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उत्कृष्ट साहित्य : फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास पर पंकज राग का लिखा- 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे'

अनिल विश्वास

उत्कृष्ट साहित्य : फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास पर पंकज राग का लिखा- 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे'
25-Jun-2020 1:53 PM

22 मार्च को भारत में हुए जनता कर्फ्यू और 24 मार्च से लगातार चल रहे लॉकडाऊन के बीच साहित्य के पाठकों की एक सेवा के लिए देश के एक सबसे प्रतिष्ठित साहित्य-प्रकाशक राजकमल, ने लोगों के लिए एक मुफ्त वॉट्सऐप बुक निकालना शुरू किया जिसमें रोज सौ-पचास पेज की उत्कृष्ट और चुनिंदा साहित्य-सामग्री रहती है। उन्होंने इसका नाम 'पाठ-पुन: पाठ, लॉकडाऊन का पाठाहार' दिया है। इन्हें साहित्य के इच्छुक पाठक राजकमल प्रकाशन समूह के वॉट्सऐप नंबर 98108 02875 पर एक संदेश भेजकर पा सकते हैं। राजकमल प्रकाशन की विशेष अनुमति से हम यहां इन वॉट्सऐप बुक में से कोई एक सामग्री लेकर 'छत्तीसगढ़' के पाठकों के लिए सप्ताह में दो दिन प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले दिनों से हमने यह सिलसिला शुरू किया है। सबसे पहले आपने इसी जगह पर चर्चित लेखिका शोभा डे का एक उपन्यास-अंश पढ़ा था। और उसके बाद अगली प्रस्तुति थी ज़ोहरा सहगल का आत्मकथा अंश। इसके बाद प्रस्तुत थी विख्यात लेखिका मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है'। और उसके बाद हमने प्रस्तुत किया था सोपान जोशी की किताब, 'जल थल मल' पुस्तक का एक अंश। पिछले दिनों हमने प्रस्तुत किया था फणीश्वरनाथ रेणु की रचनावली से  'छेड़ो न मेरी जुल्फें, सब लोग क्या कहेंगे!' (भरत यायावर से बातचीत)।
आज हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं फिल्म संगीतकार अनिल विश्वास पर पंकज राग का लिखा- 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे'। यह अंश 'धुनों की यात्रा' पुस्तक से है।
यह सामग्री सिर्फ 'छत्तीसगढ़' के लिए वेबक्लूजिव है, इसे कृपया यहां से आगे न बढ़ाएं। 
-संपादक

अनिल विश्वास : 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे'
-पंकज राग
[धुनों की यात्रा पुस्तक से]

हिंदी फि़ल्म संगीत में ऑरकेस्ट्रा और कोरस के प्रभाव को स्थापित करने का श्रेय यदि किसी को जाएगा तो वे अनिल विश्वास ही होंगे। अनिल विश्वास इतने विराट कम्पोजऱ थे कि उनकी विशेषताओं को वर्गीकृत करना आसान नहीं है। ऑरकेस्ट्रा की शैली एक तरफ़, बंगाल का लोकगान और लोकवाद्य शैली दूसरी तरफ़, गज़लों, ठुमरियों की विधा का प्रयोग अपनी जगह और हलके-फुलके फि़ल्मी माहौलानुकूल गीत भी अपनी जगह—क्या न था अनिल विश्वास के संगीत में! अनिल विश्वास ने ही फि़ल्म संगीत में अन्य विधाओं से अलग एक राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा के संगीत का सूत्रपात किया, और इसे बहुत आगे तक ले गए। लोकशैली की धुन को राजनीतिक अर्थव्यंजकता देने में कोरस का लाजवाब प्रयोग उन्हीं की देन है, जिसे आगे चलकर सलिल चौधरी ने एक नया विस्तार और नई दिशा दी।
