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एस्पिरिन से कैंसर का ख़तरा कम होता है, जानिए कैसे
23-Apr-2026 12:47 PM
एस्पिरिन से कैंसर का ख़तरा कम होता है, जानिए कैसे

4,000 साल पुरानी यह दवा, जो आमतौर पर दर्द के इलाज में इस्तेमाल होती है, कुछ ख़ास तरह के ट्यूमर को बनने से रोकती है और उन्हें शरीर में फैलने से भी रोकती है.

ये ऐसे नतीजे हैं जो अब स्वास्थ्य नीतियों में भी बदलाव ला रहे हैं.

ब्रिटेन के रहने वाले निक जेम्स करीब 40-45 साल के हैं और फ़र्नीचर बनाने का काम करते हैं. उन्हें अपनी सेहत को लेकर पहली बार चिंता तब हुई, जब उनकी मां की मौत कैंसर से हो गई. इसके बाद उनके भाई और परिवार के कई दूसरे लोगों को भी आंतों का कैंसर हो गया. उन्होंने जेनेटिक टेस्ट करवाने का फैसला किया, जिसमें पता चला कि उनके अंदर एक ख़राब जीन है, जो लिंच सिंड्रोम नाम की बीमारी की वजह बनता है. यह बीमारी इस तरह के कैंसर होने का ख़तरा काफ़ी बढ़ा देती है.

जेम्स को मदद एक बिल्कुल अनपेक्षित जगह से मिली. वह पहले व्यक्ति बने जिन्होंने एक ऐसे क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा लिया, जिसका मकसद यह जांचना था कि आमतौर पर बिना पर्चे के मिलने वाली दर्द की दवा एस्पिरिन की रोज़ ली जाने वाली डोज़, क्या कैंसर होने से बचा सकती है.

लिंच सिंड्रोम से पीड़ित 10 से 80% लोगों को, जीन में म्यूटेशन के प्रकार के हिसाब से, ज़िंदगी में कभी न कभी आंतों का कैंसर हो सकता है. लेकिन जेम्स के मामले में अब तक सब कुछ ठीक दिख रहा है. न्यूकैसल यूनिवर्सिटी के क्लिनिकल जेनेटिक्स के प्रोफ़ेसर जॉन बर्न ने इस ट्रायल की अगुआई की थी. वह कहते हैं, "वह पिछले 10 साल से हमारे साथ एस्पिरिन ले रहे हैं, और अब तक उन्हें कोई कैंसर नहीं हुआ है."

यह बात सुनने में लगभग नामुमकिन लगती है, लेकिन काफ़ी समय से इसके संकेत मिलते रहे हैं कि यह दवा कोलोरेक्टल कैंसर के फैलने की संभावना को कम कर सकती है, या शायद होने से ही रोक सकती है. बीते एक साल में, कई ट्रायल्स और स्टडीज़ ने इस साक्ष्य को और मज़बूत किया है.

कुछ देशों ने तो अपनी मेडिकल गाइडलाइंस तक बदल दी हैं और जिन लोगों को सबसे ज़्यादा ख़तरा है, उनके लिए इस गोली को सुरक्षा की पहली लाइन में शामिल किया है (हालांकि विशेषज्ञ ज़ोर देकर कहते हैं कि ऐसा सिर्फ़ डॉक्टर की निगरानी में ही किया जाना चाहिए).

और अब हम धीरे-धीरे यह भी समझने लगे हैं कि आख़िर ये क्यों इतनी असरदार है.

बहुत पुरानी जड़ें

हमारी सबसे पुरानी और सबसे असरदार दवाओं में से एक की कहानी में, ताज़ा खोजें, एक चौंकाने वाला नया मोड़ लेकर आई हैं.

उन्नीसवीं सदी के आखिर में, पुरातत्वविदों को प्राचीन मेसोपोटामिया के शहर निप्पुर, जो आज के इराक में है, से 4,400 साल पुरानी मिट्टी की टैबलेट्स मिली थीं. इनमें वनस्पति, जानवरों और खनिजों से बनी अलग अलग दवाओं की सूची दर्ज थी.

इनमें विलो (बेंत) के पेड़ से निकाले गए एक पदार्थ के इस्तेमाल के निर्देश भी शामिल थे. आज हम जानते हैं कि इसमें 'सैलिसिन' नाम का रसायन होता है, जिसे शरीर सैलिसिलिक एसिड में बदल सकता है, और यह दर्द को शांत करने में मदद करता है.

