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SAURABH CHAUHAN
-सौरभ चौहान
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित एक सरकारी कॉलेज की 19 वर्षीय दलित छात्रा की मौत ने उच्च शिक्षण संस्थानों और पुलिस प्रशासन की कार्य प्रणाली पर कई सवाल खड़े किए हैं.
छात्रा की मौत के बाद उनके परिजनों ने संबंधित कॉलेज की तीन छात्राओं और एक प्रोफ़ेसर पर प्रताड़ना, रैगिंग और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं.
वहीं, पुलिस और कॉलेज प्रशासन का कहना है कि उनके पास इस बारे में कोई औपचारिक शिकायत पहले दर्ज नहीं कराई गई थी.
इस मामले को लेकर विपक्ष ने भी राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं. वहीं हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि रैगिंग और यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहे प्रोफ़ेसर को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाएगा.
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि पुलिस ने इस मामले में समय रहते गंभीरता नहीं दिखाई.
राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, "प्रोफ़ेसर को तुरंत सस्पेंड किया जाएगा और इस मामले में जांच शुरू कर दी गई है."
इस बीच, राज्य महिला आयोग ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है.
क्या है पूरा मामला?
धर्मशाला की रहने वाली 19 साल की एक दलित छात्रा की 26 दिसंबर 2025 को मौत हो गई थी. परिजनों के मुताबिक़, वह पिछले क़रीब दो महीनों से गंभीर मानसिक तनाव और डिप्रेशन में थीं और इस दौरान अलग-अलग अस्पतालों में उनका इलाज भी चला.
छात्रा के पिता का आरोप है कि उनकी बेटी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान प्रताड़ना का शिकार हुई थीं.
उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेज की तीन छात्राओं और एक प्रोफ़ेसर ने उनकी बेटी को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान किया, जिसके चलते उसकी हालत बिगड़ती चली गई.
पिता की शिकायत के आधार पर धर्मशाला पुलिस ने यौन उत्पीड़न और जानबूझकर चोट पहुंचाने से जुड़ी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 75, 115(2), 3(5) और हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3 के तहत मामला दर्ज किया है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में छात्रा के पिता ने आरोप लगाया, "मेरी बेटी पढ़ाई में ठीक थी, लेकिन कॉलेज में कुछ लड़कियों और एक प्रोफ़ेसर की वजह से वह लगातार डर और तनाव में रहने लगी थी. उसने हमें बताया था कि उसे धमकाया गया, मारा गया और मानसिक रूप से तोड़ा गया. इसी वजह से वह डिप्रेशन में चली गई."
पिता का दावा है कि उन्होंने कई बार इस बारे में आवाज़ उठाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि किस स्तर पर शिकायत दर्ज कराई जाए.
उन्होंने कहा, "हम आम लोग हैं. हमें लगा था कि कॉलेज और पुलिस प्रशासन ख़ुद कार्रवाई करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ."
इस मामले को लेकर विपक्ष ने भी राज्य सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा, "पुलिस ने इस मामले में समय रहते गंभीरता नहीं दिखाई. अगर शुरुआती स्तर पर ही सही जांच होती तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती."
वहीं, हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष विनय कुमार ने इस घटना को बेहद दुखद और गंभीर बताते हुए कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच होनी चाहिए, जो भी दोषी पाए जाएं, उनके ख़िलाफ़ सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की जाए.
कांगड़ा ज़िले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) वीर बहादुर ने कहा कि पुलिस ने अपने स्तर पर जांच की थी.
उनके मुताबिक़, "जांच अधिकारी ने कॉलेज जाकर संबंधित प्रोफ़ेसर और छात्राओं के बयान दर्ज किए थे. उस समय जांच में कोई ठोस तथ्य सामने नहीं आया था."
कॉलेज छात्रा की मौत पर हिमाचल प्रदेश महिला आयोग की चेयरपर्सन विद्या नेगी ने कहा, "हमने इस मामले का संज्ञान लिया है. हमने एसपी को बुलाया है और लिखित रिपोर्ट भी मांगी है."
"हमने उनसे मामले के हर पहलू की जांच करने का आग्रह किया है. अगर कोई दोषी पाया जाता है, तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए. पूरी जांच होनी चाहिए. सरकार भी ऐसी घटनाओं को लेकर संवेदनशील है."
शिकायत कब और कैसे सामने आई?
