श्रवण गर्ग

27-Sep-2020 12:17 PM

-श्रवण गर्ग

सोच-सोचकर तकलीफ होती है, पर ऐसा हकीकत में हो रहा है और हम उसे रोक नहीं पा रहे हैं। अपनी इस असहाय स्थिति का हमें अहसास भी नहीं होने दिया जा रहा है। वह यह कि क्या लोगों को ठीक से जानने के लिए अब उनका चले जाना जरूरी हो गया है ? हम लोगों को, उनके काम के बारे में, उनके मानवीय गुणों के बारे में, जो कहीं दबे पड़े होंगे, उनके चले जाने के बाद ही क्यों जान पा रहे हैं ? हमें संभल पाने का मौक़ा भी क्यों नहीं मिल रहा है? एक शोक से उबरते हैं कि दूसरा दस्तक देने लगता है! हो सकता है कि हम जो अभी कायम हैं, हमारे बारे में भी कल ऐसा ही हो।

लोगों की जिंदगियाँ जैसे शेयर बाजार के सूचकांक की शक्ल में बदल गयी हैं। सूचकांक के घटने-बढऩे से जैसे बाजार की माली हालत की लगभग झूठी जानकारी मिलती है, लोगों के मरने-जीने की हकीकत भी असली आँकड़ों की हेरा-फेरी करके पेश की जा रही हैं। देखते ही देखते, जीते-जागते इंसान मौत के आँकड़ों में बदल रहे हैं। हमें सही खबर मिलना अभी बाकी है कि कितने शहर अब तक कितने खाली हो चुके हैं। अभी केवल इतना भर पता चल रहा है कि अस्पताल और उनके मुर्दाघर अब छोटे पडऩे लगे हैं।

कई लोग ऐसे हैं जिनसे हम मिलना चाहते थे पर महीनों से मिल नहीं पाए थे। फोन पर भी बात नहीं कर पाए जबकि हमारे और उनके भी फोन खाली पड़े थे। उन्हें ठीक से याद भी नहीं कर पाए क्योंकि हम बार-बार अपनी नकाबों को ही उतारते-चढ़ाते रहे या फिर अपने हाथों को माँजते रहे। हमारे हाथ इतने साफ पहले कभी नहीं रहे होंगे। अपमानित महसूस करने के कारण भी बनते हैं कि हमारे आसपास इतने सारे लोग जीती-जागती कविताओं और सत्य कथाओं के रूप में टहलते रहे और हमें पता ही नहीं चल पाया। वे दबे पाँव चले भी गए। अंतिम समय में भी कोई उनके पास नहीं था। उनके चेहरे भी ढके हुए थे।

दुनिया भर में महामारी के कारण मरने वालों का बताया जाने वाला आंकड़ा थोड़े दिनों में दस लाख को पार करने जा रहा है। मध्यम आकार के एक भरे-पूरे शहर जितने कुल लोग। चंडीगढ़ जैसे खूबसूरत शहर की आबादी लगभग इतनी ही है। कैसा लगे कोई सुबह-सुबह खबर करके बताए कि एक जाना-पहचाना शहर चार-पाँच महीनों के दौरान ही अपनी जगह से अचानक गायब हो गया है? किसी राज्य को ही अनुपस्थित होते देखना हो तो सिक्किम की आबादी सात लाख और मिजोरम की लगभग 11 लाख है। देश को देखना हो तो भूटान की आठ लाख के कऱीब है। हम अंदाजा ही नहीं लगा पा रहे हैं कि आखिरी हो क्या रहा है और हमें किस ओर धकेला जा रहा है।

जो हुकूमतों में हैं क्या उन्हें डर ही नहीं लग रहा है कि उनकी आबादी की गिनती लगातार कम हो रही है और जो लोग अभी कायम हैं मौत का खौफ अब एक साये की तरह उनका भी हर जगह पीछा कर रहा है ? पलक झपकते ही जगहें ख़ाली नजऱ आने लगती हैं ! एक भले डॉक्टर मित्र ने सलाह दी कि मुसीबत कब आ जाए कुछ पता नहीं। एक कागज पर कुछ डिटेल्स लिखकर हमेशा तैयार रखें कि कभी भी ऐसी कोई स्थिति बन जाए तो दस-पंद्रह सबसे ज़रूरी काम क्या करने हैं, सबसे पहले किन-किन से सम्पर्क करना है जो मदद के लिए तुरंत खड़ा हो जाएगा। दिन में ऐसा हो तो क्या करना है, और आधी रात हो जाए तो क्या करना है! लिखने बैठे तो पहला सबसे जरूरी काम और पहला नाम ही पूरे भरोसे के साथ ध्यान में नहीं आया।

हम इस खतरे को लेकर अभी भी पूरी तरह से सचेत नहीं हैं कि जनता के डर का इस्तेमाल दुनिया भर में कितनी चीजों के लिए उन प्रभावशाली लोगों के द्वारा किया सकता है जिन्हें लोगों के इस तरह से चले जाने, एक व्यक्ति, एक शहर, एक राज्य या एक देश की आबादी के नक्शे और गिनती से गायब हो जाने से कोई भी फर्क  ही नहीं पड़ता। कहीं भी किसी तरह का दु:ख या शोक व्यक्त करने की सुगबुगाहट भी नहीं है। लोगों की जीवित स्मृतियों में तो गुजरे सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि लोगों का भीड़ की तरह इस्तेमाल करने के बाद उन्हें अचानक से नितांत अकेले कर दिया गया हो, सांत्वनाओं के स्तर पर भी ‘आत्मनिर्भर’ बना दिया गया हो।

कहा जा रहा है कि धीरे-धीरे सब कुछ खुल जाने वाला है। पर लोगों को पता है कि अब पहले जैसे कुछ भी नहीं रहने वाला है। रह भी कैसे सकता है? वे अभागे जो असमय ही अपनी अनंत की यात्राओं पर रवाना हो चुके हैं, कैसे लौटकर आएँगे? वैसे तो हमें पहले से ही आगाह कर दिया गया है कि महामारी के बाद हमारे जीने का तरीका बदल जाने वाला है ।क्या इस बात की आशंका नजर नहीं आती कि कोरोना के बाद के जिस ‘बाद’ की बात कही गई है वह भी कभी आए ही नहीं! क्या ऐसा असम्भव है कि हमें जिस स्थान पर इस समय रोक दिया गया है वही अब हमारा पक्का ठिकाना भी घोषित कर दिया जाए जिसमें कि घर, दफ्तर ,दुकान, स्कूल, बाजार और अकेलेपन से जूझने की सारी सुविधाएँ भी कायम हो जाएँ। ऐसा होने भी लगा है और हम इस नई व्यवस्था के कितने अभ्यस्त हो चले हैं, हमें पता ही नहीं चल पाया।

क्या हमें इस बात का भी कोई डर नहीं है कि आगे चलकर नागरिकों के किसी भीड़ की शक्ल में शोक व्यक्त करने के लिए जमा होने को भी व्यवस्था के प्रति विद्रोह के षडय़ंत्र की आशंकाओं से देखा जाने लगे। हम जिस तरह की राजनीतिक गतिविधियों, सामाजिक-धार्मिक समारोहों और सार्वजनिक रूप से प्रसन्नता और आक्रोश व्यक्त करने के प्रति अभ्यस्त हो चुके हैं, क्या उसकी कोई कमी हमें महसूस नहीं हो रही है? हम शायद ठीक से जवाब नहीं दे पाएँगे कि इस समय हमें सबसे ज़्यादा डर किस बात का लग रहा है! महामारी के अलावा भी हम किन्ही और चीजों को लेकर भी चिंतित हैं पर बताना नहीं चाहते हैं। सभ्यताएँ जब समाप्त होने का तय कर लेतीं हैं तो सारी शुरुआतें इसी तरह से होती है।

और हाँ! हमें पता है न कि आज से ठीक 28 दिन बाद विजय दशमी और उसके बीस दिन बाद दीपावली का पर्व है? क्या हमारे ‘मन’ त्योहारों का सामना करने को पूरी तरह से तैयार हैं?


24-Sep-2020 11:54 AM

- श्रवण गर्ग
हरिवंश नारायण सिंह के ‘सभापतित्व ‘में राज्यसभा का कुछ ऐसा इतिहास रच गया है कि पत्रकारिता और सत्ता की राजनीति के बीच के घालमेल को लेकर पीछे मुडक़र देखने की ज़रूरत पड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की अध्यक्षता में गठित प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से नामांकित मैं भी एक सदस्य था। बात अब लगभग दस साल पुरानी होने को आयी। जस्टिस काटजू मीडिया की आज़ादी को लेकर तब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से काम कर रहे थे। इस सम्बंध में कई राज्यों से शिकायतें आ रहीं थीं। बिहार में मीडिया पर नीतीश सरकार के दबाव को लेकर प्राप्त शिकायतों के बाद एक समिति का गठन कर उसे बिहार भेजा गया और एक रिपोर्ट तैयार होकर काउन्सिल के समक्ष प्रस्तुत की गई। कि़स्सा इतना भर ही नहीं है !

वे तमाम लोग जो नीतिपरक (एथिकल ) पत्रकारिता की मौत और चैनलों द्वारा परोसी जा रही नशीली खबरों को लेकर अपने छाती-माथे कूट रहे हैं, उन्हें हाल में दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए खाँटी सम्पादक-पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह को लेकर मीडिया में चल रही चर्चाओं पर नजऱ डालने के बाद अपनी चिंताओं में संशोधन कर लेने चाहिए। वैसे यह बहस अब पुरानी पड़ चुकी है कि कैसे उस ‘काले’ रविवार (बीस सितम्बर) को लोकतंत्र की उम्मीदों का पूरी तरह से तिरस्कार करते हुए देश के कोई करोड़ों किसानों और खेतिहर मज़दूरों को सडक़ों पर उतरने के लिए मज़बूर कर दिया गया।

यह आलेख मूलत: उन सुधी पाठकों के लिए है, जो पत्रकारिता और राजनीति के बीच गहरी होती जा रही साठगाँठ को अंदर से समझना चाहते हैं। बिहार की वर्तमान राजनीति के महत्वाकांक्षी नायक नीतीश कुमार के आधिपत्य वाली जद (यू ) की ओर से वर्ष 2014 में राज्यसभा में पहुँचने के पहले तक हरिवंश नारायण सिंह की उपलब्धियाँ एक निर्भीक और वैचारिक रूप से पारदर्शी समाजवादी पत्रकार की रही हैं। मेरा भी उनके साथ कोई दो दशकों से इसी रूप में परिचय रहा है। उनके साथ पत्रकारों के दल में एक-दो विदेश यात्राएँ भी की हैं। उनके अख़बार ‘प्रभात खबर’ के एक बड़े समारोह में पत्रकारिता पर बोलने के लिए राँची भी गया हूँ और उसके लिए लिखता भी रहा हूँ। पर हाल में काफ़ी कुछ हो जाने के बाद भी उन्हें लेकर पुरानी छबि में अभी पूरी दरार क़ायम नहीं हुई है। एक-दो झटके और ज़रूरी पड़ेंगे।

पिछले रविवार को हरिवंश के ‘सभापतित्व’ में राज्यसभा में जो कुछ हुआ उसे लेकर दो-तीन सवाल इन दिनों मीडिया की चर्चाओं में हैं। पहला तो यह कि एक पत्रकार के रूप में क़ायम अपनी छबि के अनुसार हरिवंश अगर अपने अख़बार के लिए उस दिन के ऐसे ही घटनाक्रम की रिपोर्टिंग कर रहे होते और ‘सभापति’ की कुर्सी पर कोई और बैठा हुआ होता तो वे क्या कुछ लिखना चाहते ? दूसरा सवाल यह कि अगर ऐसे ही किसी और (महत्वाकांक्षी) पत्रकार को राजनीति में इसी तरह से नायक बनकर उभरने के अवसर प्राप्त हो जाएँ तो पाठकों को उससे अब किस तरह की उम्मीदें रखी जानी चाहिए ? तीसरा यह कि कुर्सी पर उस दिन एक पत्रकार की आत्मा के बजाय किसी अनुभवी राजनीतिक व्यक्तित्व का शरीर उपस्थित होता तो क्या वह भी इतने ज़बरदस्त हो-हल्ले के बीच इतने ही शांत भाव और ‘कोल्ड ब्लडेड’ तरीक़े से कागज़़ों में गर्दन समेटे ध्वनिमत से सबकुछ सम्पन्न कर देते या फिर जो सांसद मत विभाजन की माँग कर रहे थे, उनकी ओर भी नजऱें घुमाकर देखते ? इस बहस में जाने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है कि मत विभाजन (वोटिंग) अगर हो जाता तो ‘विवादास्पद’ कृषि विधेयकों और सरकार की स्थिति क्या बनती ? क्या एक पत्रकार दिमाग़ की शांत सूझबूझ से स्थिति सरकार के पक्ष में नहीं हो गई ?

हरिवंश नारायण सिंह के ‘सभापतित्व ‘में राज्यसभा का कुछ ऐसा इतिहास रच गया है कि पत्रकारिता और सत्ता की राजनीति के बीच के घालमेल को लेकर पीछे मुडक़र देखने की ज़रूरत पड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की अध्यक्षता में गठित प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से नामांकित मैं भी एक सदस्य था। बात अब लगभग दस साल पुरानी होने को आयी।जस्टिस काटजू मीडिया की आज़ादी को लेकर तब बहुत ही आक्रामक तरीक़े से काम कर रहे थे। इस सम्बंध में कई राज्यों से शिकायतें आ रहीं थीं। बिहार में मीडिया पर नीतीश सरकार के दबाव को लेकर प्राप्त शिकायतों के बाद एक समिति का गठन कर उसे बिहार भेजा गया और एक रिपोर्ट तैयार होकर काउन्सिल के समक्ष प्रस्तुत की गई। कि़स्सा इतना भर ही नहीं है !

कि़स्सा यह है कि प्रेस काउन्सिल की समिति द्वारा तैयार की गई तथ्यपरक रिपोर्ट को चुनौती तब प्रभात खबर के सम्पादक हरिवंश नारायण सिंह द्वारा दी गई। काउन्सिल के सदस्यों को आश्चर्य हुआ कि रिपोर्ट को एकतरफ़ा और मनगढ़ंत नीतीश सरकार नहीं, बल्कि एक प्रतिष्ठित पत्रकार करार दे रहा है। हरिवंश ने रिपोर्ट के खिलाफ़ अख़बार में बड़ा आलेख लिखा और उसके निष्कर्षों को झूठा करार दिया। वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित की गई नोटबंदी के समर्थन में जिन कुछ पत्रकारों ने प्रमुखता से आलेख लिखे उनमें हरिवंश भी थे। इसके साल भर के बाद तो जद(यू)-भाजपा की आत्माएँ मिलकर एक हो गईं और उसके एक साल बाद हरिवंश राज्यसभा में उप-सभापति बन गए।

राज्यसभा में जो कुछ हुआ उसका क्लायमेक्स यह है कि हरिवंश सोमवार सुबह धरने पर बैठे आठ निलम्बित सांसदों के लिए चाय-पोहे लेकर पहुँच गए जिसका कि उन्होंने (सांसदों ने )उपयोग नहीं किया । उसके अगले दिन हरिवंश ने राष्ट्रपति के नाम एक मार्मिक पत्र लिखकर स्थापित कर दिया कि वास्तव में तो पीडि़त वे हैं और अपनी पीड़ा में एक दिन का उपवास कर रहे हैं।प्रधानमंत्री ने न सिफऱ् हरिवंश के निलम्बित सांसदों के लिए चाय ले जाने की ट्वीटर पर तारीफ़ की ,उनके द्वारा राष्ट्रपति को लिखे पत्र को भी जनता के लिए ट्वीटर पर जारी करके बताया कि कैसे उसके(पत्र के) एक-एक शब्द ने लोकतंत्र के प्रति ‘हमारे विश्वास को नया अर्थ दिया है।’ समूचे घटनाक्रम के ज़रिए अब जो कुछ भी प्राप्त हुआ है उसे हम एक ऐतिहासिक दस्तावेज मानकर पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों के लिए उपयोग में ला सकते हैं।

हरिवंश राजनीतिक रूप से तीन लोगों के काफ़ी कऱीब रहे हैं और उसके कारण उन्हें कभी पीछे मुडक़र नहीं देखना पड़ा ये हैं : चंद्र शेखर, नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी। तीनों के ही व्यक्तित्व, स्वभाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ लगभग एक जैसी रही हैं।अत: असीमित सम्भावनाएँ व्यक्त की जा सकती हैं कि अपनी शांत प्रकृति, प्रत्यक्ष विनम्र छबि और तत्कालीन राजनीति की जरूरतों पर ज़बरदस्त पकड़ के चलते हरिवंश आने वाले समय में काफ़ी ऊँचाइयों पर पहुँचेंगे। सोचना तो अब केवल उन पत्रकारों को है जो फि़लहाल तो जनता की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, पर कभी सत्ता की रिपोर्टिंग के भी आमंत्रण मिलें तो उन्हें क्या निर्णय करना चाहिए !


