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कृष्णा सोबती बनाम अमृता प्रीतम : ऐतिहासिक कानूनी जंग और यादगार तेवर
18-Feb-2021 8:55 AM (413)
कृष्णा सोबती बनाम अमृता प्रीतम : ऐतिहासिक कानूनी जंग और यादगार तेवर

-भवेश सक्सेना

साहित्य अकादमी अवॉर्ड हो या ज्ञानपीठ का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, कृष्णा सोबती को उनके साहित्य के हवाले से बेहतर ढंग से याद किया जाता है. मित्रो मरजानी, दिलो दानिश, डार से बिछुड़ी और ज़िंदगीनामा जैसी किताबों के नाम आपने सुने हैं, तो उनकी रचयिता कृष्णा ही हैं, जिन्हें हिंदी ही नहीं भारतीय साहित्य की एक अहम लेखिका के तौर पर अपनाया गया. अपने साहित्य से तो रहीं ही, अमृता प्रीतम के साथ सालों की लड़ाई हो या अवॉर्ड वापसी का दौर, कृष्णा अपने बोल्ड कदमों के लिए भी सुर्खियों में रहीं.

भारतीय साहित्य में 'स्त्री विमर्श' की महत्वपूर्ण लेखिका की शुरूआती किताब ही कैसे चर्चा में आई थी? इससे पहले आपको बताते हैं कि अपने समय के सबसे चहेते लेखकों में शुमार कृष्णा सोबती ने 25 साल से भी ज़्यादा समय तक कोर्ट में अमृता प्रीतम के साथ 'आत्मसम्मान' की लड़ाई लड़ी थी. एक किस्सा संघ से जुड़ी उनकी सोच को लेकर भी सुनने लायक है.

ज़िंदगीनामा : कृष्णा बनाम अमृता
कॉपीराइट को लेकर यह बवाल था. माजरा यह था कि 1925 में जन्मीं कृष्णा ने एक उपन्यास लिखा था 'ज़िंदगीनामा', जो 1979 में प्रकाशित हुआ और 1980 में इसे साहित्य अकादमी ने नवाज़ा. करीब चार साल बाद अमृता प्रीतम ने एक भूले बिसरे क्रांतिकारी चरित्र की जीवनी 'हरदत्त का ज़िंदगीनामा' के नाम से लिखी. पहले तो कृष्णा ने अमृता पर साहित्यिक नकल का आरोप लगाया, जिसे खारिज होने में देर नहीं लगी.

उसके बाद कृष्णा ने 'ज़िंदगीनामा' शब्द के इस्तेमाल को लेकर ऐतराज़ जताया और इसे कॉपीराइट उल्लंघन का मोड़ दिया. कृष्णा ने कहा कि इस तरह के शब्द का इस्तेमाल करने से प्रचार, विज्ञापन और ब्रांडिंग में नाजायज़ फायदा उठाए जाने की कोशिश की गई. मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा और 1984 में कृष्णा ने 1.5 लाख रुपये के मुआवज़े का दावा ठोका.

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अगले करीब 27 सालों तक कोर्ट में केस चलता रहा और इस बीच, कोर्ट में तो नामचीन साहित्यकारों के बीच नाटकीय बहस चलती ही रही, इस मामले पर साहित्य जगत दो खेमों में बंट गया था. कुछ कृष्णा की तरफ से बयान देते थे तो कुछ अमृता की तरफदारी करते थे. खुशवंत सिंह ने कोर्ट और पत्र पत्रिकाओं में साफ तौर पर कहा कि 'ज़िंदगीनामा' जैसे शब्द पर कोई कॉपीराइट का दावा कैसे कर सकता है?

