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पहले महीने में ही नेपाली पीएम बालेन शाह की बढ़ीं मुश्किलें
24-Apr-2026 12:50 PM
पहले महीने में ही नेपाली पीएम बालेन शाह की बढ़ीं मुश्किलें

भारत और नेपाल के आपसी संबंधों का जिक्र आते ही कहा जाता है कि दोनों देशों के बीच 'रोटी-बेटी का रिश्ता' है. लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री बालेन शाह के कार्यकाल के एक महीने के भीतर ही इस रिश्ते में तनाव आता दिख रहा है.
  डॉयचे वैले पर  प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-

नेपाल और भारत के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं. लेकिन नेपाल में बीते करीब एक दशक से जारी अस्थिरता, सरकार के रवैए और भारत-विरोधी टिप्पणियों के कारण इन संबंधों में काफी गिरावट आई थी. जेन-जी के हिंसक आंदोलन के बाद आम लोगों के भारी समर्थन से जीत कर बीते महीने प्रधानमंत्री के तौर पर हिमालय की तलहटी में बसे इस पर्वतीय राज्य की सत्ता संभालने वाले बालेन शाह ने दोनों देशों के आपसी संबंधों की बेहतरी की उम्मीद जगाई थी. लेकिन कार्यकाल का एक महीना पूरा होने से पहले ही उनके फैसलों ने जहां सरकार में दरार पैदा कर दी है, वहीं सीमावर्ती इलाके में रहने वाले लोगों की भी नाराजगी बढ़ा दी है. हालत यह है कि कभी उनके समर्थन में पलक-पांवड़े बिछाने वाले लोग ही अब उनके खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे हैं.

एक महीने के अंदर दो मंत्रियों के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह पर सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक इसके लिए शाह में राजनीतिक अनुभव की कमी को जिम्मेदार बता रहे हैं. बुधवार को नेपाल के गृहमंत्री सुदन गुरुंग ने इस्तीफा दे दिया. इससे पहले नेपाल के श्रम, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मंत्री दीप कुमार साह को बर्खास्त कर दिया गया था.

यह तो सरकार का अंदरूनी मामला था. लेकिन भारतीय सामानों पर टैक्स लगाने के बालेन शाह के फैसले ने दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों पर सवालिया निशान लगा दिया है.

भारत के लोगों को कैसे हो रही है परेशानी 

बालेन शाह सरकार ने भारत से खरीदी गई नेपाली सौ रुपए (भारतीय मुद्रा में 62 रुपए) से ज्यादा कीमत की वस्तुओं को नेपाल ले जाने पर उन पर पांच से 80 फीसदी तक कस्टम ड्यूटी लागू करने का फैसला किया है. इससे भारत से सटे नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों में भारी नाराजगी पैदा हो गई है. दूसरी ओर, भारतीय इलाके में स्थित बाजारों और कारोबार पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ा है. नेपाल के सीमावर्ती इलाको में रहने वाले लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर थे. मुक्त आवाजाही का लाभ उठाते हुए लोग रोजाना हजारों लोग सीमा पर कर भारतीय कस्बों में आते थे और बिना किसी रोक-टोक के मनमाने तरीके से खरीदारी कर नेपाल लौटते थे. उनकी दलील थी कि वही चीजें नेपाल में महंगी है.

सरकार के ताजा आदेश के बाद सीमा पर भारत से लौटने वाले लोगों और वाहनों की कड़ाई से जांच की जा रही है. लोगों से या तो ड्यूटी वसूल की जा रही है या फिर उनका सामान जब्त कर लिया जाता है. इससे नाराज होकर लोगों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी भी शुरू की है. इसके विरोध में सीमावर्ती बीरगंज, नेपालगंज और विराट नगर के अलावा राजधानी काठमांडू में भी प्रदर्शन हो रहे हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार के ताजा फैसले का असर उनके रोजमर्रा के जीवन पर पड़ेगा,. सीमावर्ती इलाकों के लोग दवाओं और दूसरी जरूरी चीजों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर हैं.

बीरगंज में होने वाले एक प्रदर्शन में शामिल पंकज कुमार डीडब्ल्यू से कहते हैं, "सीमा पार हमारे दर्जनों रिश्तेदार हैं. वहां से लौटते हुए उपहार में मिले सामानों को भी सीमा पर जब्त किया जा रहा है या फिर उस पर ड्यूटी वसूली जा रही है. इससे पहले कभी किसी सरकार ने भारतीय वस्तुओं पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगाया था." प्रदर्शनकारियों ने चेताया है कि इस आदेश को वापस नहीं लेने की स्थिति में बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू होगा.

