सुनील कुमार

04-Aug-2020 9:24 PM

अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ से बनने वाले पहले मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल को छत्तीसगढ़ में लोग सम्मान और मोहब्बत से श्याम भैया या श्यामा भैया भी कहते थे। उनके एक-दो पुराने पारिवारिक मित्रों के अलावा उनके हमउम्र नेता-दोस्त नहीं के बराबर थे, और अपनी पीढ़ी के वे सबसे बुजुर्ग और सबसे बड़े नेता भी रह गए थे। उनसे जरा छोटे छोटे भाई विद्याचरण शुक्ल, लंबे समय तक तो दोनों एक ही पार्टी में थे, लेकिन फिर श्यामाचरण ने इंदिरा का साथ छोडऩे के एवज में 12 बरस कांग्रेस से वनवास झेला था, और वह उनकी जिंदगी के सबसे बुरे संघर्ष और सबसे लंबे इंतजार का दौर भी था। 

श्यामाचरण के बारे में इस दौर में कांग्रेस प्रवेश की अफवाहें इतनी बार उड़ती थीं कि धीरे-धीरे लोगों ने उसे सुनना भी बंद कर दिया था। अपनी हत्या के ठीक पहले जब इंदिरा गांधी रायपुर आई थीं, उस वक्त मैं अखबार में काम करता था, लिखता भी था, और फोटोग्राफी भी करता था। गांधी चौक पर इंदिराजी की सभा हुई थी, और मैंने मंच के एकदम करीब से उनकी सैकड़ों तस्वीरें खींची थीं। इसके अलावा एयरपोर्ट पर उनके आते या जाते, या शायद दोनों ही वक्त मैंने बहुत ही करीब से बहुत सी तस्वीरें खींची थीं, और उनकी खुली जीप के साथ दौड़ते हुए तस्वीरें खींचते हुए मेरे शर्ट की तमाम प्रेस-बटनें खुल गई थीं, और रात के दूरदर्शन के समाचार बुलेटिन में बहुत से लोगों ने मुझे खुले सीने दौड़ते हुए, फोटो लेते हुए पहचाना भी था। 

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उन तस्वीरों में मुझे एक तस्वीर खासकर याद है जिसमें इंदिराजी का विमान रवाना होते हुए रनवे पर दौड़ रहा था, बाकी तमाम नेता इधर-उधर चलने-फिरने लगे थे, लेकिन श्यामाचरण उसी जगह खड़े हुए विमान की तरफ हाथ हिला रहे थे, मानो कि खिडक़ी से इंदिराजी उन्हें देख रही होंगी। उन्हें भी पता नहीं होगा कि यह इंदिराजी की जिंदगी का आखिरी रायपुर दौरा होगा, और उनकी जिंदगी का आखिरी हफ्ता भी। वे रायपुर से ओडिशा गई थी, और फिर दिल्ली लौटीं जहां पर अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी थी। 

श्यामाचरण शुक्ल ने कांग्रेस के विभाजन के समय इंदिरा गांधी का साथ छोडऩे की जो गलती की थी, उसने उनकी सारी राजनीतिक जिंदगी बदलकर रख दी थी। फिर भी उनकी कांग्रेस में वापिसी हुई, और वे एक बार फिर मुख्यमंत्री भी बनाए गए। वे कुल मिलाकर तीन बार अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उनकी पहचान छत्तीसगढ़ ही रही, उनका दिल यहीं बसे रहा। 

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विद्याचरण शुक्ल की राजनीति कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी और जोड़तोड़ पर केन्द्रित रहती थी, लेकिन श्यामाचरण शुक्ल लगातार विकास के बारे में सोचते थे, और सिंचाई उनका पसंदीदा मामला था। वे मुख्यमंत्री न रहते हुए भी अपने आपको सिर्फ मुख्यमंत्री के ओहदे से जोडक़र देखते थे, और किसी विपक्षी के मुख्यमंत्री रहने पर उनका हमला सिर्फ मुख्यमंत्री पर होता था। 

उनके बाद एक वक्त मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा एक बार रायपुर आए, और उनकी प्रेस कांफ्रेंस हुई। लोगों ने उनसे श्यामाचरण शुक्ल के लगाए हुए आरोपों के बारे में पूछा तो उनका कहना था- श्याम भैया के दिमाग में पूरे ही वक्त मुख्यमंत्री बनना सवार रहता है। और इसमें उनकी गलती नहीं है, गलती भोपाल में मुख्यमंत्री निवास के नाम की है। श्यामला हिल्स नाम होने की वजह से श्याम भैया को पूरे वक्त आवाज आती रहती है कि श्याम ला, श्याम ला। और वे उसी बंगले में रहना चाहते थे। 

पटवाजी बोलने में बड़ी चटपटी जुबान का इस्तेमाल भी करते थे, और उन्होंने आगे कहा- श्याम भैया सीएम बनने के लिए इतने बेचैन हैं, इतने बेचैन हैं, कि रात भर करवटें बदलते रहते हैं, हमारी पद्मिनी भाभी ठीक से सो भी नहीं पाती हैं। 

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पटवाजी ने यह बात कही तो मजाक के रूप में थी, लेकिन श्यामाचरण शुक्ल ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से कम या अधिक, किसी चीज पर नजर नहीं रखी थी। वे कम या अधिक वक्त के लिए तीन बार मुख्यमंत्री बने।

श्यामाचरण शुक्ल उन लोगों में से थे जिन्हें बोलने पर कम काबू रहता था। कई बार उनके दिए हुए बयान ही उनके कांग्रेस प्रवेश की राह में रोड़ा बन गए थे। अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए थे, और श्यामाचरण कांग्रेस के बाहर थे। राजनीति का तकाजा यही था कि अर्जुन सिंह यह प्रवेश न होने दें, और इसके लिए उन्होंने तमाम किस्म की चतुराई का इस्तेमाल किया था। श्यामाचरण का एक ऐसा इंटरव्यू सामने आया था जिसमें उन्होंने आपातकाल के इंदिरा और संजय के बारे में कुछ अवांछित बातें कही थीं। यह एक अलग बात है कि उनका खुद का यह कहना था कि ये बातें उनकी कही हुई नहीं थीं, और अर्जुन सिंह की एक साजिश के तहत कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने उनसे लिए इंटरव्यू में कई बातें अपने मन से जोड़ी थीं, और उनके कांग्रेस प्रवेश के आखिरी वक्त पर इसे कुछ अखबारों में छपवाकर इंदिराजी के सामने पेश किया गया था। अब इस विवाद से जुड़े हुए सारे के सारे लोग धरती से जा चुके हैं, इसलिए मैं वही बातें लिख पा रहा हूं, जो कि श्यामाचरणजी ने रूबरू मुझसे कही थीं। 

श्यामाचरण शुक्ल को जाने अपने किन करीबी लोगों से यह खबर की गई थी कि मैं उन दिनों जिस अखबार में काम करता था, वहां मैं ही अकेला उनका आलोचक था, उनके खिलाफ था। यह बात अखबार के भीतर तो मेरा नुकसान नहीं कर पाई क्योंकि उसे निकालने वाले लोगों का दिल बड़ा था, और वे मेरे खिलाफ और भी ऐसी शिकायतें सुनते आए थे। लेकिन आखिर में मुझे यह भी पता लगा कि उन्हें मेरे खिलाफ भडक़ाया किसने था, लेकिन जो लोग सार्वजनिक जीवन में नहीं रहे, और अब धरती पर भी नहीं रहे, उनके बारे में कुछ कहना जायज नहीं होगा, जरूरत ही नहीं है। 

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लेकिन घूम-फिरकर किसी तरह श्यामाचरण शुक्ल मुझसे बात करने को राजी हुए, और अपने छोटे भाई की तरह उनका भी लगातार यह शक मुझ पर बना हुआ था कि मैं कहीं बातचीत रिकॉर्ड तो नहीं कर रहा हूं। उन्हें एक बार फिर मुझे यह भरोसा दिलाना पड़ा कि मैं औपचारिक इंटरव्यू के लिए रिकॉर्डर सामने रखकर ही रिकॉर्ड करता हूं, और रिकॉर्डिंग की इजाजत वाली बातचीत भी मैं रिकॉर्डिंग में सबसे पहले दर्ज कर लेता हूं ताकि किसी विवाद के वक्त सुबूत रहे। लेकिन विद्याचरण के बाद श्यामाचरण, इन दोनों के मन में एक जैसा शक, बिना किसी के बिठाए हुए तो बैठ नहीं सकता था। दोनों भाईयों के मिजाज में बहुत सी बातें बिल्कुल अलग, और कुछ बातें एक-दूसरे से विपरीत भी थीं। लेकिन उनकी कई बातें एक सरीखी भी थीं, जिनमें से एक यह भी था कि वे मीडिया के अधिकतर लोगों के मुंह से भैया सुनने के आदी थे, बहुत से लोग उनके पांव छूते थे, और वे बहुत तीखे सवालों के आदी भी नहीं थे। 

श्यामाचरण शुक्ल की एक बड़ी कमजोरी भी थी कि वे अपनी पीढ़ी के लोगों के परिवारों के लोगों को उनके बाप-दादा के नाम से ही याद रख पाते थे, मानो बात की पीढिय़ां अपने आपमें कोई अस्तित्व नहीं थीं। इस मामले में विद्याचरण शुक्ल एकदम अलग थे जो कि जवानों के साथ रहते थे, और वे ही लोग उनके सहयोगी थे। 

श्यामाचरण शुक्ल लंबी बातचीत के शौकीन थे, अपनी यादों को बांटने के भी शौकीन थे, और वे लगातार चाय पिलाने, और घर पर तलकर बनाए गए पकौड़े वगैरह खिलाने के भी शौकीन थे। मेरी कमसमझ से उनकी एक बात मुझे गलत तरीके से खटक गई थी, जो कि बाद में साफ हुई। वे आए हुए लोगों के लिए भी अपने हाथ से ही चाय बनाते थे, और पहले अपने कप में केतली से चाय निकालते थे, फिर सामने वाले के कप में। मुझे यह बात अटपटी लगती थी, लेकिन फिर बाद में यह बात समझ आई कि चाय निकालने की यही सही संस्कृति रहती है कि पहले अपने कप में निकाली जाए, और फिर बाद में जब मेहमान के लिए निकाली जाए, तो तब तक वह चाय केतली की चायपत्ती से कुछ और कडक़ हो चुकी रहे। श्यामाचरण शुक्ल सुबह से रात तक सारा वक्त चाय पीते, पकौड़े खाते-खिलाते, और बातें करते गुजार सकते थे। 

लेकिन इन दोनों भाईयों ने अलग-अलग वक्त पर, अलग-अलग मुझसे बातचीत में अर्जुन सिंह की सेहत को लेकर कहा था कि हार्ट के बाइपास ऑपरेशन के बाद वे बिस्तर से शायद ही उठ सकें। लेकिन इस ऑपरेशन के बाद अर्जुन सिंह तो महत्वपूर्ण बने रहे, श्यामाचरण शुक्ल किनारे रहे, और अर्जुन सिंह के काफी पहले गुजर गए। विद्याचरण शुक्ल जरूर अर्जुन सिंह के बाद तक रहे, लेकिन अर्जुन सिंह गुजरने के दो बरस पहले तक महत्वपूर्ण केन्द्रीय मंत्री रहे, विद्याचरण शुक्ल तकरीबन महत्वहीन हो गए थे। इस तजुर्बे से मुझे उस वक्त तो लिखने को तो कुछ नहीं मिला, क्योंकि ये बातें अनौपचारिक चर्चा का हिस्सा थीं, लेकिन यह नसीहत जरूर मिली कि दुश्मनी भी हो, तो भी किसी की मौत की कामना नहीं करनी चाहिए। 