अनिल विश्वास का जन्म बरीसाल (अब बाँग्लादेश) में 7 जुलाई, 1914 को हुआ था। उनकी माँ को संगीत में रुचि थी और उनकी प्रेरणा से ही अनिल विश्वास का संगीत-जीवन अपना सूत्रपात कर पाया। चार-पाँच साल की उम्र से ही गाना और तबला बजाना उन्होंने शुरू कर दिया था और कुछ ही वर्षों में नाटकों में काम करना भी प्रारंभ हुआ। कुछ और बड़े होने पर संगीत की महफि़लों में भी वे गाने लगे। उस समय से ही वे अपने गीत कम्पोज़ करके गाया करते थे। (स्वतंत्रता-आंदोलन की ललकार और विशेषकर क्रांतिकारी दलों के आह्नान से प्रभावित होकर उन्होंने मैट्रिक से ही अपनी पढ़ाई छोड़ दी और क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। बम भी बनाए और जेल भी गए। अनिल विश्वास के मित्र प्रोफेसर सत्यव्रत घोष के अनुसार बरीसाल जेल में बहुत मच्छर थे और सोना बड़ा मुश्किल था। अत: समय बिताने के लिए संगीत ही सहारा बनता था और अनिल विश्वास इसमें स्वाभाविकत: अग्रणी भूमिका निभाते थे। एक विशेष गीत जो उस समय अक्सर गाया जाता था, वह था 'लाठी मार भाँगरे लाला, जोता सब बंद शाला', अर्थात् लाठी मारकर जेल के ताले तोड़ दो और मुक्त हो जाओ।
अपने पिता की मृत्यु (1930) के बाद अनिल विश्वास ने बरीसाल छोड़ दिया और वेश बदलकर कलकत्ता आ पहुँचे। जेब में पैसे बहुत कम थे और कलकत्ता पहुँचने के लिए भी कुली का काम करना पड़ा था। कलकत्ता में उनकी जानपहचान के मात्र पन्नालाल घोष (बाद के प्रसिद्ध बाँसुरीवादक) थे जो उनके बचपन के दोस्त और बहनोई थे, और उनकी बड़ी बहन और बहनोई के घर ही उन्हें ठहराया गया। कलकत्ते में भी एक होटल में वे आजीविका के लिए बर्तन धोने लगे। उसी होटल में मनोरंजन सरकार नामक एक जादूगर खाने के लिए आते थे। उन्होंने एक दिन अनिल विश्वास को गुनगुनाते सुना तो अपने साथ एक संगीत प्रेमी रामबहादुर अघोरनाथ के घर संगीत महफि़ल में ले गए। वहाँ कवि जीतेंद्रनाथ बागची और मेगाफ़ोन ग्रामोफ़ोन कम्पनी के मालिक जे.एन. घोष भी थे। अनिल विश्वास ने जब वहाँ श्यामा संगीत सुनाया तो सभी बड़े प्रसन्न हुए। रायबहादुर अघोरनाथ ने उन्हें अपने पौत्रों को संगीत सिखाने के लिए अपने घर ही रख लिया। पर कुछ दिनों में इस प्रकार की जि़ंदगी से ऊबकर अनिल विश्वास पाँच रूपए महीने पर एक अन्य जगह संगीत सिखाने चल पड़े।