17-Sep-2020 2:09 PM

-श्रवण गर्ग

सहज जिज्ञासा है कि लोग पूछ रहे हैं- ‘अब क्या करना चाहिए?’ एक विशाल देश और उसके एक दूसरे से लगातार अलग किए जा रहे नागरिक जिस मुकाम पर आज खड़े हैं, वे जानना चाह रहे हैं कि उन्हें अब किस दिशा में आगे बढऩा चाहिए? आम आदमी की साँसों को प्रभावित करने वाला ऐसा कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है, जिसमें अभावों के साथ-साथ बाकी सभी चीजें भी अपने निम्नतम स्तरों पर नहीं पहुँच गई हों। होड़ मची हुई है कि कौन ज़्यादा नीचे गिर सकता है। संविधान निर्माता सात दशक पहले के काल में वर्तमान परिदृश्य की कल्पना नहीं कर पाए होंगे वरना वे कुछ तो लिखकर अवश्य जाते।

हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया कि हमारे आसपास की चीज़ें कितनी तेजी से फास्ट-फ़ॉरवर्ड हो रही हैं और पलक झपकते ही पुरानी के स्थान पर नई आकृतियाँ प्रकट हो रही हैं। केवल एक उदाहरण ले लें क्या हमने नोटिस किया कि मॉब-लिंचिंग जैसी घटनाएँ अचानक बंद हो गई हैं, जैसे किसी ने स्विच ऑफ करके ऐसा न करने का फरमान जारी कर दिया हो। इसका यह मतलब कतई नहीं कि वे तत्व जो इस तरह की कार्रवाईयों में जुटे थे, उनका कोई हृदय परिवर्तन हो गया है और वे एक नेक इंसान बन गए हैं। न ही कुछ ऐसा हुआ है कि जो घटनाएँ अतीत में घट चुकी हैं, उनके दोषियों को पर्याप्त सजाएँ और पीडि़त परिवारों को न्याय और राहत नसीब हो चुकी है।

लोग तकलीफ के साथ महसूस कर रहे हैं कि इस समय जो कुछ चल रहा है, वह और भी ज़्यादा डराने वाला है। ऐसा इसलिए कि इस नए खेल में जो हिस्सा ले रहे हैं, उनका संबंध समाज के सम्पन्न लोगों की जमात से है। असीमित सम्पन्नता के बोझ से जन्मा यह नया उग्रवाद मॉब लिंचिंग या धार्मिक आतंकवाद के मुकाबले ज्यादा खतरनाक इसलिए है कि इसे स्थानीय सत्ताओं का राजनीतिक संरक्षण और प्रश्रय प्राप्त है। इसे राजनीति ने सत्ता की जरूरत का नया हथियार बना लिया है। इसका भयभीत करने वाला चेहरा एक ही देश के भीतर कई देशों का विकसित हो जाना है। इस खेल में उन अस्सी करोड़ लोगों की कोई भागीदारी नहीं है, जिन्हें राशन की कतारों में खड़ा कर दिया गया है, जो करोड़ों की तादाद में बेरोजग़ार हैं अथवा इलाज के अभाव में अस्पतालों की सीढिय़ों पर दम तोड़ रहे हैं।

प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द इकानमिस्ट‘ ने पिछले दिनों रूस के सम्बन्ध में प्रकाशित अपने एक अग्रलेख में कहा है कि लोगों का पेट जैसे-जैसे तंग होने लगता है, सरकारों के पास उन्हें देने के लिए राष्ट्रवाद और विषाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। अग्रलेख में यह भी कहा गया है कि जो सरकारें अपनी जनता के ख़िलाफ़ भय का इस्तेमाल करके शासन करती हैं, वे अंतत: खुद भी भय में ही रहने लगती हैं। लगभग पच्चीस करोड़ की आबादी वाले उत्तरप्रदेश में इस समय जो चल रहा है वह बताता है और इशारा भी करता है कि आपातकाल लगाने के लिए अब किसी औपचारिक घोषणा की जरूरत नहीं रहेगी।
उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा जारी एक अधिसूचना के अनुसार अब राज्य के किसी भी व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति और वारंट के गिरफ़्तार किया जा सकेगा। बिना सरकार की इजाज़त के कोर्ट भी ऐसी कार्रवाई करने वाले किसी अधिकारी के खिलाफ संज्ञान नहीं ले सकेगा। माना जा सकता है कि आगे या पीछे और सरकारें भी उत्तर प्रदेश से प्रेरणा ले सकती हैं। क्योंकि जो चिंताएँ देश की सबसे अधिक आबादी वाले राज्य की हो सकती हैं, वे और प्रदेशों की भी तो हो सकती हैं। सवाल यह है कि उत्तरप्रदेश की इस ‘व्यवस्था’ को नागरिकों के सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया कदम माना जाए या फिर किसी अन्य आशंका और अज्ञात भय की दृष्टि से देखा जाना चाहिए ?

मेरे पिछले आलेख (‘कोरोना पर भारी पड़ गई कंगना’) को लेकर कई मित्रों की जो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं हैं, उनमें केवल दो का उल्लेख करना चाहूँगा। दोनों के सवाल एक जैसे ही हैं।ग्वालियर के कवि-मित्र पवन करण ने कहा-‘दुखद है। क्या किया जाए!’ और शिवपुरी के डॉ. महेंद्र अग्रवाल की प्रतिक्रिया है कि सही कहा, पर क्या होगा ?’ सवाल जायज़ हैं और हरेक व्यक्ति जानना भी चाहता है कि परिस्थितियों के प्रति मन में क्षोभ हो और अहिंसक तरीकों से भी नाराजगी को ज़ाहिर करने के खिलाफ सडक़ों पर अवरोध खड़े कर दिए जाएँ तो फिर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवेदनशील नागरिकों को क्या करना चाहिए? (हमें यह जानकर थोड़ा आश्चर्य हो सकता है कि दुनिया के कोई एक चौथाई से ज़्यादा यानी साठ देशों में इस समय नागरिक अपनी माँगों अथवा सरकारों के कामकाज के खिलाफ सडक़ों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इनमें तानाशाही हुकूमतें भी शामिल हैं। अमेरिका के तो सभी राज्यों में 25 मई के बाद से ऐसा हो रहा है।)

महात्मा गांधी ने वैसे तो अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रतिकार के कई रास्ते बताए हैं, पर उनका पालन हमारे लिए कठिन है। दूसरा यह कि इस समय हमारे पास गांधीजी जैसा कोई व्यक्तित्व भी नहीं है। अब यह भी संभव नहीं कि केवल एक या कुछ व्यक्ति ही बोलते रहें और बाकी मौन रहें। सरकारों को सुविधाजनक लगता है कि कुछ लोग विरोध करते रहें और बाक़ी खामोशी ओढ़े रहें। इससे दुनिया में भी संदेश चला जाता है कि देश में बोलने पर कोई पाबंदी नहीं है और कहीं कुछ बदलता भी नहीं।

प्रतिष्ठापूर्ण नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त करने वाली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने शांतिपूर्ण प्रतिकारों के क्षेत्र में कई तरीके ईजाद किए हैं। ये तरीके अधिनायकवादी हुकूमतों पर भी असर डालते हैं और लोकतांत्रिक सरकारों को भी जवाब देने के लिए बाध्य करते हैं। एमनेस्टी की पहल पर कई देशों में जेलों में बंद सत्ता-विरोधी लोग रिहा हुए हैं और मौत की सजाएँ भी रद्द हुई हैं। एमनेस्टी के काम करने के कई और तरीकों में एक यह भी है कि वह नागरिकों को प्रेरित करती है कि व्यवस्थाओं के प्रति अपना प्रतिरोध व्यक्त करने के लिए वे शासन-प्रमुखों के नाम  चिट्ठियां और मेल लिखें या अन्य साधनों से संदेश प्रेषित करें।

हमारे यहाँ तो सवाल उन कतिपय मीडिया संस्थानों का भी है, जो राष्ट्रीय स्तर पर अराजकता फैला रहे हैं। नागरिक चाहें तो यह काम लगातार कर सकते हैं और ऐसे सभी लोगों, संस्थाओं और शासन में बैठे जि़म्मेदार व्यक्तियों को अपने विरोध और असहमति से अवगत करा सकते हैं, जिन्होंने लोकतंत्र को एक मजाक बनाकर रख दिया है। नागरिकों में अगर किसी भी तरह का विरोध या असहमति व्यक्त करने का साहस ही नहीं बचा है तो फिर उन्हें जो कुछ चल रहा है, उसे चुपचाप स्वीकार करते रहना चाहिए। अभी ऐसा ही हो रहा है कि गिने-चुने लोग ही बोल रहे हैं और बहुसंख्या में मौन। 


12-Sep-2020 2:12 PM

-श्रवण गर्ग
पटना और मुंबई के बीच सत्रह सौ किलो मीटर की जितनी दूरी है लगभग उतनी ही शिमला और मुंबई के बीच भी है। दोनों ही राज्यों में इस समय एक ही पार्टी के दबदबे वाली हुकूमतें भी हैं। बिहार और हिमाचल दोनों का मौसम और मिजाज अलग-अलग किस्म का है पर राजनीतिक जरूरतों ने दोनों की आत्माओं को एक कर दिया है। एक राज्य की सरकार को चुनाव जीतने के लिए अपने सितारा बेटे की मौत का इंसाफ चाहिए और दूसरे ने अपनी सितारा बेटी के सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठा ली है। उधर मुंबई में भी एक सितारा बेटी की जिंदगी दांव पर लगी हुई है और एक राजनीतिक मराठा बेटे ने महाराष्ट्र के गौरव की रक्षा करने का दायित्व अपनी तलवार की धार पर धारण कर लिया है। चूँकि दोनों ही सितारा बेटियाँ बॉलीवुड से जुड़ी हुई हैं, फिल्मी हस्तियों की जिंदगियों से जुड़े तमाम अंतर्वस्त्रों को फिल्मी नगरी की सडक़ों पर पताकाओं की तरह लहराया जा रहा है।
दूसरी ओर, अपनी टीआरपी को हर कीमत पर बढ़ाने में जुटा मीडिया इन दृश्यों को बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के नशे की गोलियों की तरह बेच रहा है। इस काम में भी कुछ ख्याति प्राप्त ‘बेटियाँ’ भी सितारा वस्त्रों को मार्केट की जरूरत के मुताबिक ठीक से धोकर टीवी स्क्रीन के रंगीन पर्दों पर सुखाने में मदद कर रही हैं।चैनलों पर चल रही ‘मीडिया ट्रायल’ के नशे में खोए हुए देश की कोई एक चौथाई आबादी ने तलाश करना बंद कर दिया है कि कोरोना के  ‘वैक्सीन की ट्रायल’ की ताज़ा स्थिति क्या है ! मुंबई में महामारी के दस लाख के आँकड़े और तीस हज़ार को छूने जा रही मौतों के बीच रंगीन खबरों के जो 24@7 रक्तहीन विस्फोट हो रहे हैं उन्हें देश में प्रशिक्षित दस्ते ही अंजाम दे रहे हैं और उनके असली हैंडलर्स कौन हैं किसी को भी आधिकारिक जानकारी नहीं है।

देश के नागरिक कथित तौर पर चीन के द्वारा निर्यात की गई कोरोना की महामारी का मुक़ाबला करने में तो आत्मनिर्भर हो सकते हैं और ‘भगवान’ के कोप के कारण अवतरित हुए आर्थिक संकट के खिलाफ भी भूखे पेट पर पवित्र शिलाएँ बांध सकते हैं ,पर उस मानव-निर्मित त्रासदी का मुकाबला नहीं कर सकते जिससे कि वे इस समय मुखातिब हैं।एक ऐसी त्रासदी जिसे प्रांतवाद के नाम पर ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ के मार्फत अंजाम दिया जा रहा है। इसमें खरीदने का कोई काम ही नहीं है, सबकुछ बेचा ही जाना है। अब तक कहा जाता रहा है कि प्यार में सबकुछ जायज है ,पर इस समय जो नाजायज है सिर्फ उसे ही ढूँढा जा रहा है। ताजा घटनाक्रम की किरदार सभी हस्तियों के मामले में यही हो रहा है। कहना मुश्किल है कि आज अगर सुशांत सिंह जीवित होते तो चुनावी पोस्टरों के लिए किसके चेहरे को ढूँढा जाता और अगर बाला साहब ‘मातोश्री’ की अपनी शानदार कुर्सी पर बिराजे हुए होते तो क्या शिव सेना में ‘आ कंगना मुझे मार’ जैसा कुछ भी संभव हो पाता ?

महामारी और बेरोजगारी से जूझ रही देश की औद्योगिक और वित्तीय राजधानी को अपने संकट से उबरने के लिए शिव सेना किसी सोनू सूद से भी मदद की माँग नहीं कर सकती।उन्हें भी पहले ही हडक़ाया जा चुका है। ‘महाराष्ट्र किसी के बाप का नहीं’ कंगना के कहने के कारण नहीं बल्कि अब इसलिए लगने लगा है कि इतने बड़े राज्य का कोई ‘माई-बाप’ ही नहीं बचा लगता है। कोरोना संकट से अपने आपको सफलता पूर्वक बचा लेने वाले धारावी के भले रहवासी भी शायद ऐसा सोचते होंगे कि एक नई और बड़ी संभ्रांत झोपड़ पट्टी का निर्माण उनके इलाकै के बाहर महानगर में हो रहा है।

क्या विडम्बना है कि संसद की बैठकों के ‘प्रश्न काल ‘को भी कोरोना का संक्रमण हो गया है और किसी को भी उसके इलाज की नहीं पड़ी है। सारे ‘प्रश्न’ केवल एक ही आदमी सडक़ों पर उठा रहा है जिसे उस मीडिया ने राजनीतिक ताश की गड्डी का ‘पप्पू’ बना रखा है जो कंगना के दफ्तर के बाहर खड़े होकर एक पोस्टमैन से सवाल पूछ रहा है कि बीएमसी के द्वारा ‘मणिकर्णिका’ के कि़ले में तोडफ़ोड़ क्यों की गई? कभी कोई ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो जाए कि थोड़े लम्बे समय के लिए राष्ट्रीय पावर ग्रिड में ‘ब्रेक डाउन ‘ हो जाए या फिर युद्ध की परिस्थितियों का अभ्यास करने के लिए ‘ब्लैक आउट’ लागू करना पड़ जाए तो पता नहीं कितनी बड़ी आबादी पागल होकर सडक़ों पर थालियाँ कूटने लगेगी !