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छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐसे बहुत से लोग रहे जो कि अजीत जोगी के सताए हुए रहे, और अजीत जोगी के सडक़ हादसे में अपाहिज होने के बाद कई बार यह सोच जाहिर करते थे कि अगले चुनाव तक तो वे शायद ही रहें, और उन्हें गलत साबित करते हुए अजीत जोगी ने पहियों की कुर्सी पर कई चुनाव निपटाए थे। शुक्ल बंधुओं और अर्जुन सिंह के अपने तजुर्बे के आधार पर तमाम जोगी विरोधियों को मेरी यही नसीहत रहती थी कि किसी के बुरे का सोचो, तो उसका भला ही होता है। मैं शुक्ल बंधुओं की यह बात बताता भी था, और जोगी का हौसला देखकर हैरान भी होते चलता था। 

लेकिन अजीत जोगी के बारे में लिखने का मौका फिर आएगा, आज तो श्यामाचरण शुक्ल के बारे में भी लिखने को बहुत है। श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री न रहते हुए भी लगातार शहरी विकास के लिए भी फिक्रमंद रहते थे, और उन्हें शहर में सिर उठाती इमारतें पसंद नहीं आती थीं। लेकिन उनकी पसंद और नापसंद बहुत हद तक निजी रहती थीं, और कई बार वे एक व्यापक सार्वजनिक हित से परे देखते थे। अजीत जोगी जब मुख्यमंत्री थे, तो रायपुर शहर में एक कांग्रेस नेता की इमारत तोडऩे म्युनिसिपल पहुंचा था, और बाद में अदालती दखल से वह मामला थमा था। जब मैंने जोगी से इस बारे में बात की, तो उनका कहना था कि श्यामाचरणजी एयरपोर्ट से घर पहुंचने के बीच जब दो इमारतों के बगल से गुजरते थे, तो उन्हें फोन करते थे, और तोडऩे के लिए कहते थे। एक तो कांग्रेस नेता की थी, और दूसरी भाजपा के नेताओं की थी जिसमें ऊंचाई का कुल दो-तीन फीट का गलत निर्माण था, लेकिन उसे तुड़वाने के लिए श्यामाचरण शुक्ल अड़े रहते थे। ये दोनों उन्हें निजी नापसंद मामले थे, जबकि शहर में सैकड़ों ऐसे दूसरे निर्माण उनके मुख्यमंत्री रहते हुए भी थे जिनके बारे में उनका कुछ सोचना-कहना नहीं था। आज काम के बीच इस कॉलम को लिखते हुए इससे अधिक वक्त मुमकिन नहीं हो पा रहा है, इसलिए बाकी कुछ बातें आगे फिर। फिलहाल यह साफ कर देना जरूरी है कि यहां कुछ कतरा-कतरा यादें ही लिखी जा रही हैं, यह कॉलम किसी भी व्यक्ति का समग्र मूल्यांकन नहीं है। 
-सुनील कुमार


03-Aug-2020 4:49 PM

विद्याचरण शुक्ल के बारे में कल लिखना मधुमक्खी के छत्ते को छेडऩे जैसा हो गया। कल उनका जन्मदिन भी मनाया जा रहा था, और उस दिन उन्हें इमरजेंसी का खलनायक लिखना कुछ लोगों को खल गया जो उन्हें नायक मानते थे, और हैं। सच तो यह है कि कल सुबह जब यह लिखा गया, उस वक्त यह याद भी नहीं था कि विद्याचरण शुक्ल ने अपना जन्मदिन एक अगस्त से खिसकाकर दो अगस्त कर लिया था, क्योंकि उस दिन उनके दिवंगत पिता पंडित रविशंकर शुक्ल का भी जन्मदिन पड़ता था, और समारोह कुछ अधिक हो सकते थे। चूंकि इस अखबार का मिजाज नेताओं की जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर लिखने का नहीं है, इसलिए यह दिन याद भी नहीं था। लेकिन जैसा कि हम बार-बार लिखते हैं सार्वजनिक जीवन में जीने वाले लोग शीशे के मछलीघर में रहने वाली मछली की तरह की ही निजता के दावेदार हो सकते हैं। 

आज किसी और नेता के बारे में लिखने के पहले विद्याचरण शुक्ल के बारे में कुछ बातें और लिखी जा सकती हैं, और उनके साथ मेरा वास्ता खासा लंबा पड़ा है, उन्हें कई दशक तक छत्तीसगढ़ में करीब से देखा है, इसलिए उनके बारे में लिखना कुछ अधिक दिलचस्प भी है, और आज राखी के दिन की निजी हड़बड़ी के बीच उन पर अधिक रफ्तार से लिखना अधिक आसान भी है। 

विद्याचरण शुक्ल को उनकी रंगीनमिजाजी के लिए भी जाना जाता था, हालांकि हिन्दुस्तान में नेताओं की जिंदगी के इस पहलू के बारे में ज्यादा लिखा नहीं जाता, और जनता भी जिंदगी के ऐसे किस्सों को सुनकर भी अनसुना कर देती है, और वोटों पर इसका फर्क नहीं पड़ता। 

इंदिरा गांधी के एक जूनियर मंत्री रहते हुए उस वक्त विद्याचरण शुक्ल को अमरीका की किसी एक संस्था से न्यौता मिला था, जिसे लेकर बाद में सरकार के भीतर उन्हें झिडक़ी भी पड़ी थी कि यह संस्था अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए से रिश्तों के लिए जानी जाती है, और उन्हें इसके न्यौते पर नहीं जाना था। खैर, वे गए थे, और वह वक्त होली के तुरंत बाद का था। यह बात बहुत पुरानी है, मेरी देखी हुई नहीं लेकिन सुनी हुई है। जब वे वहां पहुंचे तो उनके बालों पर से होली का रंग गया नहीं था। जिस किसी अमरीकी पत्रकार ने उन्हें देखकर वहां कोई खबर बनाई, या किसी गॉसिप कॉलम में लिखा, उसने लिखा कि इंदिरा गांधी का एक ऐसा मंत्री आया है जो अपने बालों को बैंगनी रंगता है। 

आपातकाल के बहुत बाद विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस छोडक़र, एनसीपी में जाकर, वहां से निकलकर भाजपा के उम्मीदवार बनकर लोकसभा चुनाव लडक़र हार चुके थे। लेकिन भाजपा के भीतर अभी दो बरस पहले कर्नाटक की एक सांसद शोभा करंदलाजे ने पार्टी का यह पोस्टर पोस्ट किया था और लिखा था कि वीसी शुक्ला को पत्रकारों के खिलाफ बदनीयत से सत्ता के बेजा इस्तेमाल का दोषी पाया गया था, लेकिन इसका ईनाम उन्हें राजीव सरकार ने मंत्री बनाकर दिया गया था, बाद में नरसिंह राव सरकार में भी। अब भाजपा के 2018 के इस पोस्टर का खलनायक, 2004 में छत्तीसगढ़ की महासमुंद संसदीय सीट के चुनाव में भाजपा का नायक था! उस वक्त भी इमरजेंसी का इतिहास वीसी शुक्ला के साथ था ही। 

 

जब उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया, तो भी लोगों ने मजाक बनाया कि उन्हें एक्सटर्नल अफेयर्स दिया गया है। लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने अपने आसपास अपने से कम से कम एक पीढ़ी से अधिक फासले वाले लोगों को ही रखा, जिनसे उनका बातचीत का लिहाज बना रहता था। उनकी राजनीति ऐसी थी कि वे अपनी बराबरी के किसी और को साथ नहीं रखते थे, और शायद ऐसी ही राजनीति उनके बड़े भाई श्यामाचरण शुक्ल की भी थी, और इसीलिए ये दोनों भी एक साथ राजनीति नहीं करते थे, एक प्रदेश में रहता था, तो दूसरा राष्ट्रीय राजनीति में। दोनों ही भाईयों के सबसे करीब सहयोगी हमेशा ही उनके पांव छूने वाले रहते थे, और राजनीति में यह बात बड़ी सहूलियत की रहती है कि जो लोग बिना बात पांव पकड़ते रहते हैं, वे किसी बात के होने पर भी हाथ नहीं पकड़ सकते। इन दोनों के आसपास इनका नाम लेकर, नाम के साथ जी लगाकर बोलने वाले लोग अपवाद के रूप में ही रहे होंगे, बाकी तमाम साथी-समर्थक बड़ी कमउम्र के रहते थे। और तो और अखबारनवीसों में भी इन दोनों को वैसे ही लोग अधिक सुहाते थे जो कि उन्हें भैया बोलते हों। 

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मैंने अपनी अखबारनवीसी में निजी और पारिवारिक रिश्तों के बिना किसी नेता को कभी भैया नहीं कहा। नतीजा यह था कि विद्याचरण शुक्ल लंबे अरसे तक मेरे साथ सहज नहीं रह पाते थे। उन्हें भैया न कहने वाला अखबारनवीस बागी तेवरों वाला लगता था, और मुझे 30 बरस तक देखने के बाद भी उनके मन से यह शक कभी नहीं गया कि मैं कहीं उनकी बात रिकॉर्ड तो नहीं कर रहा हूं। मैंने उन्हें बार-बार अपने तरीके साफ किए कि मैं किसी भी रिकॉर्डिंग के पहले बताकर, पूछकर, और रिकॉर्डर सामने रखकर बात रिकॉर्ड करता हूं, लेकिन उनकी नजरें मेरी जेब पर, या शायद आखिरी के कुछ बरसों में मेरे मोबाइल पर लगी ही रहती थीं। यह तो गनीमत कि उनकी जिंदगी रहने तक मेरे कान पर ब्लूटूथ टंगना शुरू नहीं हुआ था, वरना उन्हें पक्का भरोसा रहता कि यह उनकी बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए ही है। 

आखिरी के कुछ बरस उनका शक कुछ घटा था, उनके खिलाफ मेरे कोई बागी तेवर हैं इसकी गलतफहमी कम हुई थी, और उन्हें यह गलतफहमी हो गई थी कि मैं एक समझदार और बात करने लायक पत्रकार हूं। नतीजा यह हुआ कि वे अपनी जिस जीवनी को लिखना चाहते थे, और जिसके लिए उन्होंने एक अघोषित सलाहकार मंडल बनाया था, उस जीवनी के बारे में वे मुझसे भी चर्चा करने लगे। उनके व्यक्तित्व का यह पहलू मेरा देखा हुआ नहीं था, और मेरे लिए यह बात थोड़ी सी अटपटी भी थी कि वे मुझसे रायमशविरा करने लगे थे। मैंने एक शर्त रखी थी जिसे न चाहते हुए भी उन्होंने मान लिया था कि वे जब मुझसे बात करेंगे, तो कोई तीसरे व्यक्ति वहां नहीं रहेंगे। 

