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केंद्र ने माना, मुआवजा वितरण में कुछ विसंगति है
नई दिल्ली, 17 फरवरी। वर्ष-2012 से बिलासपुर रायपुर फोर लेन और सिक्स लेन प्रोजेक्ट में अपनी सडक़ किनारे की महंगी जमीन गवा चुके किसानों को अंतत: 14 साल की कानूनी लड़ाई के बाद उम्मीद दिखाई दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने माना कि मुआवजा वितरण में कुछ विसंगति है, जिसमें सुधार की जरूरत है। प्रकरण पर सुनवाई 17 मार्च को होगी।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश शर्मा के खंडपीठ में मंगलवार को हुई सुनवाई में एन एच ए आई की ओर से उपस्थित भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह सही है कि मुआवजा वितरण में कुछ विसंगति है। जिसमें सुधार की जरूरत है। इसके लिए हम छत्तीसगढ़ सरकार से भी बात कर रहे हैं। और हमें अपनी बात रखने के लिए कुछ समय दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस कथन को सुनकर समय देना स्वीकार कर लिया। इस स्तर पर याचिका कर्ताओं की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और सुदीप श्रीवास्तव ने कहा कि यह मामला 12 साल से लंबित है और जो राज्य सरकार ने नया मार्गदर्शिका सिद्धांत बनाया है वह नए मामलों पर लागू होगा पुराने मामलों पर नहीं। अन्य याचिकाकर्ता की तरफ से उपस्थित वरिष्ठ वकील अग्रवाल ने भी मामले की जल्दी समाप्त किए जाने पर बल दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने एन एच ए आई और छत्तीसगढ़ सरकार के अधिवक्ता के कथनों को सुन कर इस विषय पर विचार करने का समय देना उचित समझा।
गौर तलब है कि इस मामले में 2012 से लगातार न्यायालय में केस चल रहे है। दो बार आर्बिट्रेटर और दो बार जिला जज और एक बार हाई कोर्ट में यह मुकदमा चल चुका है। इसी मामले के साथ जुड़े एक अन्य प्रकरण में हाई कोर्ट की दो खंडपीठों ने यह फैसला दिया है कि अधिक जमीन वाले को कम मुआवजा दिया जाना अनुचित है और जिस रेट पर अन्य किसानों छोटी जमीन का मुआवजा दिया गया है वैसे ही स्लैब के आधार पर बड़ी जमीनों वालों को भी देना चाहिए यदि उनकी जमीन भी सडक़ के किनारे समान रूप से स्थित है। प्रतिवादी एन एच ए आई ने हाई कोर्ट खंडपीठ के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है वहीं याचिका कर्ताओं ने दो बार आर्बिट्रेशन और दो बार डिस्टिक कोर्ट में सुनवाई हो जाने के बाद उन्हें पुन: आर्बिट्रेशन के लिए भेजे जाने के खिलाफ याचिका लगाई है। याचिका कर्ताओं का तर्क है कि दो ही रेट उपलब्ध है जिसमें से एक को आर्बिट्रेटर डिस्टिक कोर्ट और हाई कोर्ट नकार चुका है। ऐसे में दूसरे उपलब्ध विकल्प के रेट पर ही मुआवजा तय होना है अत: किसी नए मुकदमे की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 17 मार्च को अंतिम रूप से करने का आदेश किया है।


