संपादकीय
देश में गाडिय़ों के कारोबारियों के संघ ने जानकारी दी है कि पहली बार बिकी हुई तमाम गाडिय़ों में इलेक्ट्रिक गाडिय़ां 11 फीसदी से अधिक हैं। इसके साथ-साथ इस महीने जमकर बैटरी गाडिय़ां बिकी हैं। ये कहने के लिए बैटरी गाडिय़ां होती हैं, इनकी बैटरी तो बिजली से ही चार्ज होती है। सडक़ों पर ये भूत की तरह पीछे से बेआवाज पहुंचकर आगे निकल जाती हैं, या लालबत्ती पर खड़ी हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। इनके बढऩे से सडक़ों पर प्रदूषण घट रहा है, और शोरगुल भी कम हो रहा है। अभी देश में इन गाडिय़ों की बिक्री एकदम से बढऩे की वजह समझ में आती है कि डीजल-पेट्रोल न सिर्फ लगातार महंगा होते चल रहा है, बल्कि उसकी कमी भी चल रही है, जगह-जगह पेट्रोल पम्प सूखे पड़े हैं, और कमी का फायदा उठाते हुए पंप कारोबारी अब महंगा प्रीमियम पेट्रोल टिकाने लगे हैं। लेकिन इन सबके बीच यह बात अपनी जगह कायम है कि यह देश बैटरी गाडिय़ों के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर पा रहा है। ग्राहक तो तैयार हैं, सरकार ही तैयार नहीं है, कारोबार तैयार नहीं है।
बीते कुछ दशकों के भारत को देखें, तो जिस तरह बैंकों के एटीएम चारों तरफ खुले, और आम लोग अब रोजमर्रा की नगदी निकालने के लिए बैंक जाना तकरीबन बंद कर चुके हैं। एक वक्त टेलीफोन के एसटीडी-पीसीओ हुआ करते थे जहां जाकर लोग दूसरे शहरों में, या अपने शहर के किसी नंबर पर भी फोन लगाते थे, अब मोबाइल टेक्नॉलॉजी ने इन सारे पीसीओ को बंद करवा दिया है, और नई पीढ़ी को यह याद भी नहीं है कि एक वक्त ऐसी कोई मजबूरी हुआ करती थी। इसी तरह आज लोगों को घर-घर अपनी गाडिय़ों की चार्जिंग का इंतजाम करना पड़ता है, इसके लिए घरेलू बिजली कनेक्शन की क्षमता बढ़वानी पड़ती है, और जिन लोगों के पास घर के भीतर, या अहाते में चार्जिंग प्वाइंट लगाने की सहूलियत नहीं है, उन्हें घर के बाहर खतरा उठाकर चार्जिंग करनी पड़ती है। नतीजा यह है कि लोग नई टेक्नॉलॉजी पर जाना चाहते हैं, लेकिन सरकार की, और कारोबार की भी तैयारी नहीं है।
आज दुनिया के अलग-अलग बहुत से देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी चार्जिंग के कई तरह के मॉडल काम कर रहे हैं। सबसे सफल मॉडल वे हैं जो बैटरी को एक मिनट में बदल देते हैं। ऐसे चार्जिंग स्टेशन लगे हुए हैं जहां बैटरियां चार्ज होती ही रहती हैं, और लोग जाकर गाड़ी रोकते हैं, वहां उनकी बैटरी बदल दी जाती है, और घरों में चार्जिंग की मजबूरी नहीं रहती है। लेकिन इसके लिए देश की सरकार को कारोबार के साथ मिलकर पहले तो बैटरियों के आकार-प्रकार को एक सरीखा करना पड़ेगा। कुछ चुनिंदा आकार और क्षमता की बैटरियों की शर्त बैटरी और वाहन निर्माताओं पर लगानी होगी, तभी बैटरी बदलना संभव और आसान हो पाएगा। अभी लगातार हम अपने शहर में ये खबरें पढ़ते हैं कि स्थानीय सरकार के पास ऐसे चार्जिंग स्टेशन बनाने के लिए बजट आकर रखा हुआ है, लेकिन वे जगह नहीं तय कर पा रहे हैं, चार्जिंग शुरू नहीं कर पा रहे हैं। बैटरी बदलना एक आदर्श व्यवस्था होगी, लेकिन जब तक वह नहीं होती है, तब तक चुनिंदा जगहों पर चार्जिंग की व्यवस्था करने के लिए बहुत मामूली सी कल्पनाशीलता की जरूरत है।