कांगड़ा के पुलिस अधीक्षक अशोक रत्तन ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "इस मामले में औपचारिक शिकायत 20 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से दर्ज कराई गई."
"हमें 20 दिसंबर को सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत मिली थी. उस शिकायत में यौन शोषण या किसी प्रोफे़सर का नाम नहीं था. उसी आधार पर प्रारंभिक जांच की गई. अब जो नए आरोप सामने आए हैं, उनकी भी जांच की जा रही है."
उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और दावों की सत्यता की जांच की जाएगी.
"हम किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हर पहलू को वैरिफाई करेंगे."
छात्रा की मौत के बाद दो वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं. दावा किया जा रहा है कि दोनों वीडियो छात्रा के हैं. इस वीडियो में दो अलग-अलग बयान हैं.
पुलिस का इनके बारे में कहना है कि इन वीडियो की फॉरेंसिक और क़ानूनी जाँच की जाएगी. अगर ये वीडियो छात्रा के हैं तो यह भी तहक़ीक़ात की जाएगी कि ये बयान किस परिस्थिति में दिए गए थे.
पुलिस ने बताया है कि परिजनों के बयान दर्ज कर लिए गए हैं और अभियुक्तों से भी पूछताछ की जा रही है.
पुलिस का कहना है कि वह यह भी जांच करेगी कि क्या छात्रा की मानसिक स्थिति और शैक्षणिक दबाव के बीच कोई सीधा संबंध था या नहीं.
नॉर्दर्न रेंज डीआईजी सौम्या सांबशिवन ने कहा, "मामले की जांच के लिए डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (डीएसपी) के नेतृत्व में एक टीम गठित की गई है और एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया है, जो सितंबर से अब तक के इलाज से जुड़े रिकॉर्ड की जांच करेगा. मेडिकल बोर्ड की राय के आधार पर ही मौत के कारण और आगे की जांच की दिशा तय होगी."
कॉलेज प्रशासन ने क्या कहा?
इस मामले पर राज्य के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा, "इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है. हायर एजुकेशन के एडिशनल डायरेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है. वे तीन दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे. इस मामले में जो भी दोषी पाया जाएगा, सरकार और विभाग उसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करेंगे."
कॉलेज के प्रिंसिपल राकेश पठानिया का दावा है कि कॉलेज प्रशासन के पास कभी रैगिंग या उत्पीड़न की कोई औपचारिक शिकायत नहीं आई.
उन्होंने कहा, "कॉलेज में रैगिंग रोकने के लिए कमेटी बनी हुई है. लेकिन छात्रा या उनके परिजनों की तरफ़ से कभी न तो लिखित और न ही मौखिक शिकायत दर्ज कराई गई."
प्रिंसिपल ने बताया, "वह सेकेंड ईयर में एडमिशन चाहती थीं, लेकिन विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार फ़र्स्ट ईयर में फ़ेल छात्र को अगली कक्षा में दाख़िला नहीं दिया जा सकता. इसी बात को लेकर वह मानसिक तनाव में थीं."
वहीं, प्रोफे़सर पर लगे आरोपों को लेकर प्रिंसिपल ने सीधे टिप्पणी करने से इनकार किया और कहा कि पुलिस मामले की जांच कर रही है.
फ़ेल होने पर मानसिक तनाव में आने के प्रिंसिपल के दावे पर छात्रा के पिता ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया कि उनकी "बेटी ने जो झेला है वो कॉलेज के प्रिंसिपल को नहीं पता. शायद वो कॉलेज की छवि को बचाने के लिए मामले को हलका आंक रहे हैं."
"मुझे किसी की बातों से कोई लेना-देना नहीं है, मेरी बेटी के साथ जो हुआ, संस्थान के मुखिया होने के नाते प्रिंसिपल को भी जवाब देना चाहिए. मैं बस इंसाफ़ चाहता हूं."
हिमाचल की राजधानी शिमला में इस घटना के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी हुए. कुछ संगठनों ने आरोप लगाया कि दलित और कमज़ोर वर्गों से जुड़े मामले में पुलिस की कार्रवाई अक्सर ढीली रहती है.
अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शीतल व्यास ने कहा कि यह मामला केवल एक छात्रा की मौत तक सीमित नहीं है.
उनके मुताबिक़, यह सवाल भी उठता है कि कॉलेजों में स्टूडेंट्स की मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को कैसे संभाला जाता है, साथ ही स्टूडेंट्स के लिए शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया कितनी सरल और भरोसेमंद है? (bbc.com/hindi)