वे आमतौर पर अपने मुसाहिबों से घिरे रहते थे। कोई भी बड़ा नेता वैसे ही दायरे के भीतर महफूज महसूस करता है, विद्याचरण भी उनमें से ही एक थे। उनके आसपास उनके तकरीबन हर वाक्य पर जी भैया कहने वाले लोग अगर न रहें, तो उनका बातचीत का सिलसिला ठीक नहीं चलता था। जिस तरह शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में अगर सम पर सिर हिलाने वाले कुछ समझदार श्रोता सामने न रहें, तो गायक का मूड उखड़ जाता है, किसी पेशेवर कव्वाल के साथ उसके शेर दुहराने वाले लोग न रहें, तालियों से संगत देने वाले लोग न रहें, तो कव्वाली आधी भी अच्छी नहीं हो पाती, और तो और छत्तीसगढ़ में किसी भागवत-प्रवचन में भी सामने बैठे कुछ लोग प्रवचनकर्ता की हर बात पर हहो-हहो कहने वाले न रहें, तो प्रवचनकर्ता पटरी से उतर जाते हैं, कुछ ऐसा ही विद्याचरण शुक्ल के साथ भी होता था। अकेले में बात करना, किसी गैरभक्त से बात करना उनके लिए कुछ अटपटा सा था, लेकिन फिर भी वे मुझसे बात करने के लिए यह बर्दाश्त कर लेते थे। 

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आखिरी के इन बरसों में आमतौर पर दोपहर के खाने की मेज पर घंटों लंबी ऐसी अकेले बातचीत के आखिर में उनका शक मुझ पर से कुछ घटा रहता था, और मैं उनके तजुर्बे का कायल होकर वहां से निकलता था। हिन्दुस्तान के राजनीतिक इतिहास के इतने लंबे दौर के वे एक प्रमुख खिलाड़ी रहे, तमाम चीजों के गवाह रहे, उनसे बातें करने के बाद मैं बहुत सी नई जानकारियां पाकर निकलता था, और मुझे हैरानी भी होती थी कि इतने ऊपर तक पहुंचा हुआ यह नेता किस तरह स्थानीय राजनीति और छोटे, ओछे मुद्दों पर अपना वक्त जाया करता था। इस पर भी हैरानी होती थी कि उनके आसपास अधिकतर समय रहने वाले अधिकतर लोग ऐसे नहीं थे, जो कि उनसे कोई बौद्धिक बहस कर सकते हों। कुल मिलाकर जिस वक्त आप अपने समविचारकों और अपने प्रशंसकों से घिर जाते हैं, आपका आगे बढऩा रूक जाता है, विद्याचरण शुक्ल के साथ मेरा मानना है कि ऐसा ही कुछ हुआ था। इसलिए जब आखिर में उनका नमक खाते हुए भी उनसे असहमति और बहस के साथ मैं उनकी जीवनी पर चर्चा करता था, तो वे मुझे बर्दाश्त करते हुए सुनने लगे थे। 

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मैं उन्हें बार-बार याद दिलाता था कि चिट्ठियां, दस्तावेज, और जानकारियों को इकट्ठा  करना, लोगों से उस पर विचार-विमर्श करना काफी नहीं है, और उन्हें असल लिखना शुरू कर देना चाहिए। उन्हें यह बात कुछ बुरी लगती थी कि मानो मैं उनकी बढ़ती हुई उम्र और बाकी कम बचे हुए वक्त के बारे में इशारा कर रहा हूं। मेरी ऐसी कोई नीयत नहीं थी, लेकिन मेरा यह तो पक्का भरोसा है कि इंसान को अपनी खुद की जिंदगी की नियति का पहले से कुछ पता नहीं होता, और इसीलिए काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, जैसी अच्छी नसीहत किसी ने लिखी थी। विद्याचरण शुक्ल नक्सलियों की गोली से मारे जाएंगे यह तो मैंने अपने सबसे बुरे सपने में भी नहीं देखा होता, लेकिन लिखना शुरू करना विचार-विमर्श के मुकाबले खासा मुश्किल और मेहनतकश काम होता है, इसलिए लोग आमतौर पर बातें करते रह जाते हैं। इसलिए मैं आखिरी की ऐसी कई मुलाकातों में उन्हें लिखना शुरू करने के लिए कोंचने लगा था। मेरा ख्याल है कि वे अपनी जीवनी लिखने को लेकर जितने गंभीर थे, उससे खासे अधिक गंभीर वे उसके बारे में चर्चा भर करने को लेकर थे। यह एक अलग बात थी कि देश के एक नामी-गिरामी इतिहासकार, रामचन्द्र गुहा से भी वे अपनी जीवनी को लेकर विचार-विमर्श करते थे। इसका मुझे पक्का भरोसा है कि ताजा भारतीय इतिहास पर अच्छा लिखने वाले रामचन्द्र गुहा को भी विद्याचरण शुक्ल से खासी जानकारी मिली होगी।

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मैं उनकी राजनीति की जीत-हार के मौजूद आंकड़ों पर यहां जगह बर्बाद नहीं कर रहा हूं, बल्कि कुछ ऐसी बातों को लिख रहा हूं जो कि लोगों की कम सुनी हुई होंगी। इन बातों में अनुपात से बहुत अधिक मौजूदगी मेरी अपनी भी है, लेकिन मैं अपने देखे-सुने को ही इस कॉलम में अधिक लिखना चाहता हूं। विद्याचरण शुक्ल की जिंदगी किस्म-किस्म के मलाल से भरी हुई थी, उन्हें आपातकाल की सारी तोहमतें अपने सिर पर लेने की बेबसी का मलाल भी था, और वे यह भी कहते थे कि उनके पास इंदिरा गांधी और संजय गांधी का नाम लेने का मौका था, लेकिन उन्होंने सारी जिम्मेदारी खुद लेना खुद ही तय किया था। उन्हें वीपी सिंह को लेकर यह मलाल था कि कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाला, लेकिन वीपी सिंह की सरकार में उन्हें वह महत्व नहीं मिला जिसके कि वे हकदार थे। उन्हें नरसिंहराव सरकार के दौरान संसदीय कार्यमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी के लिए असुविधा खड़ी करने वाले बोफोर्स विवाद को बढ़ावा देने का मलाल नहीं था, लेकिन बाद में जब सोनिया गांधी ने उन्हें छत्तीसगढ़ का पहला मुख्यमंत्री नहीं बनाया, तो उन्हें उसका बड़ा मलाल था। वे महत्वाकांक्षी थे, कुछ मायनों में अतिमहत्वाकांक्षी भी थे, थोड़ी सी हद तक वे महत्वोन्मादी भी थे, लेकिन इन सबसे ऊपर वे जमीनी-चुनावी राजनीति करने में जितने लड़ाकू थे, उतने लड़ाकू लोग छत्तीसगढ़ की राजनीति में कम ही होंगे। विद्याचरण शुक्ल पर बात अभी बाकी है मेरे दोस्त, एक ब्रेक के बाद।
-सुनील कुमार


02-Aug-2020 4:26 PM

बेतरतीब लिखने की अराजक आजादी की एक सहूलियत यह भी होती है कि एक बार में एक से ज्यादा लोगों के बारे में भी लिखा जा सकता है, और एक व्यक्ति के बारे में एक से ज्यादा किस्तों में भी। कुछ व्यक्ति छत्तीसगढ़ की राजनीति में सचमुच ऐसे रहे जिनके बारे में कई-कई किस्तों में ही थोड़ी सी बात हो पाएगी, इसलिए ऐसे लोगों के बारे में एक किस्त तो शुरू में हो जानी चाहिए। 

विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ की राजनीति में सबसे अधिक चर्चित, सबसे अधिक विवादास्पद, और जिंदगी के आखिर में बहुत ही अप्रत्याशित शहादत पाने वाले नेता रहे। किसने यह सोचा था कि शानदार व्यक्तित्व और आलीशान शौक रखने वाला यह नेता इस तरह नक्सल गोलियों का शिकार होकर अस्पताल में दम तोड़ेगा। विद्याचरण शुक्ल तो न कभी राज्य की सरकार में रहे, न ही केन्द्र सरकार में उनका कोई काम नक्सल-विरोधी अभियान वाला रहा, और वे नक्सल-हमले में इस तरह फंस गए। 

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विद्याचरण शुक्ल ने राजनीति में अहमियत विरासत में पाई थी। वे अविभाजित मध्यप्रदेश के अपने वक्त के सबसे बड़े नेता पंडित रविशंकर शुक्ल के बेटे थे, और उम्र के लिहाज से वे श्यामाचरण शुक्ल के छोटे भाई थे। यह एक अलग बात थी कि दोनों भाईयों की राजनीति नदी के दो पाटों की तरह अलग-अलग फासले पर चलती थी, और दोनों कभी एक साथ राज्य में, या एक साथ केन्द्र में सक्रिय नहीं रहे। बहुत सा दौर तो ऐसा रहा कि इन दोनों में से कोई एक कांग्रेस के बाहर भी रहा। इन दोनों की तुलना करने का वक्त अगली किसी किस्त में आएगा, लेकिन एक लाईन इन दोनों के बारे में किसी बुजुर्ग अखबारनवीस की कही हुई यह लिखना जरूरी है जो उन्होंने किसी पत्रकार के सवाल के जवाब में कही थी। छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण पत्रकार रहे मायाराम सुरजन ने बाहर से आए किसी पत्रकार के एक सवाल के जवाब में कहा था- विद्याचरण शुक्ल अधिक तेज नेता हैं, लेकिन श्यामाचरण शुक्ल एक बेहतर इंसान हैं। 

यह बात दोनों की तारीफ करने वाली थी, लेकिन फिर भी विद्याचरण शुक्ल को यह बात खटक सकती थी कि उन्हें श्यामाचरण जितना अच्छा इंसान नहीं माना गया। खैर, सार्वजनिक जीवन में लोगों को अपनी अहमियत के अनुपात में ही मूल्यांकन बर्दाश्त करना होता है, और विद्याचरण शुक्ल से अधिक मूल्यांकन तो छत्तीसगढ़ में न किसी नेता का हुआ होगा, और न ही शायद आगे भी हो। 

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छत्तीसगढ़ से बाहर विद्याचरण शुक्ल की दोनों-तीनों शिनाख्त अप्रिय कही जा सकती हैं। आपातकाल के दौरान वे सेंसर-मंत्री थे, जब वीपी सिंह ने कांग्रेस छोड़ी, और जनमोर्चा बनाया, तो विद्याचरण शुक्ल कांग्रेस से निकाले गए थे, और वे जनमोर्चा के एक बड़े नेता बने, और तीसरा मौका आया जब छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी, और शरद पवार की एनसीपी का राज्य संगठन बनाया, तीन साल बाद विधानसभा चुनाव में जोगी पार्टी-सरकार को शिकस्त दी। ये तीनों ही बातें जो उन्हें बाहर खबरों में लाती थीं, वे तीनों ही कांग्रेस पार्टी के लिए अप्रिय अध्याय रहीं। विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री न बन पाने से इतने आहत रहे कि वे पहले एनसीपी के प्रदेश के मुखिया बने, और फिर कांग्रेस के खिलाफ लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए भाजपा चले गए, और शायद उनकी जिंदगी का वही सबसे बुरा फैसला रहा जब कांग्रेस के परंपरागत वोटरों ने उन्हें खारिज कर दिया, और भाजपा के परंपरागत वोटरों ने उन्हें अछूत का अछूत माना। यह उनका चुनावी अंत था, यह अलग बात थी कि पार्टी में बाद में उनका दाखिला हो गया, और जब बस्तर में पार्टी के एक काफिले में वे चल रहे थे, तो नक्सल-हमले में घायल होने के बाद जब वे गुजरे, तो अपने पर वे पार्टी के झंडे के भी हकदार हो गए थे। 