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पुलिस अब भी उनकी तलाश में थी, और एक दिन वे पकड़ में आ गए तथा चार महीने तक जेल में रहे। वहाँ पिटाई भी खूब हुई। पुलिस को उनके विरुद्ध कोई प्रमाण न मिला और उन्हें छोडऩा पड़ा। पर साथ ही पुलिस ने उनको सरकारी जासूस बनने का प्रलोभन दिया, ताकि वे क्रांतिकारियों के भेद दे सकें। चूँकि वह बेकार थे, इसलिए अनिल विश्वास ऊपर से मान गए, पर वस्तुत: पुलिस को गलत जानकारियाँ देते रहे। यह सिलसिला भी अधिक न चल सका। जल्दी ही पुलिस समझ गई कि जानकारियाँ गलत आ रही हैं, और विश्वास फिर बेकारों की कतार में शामिल हो गए।
उन दिनों काज़ी नज़रुल इस्लाम मेगज़ीन रेकॉर्ड कम्पनी में काम करते थे, और अनिल विश्वास बचपन से ही काज़ी के बड़े प्रशंसक रहे थे। वे काज़ी से मिले और उनकी मदद से उन्होंने कुछ गज़लों को गाकर रेकॉर्ड भी करवाया, लेकिन कम्पनी की अंदरूनी राजनीति की वजह से ये रेकॉर्ड नहीं बन पाए। लेकिन वहीं के एक संगीतकार मंजू खाँ साहब मुर्शिदाबादी के सम्पर्क में आकर गज़ल गायन की कई बारीकियाँ अनिल विश्वास ने ज़रूर सीख लीं। तत्पश्चात् निताई मोतीलाल ने अपने रंगमहल थियेटर में काम दिया, और उनके सहायक के रूप में अनिल विश्वास ने पाँच नाटकों में संगीत भी दिया, अभिनय भी किया और गीत भी गाए। जिस लोक रंग के संगीत को लेकर अनिल विश्वास आगे बहुत प्रसिद्ध होने वाले थे, उसका सूत्रपात उन्होंने इन नाटकों में पूर्वी बंगाल के लोकगीतों और प्रहसनों के अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे द्वारा सफलतापूर्वक किया। तीन वर्षों तक चालीस रूपए महीने पर वे वहाँ कार्यरत रहे। थियेटर के अनुभव से उन्हें लोगों के संगीत सम्प्रेषण की बारीकियों की अच्छी जानकारी होगी। संगीत में अनिल विश्वास अब अधिक समय देने लगे थे। हिंदुस्तान म्यूजि़कल कम्पनी के द्वारा पन्नालाल घोष के बाँसुरीवादन की पहली रेकॉर्डिंग के लिए गीत अनिल विश्वास ने ही लिखा था और एक छोटा-मोटा ऑरकेस्ट्रा भी इसकी रेकॉर्डिंग के लिए इस्तेमाल किया। वे एक बहुत अच्छे ढाक, ढोल, तबला और ढोलक वादक थे, और बंगाली ढोल को कुछ नाटकों और गीतों में उन्होंने अपने कलकत्ते के प्रवास के दौरान ही अपनाना शुरू कर दिया था। साथ ही खय़ाल, ठुमरी, दादरा एक तरफ़ और वैष्णव कीर्तन, लोकसंगीत और रवींद्र संगीत का ज्ञान दूसरी तरफ़—सभी कुछ उन्होंने बड़े लगन से अर्जित किया। आगे चलकर फि़ल्म 'हमदर्द' में उन्होंने खय़ाल, गज़ल, कव्वाली, गीत—सभी का उपयोग बड़े सिद्धहस्त ढंग से किया। रवींद्रनाथ टैगोर से विश्वास मिले भी थे। उन्होंने रवींद्रनाथ की कृतियों को एक ऐसे वितउंज में संगीतबद्ध किया, जैसा पहले नहीं किया गया था। गुरुदेव रवींद्रनाथ उनके इस कार्य से काफ़ी प्रभावित भी हुए थे।
इन्हीं दिनों अनिल विश्वास की मुलाकात फि़ल्म-निर्देशक हीरेन बोस से हुई। बोस ने उन्हें समझाया कि अगर कुछ बनना है तो बम्बई की फि़ल्मों में काम करना पड़ेगा। इस प्रकार अनिल विश्वास का पदार्पण बम्बई के फि़ल्म जगत में हुआ।