इसकी बनावट आधुनिक एस्पिरिन, यानी एसीटाइलसैलिसिलिक एसिड, से काफ़ी मिलती जुलती है, लेकिन यह पेट में ज़्यादा दिक्कतें पैदा करने वाली होती है. दूसरी प्राचीन सभ्यताओं, जैसे मिस्र, यूनान और रोम, में भी इस नुस्खे का इस्तेमाल किया जाता था.

इस यौगिक पर आधुनिक शोध की शुरुआत 1763 में हुई, जब अंग्रेज़ पादरी एडवर्ड स्टोन ने रॉयल सोसाइटी को चिट्ठी लिखकर सूखी और पिसी हुई विलो की छाल के बुखार कम करने वाले गुणों के बारे में बताया.

करीब एक सदी बाद, वैज्ञानिकों ने सैलिसिलिक एसिड को कम नुक़सान पहुंचाने वाले सीटाइलसैलिसिलिक एसिड के रूप में तैयार करने में सफलता हासिल की, और इसे 'बायर' नाम के ब्रांड के तहत बाज़ार में उतारा.

एक और सदी बाद, वैज्ञानिकों ने यह भी देखना शुरू किया कि एस्पिरिन के कुछ अनपेक्षित फ़ायदे दिल से जुड़ी बीमारियों को रोकने में भी हो सकते हैं. यह खून को पतला करके और प्लेटलेट्स को कम चिपचिपा बनाकर खून के थक्के बनने के ख़तरे को घटाती है.

इसी वजह से, यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस जैसी संस्थाएं दिल के दौरे या स्ट्रोक के ज़्यादा ख़तरे के दायरे में आने वाले लोगों को रोज़ाना कम मात्रा में एस्पिरिन लेने की सलाह देती हैं.

1972 तक आते आते, इसके संभावित फ़ायदे कैंसर की रोकथाम तक भी पहुंच गए. चूहों पर किए गए एक चर्चित अध्ययन ने ध्यान खींचा, जिनमें ट्यूमर वाली कोशिकाएं डाली गई थीं. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पाया कि चूहों के पीने के पानी में एस्पिरिन मिलाने से कैंसर के पूरे शरीर में फैलने का ख़तरा, जिसे मेटास्टेसिस कहा जाता है, उन चूहों की तुलना में काफ़ी कम हो गया, जिन्हें यह दवा नहीं दी गई थी.

हालांकि इस खोज से काफ़ी उत्साह का संचार हुआ, लेकिन यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में ऑन्कोलॉजी और मेडिकल ट्रायल्स की प्रोफ़ेसर रुथ लैंगली कहती हैं, "हालांकि तुरंत यह साफ़ नहीं हो पाया था कि इसका क्लिनिकल प्रैक्टिस पर क्या असर पड़ेगा."

और फिर यह भी साफ़ नहीं था कि यह दवा इंसानों में भी वही असर दिखाएगी या नहीं- इसलिए यह खोज किसी ज़िंदगी को बदल देने वाले इलाज की बजाय बस एक दिलचस्प लेकिन सीमित जानकारी बनकर रह गई.

2010 में एक अहम मोड़ आया, जब ब्रिटेन की ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में क्लिनिकल न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर पीटर रॉथवेल ने दिल से जुड़ी बीमारियों को रोकने के लिए एस्पिरिन पर पहले से मौजूद बहुत ज़्यादा डेटा को दोबारा खंगाला. अपने विश्लेषण में उन्होंने पाया कि यह दवा न सिर्फ़ कैंसर होने के मामलों को कम करती है, बल्कि उसके फैलाव को भी रोकती है. इससे एस्पिरिन की बीमारी से लड़ने की ताक़त और इसके पीछे के कारणों को समझने में दोबारा रुचि पैदा हुई.

हालांकि एक बड़ी चुनौती यह है कि आम आबादी में साबित किया जाए कि एस्पिरिन कैंसर को रोक सकती है. आदर्श स्थिति में, शोधकर्ता लोगों की एक बड़ी संख्या को शामिल करते. आधे लोगों को एस्पिरिन दी जाती, और बाकी को एक नकली गोली (प्लेसिबो)- और फिर देखा जाता कि किनमें बीमारी की दर ज़्यादा है.