विद्याचरण शुक्ल अपने राजनीतिक जीवन को लेकर एक मोटी किताब के हकदार हैं, इस छोटे से कॉलम का न तो इतना दुस्साहस है कि उन्हें दो-चार किस्तों में समेटने की कोशिश करे, और न ही वह मुमकिन ही होगा। इसलिए यह साफ कर देना जरूरी है कि यह कुछ-कुछ बातों को लेकर लिखा जा रहा है, और जितना लिखा जा रहा है, उससे कई गुना अधिक छूटा भी जा रहा है। 

विद्याचरण शुक्ल अपनी उम्र के खिलाफ हमेशा लड़ते रहे। उन्हें बहुत बन-ठनकर, सजकर, शान से जीना पसंद था। वे बहुत नफीस कपड़ों के आदी थे, और खादी के परंपरागत कपड़ों से परे वे तरह-तरह के पतलून और टी-शर्ट भी पहनते थे। उनके शौकीनमिजाज होने के बारे में बहुत सी और कहानियां भी प्रचलित रहीं, लेकिन उनमें से किसी की वजह से भी छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में उनके लिए सम्मान में कमी नहीं रही, कभी कोई अपमान नहीं रहा। छत्तीसगढ़ से बाहर देश के अंग्रेजी मीडिया में, अपनी आदतन बेरहमी के मुताबिक विद्याचरण शुक्ल को लेकर कई तरह की विवादास्पद बातें गॉसिप कॉलमों में लिखी जाती थीं, और उनमें से ही एक बात को लेकर छत्तीसगढ़ के उस वक्त के एक सबसे प्रमुख अखबार को शुक्ल-समर्थकों की ओर से मुकदमेबाजी भी झेलनी पड़ी थी, और उसकी वजह के पीछे मैं व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार भी था। दिल्ली के एक अखबारनवीस की लिखी गई वैसी ही एक मजाकिया बात वहां तो खप गई थी, लेकिन छत्तीसगढ़ में यहां के एक हिन्दी अखबार में उसके छपने से बरसों तक विद्याचरण शुक्ल से अखबार की बातचीत भी बंद रही, और मेरी भी। बाद में दोनों ही पक्षों के शुभचिंतक और दोस्त सुभाष धुप्पड़ ने किसी तरह बातचीत का सिलसिला शुरू करवाया था। 

दरअसल विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ के मीडिया से एक खास किस्म के बर्ताव के आदी थे। आपातकाल के पहले से इस शहर के बड़े-बड़े पत्रकार उन्हें भैया कहकर ही बात करते थे, और कुछ बड़े सीनियर पत्रकार भी भरी प्रेस कांफ्रेंस में उनके पैर छूते थे। ऐसे बर्ताव के बाद आपातकाल में तो और भी बहुत से पत्रकार उनका एक अतिरिक्त सम्मान करने लगे थे, क्योंकि छत्तीसगढ़ की खबरें उनकी खुर्दबीनी निगाह में रहती थीं, और राज्य का छोटा सा मीडिया पूरे देश के सेंसर-मंत्री (जिसके ओहदे का नाम सूचना एवं प्रसारण मंत्री था) को सीधे बर्दाश्त करने की हालत में नहीं था। 

आपातकाल के बाद शाह आयोग और दूसरी कई किस्म की जांच का सामना करते हुए विद्याचरण शुक्ल वहां तो कमजोर होते रहे, लेकिन वे छत्तीसगढ़ में फिर भी बड़े नेता बने रहे। हमने ऊपर दोनों भाईयों की राजनीति के अलग-अलग चलने का जिक्र भी किया है। लेकिन एक दौर ऐसा था जब ये दोनों के दोनों अलग-अलग किरदारों में एक सा काम कर रहे थे, और वह दौर इमरजेंसी का था। इमरजेंसी में विद्याचरण शुक्ल दिल्ली में संजय गांधी की चौकड़ी में रहे, और देश भर के मीडिया पर तरह-तरह का जुल्म किया। इधर छत्तीसगढ़ में श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री रहे, और पूरे प्रदेश में हजारों बेगुनाह मीसा में बंद कर दिए गए, संजय गांधी को युवा हृदय सम्राट स्थापित करने के लिए बस्तर में आमसभा करवाई गई, और पूरे प्रदेश से सरकारी बसों को उसमें लगाया गया, जिसके भुगतान से बाद में कांग्रेस पार्टी ने मना कर दिया कि उसका लिखित आदेश दिखाया जाए। वह दौर ऐसा था कि हिन्दुस्तान की सरहद में किसी के पास इतना हौसला नहीं था कि संजय गांधी की हसरतों से कोई सवाल करे, और कुछ राज्यों में तो मुख्यमंत्री संजय गांधी की चप्पलें लेकर पैदल चल रहे थे, अपने अंगवस्त्र से मंच पर संजय गांधी की कुर्सी साफ कर रहे थे। बाद में शुक्ल बंधु अपनी सफाई में चाहे जो कहते रहे हों, इतिहास की हकीकत यही है कि इन्हें अपनी कुर्सियों से इतना मोह था कि अपनी तनी हुई देह से रीढ़ की हड्डी भी इन्होंने अलग करके इमरजेंसी के दौरान ताले में धर दी थी। दोनों भाई राजनीति अलग-अलग करते थे, लेकिन मध्यप्रदेश में इमरजेंसी की ज्यादतियों में दोनों पार्टी के एक पुराने निशान, बैल-जोड़ी की तरह एक ही मकसद में लगे हुए थे। 

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पूरे देश के लिए विद्याचरण शुक्ल आपातकाल के बाद से एक खलनायक की तरह रहे, और मीडिया के लोग उनकी सेंसरशिप को कभी माफ नहीं कर पाए। उन्हीं का तजुर्बा है कि हिन्दुस्तान में बाद की किसी सरकार ने सेंसरशिप को घोषित रूप से लागू करने के बारे में नहीं सोचा, यह एक अलग बात है कि रीढ़ की हड्डियों का संग्रहालय बनाने में बहुत से बड़े नेताओं को आज भी मजा आता है। 

मीडिया के लोगों को इमरजेंसी के वीसी शुक्ला से कितनी नफरत थी उसका एक तजुर्बा मुझे तब हुआ जब देश के सबसे विख्यात कॉर्टूनिस्ट आर.के. लक्ष्मण का छत्तीसगढ़ आना हुआ। वह शायद अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री रहने का दौर था, और उन्होंने लक्ष्मण को राज्य पर एक स्कैचबुक बनाने का न्यौता दिया था। उसी सिलसिले में लक्ष्मण पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे थे, और छत्तीसगढ़ आने पर वे रायपुर में सर्किट हाऊस में अपनी पत्नी के साथ ठहरे हुए थे। वे मीडिया के लोगों से बात नहीं करते थे, उनके इंटरव्यू भी शायद ही कहीं छपते थे। लेकिन मैंने लक्ष्मण के बेटे के एक दोस्त का जिक्र किया जो कि मेरे साथ युद्ध-संवाददाता प्रशिक्षण में महीनों तक रहा था। सर्किट हाऊस जाकर जब इस पहचान के हवाले से मैंने उनसे बात करनी चाही, तो वे अपनी आदत के खिलाफ तुरंत ही मिलने आ गए, और फिर अपनी पत्नी को भी बुलवा लिया कि बेटे के दोस्त का दोस्त आया है। मैं उन दिनों फोटोग्राफी भी करता था, और लक्ष्मण के इंटरव्यू के साथ-साथ मैंने सर्किट हाऊस के बाहर लॉन पर उन्हें ले जाकर उनकी ढेर सारी तस्वीरें खींची थीं। बाद में डार्करूम में खुद ही तुरंत उनके प्रिंट तैयार करके लौटकर उनसे हर प्रिंट पर ऑटोग्राफ भी करवाया था। उस इंटरव्यू के दौरान और बाकी बातचीत में लक्ष्मण ने विद्याचरण शुक्ल की इमरजेंसी और सेंसर के खिलाफ इतनी गालियां दी थीं, इतनी गालियां दी थीं, कि उनका यहां पर जिक्र असंसदीय हो जाएगा। अब न लक्ष्मण रहे, न ही वीसी शुक्ला, इसलिए वे गालियां अब कागजों पर दर्ज करना भी ठीक नहीं है। 

विद्याचरण शुक्ल तीन बेटियों के पिता रहे, जिनमें से किसी ने भी राजनीति में उनके जीवनकाल में कोई दिलचस्पी नहीं ली। उनकी बड़ी बेटी उनके गुजरने के बाद उनकी राजनीतिक विरासत सम्हालने की हसरत जरूर रखती थी, लेकिन तब तक छत्तीसगढ़ की राजनीति इतनी तेज रफ्तार और नेताओं के लिए ओवरटाईम का सामान बन चुकी थी कि दिल्ली में बसी हुई प्रतिभा पांडेय के लिए छत्तीसगढ़ में कोई भी जगह बची नहीं थी।
 
विद्याचरण शुक्ल पर अगली कई-कई किस्तों में लिखना हो सकता है, ये सिर्फ उनसे जुड़ी हुई कुछ बातें हैं, बाकी बातें अगली किसी किस्त में। 

-सुनील कुमार 


01-Aug-2020 2:06 PM

राजनीति, सार्वजनिक जीवन, और शासन-प्रशासन में रहते हुए कोई व्यक्ति किस तरह कुएं का मेंढक हो सकता है, यह देखना हो तो रायपुर के महापौर, विधायक, और छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के मंत्री रहे हुए तरूण चटर्जी को देखना चाहिए। कुएं का मेंढक लिखने मतलब किसी भी तरह तरूण चटर्जी, या मेंढक का अपमान करना नहीं है, इन दोनों को इस मिसाल पर आपत्ति हो सकती है, लेकिन तरूण चटर्जी के मिजाज का बखान करने के लिए इससे कम शब्दों में इससे बेहतर कोई मिसाल नहीं हो सकती। इसलिए तरूण चटर्जी की आत्मा, और उनके वक्त के कुएं के मेंढकों के आज के वंशज दोनों कृपया बुरा न मानें।