अनिल विश्वास का संगीत उल्लेखनीय इसलिए भी है कि उन्होंने उस समय तक प्रचलित शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं से हटकर संगीत में लोकप्रियता के तत्त्वों का समावेश किया। यहाँ इस समय की संगीत रचनाओं में एक नीरसता और ढर्रे पर बँधे रहने की परम्परा थी, वहीं विश्वास ने फि़ल्म-संगीत को एक रस दिया। उन्होंने धुनों को मोहक बनाया, ऑरकेस्ट्रा को विस्तार दिया और लोकसंगीत से लेकर रंगमंचीय संगीत, हर विधा के लोकप्रिय अवयवों का अपने संगीत में सुंदर सम्मिश्रण किया। अनिल विश्वास ने न केवल पहली बार 12 सदस्यीय ऑरकेस्ट्रा का प्रयोग किया बल्कि वे पहले संगीतकार थे, जिन्होंने मेलोडी के साथ काउंटर मेलोडी को भी गीतों में इस्तेमाल किया। अपनी राजनीतिक और जागरूक पृष्ठभूमि के कारण ज्ञान मुखर्जी और महबूब की कई फि़ल्मों में संगीत पक्ष को उन्होंने एक सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति की परिभाषा दी। उनका संगीत ऐसी फि़ल्मों में मात्र रोमांस, प्रकृति प्रेम या कोठों पर प्रचलित संगीत न होकर एक प्रगतिशील बयान का रूप लेने में भी सक्षम रहा। यहाँ तक कि जहाँ संगीत का आधार शास्त्रीय था, वहाँ भी परिस्थिति के हिसाब से अनिल विश्वास ने इसे बेहद सरल और सरस तरीके से प्रयुक्त किया।

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बम्बई में 1934 में पदार्पण के बाद अनिल विश्वास पहले कुमार मूवीटोन के साथ जुड़े। कलकत्ते से वे अपने साथ चार साजिंदे भी लाए थे जो एक साथ कई वाद्य बजाना जानते थे—इस तरह वॉयलिन, पियानो, हवाइयन गिटार, ट्पेट, मैंडो रं लिन, चेलो जैसे वाद्यों के साथ अनिल विश्वास ऑरकेस्ट्रा के क्रांतिकारी शुरुआत की भूमिका तैयार करके ही आए थे। ऑरकेस्ट्रा का महत्त्व और पाश्चात्य संगीत के तत्वों के प्रयोग का महत्व विश्वास ने आरंभ से ही पहचाना। कुमार मूवीटोन के व्ही.एम. कुमार से मतभेद होने के बाद वे राम दरयानी की ईस्टर्न आर्ट सिंडिकेट के साथ सम्बद्ध रहे। मधुलाल मास्टर के साथ संगीतबद्ध 'बाल हत्या' (1935) में ही उन्होंने अपनी राजनीतिक चेतना का परिचय शक्ति की माता की आराधना वाले समूह गीत 'काली माँ तू प्यारी तुम जग जननी, माता दे शक्ति हमको' द्वारा स्पष्ट कर दिया था। 'भारत की बेटी' (1935) में उस्ताद झंडे खाँ के साथ संगीत देते हुए उन्होंने फि़ल्म के पार्श्वसंगीत के अलावा तीन गीत भी कम्पोज़ किए, जिनमें 'दीन दयाल दया करके भवसागर लेकर पार मुझे' और विशेषकर 'तेरे पूजन को भगवान बना है मंदिर आलीशान' उल्लेखनीय और लोकप्रिय थे। पर स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उनकी प्रथम फि़ल्म ईस्टर्न आर्ट्स की हीरेन बोस निर्देशित 'धर्म की देवी' (1935) थी, जिसमें उन्होंने फ़कीर की भूमिका भी निभाते हुए 'क्षमा करो तुम क्षमा करो यह कहकर सब चिल्लाते हैं', 'कुछ भी नहीं भरोसा दुनिया है आनी जानी' और 'कर हाल पे अपने रहम जऱा यूँ कुदरत को तू यूँ नाशाद न कर' जैसे गीत स्वयं गाए। 