देश का पूरा ध्यान एक अभूतपूर्व संकट से सफलतापूर्वक भटका दिया गया है। चालीस सालों में पहली बार इतना बड़ा आर्थिक संकट, करोड़ों लोगों की बेरोजगारी, महामारी से प्रतिदिन संक्रमित होने वालों के आँकड़ों में दुनिया में नंबरवन बन जाना, चीन द्वारा सीमा पर चार महीनों से दादागीरी के साथ लगातार अतिक्रमण और जानकारी के नाम पर सरकार द्वारा देशवासियों को झूला-झूलाते रहना सब कुछ धैर्यपूर्वक बर्दाश्त किया जा रहा है। हमें बिल्कुल भी डरने नहीं दिया रहा है कि हर महीने कोई सोलह हजार लोग कोरोना की भेंट चढ़ रहे हैं।

कथित तौर पर अवसाद और नशे की लत में पड़े एक सुदर्शन अभिनेता की मौत सरकारों को तो हिला देती है पर लॉकडाउन से उपजे अभावों और बेरोजगारी से पैदा हुए अवसाद के कारण हुई सैंकड़ों आत्महत्याओं की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। मैंने दक्षिण भारत के चार राज्यों-आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में अपने पत्रकार मित्रों से बात की तो पता चला कि सुशांत-रिया-कंगना को लेकर वहाँ खबरों का कोई नशा नहीं बिक रहा है। वहाँ सरकारें और लोग अपनी दूसरी समस्याओं को लेकर चिंतित हैं। इसे हिंदी (मराठी भी) भाषी राज्यों का दुर्भाग्य ही माना जाना चाहिए कि एक ऐसे समय जबकि अधिकतर इलाकों में महामारी के साथ-साथ वर्षा और बाढ़ के कारण उत्पन्न हुई कठिनाइयों के घने बादल छाए हुए हैं, हमारा राजनीतिक नेतृत्व मीडिया के एक वर्ग की मदद से पापड़-बड़ी बनाकर सडक़ों पर सुखा रहा है। वह थोड़ी सी जनता जो इस तमाशे का हिस्सा नहीं है इसी कशमकश में है कि जो कुछ चल रहा है उसके लिए खुद शर्मिंदगी महसूस करे या उन्हें शर्मिंदा करने के अहिंसक और शांतिपूर्ण उपाय तलाशे जो इस दुरावस्था के असली जिम्मेदार हैं !


08-Sep-2020 11:38 AM

-श्रवण गर्ग

आज से केवल छप्पन दिनों के बाद भारत सहित पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली घटना के परिणामों को लेकर अब हमें भी प्रतीक्षा करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इस बात पर दु:ख व्यक्त किया जा सकता है कि मीडिया ने एक महत्वपूर्ण समय में जनता का पूरा ध्यान जान बूझकर गैरजरूरी विषयों की तरफ़ लगा रखा है। इस बातचीत का सम्बंध अमेरिका में तीन नवम्बर को महामारी के बीच एक युद्ध की तरह सम्पन्न होने जा रहे राष्ट्रपति पद के चुनावों और जो कुछ चल रहा है उसके साथ नत्थी हमारे भी भविष्य से है।

पिछले सितम्बर की ही बात है। अपनी सात-दिवसीय अमेरिका यात्रा के दौरान ह्यूस्टन में आयोजित भव्य ‘हाउडी मोदी’ रैली में वहाँ के सभी राज्यों से पहुँचे कोई पचास हज़ार लोगों की उपस्थिति से अभिभूत होकर प्रधानमंत्री मोदी ने दस भारतीय भाषाओं में उस देश में बसने वाले भारतीय मूल के लगभग पचास लाख नागरिकों को आश्वस्त किया था कि वे क़तई चिंतित नहीं हों। भारत में सब कुछ ठीक चल रहा है। ‘ऑल इज वेल।’ (देश के एक सौ तीस करोड़ नागरिक ही अब अपने सीने पर हाथ रखकर इस ऑल इज़ वेल’ की हक़ीक़त बता सकते हैं)। पर यहाँ हमारी बातचीत का सम्बंध किसी और विषय से है :
भारत के प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन की रैली में अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति में जो एक और ज़बरदस्त बात कही वह यह थी कि : ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार।’ रैली में उपस्थित लोगों ने जोरदार ध्वनि के साथ मोदी के नारे का स्वागत किया था। मोदी और ट्रम्प दोनों ही ने तब नहीं सोचा होगा कि साल भर से कम वक्त में दोनों देशों की तस्वीरें इस तरह से बदल जाएँगी ! अमरीकियों के साथ-साथ ही भारतीय मूल के लाखों नागरिक अपने अब तक के सबसे बड़े धर्म संकट में हैं कि ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ होना चाहिए या नहीं !

बताने की ज़रूरत नहीं कि भारतीय मूल के लोगों का फ़ैसला अमेरिकी चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है। ट्रम्प और उनके प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रैट जो बायडन दोनों ही भारतीयों को रिझाने में लगे हुए हैं। बायडन ने तो भारतीय मूल की माँ की अश्वेत संतान कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया है। उद्देश्य ट्रम्प से नाराज़ अश्वेत नागरिकों और भारतीय मूल के लोगों दोनों को ही अपने पक्ष में लेना है। मुद्दा यह है कि इस बार के अमेरिकी चुनावों में दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है और वहाँ भी परिस्थितियाँ लगभग वैसी ही हैं जैसी कि भारत में हैं। इसे महज़ संयोग ही माना जा सकता है कि चुनावों के ठीक पहले सार्वजनिक हुए व्हाइट हाउस के टेप्स में पूर्व रिपब्लिकन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को अत्यंत ज़हरीले अन्दाज़ में यह कहते हुए बताया गया है कि भारतीय महिलाएँ दुनिया में सबसे अधिक अनाकर्षक हैं। भारतीय महिलाओं की सेक्स सम्बन्धी क्षमताओं पर भी उन्होंने घटिया टिप्पणी की है। भारत के सपनों के अमेरिका को इस समय जिन कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा है उसकी पूरी जानकारी हमें प्राप्त नहीं हो रही है। वहाँ अब संकट सिर्फ़ कोरोना संक्रमण के बढ़ते हुए आँकड़ों या मौतों तक सीमित नहीं रह गया है। वहाँ की सडक़ों पर कई महीनों से हिंसा की घटनाएँ हो रही हैं। सरकार के खिलाफ़ ज़बरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस पर पक्षपातपूर्ण नस्लवादी हिंसा के आरोप लगाए जा रहे हैं (जैसा कि हमारे यहाँ भी होता है !)। आरोप हैं कि वहाँ नस्लवादी भेदभाव को सरकार का समर्थन प्राप्त है। अमेरिकी समाज इस समय दो फाड़ नजऱ आ रहा है। खऱाब आर्थिक स्थिति, बेरोजग़ारी की समस्याएँ अलग से हैं। चुनाव तय करने वाले हैं कि चमड़ी के रंग के आधार पर पनप रहे नस्लवाद और अल्पसंख्यकों (अश्वेतों) के समान अधिकारों को लेकर अमेरिकी समाज का क्या रुख है? ट्रम्प की पार्टी को सवर्णों (गोरी चमड़ी वालों) की समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि ट्रम्प की सत्ता में वापसी अमेरिका में लोकतंत्र को समाप्त कर देगी। यह भी आरोप है कि ट्रम्प अमेरिका को पुतिन के रूस की तरह चलना चाहते हैं। और यह भी कि पिछली बार की तरह ही रूस इस बार भी वहाँ हस्तक्षेप करेगा।

अमेरिका के चुनावी नतीजे न सिर्फ़ दुनिया में भविष्य के व्यापार की दिशा, सैन्य समझौते, लड़ाइयाँ और उनमें होने वाली मौतों, शांति वार्ताओं और समझौतों को तय करते हैं बल्कि उन हुकूमतों को भी प्रभावित करते हैं जहां किसी न किसी तरह का लोकतंत्र अभी क़ायम है। भारत की समस्याएँ भी वे ही सब हैं जो अमेरिका में हैं। अमेरिकी सवर्णों के पक्षधर नस्लवाद को लेकर जो आरोप ट्रम्प के खिलाफ़ हैं वही हमारे यहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यकों को लेकर भाजपा सरकार के विरुद्ध भी हैं। वहाँ जैसा ही विभाजन यहाँ भी है। यहाँ भी सरकार की मूल ताक़त बहुसंख्यक समुदाय ही है।भारत के समझदार नागरिक कमला हैरिस की उम्मीदवारी को लेकर तो गर्व महसूस कर रहे हैं पर वहाँ के चुनाव परिणामों के भारत के लोकतंत्र पर पड़ सकने वाले प्रभावों से पूरी तरह बेख़बर हैं। ट्रम्प अगर दावा कर रहे हैं कि ; ‘मोदी मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं ,भारतीय-अमेरिकी मेरे लिए वोट करेंगे’ तो हो सकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस प्रतीक्षा में भी हों कि प्रधानमंत्री उनके पक्ष में ह्यूस्टन रैली जैसी कोई अपील एक बार फिर से कर देंगे।

ओपीनियन पोल्स में बताया जा रहा है कि जो बायडन राष्ट्रपति ट्रम्प से आगे हैं पर यह छलावा और भुलावा भी साबित हो सकता है। कोई चमत्कार ही ट्रम्प को हरा सकता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे के लिए अगर दो अवधि की संवैधानिक बाध्यता नहीं हो (जैसी कि स्थिति हमारे यहाँ है) तो ट्रम्प भी पुतिन की तरह ही राज करने की क्षमता रखते हैं। अमेरिकी सडक़ों पर हिंसा जितनी बढ़ती जाएगी, मतदाता ट्रम्प की वापसी के पक्ष में बढ़ते जाएँगे। शाहीन बाग का अनुभव हम याद कर सकते हैं कि किस तरह से धरने पर बैठी महिलाओं की लड़ाई से हमदर्दी रखने वाले मुस्लिम नेता बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे और यह आरोप भी लगे कि समूचा विरोध-प्रदर्शन सत्तारूढ़ दल द्वारा ही प्रायोजित था। यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिए कि सरकारें अपनी जनता को वास्तव में ही जागरूक देखना चाहती हैं। सरकारों की कल्पना के लोकतंत्रों की हिफाजत के लिए तो जनता को लम्बे समय तक मूर्ख बनाए रखना बेहद जरूरी है और यह काम वे उन्हीं तत्वों की मदद से कर सकतीं हैं जिनके जिम्मे नागरिकों को सही जानकारी देने का काम है।


02-Sep-2020 12:01 PM

-श्रवण गर्ग

बहस का विषय इस समय यह है कि वकील प्रशांत भूषण अगर अपने आपको वास्तव में ही निर्दोष मानते हैं तो उन्हें बजाय एक रुपए का जुर्माना भरने के क्या तीन महीने का कारावास नहीं स्वीकार कर लेना चाहिए था? सवाल बहुत ही वाजिब है। पूछा ही जाना चाहिए। प्रशांत भूषण ने भी अपनी अंतरात्मा से पूछकर ही तय किया होगा कि जुर्माना भरना ठीक होगा या जेल जाना ! प्रशांत भूषण के ट्वीटर अकाउंट पर सत्रह लाख फालोअर्स के मुकाबले एक सौ सत्तर लाख से अधिक फालोअर्स की हैसियत रखने वाले ‘चरित्र’ अभिनेता अनुपम खेर ने भी अपना सवाल ट्वीटर पर ही उठाया है :’एक रुपया दाम बंदे का ! और वह भी उसने अपने वकील से लिया !! जय हो !! ’। निश्चित ही लाखों लोग अब इसी तरह के सवाल प्रशांत भूषण से पूछते ही रहेंगे और उनका जीवन भर पीछा भी नहीं छोड़ेंगे। वे अगर चाहते तो जुर्माने या सजा पर कोई अंतिम फैसला लेने से पहले पंद्रह सितम्बर तक की अवधि खत्म होने तक की प्रतीक्षा कर सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। हो सकता है वे न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के सेवा निवृत होने के पूर्व ही प्रकरण को समाप्त करना चाह रहे हों !

मैंने अपने हाल ही के एक आलेख (‘प्रशांत भूषण को सजा मिलनी ही चाहिए और वे उसे स्वीकार भी करें’) में गांधीजी से सम्बंधित जिस प्रसंग का उदाहरण दिया था उसे ताजा संदर्भ में दोहरा रहा हूँ। वर्ष 1922 में अंग्रेजों के खिलाफ अपने समाचार पत्र ‘यंग इंडिया’ में लेखन के आरोप में (तब ट्वीटर की कोई सुविधा नहीं थी) गांधीजी को अहमदाबाद स्थित उनके साबरमती आश्रम से गिरफ्तार करने के बाद छह वर्ष की सजा हुई थी। गांधीजी तब आज के प्रशांत भूषण से ग्यारह वर्ष कम उम्र के थे। कहने की जरूरत नहीं कि वे तब तक एक बहुत बड़े वकील भी बन चुके थे। हम इस कठिन समय में न तो प्रशांत भूषण से गांधीजी जैसा महात्मा बन जाने या किसी अनुपम खेर से प्रशांत भूषण जैसा व्यक्ति बन जाने की उम्मीद कर सकते हैं। गांधीजी पर आरोप था कि वे विधि के द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ घृणा उत्पन्न करने अथवा असंतोष फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। अब इसी आरोप को प्रशांत भूषण के खिलाफ उनके द्वारा की गई सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के संदर्भ में भी पढ़ सकते हैं। गांधी जी ने अपने ऊपर लगे आरोपों और अंग्रेज जज द्वारा दी गई छह वर्ष की सजा को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया था।

प्रशांत भूषण को अगर सजा सिर्फ इतने तक सीमित रहती कि या तो वे एक रुपए का जुर्माना भरें या तीन महीने की जेल काटें तो निश्चित रूप से वे कारावास को प्राथमिकता देना चाहते। पर अदालत ने (कानून की व्याख्या और बार कौंसिल ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए) जैसा कि कहा है प्रशांत भूषण अगर जुर्माना नहीं भरते हैं तो उन्हें तीन महीने की जेल के साथ ही तीन वर्ष के लिए वकालत करने पर प्रतिबंध भी भुगतना पड़ेगा। बातचीत का यहाँ मुद्दा यह है कि अंग्रेज जज एन. बू्रफफील्ड अगर गांधीजी की सजा के साथ यह भी जोड़ देते कि वे सजा के छह वर्षों तक सरकार के खिलाफ किसी भी प्रकार का लेखन कार्य भी नहीं करेंगे तो फिर महात्मा क्या करते?

क्या यह न्यायसंगत नहीं होगा कि प्रशांत भूषण द्वारा एक रुपए का जुर्माना भरकर मुक्त होने के मुद्दे को करोड़ों लोगों की ओर से जनहित के मामलों में सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने से तीन वर्षों के लिए वंचित हो जाने की पीड़ा भुगतने से बच जाने के रूप में लिया जाए? अनुपम खेर या उनके जैसे तमाम लोग इस मर्म को इसलिए नहीं समझ पाएँगे कि प्रशांत भूषण किसी फिल्मी अदालत में ‘अपने निर्देशकों’ द्वारा पढ़ाई गई स्क्रिप्ट नहीं बोलते। और न ही जनहित से जुड़ी किसी कहानी में भी स्क्रिप्ट की माँग के अनुसार नायक और खलनायक दोनों की ही भूमिकाएँ स्वीकार करने को तैयार बैठे रहते हैं।

प्रशांत भूषण का पूरे विवाद से सम्मानपूर्वक बाहर निकलना इसलिए जरूरी था कि नागरिकों की जिंदगी और उनके अधिकारों से जुड़े कई बड़े काम सुप्रीम कोर्ट से बाहर भी उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। बिना किसी अपराध के जेलों में बंद लोगों को इस समय उनकी कानूनी सहायता और सांत्वना की सख्त जरूरत है, जो कि ट्वीटर हैंडल पर उनके खिलाफ ट्रोल करने वाले कभी प्रदान नहीं कर सकते।साथ ही इसलिए भी जरूरी था कि अब प्रशांत भूषण उन तमाम लोगों का अदालतों में बचाव कर सकेंगे, जो अपने सत्ता-विरोधी आलोचनात्मक ट्वीट्स या लेखन के कारण अवमाननाओं के आरोप झेल सकते हैं।

जिस तरह की परिस्थितियाँ इस समय देश में है उसमें तीन साल तक एक ईमानदार वकील के मुँह पर ताला लग जाना यथा-स्थितिवाद विरोधी कई निर्दोष लोगों के लिए लम्बी सजाओं का इंतजाम कर सकता था। किन्ही दो-चार लोगों के आत्मीय सहारे के बिना तो केवल वे ही सुरक्षित रह सकते हैं, जो शासन-प्रशासन की खिदमत में हर वक्त हाजिर रहते हैं। प्रशांत भूषण को अगर जुर्माने और सजा के बीच फैसला करते वक्त अपनी अंतरात्मा के साथ किंचित समझौता करना पड़ा हो तो भी उन्होंने करोड़ों लोगों की आत्माओं को अब और ज़्यादा आजादी के साथ साँस लेने की स्वतंत्रता तो उपलब्ध करा ही दी है। क्या हमारे लिए इतनी उपलब्धि भी पर्याप्त नहीं है?


