सामान्य ज्ञान

स्कन्द पुराण
29-Nov-2020 12:19 PM 52
स्कन्द पुराण

विभिन्न विषयों के विस्तृत विवेचन की दृष्टि से पुराणों में स्कन्दपुराण सबसे बड़ा है। भगवान स्कन्द के द्वारा कथित होने के कारण इसका नाम  स्कन्दपुराण  है।
यह खण्डात्मक और संहितात्मक दो स्वरूपों में उपलब्ध है। दोनों खण्डों में 81-81 हजार श्लोक हैं। खण्डात्मक स्कन्द पुराण में क्रमश: माहेश्वर, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, अवन्ती (ताप्ती और रेवाखण्ड) नागर तथा प्रभास-ये सात खण्ड हैं। संहितात्मक स्कन्दपुराण में सनत्कुमार, शंकर, ब्राह्म, सौर, वैष्णव और सूत-छ: संहिताएं हैं। इसमें बदरिकाश्रम, अयोध्या, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर, कन्याकुमारी, प्रभास, द्वारका, काशी, कांची आदि तीर्थों की महिमा; गंगा, नर्मदा, यमुना, सरस्वती आदि नदियों के उद्गम की मनोरथ कथाएं,  रामायण, भागवतादि ग्रन्थों का माहात्म्य, विभिन्न महीनों के व्रत-पर्व का माहात्म्य तथा शिवरात्रि, सत्यनारायण आदि व्रत-कथाएँ अत्यन्त रोचक शैली में प्रस्तुत की गई हैं। विचित्र कथाओं के माध्यम से भौगोलिक ज्ञान तथा प्राचीन इतिहास की ललित प्रस्तुति इस पुराण की अपनी विशेषता है। आज भी इसमें वर्णित विभिन्न व्रत-त्योहारों के दर्शन भारत के घर-घर में किये जा सकते हैं।
इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचन के साथ अनेक ं साधु-महात्माओं के सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। आज भी इसमें वर्णित आचारों, पद्धतियों के दर्शन हिन्दू समाज के घर-घरमें किये जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान शिव की महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध आदि का मनोहर वर्णन है। 
स्कन्द पुराण एक शतकोटि पुराण है। जिसमें शिव की महिमा का वर्णन किया है, उसके सारभूत अर्थ का व्यासजी ने स्कन्दपुराण में वर्णन किया है। स्कन्द पुराण इक्यासी हजार श्लोकों से युक्त है एवं सात खण्ड है। पहले खण्ड का नाम माहेश्वर खण्ड है, इसमें बारह हजार से कुछ कम श्लोक है। दूसरा वैष्णवखण्ड है, तीसरा ब्रह्मखण्ड है। चौथा काशीखण्ड एवं पांचवां अवन्तीखण्ड है फिर क्रमश: नागर खण्ड एवं प्रभास खण्ड हंै। 
 

प्रतिहार कला शैली 
प्रतिहार कला शैली मध्यकालीन मूर्ति शैली है, इस शैली की प्रतिमाओं में गुप्त काल की अनेक विशेषताएं समाहित हैं। 
प्रतिहार कला शैली की प्रतिमाएं मध्यकालीन शैली की अन्य कला शैलियों की तुलना में सबसे अधिक प्रभावशाली एवं सुन्दर हैं। इस शैली की प्रतिमाओं के मुख पर प्रसन्नता का भाव प्रदर्शित हुआ है। इन प्रतिमाओं के शरीर की सुडौलता पर विशेष ध्यान दिया गया है तथा अलंकरणों का कम प्रयोग हुआ है। उत्तर-प्रदेश के जिला झांसी स्थित बरुआ सागर का विशाल मन्दिर प्रतिहार कला शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मन्दिर के प्रवेश द्वार पर अनेक सुेदर मूर्तिया उकेरी गईं हैं। इस मंदिर की कलाकृतियों को देखने से स्पष्ट होता है कि उस समय के कलाकार मूर्तियों के अंग-प्रत्यंग की सुडौलता के प्रति अत्यन्त सजग थे तथा इनके निर्माण में सिद्धहस्त थे।  
---

अन्य पोस्ट

Comments