ऊपर सरकारी हिंसाफ हावी रहता है। संवैधानिक अदालतों की यह जिम्मेदारी रहती है कि वे संसद के बनाए हुए कानूनों का कम से कम विश्लेषण कर सकें, उस पर टिप्पणी कर सकें। इसी देश में कई जजों ने सरकार और संसद को यह सुझाया भी है कि किन मामलों में उन्हें कानून बनाने चाहिए। अदालत को अगर फैसला मौजूदा कानून की तंग सुरंग के भीतर ही रहते हुए लिखना है, तब भी अदालतों को खुले आसमान की सिफारिश करने से तो कोई रोक नहीं सकता। लेकिन खुले आसमान के आजाद पंछी की तरह दूर से अपने देश को देखने का जिनका हौसला न रह जाए, जो बंद सुरंग में उल्टे लटके पंछी की तरह महज सीमित दूरी तक ही देख पाएं, वे कभी लोकतंत्र के इतिहास में अच्छी तरह दर्ज नहीं होते, और वे लोकतंत्र को विकसित और परिपक्व भी नहीं कर पाते। लोकतंत्र तो सरकार और संसद के कामकाज की सर्वोच्च अदालती व्याख्या से विकसित होता है, उससे लोकतंत्र का विकास ही होता है, विनाश नहीं होता। लेकिन इसके लिए जजों को उन्हें मिले संवैधानिक अधिकारों का अहसास करने की जरूरत भी होती है। फिलहाल तो इन दो दिनों में इन दो अलग-अलग मामलों में देश की सबसे बड़ी अदालत के नजरिए शर्मिंदगी का सामान है। कानूनी तकनीक की उलझन में उलझकर जमीन पर औंधे मुंह गिरे जजों की नैतिकता को बड़ी चोट लगी है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