31-Aug-2020 5:30 PM

-श्रवण गर्ग

देश में इस समय सोशल मीडिया प्लेटफाम्र्स-फेसबुक और व्हाट्सएप-आदि पर नागरिकों के जीवन में कथित तौर पर घृणा फैलाने और सत्ता-समर्थक शक्तियों से साँठ-गाँठ करके लोकतंत्र को कमजोर करने सम्बन्धी आरोपों को लेकर बहस भी चल रही है और चिंता भी व्यक्त की जा रही हैं। पर बात की शुरुआत किसी और देश में सोशल मीडिया की भूमिका से करते हैं :

खबर हमसे ज़्यादा दूर नहीं और लगभग एकतंत्रीय शासन व्यवस्था वाले देश कम्बोडिया से जुड़ी है। प्रसिद्ध अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाईम्स’ की वेबसाइट द्वारा जारी इस खबर का सम्बंध एक बौद्ध भिक्षु लुओन सोवाथ से है, जिन्होंने अपने जीवन के कई दशक कम्बोडियाई नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा की लड़ाई में गुजार दिए थे। अचानक ही सरकार समर्थक कर्मचारियों की मदद से बौद्ध भिक्षु के जीवन के संबंध में फेसबुक के पेजों पर अश्लील किस्म के वीडियो पोस्ट कर दिए गए और उनके चरित्र को लेकर घृणित मीडिया मुहीम देश में चलने लगी। उसके बाद सरकारी नियंत्रण वाली एक परिषद द्वारा बौद्ध धर्म में वर्णित ब्रह्मचर्य के अनुशासन के नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में लुओन सोवाथ को बौद्ध भिक्षु की पदवी से वंचित कर दिया गया। उनके खिलाफ इस प्रकार से दुष्प्रचार किया गया कि उन्होंने गिरफ्तारी की आशंका से कहीं और शरण लेने के लिए चुपचाप देश ही छोड़ दिया। सब कुछ केवल चार दिनों में हो गया।

फेस बुक सरीखे सोशल मीडिया प्लेटफार्म के राजनीतिक दुरुपयोग को लेकर तमाम प्रजातांत्रिक व्यवस्थाओं में जो चिंता जाहिर की जा रही है, उसका कम्बोडिया केवल छोटा सा उदाहरण है।हम अपने यहाँ अभी केवल इतने खुलासे भर से ही घबरा गए हैं कि एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर साम्प्रदायिक वैमनस्य उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रसारित की जा रही पोस्ट्स को किस तरह बिना किसी नियंत्रण के प्रोत्साहित किया जाता है। अभी यह पता चलना शेष है कि देश की प्रजातांत्रिक सम्पन्नता को एक छद्म एकतंत्र की आदत में बदल देने के काम में मीडिया और सोशल मीडिया के संगठित गिरोह कितनी गहराई तक सक्रिय हैं।

कोरोना ने नागरिकों की जीवन पद्धति में सरकारों की सेंधमारी के लिए अधिकृत रूप से दरवाज़े खोल दिए हैं और इस काम में सोशल मीडिया का दुनिया भर में ज़बरदस्त तरीक़े से उपयोग-दुरुपयोग किया जा रहा है। महामारी के इलाज का कोई सार्थक और अत्यंत ही विश्वसनीय वैक्सीन नहीं खोज पाने या उसमें विलम्ब होने का एक अन्य पहलू भी है ! अलावा इसके कि महामारी का दुश्चक्र लगातार व्यापक होता जाएगा और संक्रमण के साथ-साथ मरनेवालों की संख्या बढ़ती जाएगी, नागरिक अब अधिक से अधिक तादाद में अपने जीवन-यापन के लिए सरकारों की कृपा पर निर्भर होते जाएँगे। पर इसके बदले में उन्हें ‘अवैध’ रूप से जमा किए गए हथियारों की तरह अपने ‘वैध’ अधिकारों का ही समर्पण करना पड़ेगा।

सरकारें अगर इस तरह की भयंकर आपातकालीन परिस्थितयों में भी अपने राजनीतिक आत्मविश्वास और अर्थव्यवस्थाओं को चरमराकर बिखरने से बचाने में कामयाब हो जातीं हैं, तो माना जाना चाहिए कि उन्होंने एक महामारी में भी अपनी सत्ताओं को मजबूत करने के अवसर तलाश लिए हैं। चीन के बारे में ऐसा ही कहा जा रहा है। महामारी ने चीन के राष्ट्राध्यक्ष को और ज़्यादा ताकतवर बना दिया है। रूस में भी ऐसी ही स्थिति है। दोनों ही देशों में सभी तरह का मीडिया इस काम में उनकी मदद कर रहा है। रूस में तो पुतिन के धुर विरोधी नेता नेवेल्नी को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया का जबरदस्त तरीके से उपयोग किया गया। रूस के बारे में तो यह भी सर्वज्ञात है कि उसने ट्रम्प को पिछली बार विजयी बनाने के लिए फेसबुक का किस तरह से राजनीतिक इस्तेमाल किया था।

नागरिकों को धीमे-धीमे फैलने वाले जहर की तरह इस बात का कभी पता ही नहीं चल पाता है कि जिस सोशल मीडिया का उपयोग वे नागरिक आजादी के सबसे प्रभावी और अहिंसक हथियार के रूप में कर रहे थे वही देखते-देखते एकतंत्रीय व्यवस्थाओं के समर्थक के विकल्प के रूप में अपनी भूमिका-परिवर्तित कर लेता है। (उल्लेखनीय है कि महामारी के दौर में जब दुनिया के तमाम उद्योग-धंधों में मंदी छाई हुई है, सोशल मीडिया संस्थानों के मुनाफे जबरदस्त तरीक़े से बढ़ गए हैं। अख़बारों में प्रकाशित खबरों पर यक़ीन किया जाए तो चालीस करोड़ भारतीय व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं। अब व्हाट्सएप चाहता है कि उसके पैसों का भुगतान किया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार की स्वीकृति चाहिए। इसीलिए  व्हाट्सएप की नब्ज पर भाजपा की पकड़ है।)

ऊपर उल्लेखित भूमिका का सम्बंध अफ्रीका के डेढ़ करोड़ की आबादी वाले उस छोटे से देश ट्यूनिशिया से है, जो एक दशक पूर्व सारी दुनिया में चर्चित हो गया था। सोशल मीडिया के कारण उत्पन्न अहिंसक जन-क्रांति ने वहाँ न सिर्फ लोकतंत्र की स्थापना की बल्कि मिस्र सहित कई अन्य देशों के नागरिकों को भी प्रेरित किया। ट्यूनिशिया में अब कैसी स्थिति है? बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, खऱाब अर्थव्यवस्था के चलते लोग देश में तानाशाही व्यवस्था की वापसी की कामना कर रहे हैं। वहाँ की वर्तमान व्यवस्था ने उन्हें लोकतंत्र से थका दिया है। ट्यूनिशिया के नागरिकों की मनोदशा का विश्लेषण यही हो सकता है कि जिस सोशल मीडिया ने उन्हें ‘अरब क्रांति’ का जन्मदाता बनने के लिए प्रेरित किया था वही अब उन्हें तानाशाही की ओर धकेलने के लिए भी प्रेरित कर रहा होगा या इसके विपरित चाहने के लिए प्रोत्साहित भी नहीं कर रहा होगा।

नागरिकों को अगर पूरे ही समय उनके आर्थिक अभावों, व्याप्त भ्रष्टाचार और जीवन जीने के उपायों से ही लड़ते रहने के लिए बाध्य कर दिया जाए और सोशल मीडिया के अधिष्ठाता अपने मुनाफे के लिए राजनीतिक सत्ताओं से साँठ-गाँठ कर लें तो उन्हें (लोगों को) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं, मानवाधिकार और संवैधानिक संस्थाओं का स्वेच्छा से त्याग कर एकाधिकारवादी सत्ताओं का समर्थन करने के लिए अहिंसक तरीकों से भी राजी-खुशी मनाया जा सकता है। और ऐसा हो भी रहा है !


28-Aug-2020 8:41 AM

-श्रवण गर्ग 

संकट की इस घड़ी में हम मीडिया के लोग अपने ही आईनों में अपने ही हर घड़ी बदलते नक़ली चेहरों को देख रहे हैं. किसी क्षण अपनी उपलब्धियों पर तालियाँ ठोकते हैं और अगले ही पल छातियाँ पीटते नज़र आते हैं ! इस पर अब कोई विवाद नहीं रहा है कि मीडिया चाहे तो देश को अनचाहे युद्ध के लिए तैयार कर सकता है या फिर किसी समुदाय विशेष के प्रति प्रायोजित तरीक़े से नफ़रत भी फ़ेला सकता है. किसी अपराधी को स्वच्छ छवि के साथ प्रस्तुत कर सकता है और निरपराधियों को मुजरिम बनवा सकता है. 

मीडिया की इस विशेषज्ञता को लेकर विदेशों में किताबें/उपन्यास लिखे जा चुके हैं जिनमें बताया गया है कि प्रतिस्पर्धियों से मुक़ाबले के लिए बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों के द्वारा किस तरह से अपराध की घटनाएँ स्वयं के द्वारा प्रायोजित कर उन्हें अपनी एक्सक्लूसिव ख़बरों के तौर पर पेश किया जाता है. ताज़ा संदर्भ एक फ़िल्मी नायक की मौत को लेकर है. चैनलों के कुछ दस्ते युद्ध जैसी तैयारी के साथ नायक की महिला मित्र और कथित प्रेमिका को मौत के पीछे की मुख्य खलनायिका घोषित करने का तय करके सुबूत जुटाने लगते हैं. कोई ढाई महीनों तक वे इस काम में लगे रहते हैं. अपनी समूची पत्रकारिता की ईमानदारी को दाव पर लगा देते हैं. देश के चौबीस करोड़ दर्शक उनके कहे पर यक़ीन करने लगते हैं. अचानक से उन्हीं चैनलों में किन्हीं एक-दो के ‘अबतक’ मौन चेहरों का ज़मीर जागता है या जगवाया जाता है और एक झटके में ‘खलनायिका’ ही ‘विक्टिम’ घोषित हो जाती है. करोड़ों दर्शक अपने सिर पीटने लगते हैं और कुछ आत्मग्लानि से कपड़े भी फाड़ने लगते हैं. 

मीडिया वही है पर घटनाक्रम के क्लायमेक्स पर पहुँचने के ठीक पहले वह अब दोनों तरफ़ की एक्सक्लूसिव ख़बरें परोसेगा और दोनों ही पक्षों की सहानुभूति भी बटोरेगा.दर्शक कभी समझ ही नहीं पाएगा कि मीडिया उसके ही द्वारा बिना किसी मुक़दमे के आरोपी और खलनायिका घोषित की जा चुकी और अब ‘विक्टिम’ स्थापित की जा रही महिला की विश्वसनीयता के लिए काम कर रहा है या स्वयं की विश्वसनीयता को बचाने में जुट गया है. दर्शक यह भी समझ नहीं पाएँगे कि इनमें अपने पेशे के प्रति ईमानदार कौन हैं और कौन बेईमान ?आरुषि हत्याकांड के मीडिया कवरेज को याद किया जा सकता है. मीडिया की असली ताक़त को तो जो सत्ता में रहता है वही समझ सकता है.


23-Aug-2020 11:49 AM

-श्रवण गर्ग

प्रशांत भूषण को अगर कोई सजा मिलती है तो उसका स्वागत किया जाए या नहीं ? उन्हें जिस अवमानना का दोषी पाया गया है उसमें अधिकतम छह माह की क़ैद या जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है। यहाँ विषय क़ैद की अवधि अथवा जुर्माने की राशि का नहीं बल्कि अवमानना के मामले में किसी भी छोटी या बड़ी सजा के इतिहास में दर्ज होने और उस पर देश और दुनिया के नागरिकों की ओर से होने वाली प्रतिक्रिया का है। प्रशांत भूषण को सर्वोच्च न्यायालय ने विचार करने के लिए जो दो-तीन दिन का समय दिया था वह रविवार रात को समाप्त हो जाएगा। प्रशांत भूषण को अपने किए के प्रति न तो किसी प्रकार का पश्चाताप है और न ही सजा को लेकर वे किसी भी तरह के दया भाव की अपेक्षा कर रहे हैं। सवाल अब यह है कि नागरिकों की इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया है या होनी चाहिए?

देश के स्वतंत्रता दिवस के ठीक एक दिन पहले यानि कि चौदह अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय की तीन-सदस्यीय खंडपीठ द्वारा भूषण को उनके दो ट्वीट्स के लिए अवमानना का दोषी ठहराए जाने के बाद सजा का वे तमाम नागरिक निश्चित ही स्वागत करना चाहेंगे, जो न्यायपालिका की गरिमा को हर क़ीमत पर बनाए रखने के पक्षधर हैं, और उनके साथ वे लोग भी जो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के कारण भूषण जैसे लोगों के प्रति द्वेष का भाव रखते हैं। इनमें दोनों ही प्रमुख दलों के लोग भी शामिल माने जा सकते हैं। इन लोगों का मानना हो सकता है कि सजा के बाद न्यायपालिका जैसी संस्थाओं के प्रति अवमाननाओं के ‘दुस्साहस’ की घटनाओं में कमी आ जाएगी।

दूसरी ओर, इस बात में कोई आश्चर्य नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए कि वे तमाम नागरिक भी, जो संख्या में कम होते हुए भी भूषण जैसे गिने-चुने लोगों के समय-समय पर व्यक्त होने वाले अप्रतिम ‘साहस’ और विचारों के साथ आत्मीय भाव से जुड़े हुए हैं, अगर यही चाहते हों कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता के लिए अहिंसक संघर्ष में लगे इस व्यक्ति को प्राप्त होने वाली सजा एक पुरस्कार मानकर सम्मानपूर्वक स्वीकार कर लेना चाहिए। पर इस दूसरी तरह की ‘अल्पसंख्यक ‘जमात के इस तरह की कामना करने के कारण पहली तरह के नागरिकों से सर्वथा भिन्न हैं।

ये दूसरी तरह के नागरिक या तो संख्या में अब बहुत ही कम बचे हैं या फिर उन लोगों के ही वैचारिक उत्तराधिकारी हैं जो 25 जून 1975 की शाम दिल्ली के ऐतिहासिक राम लीला मैदान में उपस्थित थे और तिहत्तर-वर्षीय जयप्रकाश नारायण को उसी आवाज में बोलता हुआ सुन रहे थे जो वर्ष 1922 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के कंठ से उपजी थी। जे पी के साथ तब मंच पर मोरारजी देसाई के अलावा नानाजी देशमुख, मदन लाल खुराना और अन्य कई राष्ट्रीय नेता उपस्थित थे। इन सब लोगों को तब कोई अनुमान नहीं था कि कुछ ही घंटों के बाद और रात के ख़त्म होने के पहले देश की तकदीर बदलने वाली है।