तरूण चटर्जी की सारी की सारी जिंदगी रायपुर म्युनिसिपल की सरहद, और उनकी अपनी विधानसभा सीट तक सीमित थी। भाजपा के 13 विधायकों को लेकर वे दल-बदल करके जोगी सरकार में शामिल हुए थे, और थोक के इस सौदे में उन्हें मंत्री बनना नसीब हुआ था। लेकिन पूरे प्रदेश के मंत्री रहते हुए भी उनके दिमाग के टॉवर की रेंज उनके विधानसभा क्षेत्र की सरहद पर खत्म हो जाती थी। अपने साम्राज्य में वे एक-एक गली-नाली को जानते थे, लेकिन बाहर के किसी को नहीं पहचानते थे। यह उनकी खामी नहीं थी, उनकी खूबी थी कि वे टेबिल लैम्प की रौशनी की तरह अपना सारा ध्यान फोकस रखते थे, अपने वोटरों तक सीमित रखते थे। 

तरूण चटर्जी ने विद्याचरण शुक्ल के साथ राजनीति शुरू की थी, और बढ़ते-बढ़ते वे अपने दम पर अपनी लोकप्रियता से महापौर चुने गए। एक महापौर का जितना ध्यान म्युनिसिपल की बुनियादी जिम्मेदारियों पर रहना चाहिए, उतना पूरे का पूरा ध्यान तरूण चटर्जी का रहता था। और वे दिन खासे मुश्किल के भी थे। छत्तीसगढ़ में दशकों तक विद्याचरण शुक्ल की मर्जी कांग्रेस पार्टी के अधिकतर लोगों के लिए हुक्म सरीखी रहती थी। फिर तरूण तो विद्या भैया के खेमे के थे, उनकी मर्जी से परे कुछ सोच नहीं सकते थे। और छत्तीसगढ़ की उस वक्त राजधानी न बने हुए रायपुर में हर कोई अपने काम को लेकर विद्याचरण तक पहुंच रखते थे। नतीजा यह था कि मेयर के लायक कोई काम भी अगर वीसी शुक्ला से होते हुए आता था, तो हैरानी नहीं होती थी। ऐसे में वीसी की मर्जी के साथ-साथ चलते हुए म्युनिसिपल को चलाना, और जनता के छोटे-छोटे काम करना, तरूण चटर्जी के पहले, और उनके बाद वैसा कोई दूसरा मेयर नहीं हुआ। 

उन दिनों राजधानी भोपाल रहती थी। मेयर को किसी भी काम के लिए भोपाल में मंत्री और सचिव के पास, और डायरेक्ट्रेट में जाकर डेरा डालना पड़ता था। तरूण चटर्जी तेज थे, वे अपने साथ अपने टाइपिस्ट और टाईपराईटर को लेकर जाते थे, और वहां मंत्रालय-सचिवालय, वल्लभ भवन, के बाहर पेड़ के नीचे टाईपिस्ट का डेरा डलवा देते थे। भीतर दफ्तरों में तरूण चटर्जी से जिस बात का प्रस्ताव बनाकर भेजने के लिए कहा जाता था, वह प्रस्ताव वे घंटे भर में लेकर वापिस सिर पर चढ़ बैठते थे। लोगों के साथ उनकी बातचीत का लहजा अपने साम्राज्य की जरूरतों से तय होता था, और वे किसी भी सीमा तक नरमी बरतते हुए मंत्री या अफसर के हाथ जोड़ लेते थे, और उनका यह मानना रहता था कि किसी निर्वाचित और पद पर बैठे नेता की अकेली इज्जत होने वाला काम रहता है, और कुछ नहीं। 

म्युनिसिपल की राजनीति में जितना जोड़तोड़ करना होता है, जितना छोटा-छोटा ख्याल रखना होता है, उसमें तरूण चटर्जी बहुत ही माहिर थे। एक गैरछत्तीसगढ़ी समुदाय के रहते हुए भी वे किसी भी स्थानीय जाति और समुदाय के बाशिंदे के मुकाबले अधिक छत्तीसगढ़ी, और अधिक स्थानीय थे। किसी को डांटकर, किसी को फटकार कर, किसी को पुचकार कर, और जरूरत रहे तो किसी की मुसाहिबी भी करके वे काम निकालते थे। 

राजनीति में तरूण चटर्जी ने कांग्रेस छोडक़र भाजपा में जाना तय किया क्योंकि उन्हें अपने इलाके का और अपना भला उस वक्त भाजपा में दिख रहा था। भाजपा से विधायक बनने के बाद उन्होंने रातोंरात 13 विधायकों के साथ भाजपा तोड़ी, मुख्यमंत्री निवास के रास्ते में नाम के लिए शायद एक कोई नई पार्टी बनाई, और कांग्रेस में चले गए। वे बुनियादी रूप से कांग्रेसी सोच के नेता थे, लेकिन उससे भी ऊपर वे गरीबों के नेता थे। उनके म्युनिसिपल इलाके में, और उनके चुनाव क्षेत्र में गरीबों का जितना भला हुआ, उतना शायद प्रदेश के किसी भी दूसरे विधानसभा क्षेत्र में नहीं हुआ होगा। तमाम गंदी बस्तियों और झुग्गी-झोपडिय़ों को बसाना, वहां बुनियादी सुविधाएं जुटाना, जमीन के पट्टे दिलवाना, रिक्शों का मालिकाना हक दिलवाना, एकबत्ती कनेक्शन दिलवाना, राशन कार्ड बनवाना, उनका रोज का काम था। मंत्री बनने के पहले तक कलेक्ट्रेट, म्युनिसिपल, और अनगिनत सरकारी दफ्तरों में वे जुलूस लेकर पहुंचते रहते थे, या प्रतिनिधि मंडलों के साथ जाकर अफसरों से गरीबों का काम करवाते थे। 

बहुत पुराने गांधीवादी सांसद केयूर भूषण को छोड़ दें, तो बाद की पीढ़ी में तरूण चटर्जी, और उनके एक दूसरे साथी नेता बलबीर जुनेजा जो बाद में मेयर भी बने, यही दो ऐसे नेता थे जो आए दिन कुष्ठरोगियों की बस्ती में जाते रहते थे, उनके साथ बैठते थे, उनके काम निपटाते थे। तरूण चटर्जी मोटे तौर पर गरीबों की राजनीति करते थे, उनके बुनियादी काम निपटाने के लिए किसी से भी भिड़ जाते थे, और हिकमतअमली से काम निकलवा लेते थे। 

उनके परिवार से राजनीति में किसी की दखल नहीं रही, और वे कुनबे के अकेले नेता बनकर रहे, और चले गए। राजनीति के इमरजेंसी के बाद से शुरू वे ऐसे दिन थे जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और जनसंघ, या भाजपा के बीच कोई निजी कटुता नहीं रहती थी, और पक्ष-विपक्ष की अपनी-अपनी जगह दोनों एक-दूसरे के साथ सहअस्तित्व में जी लेते थे। तरूण चटर्जी की चर्चा जरूरी इसलिए है कि स्थानीय संस्थाओं की राजनीति में अपनी निजी महत्वाकांक्षा से, आत्मसम्मान और दंभ से ऊपर जाकर कैसे जनहित के काम करवाए जा सकते हैं, तरूण चटर्जी इसकी एक बड़ी मिसाल रहे। अपने वोटरों और आम लोगों के बीच एक जुझारू और कामयाब नेता की छवि के पीछे उनकी चतुराई भी थी, मेहनत भी थी, और कामयाबी भी थी। आज के वक्त जब छत्तीसगढ़ राज्य बन चुका है, और मेयर होने का मतलब मुख्यमंत्री का करीबी होना हो जाता है, तब वैसे जुझारूपन और वैसे संघर्ष के दिन लद गए। तरूण चटर्जी की कल्पना करने के लिए उनके वक्त का होना जरूरी है, उस वक्त तो उनके इलाके में हर कोई उन्हें अच्छी तरह जानते ही थे।

तरूण चटर्जी के लिए जिंदगी में एक बड़ी शिकस्त रही अपने ही घर के वार्ड से म्युनिसिपल का चुनाव हारना। वे इसके पहले मेयर रह चुके थे, विधायक रह चुके थे, लेकिन बड़े नेता हो जाने के बाद फिर मेयर बनने के लिए उन्होंने वार्ड का चुनाव लड़ा, और एक साधारण समझे जाने वाले नेता से हार गए। यह एक अलग बात है कि हार का विश्लेषण करने वाले लोगों ने इसकी वजह ढूंढ निकाली और कहा कि भाजपा के एक राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता सिकंदर बख्त रायपुर आए थे, और तरूण चटर्जी उन्हें प्रचार के लिए अपने वार्ड ले गए थे जहां की मुस्लिम आबादी भरपूर थी। उनकी चतुराई धरी रह गई दो मायनों में, एक तो यह कि बड़े नेता को छोटा चुनाव नहीं लडऩा चाहिए, दूसरी यह कि अतिआत्मविश्वास में मुस्लिम आबादी में भाजपा के बड़े नेता को वे ऐसे वक्त ले गए जब बाबरी मस्जिद गिरने के जख्म ताजा थे। बाकी कुछ और लोगों की चर्चा के दौरान तरूण चटर्जी के बारे में कुछ और बातें।

-सुनील कुमार


31-Jul-2020 11:01 PM

पवन दीवान की जिंदगी छत्तीसगढ़ के राजिम से जुड़ी रही। वे वहीं पास एक गांव, किरवई, में पैदा हुए, जहां उनके एक कच्चे मकान में उनके साथ खाने का मौका मुझे मिला था। उसके अलावा भी आपातकाल के तुरंत बाद के जनता पार्टी राज के वक्त से उनसे जो परिचय शुरू हुआ, तो वह कभी कमजोर नहीं पड़ा। उनके बारे में लिखते हुए मैं कई बार बहुत बेरहम हुआ, लेकिन उनके दिल का रहम डिगा नहीं। मुझसे वे हमेशा प्रेम का बर्ताव करते रहे, जो कि सांसारिक जीवन से ऊपर उठ जाने का एक सुबूत सा था, लेकिन सुबूत था नहीं।
 
अपनी निजी जिंदगी में पारिवारिक स्थिति की वजह से पवन दीवान सन्यासी बने रहे, वे सन्यासी की पोशाक में भी जिए, लेकिन उनका मन सन्यास से अछूता रहा। वे राजनीति से कभी सन्यास नहीं ले पाए, और उनका मोह भी खत्म नहीं हुआ। इस तरह वे एक सन्यासी की देह में एक असन्यासी आत्मा के साथ जीते रहे, लड़ते रहे, पाते रहे, खोते रहे, और फिर पाने की चाहत में पार्टियां बदलते रहे। 

अब वे नहीं रह गए हैं, लेकिन यह लिखने में मुझे कोई हिचक इसलिए नहीं है कि उनके रहते-रहते भी मैं काफी कुछ कड़वा लिखते रहता था, और वे उसे बर्दाश्त करते हुए मुझसे प्रेमसंबंध बनाए रखते थे। 

पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आंदोलन करने वाले पुराने लोगों में से पवन दीवान भी एक थे। इस आंदोलन से उनके पहले भी लोग जुड़े, और उनके बाद भी, लेकिन पवन दीवान के नाम का जिक्र पृथक छत्तीसगढ़ से हमेशा ही बने रहा। इमरजेंसी के तुरंत बाद जब चुनाव हुए, तो जनसंघ और समाजवादियों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई थी, और पवन दीवान राजिम विधानसभा सीट से उसके उम्मीदवार थे। यह सीट श्यामाचरण शुक्ल की घरेलू सीट मानी जाती थी, लेकिन आपातकालीन ज्यादतियां इतनी अधिक हुई थीं कि संजय गांधी के चरणों पर अपनी-अपनी रीढ़ की हड्डियां चढ़ाकर मुख्यमंत्री बने रहने वाले लोगों में से श्यामाचरण भी थे। वे जनता पार्टी की लहर में, और जबरिया-नसबंदी जैसे कुकर्म के तुरंत बाद पवन दीवान से चुनाव हार बैठे। अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रविशंकर शुक्ल के मुख्यमंत्री रहे बेटे को हराने वाले पवन दीवान को मध्यप्रदेश में मंत्री बनने का मौका मिला। शायद यही चुनाव था जब छत्तीसगढ़ में एक नया नारा इस्तेमाल हुआ था- पवन नहीं यह आंधी है, छत्तीसगढ़ का गांधी है। 

पवन दीवान राजनीति में आने के पहले से छत्तीसगढ़ के एक सबसे लोकप्रिय कवि थे, और सन्यासी होने के बावजूद उनकी एक बड़ी रोमांटिक कविता, एक थी लडक़ी मेरे गांव की, चंदा जिसका नाम था..., की खूब डिमांड रहती थी, और वे मंच से कविता पढऩे वाले सबसे लोकप्रिय कवियों में से एक थे। इस कविता की मांग बराबर रहती थी, और वे इसे आखिरी तक बचाकर भी रखते थे, क्योंकि पहले रसमलाई परोस दी, तो बाद में बालूशाही किसे सुहाएगी। पवन दीवान जितने लोकप्रिय कवि थे उतने ही लोकप्रिय भागवत-प्रवचनकर्ता भी थे। उनकी भागवत सुनने के लिए भी लोग जुटते थे, और ये तमाम चीजें उनके चुनाव जीतने में काम आईं। 

जनता पार्टी सरकार में जेल मंत्री रहते हुए पवन दीवान ने मुझ पर एक व्यक्तिगत उपकार भी किया था। रायपुर की सेंट्रल जेल में एक कैदी को फांसी की सजा होनी थी। यह 1978 की बात थी, और मुझे अखबार में नौकरी शुरू किए दो ही बरस हुए थे। उम्र 20 बरस थी, लेकिन अखबारनवीसी का जोश बहुत था। जेल सुप्रीटेंडेंट जी.के. अग्रवाल से मेरे दोस्ताना ताल्लुकात थे, हालांकि वे उम्र में मुझसे दोगुने से भी बड़े थे। उनकी मेहरबानी से मैं जेल के इस कैदी, बैजू, से कई दिनों तक रोज उसकी कोठरी में जाकर मिलकर, लंबी बातचीत करके आता था। यह पूरा सिलसिला जेल के नियमों के खिलाफ था, लेकिन यह चला। आखिर में जब उसकी फांसी का दिन आ गया, तो मैंने अग्रवाल साहब से कहा कि कोई ऐसा जरिया हो सकता है कि मैं यह फांसी देख सकूं? उन्होंने कहा कि उनके अधिकार में तो ऐसा नहीं है, लेकिन अगर जेलमंत्री चाहें तो ऐसी इजाजत दे सकते हैं, और उस इजाजत की अधिक छानबीन किए बिना वे अपने स्तर पर मुझे यह छूट दे देंगे। 

पवन दीवान से मेरे उस वक्त के एक वरिष्ठ सहकर्मी राजनारायण मिश्र के संबंध अधिक घरोबे के थे, और उनके साथ जाकर मैंने ऐसी चि_ी पवन दीवान को सर्किट हाऊस में दी। अग्रवाल साहब भी मंत्री के रायपुर में होने की वजह से सर्किट हाऊस में ही थे। चि_ी में मैंने फांसी की सजा के बेरहम होने, और उसके खिलाफ एक जनमत तैयार करने के लिए ऐसी रिपोर्टिंग की जरूरत बखान की थी, जो कि पूरी तरह बोगस तर्क था। लेकिन उनको छूने वाली बात इसके बाद थी कि कवि हृदय जेलमंत्री के रहते हुए ऐसी अनुमति की उम्मीद है। इस पर पवन दीवान ने अग्रवाल साहब से पूछा, और उनका सोचा हुआ जवाब था- सर, जेल मैन्युअल इस बारे में मौन है। लेकिन आप तो मंत्री हैं, आप चाहें तो इजाजत दे सकते हैं। 

पवन दीवान का लंबा प्रशासनिक इतिहास तो था नहीं, फांसी की सजा को अमानवीय, उसके खिलाफ जागरूकता की जरूरत, और मंत्री को कवि हृदय लिखना काम आया, और उन्होंने उसी आवेदन पर अनुमति लिख दी। नतीजा यह हुआ कि अपने एक और वरिष्ठ सहकर्मी गिरिजाशंकर के साथ मैंने वह फांसी देखी, और उसकी रिपोर्ट लिखी, जो कि हिन्दुस्तान में अपने किस्म की पहली रिपोर्ट थी। बीस बरस की उम्र में, वैसी शोहरत दिलाने वाली रिपोर्ट के मौके के लिए मैं हमेशा ही पवन दीवान का अहसान मानते रहा, और जब कभी उनके दल-बदल पर मुझे खिल्ली उड़ानी पड़ी, मन के भीतर अच्छा नहीं लगा। इसके बावजूद पेशे का ईमान वैसी कड़वी बातें लिखवाते रहा। पवन दीवान जब कई बार कई पार्टियां बदल चुके थे, तब शायद उनके आखिरी दल-बदल के वक्त मैंने इस अखबार के पहले पन्ने पर उनकी ठहाके लगाती हुई तस्वीर के साथ लिखा था- यह आदमी हर कुछ बरस में पार्टी बदल देता है, उसके बाद छूटी हुई पिछली पार्टी किसी वक्त उसे लेने के फैसले पर रोती है, और यह आदमी इसी तरह ठहाके लगाकर हॅंसता है। 

ऐसा लिखने के बाद भी पवन दीवान ने कभी बोलचाल बंद नहीं की। कभी इंटरव्यू देना उनके लिए राजनीतिक असुविधा का रहता था, तो भी वे अनचाहे भी मुझसे तो बात कर ही लेते थे। उनके देह पर कपड़ा आधी धोती जितना छोटा रहता था, लेकिन उनका दिल बड़ा था। दिल इस मायने में भी बड़ा था कि उसमें हसरतें हमेशा बड़ी रहीं। उनसे लालबत्ती और ओहदे का मोह नहीं छूटा। परिवार का सांसारिक मोह तो उन्होंने छोड़ दिया था, लेकिन राजनीतिक जीवन का मोह उनके मन में हमेशा ही उछालें मारते रहता था। 

जब जनता पार्टी सरकार गई और मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह की सरकार आईं, उस वक्त अर्जुन सिंह कांग्रेस पार्टी के भीतर छत्तीसगढ़ के शुक्ल बंधुओं के मुकाबले छोटे नेता थे। वे सार्वजनिक बातचीत में भी उन्हें श्यामा भैया, विद्या भैया कहकर बुलाते थे, और एक बहुत ही शातिर राजनेता की तरह उनकी जड़ें भी काटते थे। वही वक्त था जब वे 1980 में मुख्यमंत्री बने थे, और शुक्ल बंधुओं, और उनके गुजरे हुए पिता रविशंकर शुक्ल के व्यक्तित्व के समानांतर उन्होंने कुछ विकल्प खड़े करने की कोशिश की, और कामयाब हुए। उसी में उन्होंने शहीद वीरनारायण सिंह को स्थापित किया, पवन दीवान को कांग्रेस में लेकर आए। इस राजनीतिक फैसले में जेल सुप्रिटेंडेंट अग्रवाल साहब अर्जुन सिंह के काम आए। वे पवन दीवान के जेलमंत्री रहते उनके रायपुर से गुजरते हुए जेल में कैदियों के लिए उनका भागवत प्रवचन करवाते थे, और उनके करीब थे। उनके मार्फत पवन दीवान से कई दौर की बात चली, और शायद उसी वक्त अजीत जोगी भी रायपुर के कलेक्टर बनकर आए थे। कुल मिलाकर अफसरों की घेराबंदी के साथ पवन दीवान का कांग्रेस प्रवेश हुआ, और शुक्ल बंधुओं को एक कड़वा घूंट पीकर रह जाना पड़ा। पवन दीवान को अर्जुन सिंह ने मंत्री स्तर का दर्जा देकर किसी निगम का अध्यक्ष बनाया था, और अपने सहयोगियों से कहा भी था कि उनका ख्याल रखें। 

पवन दीवान का ऐसा विविधता से भरा हुआ राजनीतिक जीवन रहा, सामाजिक, धार्मिक, और आध्यात्मिक जीवन रहा, सन्यासी और सांसारिक का मिलाजुला जीवन रहा, रोमांटिक कविता से भीगा हुआ साधु जीवन रहा। वे एक अच्छे इंसान रहे, और राजनीति में जितनी मौकापरस्ती और जितना दलबदल मान्य है, वे उस सीमा के भीतर उसका पूरा इस्तेमाल करते हुए गुजरे। उनके बारे में यादें बहुत हैं, बाकी फिर कभी किसी अगली किस्त में। 
-सुनील कुमार


30-Jul-2020 5:33 PM

इस कॉलम का आज पहला दिन, छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के, और रायपुर के राजधानी बनने के पहले दिन से शुरू कर रहा हूं। अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह उस वक्त छत्तीसगढ़ के भी सबसे लोकप्रिय कांग्रेस नेता थे। वैसे तो यहां नेता बड़े-बड़े थे, श्यामाचरण शुक्ल, और विद्याचरण शुक्ल दोनों मौजूद थे, दोनों ताकतवर भी थे। आज इस बात को पढक़र दोनों की आत्मा को कुछ ठेस पहुंचेगी कि दिग्विजय सिंह वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के बाहर के नेता होते हुए भी इस राज्य में सबसे लोकप्रिय कांग्रेस नेता थे। नेता तो मोतीलाल वोरा भी थे, जो दिग्विजय के काफी पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे, और कांग्रेस हाईकमान के बहुत करीबी हो गए थे, लेकिन वे भी लोकप्रियता में दिग्विजय के पासंग नहीं बैठते थे। ऐसे में राज्य बनने के पहले, और बनने का फैसला हो जाने के बाद एक दिन दिग्विजय भोपाल से रायपुर आए। उन्होंने कम्युनिटी हॉल, जहां पर अभी पुलिस मुख्यालय और राजभवन दाएं-बाएं बन गए हैं, वहां पर एक बैठक ली। बैठक में सभी तबकों के लोगों को बुलाया गया, और उनकी राय ली गई कि शहर में कहां क्या बनाया जाए। मौजूद लोग लोगों की भावनाएं एकदम उफान पर थीं, यह राज्य बनने जा रहा है यह बात एकदम से लोगों के गले नहीं उतर रही थी, हालांकि वह संसद के रास्ते, और उसके भी पहले दिग्विजय की विधानसभा के रास्ते हकीकत बन चुकी थी। 

दिग्विजय खुद कुछ पिघले हुए थे, और उन्हें मालूम था कि वे कुछ ही दिन इस इलाके के मुख्यमंत्री हैं, हालांकि उन्होंने खुद पहल करके अविभाजित मध्यप्रदेश की विधानसभा में छत्तीसगढ़ को राज्य बनाने का प्रस्ताव पास करवाया था। कम्युनिटी हॉल में मैं भी मौजूद था, और दिग्विजय सिंह को मैंने घर आने का न्यौता दिया कि इसके बाद पता नहीं वे समारोह में ही आएंगे या कब आएंगे। अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में वे एक बार मेरे घर आएं, ऐसा मैं इसलिए भी चाहता था कि सुख-दुख में वे उस अखबार के साथ खड़े रहे थे जिसमें मैं काम करता था, और मैं कुछ नाजुक मौकों का भागीदार भी था। 
उन्होंने तुरंत हॉं कहा, मैं मोटरसाइकिल से घर लौटा, और कुछ देर बाद दिग्विजय का काफिला वहां आ गया। उनके साथ अफसरों की गाडिय़ां भी थीं, और कांग्रेस के भी बहुत से नेता साथ आए थे। लेकिन यह दिग्विजय की भलमनसाहत थी कि उन्होंने साथ आए तमाम लोगों को बरामदे में ही रोक दिया, और भीतर अकेले ही आए। बैठक में बैठकर वे तीन लोगों के छोटे से परिवार से बात करते रहे, और जब उन्हें एक नॉनअल्कोहलिक वाईन पेश की गई, तो वे कुछ हड़बड़ाए, और फिर जोरों का ठहाका लगाते हुए मेरे बेटे से बोले- अब तुम मुझे वाईन पिलाना सिखा रहे हो...!