'कुछ भी नहीं भरोसा' की रेकॉर्डिंग का शरद दत्त ने अनिल विश्वास पर लिखी अपनी पुस्तक में बड़ा रोचक वर्णन किया है। पाश्र्वगायन के अभाव में आउटडोर शूटिंग रात के वक्त इस तरह की जा रही थी कि फ़कीर की भूमिका में अनिल विश्वास को सड़क पर चलते हुए गाना था और माइक्रोफ़ोन सँभाले हुए एक आदमी और ट्राली पर वादक बैठकर पीछे-पीछे चल रहे थे। गाना लगभग खत्म होने को था कि बारिश शुरू हो गई, रात के अँधेरे में दिखाई नहीं दिया कि सामने गड्ढा है और विश्वास, साजिंदे—सभी उस पानी के गड्ढे में जा गिरे। चोट तो खास नहीं आई, पर पूरे गाने की रेकॉर्डिंग नए सिरे से करनी पड़ी। इस फि़ल्म के एकाध गाने में सिंधी लोकधुन की प्रेरणा उन्हें फि़ल्म के अभिनेता गोप ने दी थी। संगीत में सरस तत्वों के प्रवेश का आभास उन्होंने इस फि़ल्म के 'न भूलो न भूलो प्रिय आज को यह अर्पण अनुराग', 'जिधर देखो जहाँ देखो उसी शै में रमा वह है' और 'अजब हाल अपना होता जो विसाल यार होता' जैसे गीतों में दे दिया था। यही प्रवृत्ति हमें 'प्रेम-बंधन' (1936) के 'कैसे कटे मोरी सूनी रे सेजरिया', 'चैन न आए जब पिया मुध आती', 'बिन देखे तुम्हारे मैं मर जाऊँगी', 'प्रतिभा' (1936) के 'जा जा रे भौंरा' (सरदार अख्तर), 'झूला झूल झूल झूल' (सरदार अख्तर), 'आज देखी मैंने जीवन ज्योति' (नज़ीर, (रदार अख्तर), 'पिया की जोगन' (1936) के अति लोकप्रिय 'ये माना हमने मुहब्बत की दवा तुम हो' (सरदार अख्तर), 'बढ़कर परी से शक्ल मेरे दिलरूबा की है', 'साकी हो सहने बाग हो' (अनिल विश्वास, सरदार अख्तर), 'संगदिल समाज' (1936) के 'नैनों के तीर चलाओ न हम पर' (सरदार अख्तर), 'प्रीत की रीत बसी है मन में', 'वह मुहब्बत के मज़े और वह मुलाकातें गई', कव्वालीनुमा 'क्या लुत्फ जि़ंदगी का', 'शेर का पंजा' (1936) के 'ऐसी चलत पवन सुखदाई', 'साँवरिया बाँके मदमाते', 'क्या नैना मतवाले निकले', 'तोहार फुलवारिया में न जइहो रे' और कव्वाली की शैली के 'चिलम जो गाँजे की भरी पीते हैं सब यार', 'शोख़ दिलरूबा' (1936) के खुर्शीद के गाए (मयजोशी मदहोशी है जहाँ में जि़ंदगानी मस्तों की', 'बुलडॉग' (1937) के 'आशा आशा मोरे मुरझाए मन की आशा' (युसुफ़ एफेंदी), 'जेंटिलमैन डाकू' (1937) के 'हृदय सेज पर फूल बिछाए आओ बैठो', 'नदिया पे आजा सैंया सावन आया), 'इंसाफ़' (1937) के 'जल भरने को पनघट पे सखियाँ आती हैं' (सहगान), 'दिल की गहराइयों में छुपाएँ', 'हृदय में प्रेम बसाएँ' और 'आज बना सुंदर संसार' आदि में कहीं कम और कहीं अधिक नजऱ आती है। इस दौर में नई शैली की लोकप्रियता का चरम गीत था फि़ल्म 'मनमोहन' (1936) का—'तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया' (सुरेन्द्र, बिब्बो)। हालाँकि नाम संगीतकार के रूप में अशोक घोष का था, पर अनिल विश्वास के अनुसार इस गीत की धुन के सृजक वे स्वयं थे। सागर मूवीटोन की महबूब निर्देशित इस फि़ल्म का यह गीत 'क्या मैं अंदर आ सकती हँू?' संवाद की अदायगी से प्रारम्भ होता था, और यह अदा न सिफऱ् नवीन थी, बल्कि गीत की धुन भी अपनी सुगमता और सरसता से जनसाधारण के बीच बेहद लोकप्रिय रही।