जयप्रकाश नारायण तब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ए एन रे से अपील कर रहे थे कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ़ इंदिरा गांधी की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई नहीं करना चाहिए।’ वे ऐसा इसलिए नहीं कह रहे हैं कि उनकी निष्पक्षता के प्रति कोई अविश्वास है बल्कि इसलिए कि सरकार द्वारा अन्य तीन जजों की वरीयता को लांघकर उनका उक्त पद के लिए चयन किया गया है। अत: लोगों के मन में शंकाएँ उत्पन्न हो सकतीं हैं।’ जे पी ने अस्सी मिनट के इसी उद्बोधन में अपने उस कथन को भी दोहराया कि पुलिस, सेना के जवानों और सरकारी सेवकों को सरकार के ‘अवैध और अनैतिक’ आदेशों का पालन नहीं करना चाहिए। राम लीला मैदान पर उपस्थित हुए इस क्षण का साक्षी बनना किसी के लिए भी गौरव की बात हो सकती थी।मेरे लिए भी थी।

अपने ‘यंग इंडिया‘अख़बार में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ़ आलेख प्रकाशित करने के आरोप में मार्च 1922 में तब केवल तिरपन-वर्षीय महात्मा गांधी को अहमदाबाद स्थित उनके साबरमती आश्रम से गिरफ़्तार कर लिया गया था।उन पर आरोप लगाया गया कि वे क़ानून के द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ़ घृणा उत्पन्न करने अथवा अवमानना या असंतोष फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। अपने ऊपर लगाए गए आरोपों को स्वीकार करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि वे अदालत से दया की प्रार्थना नहीं करना चाहते हैं। वे किसी कम कठोर सजा की माँग भी नहीं करते हैं। वे यहाँ जो भी कठोरतम दंड हो सकता है उसे प्रसन्नतापूर्वक अपने उस कार्य के परिणामस्वरूप स्वीकार करने के लिए उपस्थित हैं जिसे क़ानून जान बूझकर किया गया अपराध मानता है और वे किसी भी नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य समझते हैं। (64 वर्षीय प्रशांत भूषण ने भी अपने उत्तर में ऐसा ही कुछ उद्धृत किया है।)

अंग्रेज जज सी एन बू्रफफि़ल्ड ने तब गांधीजी को छह वर्षों के कारावास की सजा तो दी थी पर साथ ही यह भी जोड़ा था कि भारत में कभी घटनाचक्र इस तरह से बने और सरकार के लिए ऐसा सम्भव हो कि सजा की अवधि को कम करके आपको रिहा किया जा सके तो ‘मेरे से अधिक कोई और व्यक्ति प्रसन्न नहीं होगा।’

मानहानि के कारण आहत भावनाओं को लेकर सजा के समर्थक नागरिकों से भिन्न जो तबका है वह जानता है कि प्रशांत भूषण का वास्तविक इरादा उस संविधानिक संस्था की अवमानना का क़तई हो ही नहीं सकता जिसकी वाणी के साथ करोड़ों मूक लोगों का भविष्य बंधा हुआ है। उनका क्षोभ तो उन निहित स्वार्थों के प्रति है जो समस्त प्रजातांत्रिक संस्थानों के चेहरों को एक विशेष कि़स्म की वैचारिक व्यवस्था और राष्ट्रवाद की परतों से ढाँकना चाहते हैं। प्रशांत भूषण द्वारा स्वीकार की जाने वाली सजा लोगों के मन से सविनय प्रतिकार के फलस्वरूप प्राप्त हो सकने वाले दंडात्मक पुरस्कार के प्रति भय को ही कम करेगी।जैसे महामारी पर नियंत्रण के लिए उसके संक्रमण की चैन को तोडऩा जरूरी हो गया है उसी प्रकार लोकतंत्र पर बढ़ते प्रहारों को रोकने के लिए नागरिकों के मौन की लगातार लम्बी होती शृंखला को तोडऩा भी आवश्यक हो गया है। अत: इस कठिन समय में प्रशांत भूषण की उपस्थिति का एक आवश्यक उपलब्धि के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

कुछ होगा 
कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा  
न टूटे तिलिस्म सत्ता का  
मेरे अंदर एक कायर टूटेगा

-रघुवीर सहाय


21-Aug-2020 2:06 PM

-श्रवण गर्ग
सवाल बहुत ही काल्पनिक है जिसे अंग्रेज़ी में हाइपथेटिकल कहते हैं। ऐसे सवाल पश्चिमी प्रजातांत्रिक देशों में आम चलन में हैं। अमेरिका जैसे देश में तो इन दिनों कुछ ज़्यादा ही। काल्पनिक सवाल की उपज का भी एक कारण है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को लेकर हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में उन्हें सतत्तर प्रतिशत लोगों द्वारा पसंद किया जाना बताया गया है। एक अन्य सर्वे में छियासठ प्रतिशत उन्हें फिर से प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। उनके मुक़ाबले राहुल गांधी केवल आठ प्रतिशत लोगों की ही पसंद रह गए हैं। अब काल्पनिक सवाल यह है कि अगर अमेरिका के साथ ही भारत में भी इसी नवम्बर में लोक सभा चुनाव करवा लिए जाएँ तो परिणाम किस तरह के आएँगे! भारतीय जनता पार्टी को पिछले चुनाव (2019) में 303 सीटें मिलीं थीं जो कि कुल (543) सीटों का लगभग 56 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री की लोकप्रियता अगर 77 प्रतिशत है तो भाजपा को प्राप्त हो सकने वाली सीटों का अनुमान भी आसानी से लगाया जा सकता है।

सवाल खड़ा करने का दूसरा कारण यह है कि एक ऐसे समय जब कि बिगड़ती आर्थिक स्थिति और कोरोना के कारण उपजी चिकित्सा सम्बन्धी कठिन परिस्थितियों में दुनिया के अन्य देशों के शासनाध्यक्षों को अपनी कम होती साख के साथ संघर्ष करना पड़ रहा है, हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बढ़ रही है ! अमेरिका में इस समय नियमित हो रहे ओपिनियन पोल्स में राष्ट्रपति ट्रम्प विरोधी पक्ष के उम्मीदवार जो बायडन से लोकप्रियता में काफी पीछे चल रहे हैं। इसका बड़ा कारण कोरोना से होने वाला बेक़ाबू संक्रमण, खऱाब आर्थिक स्थिति और बढ़ती हुई बेरोजग़ारी है। ये ही कारण कमोबेश हमारे यहाँ भी मौजूद हैं।

कोरोना से संक्रमित होने वालों का आंकड़ा न सिर्फ उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं की छतें पार कर रहा है, कड़ी सुरक्षा और सभी-तरह की आवश्यक ‘छुआछूत’ का निर्ममता से पालन करने के बावजूद बड़ी-बड़ी हस्तियाँ इस समय अस्पतालों को ही अपना घर और दफ़्तर बनाए हुए हैं। देश की आधी से ज़्यादा आबादी अभी भी आरोपित और स्वैच्छिक लॉक डाउन की गिरफ्त में है। यह सब तब है जब प्रधानमंत्री एक से अधिक बार दावा कर चुके हैं कि सही समय पर लिए गए फ़ैसलों के कारण भारत दूसरे देशों की तुलना में कोरोना से लड़ाई में बहुत अच्छी स्थिति में है।

कल्पना ही की जा सकती है कि कोरोना को लेकर जिस ‘सही समय ओर सही फ़ैसले’ का जि़क्र किया जा रहा है वह नहीं होता तो हम आज किस बदतर हाल में होते और प्रवासी मज़दूरों की संख्या और उनकी व्यथाओं की गिनती कहाँ तक पहुँच जाती ! दूसरी ओर यह भी उतना ही सच है कि महामारी को नियंत्रित करने और इलाज की व्यवस्था को दुरुस्त करने में हमारी स्थिति अभी भी ‘दिन भर चले अढ़ाई कोस’ वाली हालत में ही है। प्रधानमंत्री ने पंद्रह अगस्त को लाल कि़ले से आश्वस्त किया है कि इस समय तीन वैक्सीन पर देश में काम चल रहा है। तो क्या वैक्सीन के आते ही सब-कुछ ठीक हो जाएगा? विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो आवश्यक वैक्सीन का बन जाना अभी पूरी तरह से तय नहीं है। अगर बन भी गई तो हमारे यहाँ के आखिरी व्यक्ति तक उसे पहुँचने में दो-तीन साल लग जाएँगे। तो फिर वैक्सीन का आश्वासन महामारी के इलाज के लिए है या फिर केवल उसका जनता के बीच भय कम करने के लिए ?

अगर हम वापस वहीं लौटें जहां से बात शुरू की थी तो इस समय कोरोना संक्रमण के दुनिया भर में प्रतिदिन के सबसे ज़्यादा मरीज़ हमारे यहीं प्राप्त होने के साथ ही सरकार को और भी ढेर सारी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। इनमें चीन द्वारा लद्दाख़ में हमारे स्वाभिमान पर किया गया अतिक्रमण, पाकिस्तान और नेपाल के साथ तनाव, अत्यंत खऱाब आर्थिक स्थिति, भयानक बेरोजग़ारी आदि को भी जोड़ सकते हैं। क्या कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इन सब समस्याओं के बाद भी सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं व्यक्त हो रहा है ! हम अगर कहना चाहें कि ‘कुछ तो निश्चित ही पड़ रहा होगा’ तो क्या फिर उनकी लोकप्रियता को लेकर प्रचारित किए जा रहे सर्वेक्षण विश्वसनीय नहीं हैं ? या फिर सरकार की विश्वसनीयता तो वैसी ही क़ायम है, जनता ने ही अपनी विश्वसनीयता खो दी है? ऐसा पहले तो कभी देखा और सुना नहीं गया !

प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता तो और भी अद्भुत थी, जिसके दम पर उन्होंने निर्धारित समय से कुछ महीने पूर्व ही चुनाव करवाने का फ़ैसला ले लिया था फिर भी उनकी सरकार को जाना पड़ा। इसके भी पहले वर्ष 1992 के अंत में बाबरी ढाँचे के विध्वंस के बाद हुए विधान सभा चुनावों में भी भाजपा को सीटों का कोई ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाया था। तो क्या ऐसा नहीं लगता कि कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है जिसे हमारे चेहरों पर चढ़ी हुई नक़ाबें बाहर नहीं आने दे रही है ! हमें यह भी बता दिया गया है कि अब इन्हीं नक़ाबों के साथ ही आपस में दूरियाँ बनाए हुए एक लम्बा वक्त गुज़ारना है। हो सकता है कि यह लम्बा वक्त अगले चुनावों की मतगणना के साथ ही ख़त्म हो। और वह चुनाव अमेरिका के साथ तो इतनी जल्दी निश्चित ही ‘मुमकिन’ नहीं हैं। हमारे लिए इसी बीच एक और भी बड़ी दिक्कत एक अमेरिकी अखबार ने ही उजागर कर दी है! वह यह कि अपनी विश्वसनीयता को लेकर हम कोई सफाई अब सोशल मीडिया पर भी लिखकर शेयर नहीं कर सकते।


16-Aug-2020 2:59 PM

-श्रवण गर्ग 
एक राजनीतिक दल के ऊर्जावान प्रवक्ता की एक टीवी चैनल की उत्तेजक डिबेट में भाग लेने के बाद कथित मौत को लेकर टीआरपी बढ़ाने वाले कार्यक्रमों की प्रतिस्पर्धा पर चिंता व्यक्त की जा रही है। एक सभ्य समाज में ऐसा होना स्वाभाविक भी है पर इस तरह की बहसों के पीछे काम कर रहे प्रभावशाली लोग और जो प्रभावित हो रहे हैं वे भी अच्छे से जानते हैं कि शोक की अवधि समाप्त होते ही जो कुछ चल रहा है, उसे मीडिया की व्यावसायिक मजबूरी मानकर स्वीकार कर लिया जाएगा। मीडिया उद्योग को नज़दीक से जानने वाले लोग भी अब मानते जा रहे हैं कि बहसों के ज़रिए जो कुछ भी बेचा जा रहा है, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही बची है, जितनी कि उनमें हिस्सा लेने वाले प्रवक्ताओं/प्रतिनिधियों के दलों/संस्थानों की जनता के बीच स्थापित है।

सत्ता की राजनीति में बने रहने के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों ने समाज को जाति और वर्गों के साम्प्रदायिक घोंसलों में सफलतापूर्वक बांटने के बाद अब मीडिया के उस टुकड़े को भी अपनी झोली में समेट लिया है, जिसका जनता की आकांक्षाओं का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व कर पाने का साहस तो काफी पहले ही कमजोर हो चुका था। अब तो केवल इतना भर हो रहा है कि ‘आपातकाल’ ने जिस मीडिया के ऊपरी धवल वस्त्रों में छेद करने का काम पूरा कर दिया था, आज उसे लगभग निर्वस्त्र-सा किया जा रहा है। उस जमाने में (अपवादों को छोड़ दें तो) जो काम प्रिंट मीडिया का केवल एक वर्ग ही दबावों में कर रहा था, वही आज कुछ अपवादों के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा तबका स्वेच्छा से कर रहा है। यही कारण है कि एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता की किसी उत्तेजक बहस के कारण कथित मौत दर्शकों की आत्माओं पर भी कोई प्रहार नहीं करती और मीडिया के संगठनों की ओर से भी कोई खेद नहीं व्यक्त किया जाता।
समझदार दर्शक तो समझने भी लगे हैं कि टीवी की बहसों में प्रायोजित तरीके से जो कुछ भी परोसा जाता है, वह केवल कठपुतली का खेल है, जिसकी असली रस्सी तो कैमरों के पीछे ही बनी रहने वाली कई अंगुलियाँ संचालित करतीं हैं। एंकर तो केवल समझाई गई स्क्रिप्ट को ही अभिनेताओं की तरह पढऩे काम अपने-अपने अन्दाज़ में करते हैं। पर कई बार वह अन्दाज भी घातक हो जाता है। हो यह गया है कि जैसे अब किसी तथाकथित साधु, पादरी, ब्रह्मचारी या धर्मगुरु के किसी महिला या पुरुष के साथ बंद कमरों में पकड़े जाने पर समाज में ज़्यादा आश्चर्य नहीं प्रकट किया जाता या नैतिक-अनैतिक को लेकर कोई हाहाकार नहीं मचता, वैसे ही मीडिया के आसानी से भेदे जा सकने वाले दुर्गों और सत्ता की राजनीति के बीच चलने वाले सहवास को भी ‘नाजायज़ पत्रकारिता ‘के कलंक से आजाद कर दिया गया है।

एक राजनीतिक प्रवक्ता की मौत को कारण बनाकर अब यह उम्मीद करना कि मूल मुद्दों पर जनता का ध्यान आकर्षित करने से ज़्यादा उनसे भटकाने के लिए प्रायोजित होने वाली बहसों का चरित्र बदल जाएगा, एंकरों के तेवरों में परिवर्तन हो जाएगा या राजनीतिक दल उनमें भाग लेना ही बंद कर देंगे वह बेमायने है।ऐसा इसलिए कि जो कुछ भी अभी चल रहा है, उसे कायम रखना मीडिया बाजार की सत्ताओं की राजनीतिक मजबूरी और व्यावसायिक जरूरत बन गया है। मीडिया उद्योग भी नशे की दवाओं की तरह ही उत्पादित की जाने वाली खबरों और बहसों को बेचने के परस्पर प्रतिस्पर्धी संगठनों में परिवर्तित होता जा रहा है।
दर्शकों और देश का भला चाहने वाले कुछ लोग अभी हैं जो लगातार सलाहें दे रहे हैं कि जनता द्वारा चैनलों को देखना बंद कर देना चाहिए। पर वे यह नहीं बता पा रहे हैं कि फिर देखने के लिए नया क्या है और कहाँ उपलब्ध है? यह वैसा ही है जैसे सरकारें तो बच्चों से उनके खेलने के असली मैदान छीनती रही और उनके अभिभावक उन्हें वीडियो गेम्स खेलने के लिए भी मना करते रहें। ये भले लोग जिस मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बता रहे हैं उसे ही इस समय असली मीडिया होने की मान्यता हासिल है। जो गोदी मीडिया नहीं है वह फिल्म उद्योग की उन लो बजट समांतर फि़ल्मों की तरह रह गया है, जिन्हें बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तो मिल सकते हैं देश में बॉक्स ऑफिस वाली सफलता नहीं।