लोग मॉल जाते हैं, रेस्त्रां जाते हैं, या किसी और जगह पर जाते हैं जहां घंटा-दो घंटा उनकी गाड़ी खड़ी रहती है। ऐसी जगहों पर अगर चार्जिंग का विकल्प मुहैया कराया जाए, तो लोग शौक से वहां गाड़ी छोडक़र जा सकते हैं। अब तो तमाम गाडिय़ों में यह दिख जाता है कि बैटरी में कितने फीसदी चार्जिंग है। चार्जिंग स्टेशन इसका रिकॉर्ड रखकर आगे की चार्जिंग का भुगतान ले सकते हैं, और दुनिया के विकसित देशों में तो चार्जिंग स्टेशन किसी मोबाइल ऐप से भी जुड़े होंगे कि लोग अपने फोन पर अपनी गाड़ी की चार्जिंग देख सकें। आज भी बहुत से निजी गाडिय़ों की बैटरी चार्जिंग मोबाइल फोन पर देखी जा सकती है। इसके अलावा जिन बड़े दफ्तरों में काम करने वाले लोगों की गाडिय़ां वहां घंटों खड़े रहना तय रहता है, वहां भी कंपनी या सरकार चार्जिंग स्टेशन लगा सकती है, और हो सकता है कि कोई निजी कंपनी भी गाडिय़ों की नियमित पार्किंग वाली ऐसी जगहों पर चार्जिंग प्वाइंट लगाने का कारोबार शुरू कर सके। यह तो एक लगातार बढऩे वाला कारोबार है, और लोगों को चार्जिंग का विकल्प जगह-जगह हासिल रहना चाहिए, उसी से इलेक्ट्रिक गाडिय़ों का इस्तेमाल बढ़ेगा, और डीजल-पेट्रोल की गाडिय़ां बढऩा थमेगा।
आज प्रदेश में ऐसी कल्पनाशीलता नहीं दिख रही है कि सरकार घंटों की नियमित पार्किंग की जगह की शिनाख्त करे, और वहां के सरकारी दफ्तर, या कारोबार से बात करके चार्जिंग का इंतजाम करे। चार्जिंग के कई तरह के विकल्प इसलिए जरूरी हैं कि दिन में कुछ घंटों बिजली सस्ती रहती है, कुछ घंटों बिजली बहुत महंगी रहती है। अभी ग्राहक तक यह उतार-चढ़ाव नहीं पहुंचता, लेकिन बिजली कंपनी को बिजली की जो खरीद-बिक्री करनी पड़ती है, उसमें यह फर्क पड़ता है। दूसरा यह कि आज नहीं तो कल, सोलर पैनल से बैटरी चार्ज होने की शुरूआत होगी, और वैसे में घरों में रात को गाडिय़ों की चार्जिंग महंगी पडऩे लगेगी, और दिन में कामकाज की जगहों पर बैटरी चार्जिंग सोलर बिजली से सस्ती पडऩे लगेगी। अगर चार्ज की हुई बैटरी बदलने वाले सेंटर बढ़ते चले जाएंगे, तो वे सोलर से बैटरी चार्ज करने का काम अधिक व्यवस्थित तरीके से कर सकेंगे, और सूरज की मेहरबानी के हर मिनट को वे बैटरियों में कैद करके रखेंगे, और गाडिय़ों के आते ही बैटरी बदल देंगे।
आज दुनिया में यह टेक्नॉलॉजी सिर्फ बढऩा और बढऩा है। इलेक्ट्रिक गाडिय़ों के साथ-साथ बैटरी का कारोबार भी बढऩा है, और चार्जिंग का एक नया धंधा भी चारों तरफ फैलना है। ऐसे में सरकार को यह सीखना चाहिए कि जिस तरह योरप में मोबाइल के कई तरह के चार्जिंग प्वाइंट खत्म करके सिर्फ एक, सी-पोर्ट, रखा है, उससे अब दुनिया में चार्जिंग सिर्फ एक ही जैसे चार्जर से होने लगी है। इसी तरह भारत में सरकार को गाडिय़ों की क्षमता के आधार पर कुछ सीमित आकार-प्रकार की बैटरियां तय करने का काम वाहन निर्माताओं के साथ मिलकर करना चाहिए ताकि जगह-जगह इन बैटरियों को तुरंत बदलने का काम किया जा सके। यह टेक्नॉलॉजी भारत में जिस रफ्तार से बढ़ रही है, और आगे इसका जितना बढऩा तय है, उसके हिसाब से सरकारें अभी पिछड़ी हुई हैं। सरकार को खुद व्यापार नहीं करना चाहिए, लेकिन व्यापार को इतना नियंत्रित जरूर करना चाहिए कि बैटरी और चार्जिंग के काम में सौर ऊर्जा का अधिक से अधिक इस्तेमाल हो सके। भविष्य सौर ऊर्जा का ही है, और भारत जैसा रौशन देश हर दिन सौर ऊर्जा के दोहन की संभावनाओं को खो देता है। वे प्रदेश कारोबार में भी आगे रहेंगे, और अपने नागरिकों को सहूलियत भी मुहैया कराएंगे, जो आज दहलीज पर आ खड़ी हुई कल की इस टेक्नॉलॉजी के हिसाब से ढांचा तैयार करेंगे। जहां कहीं गाडिय़ां नियमित रूप से घंटों खड़ी रहती हैं, उन तमाम जगहों पर चार्जिंग का इंतजाम होना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)