मेरे डिजाइन किए हुए घर को वे खूब देर तक खड़़े देखते रहे, साथ में तस्वीरें खिंचवाईं, और एक व्यस्त दौरे के बीच जिसे काफी कहा जा सकता है, उतना वक्त गुजारकर वे गए। 

फोटो : पीटीआई

लेकिन एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी उदारता का मुझे पहले भी तजुर्बा हो चुका था। इसके काफी पहले जब मेरी मॉं गुजरीं, तब देर रात फोन पर लगी, नई-नई आंसरिंग मशीन पर उनका रिकॉर्ड किया हुआ मैसेज मिला कि उन्हें मॉं के गुजरने की खबर से तकलीफ हुई है, और अगले दिन उन्हें रायपुर आना था, और वे घर आएंगे। इसके बाद उस वक्त रायपुर-भिलाई के आईजी सीपीजी उन्नी का फोन आया कि सीएम कल एयरपोर्ट से सीधे मेरे घर पहुंचेंगे। 

अगले दिन वे आए, एयरपोर्ट से सीधे घर आए, एक ही दिन पहले अंतिम संस्कार हुआ था, तो पूरा परिवार घर पर ही थे। आते ही उन्होंने परिवार के उन तमाम लोगों के पैर छुए जो कि उनसे बड़े थे, और जितनी देर बैठे, किसी तरह की राजनीतिक चर्चा नहीं की, सिर्फ परिवार से बात की, और फिर निकले। 
उनका एक और तजुर्बा अभी कुछ बरस पहले का, जब उनकी पत्नी का कैंसर से निधन हो गया था, और अमृता से उनकी दूसरी शादी हुई थी। अमृता राज्यसभा टीवी पर एक बहुत अच्छी पत्रकार रह चुकी थीं, और उसके कुछ कार्यक्रमों में मैंने हिस्सा लिया था, इसलिए उनसे मेरा टेलीफोन और टीवी का परिचय था। उन दिनों मैं स्लिपडिस्क की वजह से बिस्तर पर था, और मैसेंजर पर ही अमृताजी से बात हुई थी। उनसे दिग्विजय को पता लगा कि मैं ऐसी तकलीफ में हूं तो उन्होंने खबर करवाई कि डोंगरगढ़ से देवी दर्शन करने के बाद लौटकर वे घर आएंगे। वे आए, खासी देर बैठे, वे खुद स्लिपडिस्क से गुजरे हुए थे, इसलिए उनके पास देने के लिए बहुत सारी नसीहतें थीं। यहां से लौटने के बाद वे नर्मदा परिक्रमा के लिए निकलने वाले थे, और उस बारे में भी देर तक बात होती रही। 
छत्तीसगढ़ की राजनीति के बारे में अपने तजुर्बे को लिखते हुए आज अचानक यह भी याद पड़ रहा है कि भोपाल के वक्त से अब तक, दिग्विजय सिंह ने सुख-दुख के मौकों पर रिश्ता रखा, साथ निभाया, और उनके खिलाफ पिछले अखबार में जितना तेजाबी मैंने लिखा था, मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने कभी उसका कोई हिसाब चुकता नहीं किया। दूसरी तरफ उनसे अधिक सीनियर छत्तीसगढ़ के बहुत से कांग्रेस नेताओं का तजुर्बा इससे बहुत अलग रहा, जो न सुख में साथ रहे, न दुख में साथ रहे, और न उनसे ऐसी कोई उम्मीद ही रही, कोई कमी भी नहीं खली।
 
दिग्विजय सिंह बुनियादी रूप से एक अच्छे इंसान, रिश्तों और पहचान का खूब ख्याल रखने वाले नेता हैं, और यही वजह है कि वे आज भी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के अधिकतर नेताओं से अधिक लोकप्रिय हैं, और इस प्रदेश के पूरे संगठन में उनका खूब सम्मान है। जिस वक्त वे अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, उस वक्त भी वे छत्तीसगढ़ में इतने नेताओं को, प्रमुख सामाजिक व्यक्तियों को, अखबारनवीसों को नाम से जानते और बुलाते थे जितना छत्तीसगढ़ के बाकी तमाम दिग्गज कांग्रेस नेता मिलकर भी नहीं जानते थे। उनके बारे में कई और बातें फिर कभी। 
-सुनील कुमार


30-Jul-2020 2:21 PM

पिछले कुछ महीनों में हिन्दुस्तान में एक ऐसा जननायक देखा जो न राजनीति से निकलकर आया, और न ही किसी सामाजिक आंदोलन से। उसके एजेंडा में कोई धर्म, मंदिर-मस्जिद, या जाति का आरक्षण भी नहीं था। उसके नारों में महिला अधिकारों की बात भी नहीं थी, पशुओं के हक की लड़ाई भी नहीं थी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी नहीं थी, और न ही लोकतंत्र को साफ-सुथरा बनाने जैसा कोई सपना वह बेच रहा था। फिर भी वह बिना किसी इतिहास के, और बिना जाहिर तौर पर दिखती भविष्य की किसी साजिश के भी जननायक बन गया। 

बात थोड़ी सी अटपटी है। उसके साथ न आयुर्वेद और योग के जादुई करिश्मे के दावों की ताकत थी, न अन्ना हजारे सरीखे चौथाई सदी लंबे आंदोलन का इतिहास था। फिर भी आज वह हिन्दुस्तान में करोड़ों लोगों के लिए एक आदर्श बन गया है, और देश-विदेश में बसे और फंसे हुए हिन्दुस्तानी उसकी तरफ टकटकी लगाकर उम्मीद से देख रहे हैं। 

अभी दो महीने पहले ही जब मुम्बई में फिल्म अभिनेता सोनू सूद ने घर लौटने की हसरत रखने वाले प्रवासी मजदूरों की वापिसी के इंतजाम का सिलसिला शुरू किया, तो लोगों को लगता था कि दो-चार बस रवाना करने के बाद यह सिलसिला बस हो जाएगा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह सिलसिला गजब की रफ्तार से जारी है, और अब जब तकरीबन तमाम वे मजदूर घर पहुंचाए जा चुके हैं जो कि घर जाना चाहते थे, तो अब सोनू सूद दुनिया के दूसरे देशों में फंसे हुए हिन्दुस्तानी छात्र-छात्राओं को विमान से वापिस लाने की मशक्कत में जुट गए हैं। और यह मेहनत महज एक चेक काटकर अक्षय कुमार की तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजी-सार्वजनिक खाते में डालकर बंद हो गई, न ही कुछ और फिल्मी सितारों की तरह कुछ हजार लोगों के घर महीने-दो महीने का राशन भेजने जैसी मदद तक सीमित रही। सोनू सूद का कोई बहुत लंबा सार्वजनिक इतिहास याद नहीं पड़ता सिवाय इसके कि वे फिल्मों में काम करते आए हैं, और उनके नामुमकिन से गंठे हुए बदन को स्टेज और टीवी पर जगह-जगह दिखाने का मुकाबला चलते रहता है। वे इतने बड़े, इतने महंगे, और शायद इतने रईस फिल्म एक्टर नहीं रहे कि आज मुम्बई में सबसे बड़ा सामाजिक-खर्च करना उनकी एक नैतिक जिम्मेदारी होती। फिर खर्च से परे देखें तो कोरोना की दहशत के बीच बस अड्डों पर, रेलवे स्टेशनों पर, और हवाई अड्डे पर वे जिस तरह जाते हुए मजदूरों, मरीजों, और दूसरे लोगों को बिदा करते रहे, वह हिन्दुस्तान के इतिहास में एक अभूतपूर्व हौसले की बात रही। जिसने आज तक कोई चुनाव नहीं लड़ा है, और जिसकी जनता के प्रति ऐसी कोई सार्वजनिक जवाबदेही बनती है, वह कोरोना से बचने का मास्क लगाए हुए सैकड़ों लोगों को हर दिन बिदा करते हुए, उनकी बसों में चढक़र उनसे वापिसी का वायदा लेते हुए जिस तरह दिखा, वह पूरी तरह अनोखी बात थी, और बड़ी अटपटी बात भी थी। बहुत से लोगों को इतनी भलमनसाहत पर एक बड़ा जायज सा शक होता है कि इसके पीछे कौन सी बदनीयत छुपी हुई है, और इस पूंजीनिवेश के एवज में यह आदमी आगे जाकर क्या मांगेगा? 