एक प्रवक्ता की मौत से उपजी बहस का उम्मीद भरा सिरा यह भी है कि चैनलों की बहसों में जिस तरह की उत्तेजना पैदा हो रही है वैसा अखबारों के एक संवेदनशील और साहसी वर्ग में (जब तक सप्रयास नहीं किया जाए )आम तौर पर अभी भी नहीं होता। यानी कि काली स्याही से छपकर बंटने वाले अख़बार चैनलों के ‘घातक’ शब्दों के मुक़ाबले अभी भी ज़्यादा प्रभावकारी और विश्वसनीय बने हुए हैं। उन्हें लिखने या पढऩे के बाद व्यक्ति भावुक हो सकता है, उसकी आँखों में आंसू आ सकते हैं पर उसकी मौत नहीं होती।यह बात अलग से बहस की है कि जिस दौर से हम गुजर रहे हैं उसमें मौत केवल अख़बारों को ही दी जानी बची है पर वह इतनी जल्दी और आसानी से होगी नहीं।चैनल्स तो खैर जिंदा रखे ही जाने वाले हैं।उनमें बहसें भी इसी तरह जारी रहेंगी। सिर्फ प्रवक्ताओं के चेहरे बदलते रहेंगे। एंकरों सहित बाकी सब कुछ वैसा ही रहने वाला है।


13-Aug-2020 10:05 PM

-श्रवण गर्ग

हमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बीमारी और मौतों के तेज़ी से बढ़ते हुए आँकड़ों से लोगों ने अब डरना बंद कर दिया है। हालात पहले के इक्कीस दिनों के मुक़ाबले इस समय ज़्यादा ख़राब हैं पर जैसे-जैसे आँकड़ों का ग्राफ़ ऊँचा हो रहा है ,ख़ौफ़ भी कम होता जा रहा है। कारण कुछ भी हो सकते हैं। एक यह भी कि लोग अब जीना चाहते हैं और उसके लिए अपने आप को बदलने का इरादा भी रखते हैं। यह इरादा लोगों की बदली हुई आवाज़ों और चाल-ढाल में नज़र भी आने लगा है।

लोगों को अच्छे से अंदाज़ा है कि वर्तमान महामारी ने व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और एक विश्व नागरिक के रूप में सभी को किस कदर बदलकर रख दिया है, अंदर से निचोड़कर भी।हमें पता ही नहीं चल पाया कि पिछले पाँच महीनों के दौरान हम कितने बदल चुके हैं, प्रत्येक पल कितने और बदल रहे हैं। आगे आने वाले साल हमें संवेदनशीलता के स्तर पर और कितना परेशान करने वाले हैं। हमें महसूस होने लगा था कि एक व्यक्ति के रूप में स्वयं की उपस्थिति और निरंतरता के प्रति हम अपना आत्मविश्वास खोते जा रहे हैं। मास्क की अनिवार्यता के अनुशासन ने हमारे चेहरों से गुम हुई मुस्कुराहटों को तो दबा ही दिया हमारे प्राकृतिक तनावों को भी सार्वजनिक होने से प्रतिबंधित कर दिया। ऐसा इसलिए हुआ कि सब कुछ अचानक ही हो गया। एक राष्ट्र के तौर पर हम केवल सीमाओं पर ही युद्धों को लड़ने की सैन्य तैयारियाँ करते रहे और कल्पना में भी नहीं सोचा कि कोई युद्ध ऐसा भी हो सकता है जिसे नागरिकों और समाजों को ही अपने स्तरों पर ही लड़ना होगा।

अच्छी बात यह है कि कोरोना को अब हमने एक बीमारी, वेंटिलेटर की भयावहता, पीपीइ किट की घुटन और किसी जादुई वैक्सीन की तुरंत ज़रूरत से बाहर निकलकर नए संदर्भों में देखना प्रारम्भ कर दिया है। ये संदर्भ, एक नौकरी, अर्थ व्यवस्था, रोज़गार धंधे, बच्चों के भविष्य से जुड़े हुए हैं। हमने हक़ीक़त का तो पहले तीन सप्ताहों की समाप्ति के बाद ही अंदाज़ा लगा लिया था और यह भी समझ लिया था कि आने वाले समय में हमारे और समाज के जीने की पद्धति वह नहीं हो सकती जो कि हमारी आदत गई है।

कोरोना ने हमें इतने दिनों में परिवार के स्तर पर ज़िंदगी जीने के जिस सकारात्मक तरीक़े से संस्कारित किया है उसके कारण हम अपनी वर्तमान शासन व्यवस्था के गुण-दोषों, उसकी कमियों और उसकी सीमाओं के प्रति और भी ज़्यादा शिक्षित और सतर्क हो गए हैं। व्यवस्था की क्षमताओं के प्रति हमारा अतिरंजित आत्मविश्वास भी तिरोहित हो गया है। हो सकता है ये सब अनुभव हमें एक बेहतर नागरिक, सामाजिक प्राणी और विश्व नागरिक बनने में मदद करें।

कोरोना के कारण हुआ सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि जो दुनिया हमारी नज़रों में पहले लगातार छोटी हो रही थी, वह अचानक से बड़ी होती जा रही है। व्यक्तियों के बीच दो गज़ की दूरी का विस्तार राष्ट्रों के बीच भावनात्मक और भौगोलिक सीमाओं के संदर्भों में भी हो रहा है। हो सकता है कि इन सब बदलावों के कारण व्यक्ति और राष्ट्र के रूप में हमें अपने आपको पहले से कहीं ज़्यादा आत्मनिर्भर और ताकतवर बनाना पड़े। अपनी तात्कालिक या अल्पकालिक तकलीफ़ों और दुःख-दर्दों को दीर्घकालिक सम्पन्नता में परिवर्तित करने का अब यही एकमात्र रास्ता भी बचा है। यह भी मुमकिन है कि हम सब यह सम्पन्नता अपने जीवन के नज़दीक के कालखंड में नहीं देख पाएँ।

इतना तो अब तय हो गया है कि हमारी नियति अब पीछे मुड़कर जो छूट गया है या छूटता जा रहा है उसे देखते रहने की नहीं हो सकती। हमें अब आगे की ओर ही देखना पड़ेगा। परिवर्तन की इस यात्रा के दौरान हम जो कुछ भी देख या समझ पा रहे हैं वह किसी नई भाषा को कानों से पढ़ने और उसके संगीत को आँखों से सुनने जैसा है। सुखद यह है कि इस कठिन यात्रा में हम अकेले नहीं हैं। सारी दुनिया में भी एक ही समय पर यही सब कुछ हो रहा है। राष्ट्रों के बीच अब फ़र्क़ केवल बीमारी से संक्रमित होने वाले लोगों की काम-ज़्यादा संख्या और होने वाली मौतों के आँकड़ों का ही रह गया है।लड़ाई अब केवल वैक्सीन की खोज के ज़रिए ही महामारी पर विजय पाने के प्रयासों से काफ़ी आगे बढ़ गई है। सबसे अच्छी बात यह है कि हमने इस नई हक़ीक़त को स्वीकार कर लिया है और अपने आसपास नई उम्मीदों के संकेत भी हमें दिखाई पड़ने लगे हैं।


11-Aug-2020 7:52 PM

-श्रवण गर्ग

सत्ता की राजनीति के विद्रूप चेहरे एक-एक कर उजागर होते जा रहे हैं।हाल के महीनों में पहले महाराष्ट्र फिर मध्य प्रदेश और अब राजस्थान। जनता जिन्हें युद्ध समझकर उनकी हार-जीत पर करोड़ों-अरबों का सट्टा खेलती है, उनके बारे में अंत में यही पता चलता है कि वह तो बस एक रिहर्सल थी। रणभूमि राजस्थान की घटनाओं के बारे में अभी ठीक से पता चलना बाक़ी है कि जो हुआ है वह रिहर्सल का विराम है या फिर युद्ध का विराम ! युद्ध की समाप्ति तो निश्चित ही नहीं है।यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें एक सेना के ही दो पक्ष आपस में लड़ रहे ‘थे’।अब एक थकी हुई सेना को अपने उसी दुश्मन से अगला युद्ध लड़ना है जिससे पिछली बार जीत हुई थी।सत्ता प्राप्त करने और बचाने की समस्त लड़ाइयाँ आदर्शों की रक्षा के नाम पर ही लड़ी जाती हैं और सबसे ज़्यादा हनन भी उन्हीं आदर्शों का होता है।

लोग थोड़ा यह भी जानने को उत्सुक हैं कि अतृप्त राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के सारे मसान हर बार कांग्रेस में ही क्यों जागृत होते रहते हैं , भाजपा (या पूर्व की जनसंघ) में क्यों नहीं ? उस पार्टी में भी कुछ तो पायलट (या सिंधिया ) होते होंगे ! या सभी आडवाणी आदि की ओर देखकर ही विनम्र हो जाते हैं ? क्या इस धुर दक्षिणपंथी हिंदुत्व की राष्ट्रवादी पार्टी और उससे जुड़े संगठनों के करोड़ों कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षाओं का बंदीकरण कर दिया गया है ? या इनके अनुशासन में माँगकर प्राप्त किए जाने वाले पुरस्कारों के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रखी गई है ? तब तो इसे कांग्रेस की ही खूबी माना जाना चाहिए कि जब-जब भी पार्टी बीमार होकर मरणासन्न होने लगती है, उत्तराधिकार और पदों के बँटवारे की माँग और तेज हो जाती है।कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई जबसे यह पार्टी बनी है कभी ख़त्म ही नहीं होती। और इस बीच बाहर की चुनौतियाँ उतनी ही और बढ़ जातीं हैं। पार्टी इसे अपने आंतरिक प्रजातंत्र की खूबी बताती है, राजनीतिक अराजकता नहीं ! विशेषता यह भी कि इतना सब होने के बाद भी घोषित तौर पर पार्टी कभी डिप्रेशन में नहीं जाती।

कांग्रेस में ही यह सम्भव है कि एक मुख्यमंत्री और उनके (पूर्व) उप-मुख्यमंत्री दोनों ही आदर्शों के नाम पर अपनी-अपनी आकांक्षाओं को लेकर कम-से-कम बाहर से स्वस्थ नज़र आती सरकार को भी वेंटिलेटर पर चढ़ाने के लिए तैयार हो गए। अंत में हुआ यही कि जाँच रिपोर्ट में तो बीमारी को मात दे दी गई पर कोई प्लाज़्मा प्राप्त नहीं हुआ। सचिन पायलट ने कांग्रेस छोड़ भी दी थी और नहीं भी छोड़ी थी। वे उसमें न होते हुए भी बने हुए थे। अपना एक पैर गरम और दूसरा ठंडे पानी में रखकर बैठे-बैठे गुरुग्राम के रिज़ॉर्ट की खिड़की से अपने समर्थकों की गिनती भी कर रहे थे और दस जनपथ के सम्पर्क में भी बने हुए थे। सिंधिया की तरह इस्तीफ़ा भी नहीं दिया और मनाने-बुलाने के बाद भी घर वापसी नहीं की।और अंत में उन्हीं लोगों के ‘वार रूम’ में मिलने को राज़ी हो गए जिनके कि प्रति सारी नाराज़गी थी।

कांग्रेस के लिए बहुत ही नाज़ुक वक्त में एक और सरकार स्वाहा होने से बच गई पर राजस्थान की सात करोड़ जनता और देश के लिए अब कुछ ही बचे हुए नेताओं में से भी कुछ और नज़रों से गिर गए।लोगों से अब कहा जाएगा कि वे प्रदेश के व्यापक हित और संकट की घड़ी को देखते हुए आदर्श की मिसाल नेताओं ने चौराहों पर खड़े होकर किस तरह की ‘निकम्मी’ और ‘नकारा’ भाषा का इस्तेमाल किया था उसे भूल जाएं। उन्हें लोगों की कमज़ोर याददाश्त पर पूरा यक़ीन है। कोई भी पक्ष स्वीकार नहीं करेगा कि सब कुछ समाप्त हो भी गया है और नहीं भी हुआ है। दिल्ली दरबार भी नहीं मानेगा कि एक कमज़ोर सरकार तो बचा ली गई पर एक मज़बूत मुख्यमंत्री को कमज़ोर कर दिया गया।समझौते की क़ीमत ऊपर से जितनी छोटी दिखाई जा रही है, अंदर से उतनी है नहीं।

अब बारी शायद अशोक गहलोत की है। उन्होंने कहा बताते हैं कि राजनीति में कई बार छाती पर पत्थर रखकर ज़हर का घूँट भी कभी-कभी पीना पड़ता है। वे यह नहीं बताते कि ज़हर का असर कितने समय में ख़त्म हो जाएगा। गांधी परिवार के ‘वार रूम’ में उनकी बैठक होना अभी बाक़ी है। हो सकता है वह बैठक विधान सभा की बैठक के बाद हो। गहलोत ने कहा था कि सोने की छुरी को पेट में नहीं घुसेड़ सकते। दूसरी कहावत उन्होंने अभी नहीं कही वह यह कि एक ही म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं।राजस्थान का असली राजनीतिक संकट तो शायद अब चालू हुआ है।

  


07-Aug-2020 12:03 PM

-श्रवण गर्ग

पाँच अगस्त दो हजार बीस को सम्पूर्ण देश(और विश्व) के असंख्य नागरिकों ने भगवान राम के जिस चिर-प्रतीक्षित स्वरूप के अयोध्या में दर्शन कर लिए उसके बाद हमें इसे एक रथ यात्रा, एक लड़ाई, एक लम्बे संघर्ष का अंत मानते हुए अब किसी अन्य जरूरी काम में जुट जाना चाहिए या फिर और कोई अधूरा संकल्प हमारी नयी व्यस्तता की प्रतीक्षा कर रहा है? इतने लम्बे संघर्ष के बाद अगर थोड़ी सी भी थकान महसूस करते हों, तो यह स्वीकार करना चाहिए कि जिस एक काम में इतनी बड़ी आबादी ने अपने आपको इतने दशकों तक लगाकर रखा केवल उसे ही इतने बड़े राष्ट्र के पुरुषार्थ की चुनौती नहीं माना जा सकता। हम शायद इस बात का थोड़ा लेखा-जोखा करना चाहें कि आजादी हासिल करने के बाद सात दशकों से ज़्यादा का समय हमने कैसे गुजारा और उसमें हमारे सभी तरह के शासकों की प्रत्यक्ष-परोक्ष भूमिकाएँ और उनके निहित स्वार्थ किस प्रकार के रहे होंगे।

हमें कोई दूसरा समझाना ही नहीं चाहेगा कि सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के जश्न के कोलाहल के बीच एक दूसरी बड़ी आबादी अपनी सुरक्षा को लेकर इतनी भयभीत और अलग-थलग सी महसूस क्यों कर रही है। न सिर्फ इतना ही ! इस भय की मौन प्रतिक्रिया में उस आबादी की व्यस्तताएँ किसी तरह के अनुत्पादक कार्यों में जुट रही हैं ? मसलन, क्या हम पता करने का साहस करेंगे कि अयोध्या में उच्चारे गए पवित्र मंत्रों की गूंज देश की ही आत्मा के एक हिस्से कश्मीर घाटी में किस तरह से सुनाई दी गई होगी ! जैसा कि दर्द बयाँ किया जा रहा है: कश्मीरी पहले तो दिल्ली में ही पराए गिने जाते थे, अब खुद अपनी जमीन पर भी परायापन महसूस करने लगे हैं। क्या कश्मीरी नागरिक अपने पिछले पाँच अगस्त को भूल चुके हैं ?