सरकार ने सीमावर्ती इलाकों में भारत के पंजीकरण वाले वाहनों पर भी रोक लगा दी है. उन इलाकों में रहने वाले लोग आमतौर पर भारत में पंजीकृत वाहनों का इस्तेमाल करते थे. लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर सकेंगे. इससे लोगों में भारी नाराजगी है. सरकार की दलील है कि राजस्व बढ़ाने के मकसद से ही यह फैसले किए गए हैं. लेकिन लोगों का कहना है कि भारत के साथ रोटी-बेटी के रिश्तों को ध्यान में रखते हुए ऐसे फैसलों का आपसी संबंधो पर प्रतिकूल असर पड़ने का अंदेशा है.

नेपाली कांग्रेस पार्टी ने भारतीय सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाने के फैसले को जनविरोधी और असंवेदनशील बताते हुए उसे फौरन वापस लेने की मांग की है. शाह को अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी में भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. पार्टी के एक नेता राजीव झा ने पत्रकारों से कहा कि महंगाई के मौजूदा दौर में सौ रुपए की सीमा बहुत कम और अव्यवहारिक है.

अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण नेपाल में धन की कीमतें बढ़ने से भी आम लोगों में भारी नाराजगी है. देश में पेट्रोल की कीमत 150 नेपाली रुपए से बढ़ कर 225 रुपए तक पहुंच गई है. घरेलू मोर्चे पर बालेन शाह की चुनौतियां कम नहीं हैं. उन्होंने राजनीतिक दलों से संबद्ध छात्र संघों पर पाबंदी लगाने का भी आदेश दिया है. इससे छात्रों में भारी नाराजगी है.

नेपाल के सामने विदेश नीति की चुनौती

आंतरिक चुनौतियों और विवादास्पद फैसलों से जूझ रही बालेन शाह सरकार की सबसे बड़ी चुनौती विदेश नीति के मोर्चे पर है. प्रधानमंत्री ने हाल में 17 देशों के राजदूतों के साथ बैठक की थी. शाह अपने चुनाव अभियान के दौरान भी किसी एक देश पर निर्भर नहीं होने और भारत व चीन के साथ समान संबंध बनाने की वकालत करते रहे हैं. उनका कहना था कि भारत और नेपाल के बीच रिश्ते बराबरी के आधार पर कायम होंगे. इससे पहले नेपाल में भारत-विरोधी आंदोलन होते रहे हैं और उस पर 'बिग ब्रदर' की भूमिका निभाने के आरोप लगते रहे हैं. शाह ने चुनाव अभियान के दौरान लोगों और खासकर जेन-जी की भारत विरोधी भावनाओं को अपने पक्ष में भुनाने में कामयाबी हासिल की थी.

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भारत सरकार ने उनको दिल्ली दौरे को न्योता दिया है. बालन शाह ने न्योता तो स्वीकार कर लिया है लेकिन अब तक इस दौरे की तारीख तय नहीं हुई है. नेपाल सरकार के एक शीर्ष अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "प्रधानमंत्री के दौरे की तारीख अभी तय नहीं हुई है. दो मंत्रियों के हटने से हुई राजनीतिक उथल-पुथल और कई अन्य आंतरिक चुनौतियों से निपटना सरकार की प्राथमिकता है. इसके अलावा भारत दौरे के साथ ही चीन दौरे की तारीख भी तय की जाएगी."

उनका कहना था कि प्रधानमंत्री भारत के दौरे से लौटने के तुरंत बाद चीन के दौरे पर जाएंगे. हम इन दोनों पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध रखना चाहते हैं. लेकिन किसी को ज्यादा तरजीह नहीं दी जाएगी. यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि हाल के वर्षों में खासकर वामपंथी सरकार के सत्ता में रहने के दौरान नेपाल में चीन की दिलचस्पी बढ़ी है. उसने बिजली, गौस और पनबिजली समेत देश की कई आधारभूत परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया है. फिलहाल वह नेपाल के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नेपाल की प्राथमिकता सूची में भारत और चीन सबसे ऊपर हैं. लेकिन ऐतिहासिक रूप से नेपाल भारत के सबसे करीबी रहा है. अब नई सरकार दोनों देशों के साथ समान संबंध कायम रखने की वकालत कर रही है.

दार्जिलिंग के एक कालेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर रहे आर. बी. गुरुंग ने भारत-नेपाल रिश्तों को करीब से देखा है. वह डीडब्ल्यू से कहते हैं, "बीते खासकर डेढ़-दो दशकों के दौरान नेपाल में सरकार बदलने के साथ ही इन देशों के आपसी रिश्ते भी बदलते रहे हैं. लेकिन बालेन शाह की सरकार के सत्ता में आने के महीने भर के भीतर किए गए फैसलों ने इन रिश्तों में कड़वाहट बढ़ा दी है. ऐसे में घरेलू और विदेश नीति के मोर्चे पर जूझ रहे प्रधानमंत्री शाह के सामने "पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध कायम रखने की गंभीर चुनौती है. इसमें वो कितना कामयाब रहते हैं, यह तो बाद में पता चलेगा. लेकिन आपसी संबंधों में मजबूती भारत और नेपाल दोनों के हित में है."


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