दो खेमों में बंट गए थे राइटर्स
सिंह ने कहा था कि यह शब्द पहले फ़ारसी और उर्दू की कई किताबों के टाइटल में प्रमुख रह चुका है, इस पर कोई राइटर दावा नहीं कर सकता. अशोक बाजपेयी और खास तौर से हिंदी जगत के कुछ बड़े नाम कृष्णा के पक्ष में भी दलीलें दे रहे थे. इस बीच पंजाबी के मशहूर लेखक एस बलवंत ने दोनों नामचीन लेखिकाओं के बीच चल रहे झगड़े को सुलझाने के लिए कोशिशें की थीं. बलवंत ने कहा था :

यह केस किसी के लिए भी फायदे का सौदा नहीं है. कृष्णा जी का पैसा और ताकत इसमें बर्बाद हो रही है, तो दूसरी तरफ, अमृता नींद न आने के रोग की शिकार हो गई हैं और तमाम तरह के ज्योतिषियों के पास अपनी परेशानी का हल तलाशने लगी हैं.

बहरहाल, केस में अदालत का फैसला अमृता के गुज़रने के छह साल बाद 2011 में अमृता के पक्ष में रहा. तब कृष्णा ने खुद माना था कि इतने सालों में लड़ाई इतनी लंबी खिंच गई कि इसकी गंभीरता नहीं रही और यह मज़ाक बनकर रह गई. वहीं, इसे सिद्धांत की लड़ाई कहने वाली कृष्णा के समर्थन में तब भी बाजपेयी ने कहा था कि फैसला उन्हें मायूस करने वाला रहा.

आरएसएस से कितना चिढ़ती थीं कृष्णा?
अमृता के खिलाफ कानूनी जंग के बीच कृष्णा कई मामलों में कोर्ट केस की धमकी देने लगी थीं. एक किस्सा और सुर्खियों में था जब एक युवा लेखक कायनात काज़ी ने रिसर्च के बाद किताब 'कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज' शीर्षक से लिखी थी. किताब प्रकाशित हुई और काज़ी ने इसकी लॉंचिंग कला जगत में प्रसिद्ध सच्चिदानंद जोशी और दूरदर्शन से जुडत्रे विजय क्रांति के हाथों करवाने का कार्यक्रम आयोजित किया.

काज़ी जब निमंत्रण पत्र लेकर कृष्णा के पास गईं तो कृष्णा बुरी तरह भड़कीं. 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरी किताब को संघियों से लॉंच करवाने की! अगर तुमने ऐसा करवाया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. और खबरदार, ऐसे किसी कार्यक्रम में मेरा नाम भी लिया तो..' फिर कृष्णा ने काज़ी को कोर्ट केस की धमकी भी दी. बुरी तरह घबराई काज़ी ने वो कार्यक्रम रद्द करवा दिया.

कुछ और किस्से, जो याद आते हैं
कृष्णा के इसी तरह के सख़्त और तेज़तर्रार मिज़ाज से जुड़ा एक किस्सा अवॉर्ड वापसी का था. 2015 में, वो कृष्णा ही थीं जिन्होंने हिंदी साहित्यिक बिरादरी की ओर से देश में असहिष्णुता के खिलाफ आवाज़ उठाई थी. कड़े शब्दों में धार्मिक कट्टरपंथ और हिंसात्मक घटनाओं का विरोध करते हुए अपना साहित्य अकादमी अवार्ड वापस कर दिया था. इसके बाद कई साहित्यकारों ने अपने अवॉर्ड लौटाए थे.

स्वभाव ही नहीं, अपने बोल्ड लेखन से भी कृष्णा सुर्खियों में रहीं. उनका 'मित्रो मरजानी' उपन्यास जब 60 के दशक में आया, तब ऐसे उपन्यास न के बराबर लिखे जाते थे. महिलाओं को इतना बोल्ड दिखाने का साहस लेखक नहीं करते थे. लेकिन कृष्णा ने महिलाओं के नज़रिए को समाज को दिखाने की हिम्मत की. सेक्सुलिटी पर खुलकर बात की और उनके बोल्ड कैरेक्टर आज भी स्त्री विमर्श में याद किए जाते हैं. (news18.com)

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