एक विकासशील राष्ट्र के तौर पर अपने पिछले सत्तर सालों की विकास यात्रा पर थोड़ा सा भी गर्व महसूस करने की स्थिति में पहुँचने के लिए जरूरी हो गया है कि हम अयोध्या नगरी से अपने आपको किसी और समय पर वापस लौटने तक के लिए यह मानते हुए बाहर कर लें कि मिशन अब पूरा हो गया है। इस बात की बड़ी आशंका है कि नागरिकों की आत्माएँ अयोध्या के मोह से बाहर निकल ही नहीं पाएँ । उन्हें धार्मिक-आध्यात्मिक व्यस्तताओं से जोड़े रखने के लिए किसी नई अयोध्या के निर्माण के सपने बाँट दिए जाएँ । नागरिक हतप्रभ हो जाने की स्थिति में इस तरह सम्मोहित हो जाएँ कि अपनी उचित भूमिका को लेकर ही उनमें भ्रम उत्पन्न होने लगे। उन्हें सूझ ही नहीं पड़े कि सीमाओं पर चल रहे तनाव को लेकर किस तरह से जानकार बनना चाहिए! महामारी से लड़ाई को लेकर उन्हें गफलत में तो नहीं रखा जा रहा है! या यह कि अब कौन सा नया बलिदान उनकी प्रतीक्षा कर सकता है!

हमारी अब तक की उपलब्धियों को क्या इस कसौटी पर भी नहीं कसना चाहिए कि अनाज की भरपूर फसल और असीमित भंडारों के बावजूद सरकार का मानना है कि अस्सी करोड़ लोगों को उसकी मदद की जरूरत है। क्या इसका कारण यह नहीं समझा जाए कि इतने वर्षों की प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी आबादी के पास अपना पेट भरने के आर्थिक साधन उपलब्ध नहीं हैं? हमसे भी बड़ी जनसंख्या वाले चीन सहित दूसरे देशों में भी क्या जनता इसी तरह के संघर्षों में जुटी है या फिर उनकी चिंताएँ उसी तरह की आधुनिक हैं जिस तरह के आधुनिक प्रतिष्ठान का निर्माण अब हम पूरी अयोध्या में करना चाहते हैं ? ज़्यादा चिंता इस बात की भी है कि राजनीति में धर्म के बजाय धर्म की राजनीति को लेकर जो ताक़तें अभी तक विभाजित संकल्पों के रूप में उपस्थित थीं वे अब एकजुट होकर नागरिक प्रवाह को बदलना चाहती हों।

इस सवाल से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है कि लाखों की संख्या वाले साधु-संत, उनके करोड़ों शिष्य और भक्तों के साथ वे अनगिनत कार्यकर्ता जो मंदिर-निर्माण के कार्य को अपने संकल्पों की प्रतिष्ठा मानते हुए इतने वर्षों से लगातार संघर्ष कर रहे थे राम जन्म भूमि के छ: अगस्त के सूर्यास्त के साथ ही हर तरह की चिंताओं से बेफिक्र हो गए होंगे ! निश्चित ही इन सब को भी कोई नया धार्मिक-आध्यात्मिक उपक्रम चाहिए। यह स्थिति ऐसी ही है कि सामरिक युद्ध में विजय के बाद शांतिकाल में सैनिकों के कौशल का किस तरह से इस्तेमाल किया जाए? दूसरे यह कि देश को अब तक यही बताया गया है कि मंदिर निर्माण के कार्य में जुटे लोगों का किसी राजनीतिक दल से सीधा सम्बंध नहीं है, सहानुभूति हो सकती है।

भारत की राजनीति के लिए पाँच अगस्त के दिन को भारतीय जनता पार्टी के लिए भी आजादी के दिवस की उपलब्धि के रूप में गिनाया जा सकता है। वह इस मायने में कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उसे इस आरोप से लगभग बरी कर दिया कि वह (भाजपा) केंद्र और राज्यों में सत्ता की प्राप्ति के लिए राम मंदिर को मुद्दा बनाकर देश में साम्प्रदायिक धु्रवीकरण कर रही है। भाजपा अब संतोष जाहिर कर सकती है कि राम मंदिर भूमि पूजन के अवसर पर कांग्रेस ने प्रियंका गांधी के जरिए जो वक्तव्य जारी किया उसकी शुरुआत ‘राम सब में हैं, राम सबके साथ हैं ‘से की और अंत ‘जय सियाराम’ से किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भी तो शुरुआत और अंत ऐसे ही ‘जय सियाराम ‘से किया। गांधी परिवार अगर छ: दिसम्बर 1992 को ही तब प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिंह राव के साथ खड़ा नजर आ जाता तो कांग्रेस और मंदिर निर्माण को एक चौथाई शताब्दी का इंतजार नहीं करना पड़ता। देश का भी बहुत सारा कीमती वक्त बच जाता।


04-Aug-2020 11:31 AM

-श्रवण गर्ग

चौबीस जुलाई के दिन जब लगभग पांच लाख की आबादी वाले अयोध्या में मंदिर निर्माण के भूमि पूजन की तैयारियों के साथ-साथ शहर की कोई बीस मस्जिदों में मुस्लिम शुक्रवार की नमाज़ पढ़ते रहे थे, भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापकों में से एक 92-वर्षीय लाल कृष्ण आडवाणी दिल्ली से वीडियो काँफ्रेंसिंग के ज़रिए लखनऊ की एक सी.बी.आई. अदालत के समक्ष अपने बयान दर्ज करवा रहे थे। राम मंदिर आंदोलन के जनक आडवाणी जब तीस वर्ष पूर्व (25 सितम्बर 1990) मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष के रथ पर सवार होकर सोमनाथ से निकले थे, किसी ने भी ऐसी कल्पना नहीं की होगी कि आगे चलकर किसी अदालत के समक्ष वे यह कहना चाहेंगे कि बाबरी ढाँचे के विध्वंस की कारवाई में उनकी कोई भागीदारी नहीं थी ?

मीडिया में प्रकाशित खबरों के मुताबिक़, आडवाणी से करीब साढ़े चार घंटों तक पूछे गए कोई हज़ार से ऊपर सवालों के जवाब का सार यही रहा कि 6 दिसम्बर 1992 को वे अयोध्या में एक कार सेवक की हैसियत से उपस्थित अवश्य थे पर बाबरी ढांचे को गिराए जाने की कारवाई में उनकी कोई भागीदारी नहीं थी। इस सवाल के जवाब में कि तब उनका नाम भी घटना के आरोपियों की सूची में क्यों शामिल किया गया, उनका जवाब था (केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा)’ राजनीतिक कारणों’ से। उनके एक दिन पूर्व डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी अपने कथन में वही कहा था जो आडवाणी ने कहा।केवल आडवाणी और डॉ जोशी ही नहीं, वरिष्ठ भाजपा नेत्री उमा भारती और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भी कथित तौर पर अदालत से यही कहा कि केंद्र सरकार द्वारा राजनीतिक बदले की भावना से उन पर बाबरी के विध्वंस का आरोप मढ़ा गया था।

सवाल यह है कि कोई एक सौ पैंतीस वर्षों की अदालती जद्दो-जहद, इतने लम्बे संघर्ष और हजारों लोगों के बलिदानों के बाद कल (पाँच अगस्त को) अपरान्ह बारह बजकर पंद्रह मिनट पंद्रह सेकण्ड पर उपस्थित होने वाले उस चिर-प्रतीक्षित क्षण के जब आडवाणी सहित ये तमाम नेता प्रत्यक्ष अथवा वीडियो काँफ्रेंसिंग के ज़रिए साक्षी बनेंगे, तब क्या हृदय के अंदर भी वैसा ही अनुभव करेंगे जैसा कि कथित तौर पर लखनऊ की सी बी आइ अदालत में उनके द्वारा दर्ज कराया गया है, या कुछ भिन्न महसूस करेंगे ? अगर गर्व के साथ भिन्न महसूस करना चाहेंगे तो फिर विवादित ढाँचे के विध्वंस में अपने भी योगदान का दावा क्यों नहीं करना चाहते ? उस अवसर पर रिकॉर्ड किए गए भाषणों व चित्रों की वीडियो क्लिपिंग्स, प्रकाशित अखबारी रिपोर्ट्स व अन्य दस्तावेज क्या सभी असत्य हैं और राजनीतिक बदले की भावना से तैयार किए गए थे?

देश की जनता के हृदय में इस तरह का सोच मात्र भी कल्पना से परे होगा कि आडवाणी, डॉ जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह या कोई भी अन्य भाजपा नेता-कार्यकर्ता मंदिर निर्माण के कार्य में अपने बड़े से बड़े बलिदान में पल भर का भी कभी संकोच करेंगे। तब क्या कारण हो सकता है कि आडवाणी और तमाम नेता उस श्रेय को लेने से इनकार कर रहे हैं जिसके वे पूरी तरह से हकदार हैं ? क्या ऐसा मान लिया जाए कि बाबरी का विध्वंस एक अलग घटना थी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने फैसले के ज़रिए मंदिर-निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जाना एक अलग घटना। दोनों के श्रेय के हक़दार भी अलग-अलग हैं ? दोनों के बीच सम्बंध है भी और नहीं भी ! हो सकता है कि केंद्रीय नेतृत्व बाबरी विध्वंस के साथ एक पार्टी के रूप में भाजपा की किसी भी तरह की संबद्धता नहीं चाहता हो और उसे विश्व हिंदू परिषद आदि संगठनों के मार्गदर्शन में की गई स्वतंत्र कार्रवाई निरूपित करना चाहता हो ! और इसके ज़रिए देश-दुनिया के मुस्लिमों को भी कोई ‘सकारात्मक’ संदेश देना चाहता हो ! तब क्या देश के वे तमाम नागरिक जो इतने वर्षों से एक निरपेक्ष भाव से अपनी आँखों के सामने सब कुछ घटित होता देखते रहे हैं वे भी ऐसा ही स्वीकार करने को तैयार हो जाएँगे ?

भाजपा नेतृत्व की मंशा का सम्बंध क्या इस बात से भी जोड़ा जा सकता है कि आडवाणी द्वारा अपना कथन दर्ज कराने के एक दिन पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और अयोध्या केस के एक प्रसिद्ध अभिभाषक तथा भाजपा सांसद भूपेन्द्र यादव ने कथित तौर पर पूर्व उप-प्रधानमंत्री से भेंट की थी? तब क्या ऐसा मुमकिन है कि आडवाणी का पहले मूल सोच उनके द्वारा सी बी आइ अदालत में दर्ज कराए कथन से भिन्न रहा हो ? ऐसा होने की स्थिति में क्या ऐसा असम्भव होता कि मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन की पूर्व संध्या पर आडवाणी का किसी भी आशय का ‘अन्य कथन’ राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाता (आश्चर्यजनक रूप से उनके द्वारा सी बी आइ अदालत में दर्ज कराए गए कथन पर कोई राष्ट्रीय बहस नहीं हुई) और अयोध्या में मनने जा रहे पर्व पर उपस्थित होनेवाले चेहरों की चमक को प्रभावित कर देता। अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर की स्थापना के अपने प्रयासों के तहत आडवाणी द्वारा बाबरी ढाँचे के विध्वंस में अपनी भूमिका को लेकर दर्ज कराए गए कथन के बाद क्या इस बात पर थोड़ा-बहुत खेद व्यक्त किया जा सकता है कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचकर भी आडवाणी ने उस संतोष और श्रेय को प्राप्त करने से अपने आप को ‘स्वेच्छापूर्वक’ वंचित कर लिया जिसके लिए वे इतने वर्षों से संघर्ष कर रहे थे और शायद प्रतीक्षा भी ! मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय इतिहास में फिर किसके नाम दर्ज किया जाना चाहिए? इस सवाल का आधिकारिक उत्तर क्या अनुत्तरित ही रह जाएगा?


30-Jul-2020 10:43 AM

हमारे अब तक के अनुभव यही रहे हैं कि जब-जब भी बाहरी ताक़तों की तरफ़ से देश की संप्रभुता पर आक्रमण हुआ है ,समूचा विपक्ष अपने सारे मतभेदों को भूलकर तत्कालीन सरकारों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो गया है। जिस चर्चित ‘कारगिल युद्ध ‘को लेकर हाल ही में विजय दिवस मनाया गया उसकी भी यही कहानी है।सम्पूर्ण भारत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के साथ खड़ा हुआ था।आश्चर्यजनक रूप से इस समय पिछले अनुभवों की सूची से कुछ भिन्न होता दिखाई पड़ रहा है।

देश की सीमाओं पर पड़ोसी देश चीन की ओर से हस्तक्षेप और अतिक्रमण हुआ है ,उससे निपटने को लेकर चल रही तैयारियाँ भी नभ-जल-थल पर स्पष्ट दिखाई दे रही हैं पर सरकार चीनी हस्तक्षेप को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने को तैयार नहीं है।छोटी-छोटी बात पर आए-दिन सरकारों को मुँह चिढ़ाने वाला विपक्ष भी इस समय तटस्थ भाव से खामोशी की मास्क मुँह पर लटकाए हुए कोरोना से लड़ाई में अपनी व्यस्तता जता रहा है।जनता को तो जैसे कुछ भी पता ही नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए भी वह अनजान बनी रहना चाहती है।पर एक शख़्स है जो अपनी आधी-अधूरी पार्टी के सहारे और अपने राजनीतिक भविष्य की कोई चिंता किए बग़ैर चीन के द्वारा भारतीय सीमा में किए गए अनधिकृत प्रवेश को लेकर सरकार को लगातार कठघरे में खड़ा कर रहा है।

राहुल गांधी नाम का यह शख़्स जो इस समय लगातार सवाल उठा रहा है उसे उसके जवाब तो नहीं मिल रहे हैं ,उल्टे उससे दूसरे प्रश्न पूछे जा रहे हैं।ये प्रश्न भी प्रधानमंत्री स्वयं नहीं कर रहे हैं।उनकी पार्टी के अन्य लोग कर रहे हैं।सही भी है। प्रधानमंत्री के सामने राहुल गांधी की हैसियत का भी सवाल है।वे हैं तो केवल एक साधारण सांसद ही और वह भी सुदूर केरल प्रांत से ,उत्तर प्रदेश में हारे हुए। राहुल गांधी के सरकार से सवाल कोई लम्बे-चौड़े नहीं हैं।उन्हें उठाने के पीछे भावना भी ईमानदारी और देशभक्ति की ही है जिसकी कि अपेक्षा प्रधानमंत्री देश के नागरिकों से अक्सर ही करते रहते हैं।यह भी तय है कि राहुल जो कुछ भी कर रहे हैं उसके कारण अमेठी में उनके वोट और कम ही होने वाले है।वे फिर भी कर रहे हैं।

राहुल सरकार से कह रहे हैं कि चीनी सैनिकों ने भारत की ज़मीन के एक भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया है ।इस तथ्य को छुपाना और ऐसा होने देना दोनों ही देश-हित के विरुद्ध है।उसे लोगों के संज्ञान में लाना राष्ट्रीय कार्य है। ‘अब आप अगर चाहते हैं कि मैं चुप रहूँ और अपने लोगों से झूठ बोलूँ जबकि मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ ; मैंने सैटेलाइट फ़ोटो देखे हैं ,पूर्व सैनिकों से बात करता हूँ ।आप अगर चाहते हैं कि मैं झूठ बोलूँ कि चीनी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया है,तो मैं झूठ बोलने वाला नहीं।मैं ऐसा बिलकुल नहीं करूँगा।मुझे परवाह नहीं अगर मेरा पूरा करियर तबाह हो जाए।’

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि अगर राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं तो सरकार उस झूठ को इस तरह से क्यों छुपा रही है कि वह उसका खंडन करने को तैयार नहीं है ? इसका परिणाम यही हो रहा है कि राहुल जो कह रहे हैं वह सच नज़र आ रहा है।राहुल गांधी के सवालों का न सिर्फ़ कोई भी विपक्षी दल खुलकर समर्थन करने को तैयार नहीं है ,पूर्व रक्षा मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार तो इस मामले में पूरी तरह से सरकार के ही साथ हैं।उनका कहना है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।पवार का इशारा इस बात की तरफ़ भी है कि देश ने चीन के हाथों ज़मीन 1962 के युद्ध में खोई थी।प्रधानमंत्री का इस सम्बंध में कथन अभी तक यही है कि न तो कोई हमारी ज़मीन पर घुसा है और न किसी भारतीय ठिकाने (पोस्ट) पर क़ब्ज़ा किया है।