लेकिन कैंसर को विकसित होने में ही कई दशक लग सकते हैं, यानी ऐसा रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल पूरा होने में बहुत लंबा समय और बहुत ज़्यादा खर्च लगेगा. स्वीडन के कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में सर्जरी की प्रोफ़ेसर एना मार्टलिंग कहती हैं, "सच कहूं तो, यह लगभग नामुमकिन है."

इसी वजह से वैज्ञानिकों ने अपना ध्यान ख़ास समूहों पर केंद्रित किया है, जैसे कि वे लोग जिन्हें पहले ही कैंसर हो चुका है, या जिनमें जेनेटिक कारणों से कैंसर होने का ख़तरा ज़्यादा है.

 

बढ़ते साक्ष्य
यहीं पर जॉन बर्न का लिंच सिंड्रोम से पीड़ित मरीजों पर किया गया अध्ययन सामने आता है. यह सिंड्रोम कोलोरेक्टल (आंत और मलाशय) के कैंसर और दूसरे कैंसरों का ख़तरा बहुत ज़्यादा बढ़ा देता है.

साल 2020 में बर्न ने इस बीमारी से ग्रस्त 861 मरीजों पर किए गए एक ऐतिहासिक रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल के नतीजे प्रकाशित किए. 10 साल तक प्रतिभागियों को ध्यान से देखने के बाद, उनकी टीम ने पाया कि जिन लोगों ने कम से कम दो साल तक रोज़ाना 600 मिलीग्राम एस्पिरिन ली, उनमें कोलोरेक्टल कैंसर का ख़तरा लगभग आधा रह गया.

इसके बाद उनकी टीम ने एक दूसरा ट्रायल भी किया, जो अभी पीयर रिव्यू के दौर से गुज़र रहा है. शुरुआती नतीजे बताते हैं कि एस्पिरिन की कहीं कम मात्रा (75–100 मिलीग्राम) भी अगर ज़्यादा नहीं तो, उतनी ही असरदार है.

बर्न कहते हैं, "जिन लोगों ने दो साल तक एस्पिरिन ली, उनमें कोलन के कैंसर 50% कम थे. हम कुछ और साल तक इसे जारी रखना चाहते हैं, क्योंकि समय के साथ डेटा और बेहतर होता जाएगा." (निक जेम्स, जो इस ट्रायल में शामिल होने वाले पहले मरीज़ थे, उन लोगों में शामिल थे जिन्हें इसका फ़ायदा मिलता दिखा.)

कम खुराक (75–100 मिलीग्राम) वही है जो लोग दिल से जुड़ी बीमारियों को रोकने के लिए लेते हैं. यह इसलिए अहम है क्योंकि एस्पिरिन के कुछ अप्रिय साइड इफ़ेक्ट्स भी हो सकते हैं, जैसे अपच, अंदरूनी खून बहना, पेट में अल्सर और यहां तक कि दिमाग में रक्तस्राव. कम मात्रा में यह दवा शरीर आमतौर पर ज़्यादा आसानी से सहन कर लेता है.

इन नतीजों का असर नीतियों पर भी पड़ चुका है. बर्न कहते हैं, "हमारे निष्कर्षों के बाद यूके में गाइडलाइंस बदल दी गई हैं."

2020 से अब यह सिफारिश की जाती है कि लिंच सिंड्रोम से पीड़ित ज़्यादातर लोग करीब 20 साल की उम्र से एस्पिरिन लेना शुरू करें, जबकि कम गंभीर मामलों में यह उम्र 35 साल रखी गई है.

इन नतीजों को देखते हुए, यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एस्पिरिन दूसरे मरीज़ समूहों के लिए भी फ़ायदेमंद हो सकती है.

एना मार्टलिंग ने यह जांच की है कि क्या एस्पिरिन उन लोगों में मेटास्टेसिस यानी कैंसर के फ़ैलने का ख़तरा कम कर सकती है, जिन्हें पहले ही कोलोरेक्टल कैंसर हो चुका है. उनकी टीम ने उन लोगों पर ध्यान दिया, जिनके आंत या मलाशय के ट्यूमर में कुछ आम किस्म के म्यूटेशन पाए जाते हैं.

