बस्तर

राजकुमारी चमेली देवी की याद में रोजाना एक फूल रथ से नीचे गिराया जाता है, तीन सौ साल से चल रही परम्परा
24-Oct-2020 8:24 PM 49
राजकुमारी चमेली देवी की याद में रोजाना एक फूल रथ से नीचे गिराया जाता है, तीन सौ साल से चल रही परम्परा

हरजीत सिंह पप्पू

जगदलपुर, 24 अक्टूबर (‘छत्तीसगढ़’)। बस्तर दशहरा में रथ परिक्रमा के दौरान चित्रकोट की राजकुमारी चमेली देवी की याद में रोजाना एक फूल रथ से नीचे गिराया जाता है। तीन सौ साल से जारी यह परम्परा आज भी कायम है।  इन फूलों को लोहंडीगुड़ा ब्लॉक के एरंडवाल गांव का पेगड़ परिवार अपनी पगड़ी में बटोरने यहां उपस्थित रहते हैं।

लगातार नौ दिनों इन फूलों को एकत्रित कर पेगड़ परिवार के गंगाराम पेगड़ द्वारा मावली मंदिर में ज्योति कलश के पास रखा जाता है। उत्सव के बाद इसे इंद्रावती नदी में प्रवाहित किया जाता है। यह परंपरा बहुत कम लोग जानते हैं, इन्हीं परंपराओं के निर्बाध रूप से निर्वाहन करने के कारण बस्तर दशहरा विश्व विख्यात है।

इन फूलों को इक_ा करने जिम्मेदारी बस्तर के राजा ने पेगड़ परिवार को दी थी। वर्तमान में भी इस परिवार के सदस्य मावली मंदिर में ज्योति कलश जलाने पहुंचे हैं। इन्हें दशहरा के दौरान राजा की ओर से निमंत्रण पत्र आता था, अब प्रशासन पत्र भेजकर बुलाता है। दशहरे पर इस रस्म को निभाने परिवार हर साल बेसब्री से इंतजार करता है।

जर्जर हालत में है वीर चमेली का मठ

शहर से 40 किमी दूर चित्रकोट जलप्रपात  के पास थाने के सामने से खाले पारा मार्ग पर मावली मंदिर है। यहां से करीब आधा किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी किनारे खेत में चमेली बाई की समाधि है। ग्रामीण इसे राजकुमारी चमेली देवी के मठ के नाम से जानते हैं। यहां से यहां से कुछ दूर बरगद व पेड़ों के झुरमुट में खंडहर में दीवार है।

बताया जाता है कि तीन सौ साल पहले यहां राजा हरीश चन्द्र का शासन था। उन्हीं की बेटी चमेली थी। उनसे बस्तर महाराजा अनम देव विवाह करना चाहते थे। उन्होंने एक संदेश वाहक के माध्यम से अपने मन की बात राजा हरिश्चंद्र तक पहुंचाई, लेकिन राजकुमारी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और इसके बाद युद्ध हुए।

युद्ध में राजा हरिश्चंद्र मारे गए। राजकुमारी ने भी मोर्चा संभाला लेकिन वे भी लड़ते-लड़ते हार की कगार पर पहुंची। इसके पूर्व उन्होंने ग्रामीणों से कहा था कि अंत्येष्टि के लिए पूरी तैयारी रखो और हार नजर आने के बाद वे चिता में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। उस समय की मान्यता के अनुसार वे सती हो गई, इस तरह की  कहानी प्रचलन में है। मठ के बारे में किवदंती है कि साल में एक बार कोई व्यक्ति आकर चमेली के दीपक जलाता है।

 

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