दरअसल अनिल विश्वास की जिन विशेषताओं का जि़क्र हम पहले कर चुके हैं, वे परिपच् हुईं सागर मूवीटोन की उनकी संगीतबद्ध फि़ल्मों में। महबूब की आधुनिकता को संगीत के आधुनिक और लीक से हटेे मुहावरों के साथ अनिल विश्वास के संगीत ने भी बलवती किया। सुरेन्द्र, मोतीलाल और बिब्बो अभिनीत सामंतवादी मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाते फि़ल्म 'जागीरदार' (1937) में 'पुजारी मोरे मंदिर में आओ' (सुरेन्द्र, अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे बिब्बो), 'बाँके बिहारी भूल न जाना' (मोतीलाल, माया बनर्जी), 'नदी किनारे बैठ के आओ, खेल में जी बहलाएँ' (मोतीलाल, माया बनर्जी), 'अगर देनी है मुझको हुरे-जन्नत' (सुरेन्द्र), 'जिनके नैंनों में रहते हैं तारे' (सुरेन्द्र), 'वो ही पुराने खेल जगत के' (अनिल विश्वास) जैसे गीत खूब लोकप्रिय रहे थे। महबूब और अनिल विश्वास की दोस्ती भी खूब जमी और दोनों प्यार से एक दूसरे को 'मवाली' और 'बंगाली' पुकारा करते थे। 
सागर मूवीटोन की ही हीरेन बोस निर्देशित 'महागीत' (1937) के जिया सरहदी के लिखे 'आए हैं घर महाराज मैं जाऊँ' (सुरेन्द्र, माया बनर्जी), 'प्रेम का पुष्प खिला मन मेरे' (सुरेन्द्र) में भी गीत-संगीत का वह सुलभ, सुगम्य सरल रूप मिलता है जो शास्त्रीय रागों और तानों की दुनिया से अलग एक अधिक जाने-पहचाने और नज़दीकी संसार से लोगों का परिचय कराता था। कहते हैं कि 'महागीत' के ही 'जीवन है एक कहानी' में अनिल विश्वास ने बंबई की फि़ल्म इंडस्ट्री में प्ले बैक उर्फ पाश्र्वगायन का पहला प्रयोग किया था (हालाँकि बम्बई की फि़ल्म नगरी में इसका श्रेय कई सरस्वती देवी को भी देते हैं)। महबूब निर्देशित 'हम, तुम और वह' (1938) में औरत की इस समय के समाज में दबी और दबाई पारम्परिक दायरों से अलग प्रेम की इच्छा की अभिव्यक्ति को साकार करते 'प्रेम का है संसार' (समूहगीत), 'सजनी प्रेम का राग सुना दो', 'हमें प्रीत किसी से नहीं करनी' (हरीश, माया बनर्जी) जैसे गीत भी ज़माने के हिसाब से नए और आधुनिक ही थे। जिय़ा सरहदी निर्देशित (महेन्द्र ठाकुर के साथ) 'पोस्टमैन' उर्फ 'अभिलाषा' (1938) के 'आओ सखी कहीं छुपकर बैठें' (बिब्बो, हरीश), 'बदली ओट छिप छिप जाए' (सितारा), 'दिल की कहानी दिल की जु़बानी' (बिब्बो), 'कामरेड्स' उर्फ 'जीवनसाथी' (1939) के 'मधुर मिलन का चित्र बनाएँ' (माया बनर्जी, सुरेन्द्र) या राजनीतिक अर्थव्यंजकता वाले 'हमें हुआ है देश निकाला' (सुरेन्द्र) या 'आन बसे परदेश सजनवा' (ज्योती, सुरेन्द्र) और धर्म तथा समाज के मापदंडों पर प्रश्नचिह्न लगाती महबूब की 'एक ही रास्ता' (1939) के 'मुझे मिल जाएगी उनकी उमरिया' (वहीदन, अनिल विश्वास) या बंगाली लोकशैली का 'भई हम परदेसी लोग' (अनिल