वह बताती हैं, "कोलोरेक्टल कैंसर होने वाले सभी मरीज़ों में से 40% में वही म्यूटेशन होते हैं, जिन्हें हमने स्टडी किया है." पहले के शोध से संकेत मिला था कि ऐसे लोगों पर एस्पिरिन का ख़ास तौर पर अच्छा असर होता है.

तीन साल तक चले इस रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल में 2,980 मरीज़ शामिल थे. एक समूह को सर्जरी के तीन महीने के भीतर रोज़ाना 160 मिलीग्राम एस्पिरिन दी गई, जबकि दूसरे समूह को प्लेसिबो दिया गया. जिन मरीज़ों को एस्पिरिन मिली, उनमें कैंसर दोबारा होने का ख़तरा आधे से भी कम था, जो असर के लिहाज़ से बहुत बड़ा अंतर है.

मार्टलिंग कहती हैं, "यह मरीज़ों का एक बड़ा समूह है." ख़ास बात यह भी रही कि मार्टलिंग और बर्न, दोनों के ट्रायल में, एस्पिरिन लेने वाले लोगों में साइड इफ़ेक्ट्स के मामले बहुत कम देखने को मिले.

मार्टलिंग की यह स्टडी सितंबर 2025 में प्रकाशित हुई और इसके बाद स्वीडन में इलाज की प्रक्रिया तेज़ी से बदल गई.

जनवरी 2026 से, देश में आंतों के कैंसर के मरीज़ों की इन खास म्यूटेशंस के लिए जांच की जाने लगी है, और अगर उनमें ये पाए जाते हैं, तो उन्हें कम मात्रा में एस्पिरिन देने की पेशकश की जाती है.

फ़िलहाल यह साफ़ नहीं है कि क्या एस्पिरिन दूसरे तरह के कैंसर से भी मरीज़ों को बचा सकती है या नहीं. लेकिन हमें जल्द ही इसके जवाब मिल सकते हैं.

रुथ लैंगली इस समय एक बड़ा रैंडमाइज़्ड कंट्रोल्ड ट्रायल चला रही हैं, जिसमें यूके, आयरलैंड और भारत में कोलोरेक्टल, ब्रेस्ट, गैस्ट्रोइसोफ़ेगल या प्रोस्टेट कैंसर से जूझ चुके 11,000 लोग शामिल हैं. उनकी टीम रोज़ाना 100 मिलीग्राम या 300 मिलीग्राम एस्पिरिन की रोकथाम वाली ख़ुराक के असर को देख रही है, और उन्हें उम्मीद है कि अगले साल तक नतीजे मिल जाएंगे.

वह कहती हैं, "हम वाकई सबसे पहले हैं जो दूसरे ट्यूमर टाइप्स में एस्पिरिन की भूमिका को परख रहे हैं."

उनका मकसद कोलोरेक्टल कैंसर में मार्टलिंग के नतीजों को दोहराना है, साथ ही दूसरे कैंसरों में मौजूद ख़ास म्यूटेशंस के असर को समझने के लिए फंड जुटाना भी. वह बताती हैं कि नतीजों का दोहराव (रेप्लिकेशन) बेहद ज़रूरी है, क्योंकि किसी भी सिफ़ारिश से पहले अधिकारी आमतौर पर ट्रायल के कम से कम दो सेट के नतीजे देखना चाहते हैं.

यह कैसे काम करती है?

मार्टलिंग बताती हैं, "यह शानदार दवा कोशिका के अंदर भी काम करती है और कोशिका के बाहर भी", इसलिए इसमें कई अलग अलग तरह के तरीके शामिल हो सकते हैं. उनके अपने काम से यह संकेत मिलता है कि इसका संबंध कोशिका के अंदर मौजूद एक एंज़ाइम से है, जिसे Cox 2 कहा जाता है, और जिसे एस्पिरिन रोक देती है.

वह बताती हैं कि यह एंज़ाइम 'प्रोस्टाग्लैंडिन' नाम के हार्मोन जैसे पदार्थ बनाने में मदद करता है, जो आगे चलकर ऐसे सिग्नलिंग पाथवे को सक्रिय करते हैं, जिनसे कोशिकाएं बेकाबू होकर बढ़ने लगती हैं.