क्या मान लिया जाए कि देश की जनता ने अपने जानने के बुनियादी अधिकार और विपक्षी दलों ने अपने सवाल करने के हथियार के इस्तेमाल को सरकार की अनुमति के अधीन कर दिया है ? सवाल यह भी है कि कहीं राहुल खुद की पार्टी में भी तो अकेले नहीं पड़ते जा रहे हैं ? पता नहीं चलता कि उनकी पार्टी के कितने सीनियर नेता इस समय उनके साथ बराबरी से खड़े हैं ? तो फिर ऐसी स्थिति में इस लड़ाई को राहुल गांधी एक नेता के रूप में और एक सौ पैंतीस साल पुरानी कांग्रेस एक संगठन के तौर पर कितनी दूरी तक निभा पाएगी ? चिंता यहाँ केवल एक व्यक्ति के करियर को लेकर ही नहीं बल्कि एक स्थापित राजनीतिक संगठन के बने रहने की ज़रूरत की भी है।चाहे एक मुखौटे के तौर पर ही सही ,देश में लोकतंत्र के लिए उसका बने रहना ज़रूरी है।साथ ही ,पिछले सात वर्षों से कांग्रेस-मुक्त भारत के जो सपने देखे जा रहे हैं उनके हक़ीक़त में बदले जाने को लेकर उठने वाली चिंताएँ राहुल गांधी के करियर से कहीं ज़्यादा बड़ी हैं।पूछा जा सकता है कि जब देश को ही सरकार से कुछ जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी है तो फिर राहुल गांधी अकेले को चीनी हस्तक्षेप और पीएम कैयर्स फंड आदि की जानकारी को लेकर अपना करियर और कांग्रेस का भविष्य दांव पर क्यों लगाना चाहिए ? तो क्या फिर राहुल गांधी को सामूहिक रूप से यही सलाह दी जानी चाहिए कि वे उसी तरह से बोलना बंद कर दें जैसे कि हम सब ने बंद किया हुआ है ? तब तो पूरे देश में केवल एक व्यक्ति की आवाज़ ही गूंजती रहेगी।अभी तो दो लोग बोल रहे हैं ! और अंत में यह कि : ‘राहुल गांधी द्वारा पूछे जा रहे ग़ैर-राजनीतिक सवालों से सहमत होने लिए उनकी राजनीतिक विचारधारा से भी ‘सहमत’ होना क़तई ज़रूरी नहीं है !’

-श्रवण गर्ग


27-Jul-2020 9:56 AM

दल बदलने वालों के घर हो !

-श्रवण गर्ग

राजस्थान में भी कांग्रेस की सरकार अगर अंततः गिरा ही दी जाती है तो उसका ‘ठीकरा’ किसके माथे पर फूटना चाहिए ? मध्य प्रदेश को लेकर यही सवाल अभी हवा में ही लटका हुआ है।मार्च अंत (या उसके पहले से भी ) से मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का गांधी परिवार के साथ मंत्रणा करते हुए कोई चित्र अभी सार्वजनिक नहीं हो पाया है।महाराष्ट्र में अजित पवार भी फड़नवीस के साथ ताबड़तोड़ शपथ लेने के पहले सचिन पायलट की तरह ही किसी को दिखाई नहीं दे रहे थे।महाराष्ट्र का भाजपा प्रयोग तब सफल हो जाता तो शरद पवार की उम्र भर की राजनीतिक कमाई स्वाहा हो जाती।वे दोनों कांग्रेसों को बचा ले गए।इतना ही नहीं ,शिव सेना का भी उन्होंने कांग्रेसी शुद्धीकरण कर दिया है।अब उद्धव ने मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा को फिर से वैसा ही कोई प्रयोग करके दिखाने की चुनौती दी है।

अशोक गहलोत मुख्यमंत्री होने के अलावा एक बड़े जादूगर भी हैं।उनकी सरकार भी अब किसी बड़े जादू से ही बच सकती है।बहुत मुमकिन है पायलट के पास विधायकों की गिनती पूरी होने तक विधान सभा क्वॉरंटीन में ही रहे।राजस्थान में संकट की शुरुआत ‘सोने की छुरी पेट में नहीं घुसेड़ी जाती’ के प्रचलित राजस्थानी मुहावरे से हुई थी और उसका आंशिक समापन :’जनता राजभवन घेर ले तो फिर मुझे मत कहिएगा’, से हुआ था।मुख्यमंत्री ने अब कहा है कि ज़रूरत(?) पड़ी तो वे अपने विधायकों के साथ राष्ट्रपति से भी मिलेंगे या प्रधानमंत्री निवास के सामने धरना देंगे।मुख्यमंत्री को अभी अपनी उस चिट्ठी का जवाब प्रधानमंत्री से नहीं मिला है जिसमें उन्होंने राजस्थान में लोकतंत्र बचाने की अपील की थी।गेहलोत अपनी सत्ता बचाने के उनके संघर्ष को जनता के अधिकारों की लड़ाई में बदलना चाहते हैं। जनता जब महामारी और अभावों से मुक़ाबला कर रही हो,सत्ता की लड़ाई में उससे भागीदारी की उम्मीद करना वैसा ही है जैसी कि प्रधानमंत्री से मदद की माँग करना।

हो यह रहा है कि सभी जनता को बेवक़ूफ़ बनाना चाहते हैं। जनता भी कई बार अपना परिचय इसी प्रकार देने में ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती है। वह जानती है कि भाजपा लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर चुनी हुई सरकारों को गिराने और कांग्रेस उन्हें बचाने के काम में लगी है।जनता के विवेक पर किसी का कोई भरोसा नहीं है। ऐसा नहीं होता तो विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए करोड़ों की बोलियां नहीं लगतीं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को सितारा होटलों के कमरों में ‘दासों’ की तरह बंद नहीं कर लेते।
जनता के नाम पर सारा नाटक चल रहा है और जनता मूक दर्शकों की तरह थिएटर के बाहर खड़ी है ।अंदर मंच पर केवल अभिनेता ही दिखाई देते हैं ।सामने का हाल पूरा ख़ाली है।प्रवेश द्वारों पर सख़्त पहरे हैं।

मध्य प्रदेश में कोरोना काल का पूरा मार्च महीना एक चुनी हुई सरकार को गिराने में खर्च हो गया।जिसके बारे में मुख्यमंत्री ने ही ,बाद में वायरल हुए आडियो के अनुसार, स्वीकार किया कि सब कुछ केंद्र के इशारे पर किया गया था।उसी केंद्र के इशारे पर जिसके प्रधानमंत्री को अपनी सरकार बचाने के लिए गेहलोत ने चिट्ठी लिखी है।शिवराज सिंह के शपथ लेने के तीन महीने बाद पूरे मंत्रिमंडल का गठन हुआ और अभी कुछ दिन पहले ही काफ़ी जद्दोजहद के बाद मंत्रियों को विभागों का बँटवारा हुआ।अब ज़्यादातर नए मंत्री उप-चुनाव जीतने की तैयारी में लग गए हैं।मुख्यमंत्री को कोरोना हो गया है ।प्रदेश फिर भी चल रहा है।लोकतंत्र भी देश की तरह मध्य प्रदेश में भी पूरी तरह सुरक्षित है।एक सरकार कोरना में बन गई दूसरी को कोरोना की आड़ में ज़िंदा नहीं रहने दिया जा रहा है।

देश एक ऐसी व्यवस्था की तरफ़ बढ़ रहा है जिसमें सब कुछ ऑटो मोड पर होगा। धीरे-धीरे चुनी हुई सरकारों की ज़रूरत ही ख़त्म हो जाएगी।जनता की जान की क़ीमत घटती जाएगी और ग़ुलामों की तरह बिकने को तैयार जन प्रतिनिधियों की नीलामी-बोलियाँ बढ़ती जाएँगी।अमेरिका और योरप में इन दिनों उन बड़े-बड़े नायकों की सैंकड़ों सालों से बनीं मूर्तियाँ ,जिनमें कि कोलंबस भी शामिल हैं,इसलिए ध्वस्त की जा रहीं हैं कि वे कथित तौर पर ग़ुलामी की प्रथा के समर्थक थे।हमारे यहाँ इस तरह के नायकों के चित्र ड्रॉइंग रूम्स और कार्यालयों में लगाए जा रहे हैं और गांधी जी के पुतलों पर गोलियाँ चलाई जा रही हैं।

लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिस जनता की लड़ाई का दम भरा जा रहा है उसमें अस्सी करोड़ तो पाँच किलो गेहूं या चावल और एक किलो दाल लेने के लिए क़तारों में लगा दिए गए हैं और बाक़ी पचास करोड़ कोरोना से बचने के लिए बंटने वाली सरकारी वैक्सीन का अपने घरों में इंतज़ार कर रहे हैं। गेहलोत और कमलनाथ को वास्तव में घेराव राज भवन और प्रधानमंत्री आवास का नहीं बल्कि उन लोगों के घरों का करना चाहिए जो भुगतान की आसान किश्तों पर सत्ता की प्राप्ति के लिए अपनी पार्टी और नेतृत्व के प्रति स्व-आरोपित असहमति व्यक्त करने के लिए तैयार हो गए।और यह भी कि इस ‘असहमति’ के लिए उस मतदाता की कोई ‘सहमति’ नहीं ली गई जिसकी उम्मीदों को सरे आम धोखा दिया जा रहा है ?


24-Jul-2020 11:30 AM

-श्रवण गर्ग

देश की राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बीस जुलाई को एक बेकसूर पत्रकार विक्रम जोशी की हत्या पर पत्रकारिता के शीर्ष संस्थानों जैसे एडिटर्स गिल्ड, भारतीय प्रेस परिषद आदि की ओर से किसी औपचारिक भी प्रतिक्रिया का आना अभी बाकी है। ये संस्थान और बड़े सम्पादक अभी शायद यही तय कर रहे होंगे कि जो व्यक्ति मारा गया, वह वास्तव में भी कोई पत्रकार था या नहीं। यह भी कहा जा रहा है कि वह गुंडों के खिलाफ अपनी किसी प्रकाशित रिपोर्ट को लेकर तो नहीं मारा गया। उसकी हत्या तो अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ के खिलाफ की गई पुलिस रिपोर्ट की वजह हुई। ऐसे लोगों को विक्रम जोशी के अपनी छोटी-छोटी बेटियों की आँखों के सामने मारे जाने या उसके पत्रकार होने या न होने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता ! ये जानते हैं कि दिल्ली और अन्य गाँव-शहरों में रोजाना ही लोगों को सडक़ों पर मारा जाता है और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता।मैं विक्रम जोशी को नहीं जानता। वे गाजियाबाद के किस स्थानीय अखबार में काम करते थे यह भी पता नहीं। मेरे लिए इतना जान लेना ही पर्याप्त था कि वे एक बहादुर इंसान रहे होंगे। और यह भी कि अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर पुलिस तक जाने की हिम्मत कोई पत्रकार ही ज़्यादा कर सकता है। आम आदमी पुलिस और गुंडों दोनों से ही कितना डरता है, सबको जानकारी है।

विक्रम जोशी की हत्या तो देश की राजधानी की नाक के नीचे हुई इसलिए थोड़ी चर्चा में भी आ गई, पर सुनील तिवारी के मामले में तो शायद इतना भी नहीं हुआ होगा। मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड क्षेत्र के निवाड़ी जिले के गाँव पुतरी खेरा में पत्रकार तिवारी की दबंगों द्वारा हाल ही में हत्या कर दी गई। सुनील तिवारी ने भी पुलिस अधीक्षक को आवेदन कर उन दबंगों से अपनी सुरक्षा का आग्रह किया था, जिनके खिलाफ वे लिख रहे थे और और उन्हें धमकियाँ मिल रहीं थीं।कोई सुरक्षा नहीं मिली।तिवारी का वह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें वे बता रहे हैं कि उन्हें और उनके परिवार को किस तरह का खतरा है।निश्चित ही अब पूरी कोशिश यही साबित करने की होगी कि तिवारी पत्रकार थे ही नहीं।आरोप यह भी है कि तिवारी जिस अखबार के लिए उसके ग्रामीण संवाददाता के रूप में काम करते थे उसने भी उन्हें अपना प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया है।आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए।

क्या पत्रकार होना न होना भी पत्रकारिता जगत की वे सत्ताएँ ही तय करेंगी जो मीडिया को संचालित करती हैं, जैसा कि अभिनेता के रूप में पहचान स्थापित करने के लिए फिल्म उद्योग में जरूरी है? अगर आप सुशांत सिंह राजपूत हैं तो वे लोग जो बालीवुड की सत्ता चलाते हैं आपको कैसे अभिनेता मान सकते हैं ! ऐसा ही अब मीडिया में भी हो रहा है। पहले नहीं था। गाजियाबाद या निवाड़ी या और छोटी जगह पर होने वाली मौतें इसीलिए बिना किसी मुआवजे के दफ्न हो जातीं हैं कि मौजूदा व्यवस्था आतंक के नाम पर केवल विकास दुबे जैसे चेहरों को ही पहचानती है। वह भी उस स्थिति में अगर आतंक से प्रभावित होने वालों का सम्बन्ध व्यवस्था से ही हो।

गाजियाबाद के विक्रम जोशी या निवाड़ी के सुनील तिवारी को व्यक्तिगत तौर पर जानना जरूरी नहीं है। ज़्यादा जरूरी उन लोगों को जानना है जिनके जिम्मे उनके जैसे लाखों-करोड़ों के जीवन की सुरक्षा की जवाबदारी है और इनमें बिना चेहरे वाले कई छोटे-छोटे पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता शामिल हैं। वर्ष 2005 से अब तक कोई 68 आरटीआई कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं और छह को आत्महत्या करनी पड़ी है। इस सिलसिले में ताजा मौत 38-वर्षीय पोयपिन्हुँ मजवा की है जो बीस मार्च को मेघालय में हुई है। व्यवस्था के साथ-साथ ही उस समाज को भी अब जानना जरूरी हो गया है जिसके भरोसे संख्या में अब बहुत ही कम बचे इस तरह के लोग अभी भी तराज़ू के भारी पलड़े की तरफ बिना देखे हुए अपने काम में ईमानदारी से में लगे हुए हैं और समाज हरेक ऐसी मौत को अपनी ही एक और साँस का उखड़ जाना नहीं मानता।

विक्रम जोशी की हत्या को लेकर मैंने एक ट्वीट किया था। उसकी प्रतिक्रिया में सैकड़ों लोग मेरे द्वारा व्यक्त चिंता के समर्थन में आ गए। पर कुछ उनसे अलग भी थे जिनके विचारों का उल्लेख यहाँ इसलिए जरूरी है कि देश किस तरह से चलना चाहिए ये ही लोग तय करते हैं। जैसे : (1)’ सही कह रहे हैं श्रीमानजी ! अधिकांश मीडिया जगत के पास साँसों के अलावा कुछ भी नहीं बचा। कलम तो पहले ही बिक चुकी है, अब साँसों का भी संकट खड़ा हो गया है ‘, (2)’ पिछली सरकार में तो पत्रकारों को जेड प्लस सुरक्षा थी। कोई भी पत्रकार की हत्या नहीं हुई, लिस्ट भेजूँ क्या ?’, (3) ‘विक्रम जोशी की हत्या उनके द्वारा पत्रकार की हैसियत से किसी रिपोर्ट के प्रकाशन के कारण नहीं हुई है।’ ऐसे और भी कई ट्वीट।

एक घोषित अपराधी विकास दुबे की पुलिस के हाथों ‘संदेहास्पद’ एंकाउंटर में हुई मौत की जाँच तो सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है, पर गुंडों के हाथों सामान्य नागरिकों, पत्रकारों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, आदि की आए दिन होने वाली हत्याएँ तो सभी तरह के संदेहों से परे हैं। फिर भी अपराधियों को सजा क्यों नहीं मिलती? क्या हमें इसी तरह की हिंसक अराजकता के बीच जीना पड़ेगा?