कुछ लोगों का यह मानना है कि बिहार में चुनाव होने वाला है, और मुम्बई से रवानगी में यूपी-बिहार के मजदूर ही सबसे अधिक थे, इसलिए आने वाले चुनाव में सोनू सूद का कोई पार्टी चुनाव प्रचार में इस्तेमाल कर सकती है। पल भर के लिए बहस को यह मान भी लें कि यह चुनाव प्रचार के लिए एक नायक तैयार करने की कोशिश है, और सोनू सूद के पीछे कोई संपन्न राजनीतिक दल दसियों करोड़ खर्च कर रहा है, तो इसमें भी न तो कुछ अलोकतांत्रिक है, और न ही कुछ अभूतपूर्व। हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास में सैकड़ों फिल्मी सितारों को अब तक उम्मीदवार बनाया जा चुका है, और हजारों को प्रचार में इस्तेमाल किया जा चुका है। दक्षिण भारत में कई ऐसे राज्य रहे हैं जहां फिल्मी सितारे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, और देश में कई फिल्मी सितारे केन्द्रीय मंत्री बने, अनगिनत मंत्रिमंडलों में, संसद और विधानसभाओं में फिल्मी सितारों को जगह मिली है। ऐसे में अगर सोनू सूद के इस हैरतअंगेज सामाजिक योगदान के पीछे उनकी अपनी या किसी राजनीतिक दल की चुनावी नीयत है, तो वह रहे। ऐसी नीयत के साथ भी देश में ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने मुसीबतजदा लोगों की मदद करने के लिए सेहत पर खतरा उठाकर अनजानों को गले लगाया, दिन-दिन भर खड़े रहकर बसों को रवाना किया, और इन सबसे भी ऊपर ट्विटर पर आई हर अपील का जवाब दिया, हर जरूरत पर मदद का भरोसा दिलाया, और मदद के इस काम में कोई सीमा नहीं मानी। 

अब हालत यह है कि ट्विटर पर ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब लोग अपने परिवार के गंभीर बीमार के इलाज के लिए उनसे मदद न मांगें, और सोनू सूद हर मुमकिन-नामुमकिन मदद का पूरा भरोसा न दिलाएं। दो दिन पहले की ही बात है कि सोनू सूद ने खुद होकर यह लिखा है- अब है रोजगार की बारी, एक सोनू-सूद-पहल, अब इंडिया बनेगा कामयाब।

इस नई मुनादी के आगे की जानकारी अभी आना बाकी है, लेकिन अगर सोनू सूद के ट्विटर अकाऊंट पर लोगों की जरूरतों को देखें, और उनमें से हर किसी को पूरा करने की उनकी नीयत, कोशिश और उनका वायदा देखें, तो आंखें भर आती हैं, और भरोसा भी नहीं होता है कि कोई इतना भला कैसे हो सकता है, और खासकर, क्यों हो सकता है? 

दसियों हजार अपीलों में से सामने-सामने की दो-चार अगर देखें, और उन पर सोनू सूद का वायदा देखें, तो यह अद्भुत लगता है, और इस दुनिया के बाहर का लगता है। अभी किसी छोटी सी गरीब बच्ची ने मुम्बई के मलाड इलाके से हाथ जोडक़र एक वीडियो बनाकर भेजा है और सोनू सूद अंकल से अपील की है कि उसके घर में बहुत ज्यादा टपकने वाले पानी को रोकने में मदद करें, उनकी कोई मदद नहीं करता है। 

इस पर सोनू सूद का जवाब 9 मिनट के भीतर ही पोस्ट होता है- आज के बाद आपकी छत से कभी पानी नहीं आएगा। 

एक किसी ने पोस्ट किया- आप मूवी लेकर आएं, मैं आपकी मूवी 10 लोगों को दिखाऊंगा और उनसे बोलूंगा कि वो भी यही करें। अपना अकाऊंट नंबर दें, कुछ आर्थिक सहयोग देना चाहता हूं आपके पुण्य यज्ञ में। 

मिनटों के भीतर सोनू सूद का जवाब पोस्ट होता है- धन्यवाद भाई। बस उस राशि से किसी गरीब परिवार को राशन और स्कूल की फीस भर देना, समझ लेना आपका सहयोग मुझे मिल गया। 

कोई अस्पताल में बिस्तर नहीं पा रहे हैं तो सोनू सूद उसका इंतजाम कर रहे हैं, एक गरीब बच्चा बुरी तरह झुलस गया है, तो सोनू सूद उसके इलाज के लिए वायदा कर रहे हैं कि यह मान लो कि इसका इलाज हो गया है। उस बच्चे का पूरा हाथ प्लास्टिक सर्जरी के लायक दिख रहा है, और धनबाद के एक गांव के बच्चे से सोनू सूद का यह वायदा है। अभी दो ही दिन पहले एक खबर आई कि किस तरह उत्तर भारत में एक गरीब किसान को अपने बच्चों की ऑनलाईन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन खरीदने को अपनी गाय बेचनी पड़ी। यह खबर पाते ही सोनू सूद ने खुद होकर लोगों से बार-बार अपील की कि इस आदमी की जानकारी भेजो, इसे इसकी गाय वापिस दिलाते हैं। जबकि लोगों ने इस अखबारी कतरन को मोदीजी के नाम टैग किया था, जिनकी सरकार और जिनकी पार्टी की तरफ से उस पर कोई जवाब देखने नहीं मिला। अब एक पहाड़ी गांव में गाय वापिस दिलवाने का जिम्मा भी सोनू सूद ने उठाना चाहा, खुद होकर। 

अब ऐसे किस्से दसियों हजार हैं, और एक किसी ने भी कहीं यह नहीं लिखा है कि उससे किया गया वायदा पूरा नहीं हुआ। इसलिए यह मानने की ठोस वजह है कि वे लोगों के काम आ रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के सबसे संपन्न प्रदेश महाराष्ट्र की राजधानी, और देश की सबसे संपन्न महानगरी मुम्बई मजदूरों को घर भेजने से लेकर टपकती छत सुधरवाने तक के लिए एक अकेले इंसान के आसरे रहे? सोनू सूद की नीयत को 24 कैरेट खरा सोना मान लें तो भी सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में जो सरकारों की बुनियादी जिम्मेदारी  है, उसे सरकार से परे के एक इंसान के निजी दम-खम पर इस तरह छोड़ देना ठीक है? हैरत तो तब होती है जब कुछ प्रदेशों के मंत्री-मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से ट्विटर पर सोनू सूद का शुक्रिया अदा करते दिखते हैं कि उन्होंने उनके प्रदेश के मजदूरों को बस-ट्रेन या प्लेन से वापिस भिजवाया। यह शुक्रिया अदा करने की बात है, या शर्म से डूब मरने की कि जो सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी थी उसे दूसरे के भरोसे छोड़ दिया, और खुद एक धन्यवाद देने की वेटलिफ्टिंग जैसी जिम्मेदारी उठा रहे हैं? 

कोई जादूगर धरती की तमाम दिक्कतों को दूर कर दे, कोई ईश्वर पल भर में कोरोना को मार दे, गरीबी खत्म कर दे, तो क्या निर्वाचित-लोकतांत्रिक और तथाकथित जनकल्याणकारी सरकारें उसके भरोसे पर बैठना अपना पूरा काम मान लें? यह याद रखना चाहिए कि सोनू सूद का अपने इंतजाम से मजदूरों को पूरे देश वापिस भेजने का सिलसिला दो सरकारों की नाकामयाबी की वजह से जरूरी हुआ था। महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार अपने प्रदेश में काम करने आए मजदूरों को जिंदा रहने का इंतजाम नहीं कर पाई, और केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने मजदूरों की जरूरत को समझे बिना रेलगाडिय़ों को बंद कर दिया। 
लोकतंत्र में कोई समाजसेवी सरकार की जिम्मेदारियों का विकल्प अगर बन रहे हैं, तो यह सरकारों की परले दर्जे की नाकामी हैं। सोनू सूद की तारीफ में कसीदे गढऩे वाली सरकारों पर धिक्कार है कि उनका काम एक अकेला इंसान कर रहा है। और यह काम बंद होते भी नहीं दिख रहा है, यह काम मजदूरों की घरवापिसी से परे विदेशों में पढ़ रहे छात्रों की देशवापिसी तक, और इलाज से लेकर छत तक फैलते जा रहा है। यह कहां तक जाएगा, यह अंदाज लगाने का कोई जरिया नहीं है, इसका अंग्रेजी की एक मशहूर कॉमिक स्ट्रिप के नाम से बखान किया जा सकता है- रिप्लेज बिलीव इट ऑर नॉट।
 
एक सांस में इस मुद्दे पर इससे अधिक लिखना मुमकिन नहीं है, लेकिन जिन लोगों का इंसानियत पर से भरोसा उठ गया है, उन्हें ट्विटर पर जाकर सोनू सूद का पेज देखना चाहिए जहां देश भर से दसियों हजार लोग उन्हें दुआ भेज रहे हैं, उनकी तस्वीरें और पेंटिंग बनाकर पोस्ट कर रहे हैं, और उन्हें देश का एक ऐसा नायक मान रहे हैं जो कि सरकारों और राजनीति में नहीं है। (hindi.news18.com)

-सुनील कुमार


29-Jul-2020 4:22 PM

आज सुबह-सुबह एक अखबारनवीस साथी ने फोन करके कुछ झिझकते हुए एक सलाह दी। उसे कुछ तो जानकारी थी, और कुछ काम देखकर अंदाज था कि इन दिनों मैं काम से लदा हुआ हूं। फिर भी उसका कहना था कि छत्तीसगढ़ की राजनीति को जितने समय से मैंने देखा है, उसके बारे में मुझे कुछ लिखना चाहिए क्योंकि और लोगों के साथ-साथ पत्रकारों की ही एक ऐसी पीढ़ी आ गई है, जिसने उन दिनों के किस्से भी सुने हुए नहीं है, क्योंकि मेरी अखबारनवीसी में शुरूआती दिनों में यह पीढ़ी पैदा भी नहीं हुई थी। यह सलाह सुनते ही पल भर को तो दिल बैठ गया कि क्या रोज इतना काम करने के बाद भी अब आसपास के लोग भी बूढ़ा और बुजुर्ग मानने लगे हैं कि मुझे संस्मरण लिखने की सलाह दे रहे हैं। यह काम तो जिंदगी के आखिरी दौर में किया जाता है, और जहां तक काम का सवाल है, अभी तो मैं जवान हूं। 

फिर भी सदमे से उबरने में मिनट भर से अधिक नहीं लगा क्योंकि सलाह बड़ी दिलचस्प थी। न रोज लिखने की बेबसी, न कॉलम का कोई साईज तय, और न ही किसी खास मुद्दे पर सिलसिलेवार लिखना। फिर यह भी लगा कि राजनीति के साथ-साथ जुड़े हुए दूसरे मुद्दों पर भी लिखना हो जाएगा। 

उस पर जब एक गैरअखबारनवीस दोस्त से सलाह ली, तो उसका कहना था कि दुश्मन बनाने का सबसे आसान तरीका संस्मरण लिखना होता है, अगर सच लिखा जाए। पर मेरे दिमाग में अपना भुगता हुआ, अपनी भागीदारी वाला संस्मरण ही लिखना नहीं है, ऐसा भी लिखना दिमाग में आ रहा है जो कि कुछ दूरी से देखा हुआ होगा। और फिर कुछ लोगों को अगर बुरा लगता है, तो उससे बचते हुए कब तक ताजा इतिहास को लिखा जा सकता है?

यह सब सोचते हुए इस कॉलम के लिए एक नाम सूझा, यादों का झरोखा, पता नहीं इससे बेहतर भी कोई और नाम हो सकता था या नहीं, लेकिन नाम में क्या रक्खा है, गूगल का क्या मतलब होता है, याहू का क्या मतलब होता है, फेसबुक में फेस से परे बहुत कुछ है, और बुक तो है ही नहीं, इसलिए नाम कुछ भी हो, उस कॉलम में लिखना कुछ अच्छा हो जाए, और अधिक दिनों तक लिखना हो सके, तो हो सकता है कि मुझे लिखना और लोगों को पढऩा सुहाने लगे। 
छत्तीसगढ़ की राजनीति की छोटी-छोटी घटनाओं पर बिना किसी सिलसिले के कल से इसी वेबसाईट पर पढ़ें। 
-सुनील कुमार