यूके की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में कैंसर इम्यूनोलॉजी के प्रोफ़ेसर राहुल रॉयचौधरी और उनके साथियों की हालिया रिसर्च से यह अंदाज़ लगता है कि एक और तरीका भी हो सकता है. यह एक ऐसे जीन से जुड़ा है, जो इम्यून सिस्टम के T cells को मेटास्टेटिक कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और मारने से रोकता है.

उन्होंने पाया कि यह जीन 'थ्रोमबॉक्सेन A2' नाम के एक क्लॉटिंग फ़ैक्टर से सक्रिय हो सकता है, जो अपने नाम के अनुरूप चोट लगने पर खून को जमने में मदद करता है. चूंकि एस्पिरिन थ्रोमबॉक्सेन को रोकती है, इसलिए हो सकता है कि यह कैंसर वाली कोशिकाओं को इम्यून सिस्टम के लिए ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखने लायक बना दे. यह बात टीम के लिए भी हैरान करने वाली थी.

रॉयचौधरी की यह रिसर्च चूहों पर की गई थी, इसलिए यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इसके नतीजे इंसानों में भी वैसे ही होंगे.

लेकिन लैंगली और उनके साथियों की दिलचस्प रिसर्च से पता चला है कि जिन लोगों को कोलोरेक्टल या गैस्ट्रोइसोफेगल कैंसर हो चुका है, उनके शरीर में स्वस्थ लोगों की तुलना में थ्रोमबॉक्सेन का स्तर काफ़ी ज़्यादा होता है- यहां तक कि सफल इलाज के छह महीने बाद तक भी.

इससे संकेत मिलता है कि इंसानों में भी मेटास्टेसिस को बढ़ाने में इसकी भूमिका हो सकती है.

हर बीमारी की दवा?

आखिर किन लोगों को एस्पिरिन नियमित रूप से लेनी चाहिए, और कब, इस पर अभी बहस जारी है. कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि दिल से जुड़ी बीमारियों और कैंसर, दोनों में इसके मिले जुले फ़ायदों को देखकर इसे ज़्यादा लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए.

जॉन बर्न, जो पहले खुद भी बचाव के तौर पर एस्पिरिन ले चुके हैं, इसके पब्लिक हेल्थ में इस्तेमाल को लेकर काफ़ी उम्मीद रखते हैं. वह कहते हैं, "हमने एक बड़ा अध्ययन किया था, जिसमें हमने दिखाया कि अगर 50 की उम्र के आसपास का हर व्यक्ति दस साल तक रोज़ एस्पिरिन की एक छोटी खुराक ले, तो देश में सभी कारणों से होने वाली मौतों की दर 4% तक कम हो सकती है."

हालांकि ज़्यादातर शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका इस्तेमाल सिर्फ़ ख़ास तरह के मरीज़ों तक ही सीमित रहना चाहिए. मार्टलिंग कहती हैं, "कैंसर से जूझ रहे मरीज़ों को एस्पिरिन देना एक बात है, लेकिन पूरी तरह स्वस्थ लोगों को ऐसी चीज़ देना, जिससे उन्हें नुकसान भी हो सकता है, बिल्कुल अलग बात है."

ऐसा इसलिए क्योंकि एस्पिरिन के गंभीर साइड इफ़ेक्ट्स हो सकते हैं, और यह हर व्यक्ति या हर तरह के कैंसर में काम करे, यह ज़रूरी नहीं.

हालांकि अगर आपको लिंच सिंड्रोम है या आपका आंतों के कैंसर का इलाज हो चुका है, तो यह पूछ लेना फ़ायदेमंद हो सकता है कि क्या रोज़ाना कम मात्रा में एस्पिरिन लेना आपके लिए सही रहेगा. लैंगली कहती हैं, "एस्पिरिन शुरू करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर या किसी दूसरे हेल्थकेयर प्रोफेशनल से बात करें."

जैसे जैसे एस्पिरिन पर रिसर्च आगे बढ़ रही है, आगे और भी चौंकाने वाली बातें सामने आ सकती हैं. लेकिन क्या एस्पिरिन का यह 4,000 साल पुराना इतिहास आने वाले 4,000 साल तक भी जारी रहेगा? मुमकिन है कि हमारे आने वाले वंशज इस दवा के ऐसे ऐसे रूप इस्तेमाल करें, जिनकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते.

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बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (bbc.com/hindi)


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