विश्वास) जैसे गीतों में भी कहीं कथ्य, कहीं शैली, कहीं भाव में अनिल विश्वास का संगीत एक नया रास्ता बनाता नजऱ आता है। महबूब की ही 'वतन' (1938) में नज़रूल गीत की तर्ज पर 'रंगे जाँ से खूँ उछल पड़े' (बिब्बो, अनिल विश्वास, साथी), 'जहाँ तू है वही मेरा वतन है' (माया बनर्जी) और बहुलोकप्रिय 'क्यों हमने दिल दिया' (सितारा) आदि इसी रंग की दिलकश प्रस्तुतियाँ थीं। अनिल विश्वास के संगीत का यह पहलू सागर की सर्वोतम बादामी निर्देशित फि़ल्मों में भी नजऱ आता है। 'कोकिला' (1937) में कोरस गीतों का अपना अभिनव प्रयोग अनिल विश्वास ने 'नैनन के सैन से बुलाई हो शाम', 'सागर गाए पर्वत गाए', 'मोहे घर के द्वारे लागा जमुनिया का पेड़' जैसे गीतों में सफलता से किया था।

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कोरस गीतों के साथ यह निहित था कि जिस गीत को कई लोग गाते हैं, वह गीत जनता भी आसानी से गुनगुना सकती है। जनमानस एक तरह से इस कोरस का ही विस्तारित रूप बनकर अनिल विश्वास के संगीत को एक लोकप्रिय आधार प्रदान करनेवाला कारक बन गया। जनरल फि़ल्म्स की 'निराला हिंदुस्तान' (1938) का—'धनवानो धनवानो, गरीबों की परवाह करो' (समूहगीत) भी विश्वास के संगीत में एक राजनीतिक-सामाजिक महत्वपूर्ण बयान-सा दखल रखता था। '300 डेज़ एंड आफ़्टर' (1938) के मोतीलाल के गाए 'घर अपना ये कुर्सी अपनी' और 'इक तुम न हुईं तो क्या हुआ' भी अपनी आधुनिक शैली के कारण बेहद लोकप्रिय रहे थे। अनिल विश्वास के पास इस वक्त 12 साजिंदों का ऑरकेस्ट्रा था, जो उस समय के हिसाब से बड़ी चीज़ थी। चूँकि राजनीतिक-सामाजिक चेतना के गीतों में जीवंतता, जोश और तीव्रता का होना आवश्यक था, अत: यह भी कहा जा सकता है कि ऑरकेस्ट्रा का विस्तार इस तरह के गीतों अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे के लिए अनिवार्य था और इस प्रकार ऑरकेस्ट्रा के क्रांतिकारी परिवर्तन के पीछे यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा होगा।
सागर मूवीटोन की लुहार की निर्देशित स्टंट फि़ल्मों में अनिल विश्वास के संगीत की आधुनिकता या समकालीन सामाजिकता का रूप उतना मुखर नहीं है। 'डायनामाइट' (1938) के 'कलियाँ खिलीं' (बिब्बो, सुरेन्द्र), 'जा री सखी साजन से कह दे' (माया बनर्जी, सुरेन्द्र) जैसे गीत पारम्परिक मुहावरे के ही गीत थे। वहीं नंदलाल जसवंतलाल निर्देशित 'कॉमरेड्स' (1939) में यदि एक तरफ अपने ज़माने का लोकप्रिय परंतु पारम्परिक शब्दावली का गीत 'नाच नाच मन मोर' (ज्योति), 'आन बसे परदेस सजनवा' (सुरेन्द्र, ज्योति) तथा 'मधुर मिलन का चित्र बनाएँ' (सुरेन्द्र, माया बनर्जी) थे, तो दूसरी तरफ़ 'जागो जागो सोनेवालो अब तो हुआ सबेरा' और 'कर दे तू बलिदान' जैसे संदेशात्मक उत्प्रेरक गीत भी थे।
अनिल विश्वास के सुगम, लोगों की ज़ुबान पर चढऩेवाले संगीत का एक महत्वपूर्ण मील स्तम्भ था सागर की फि़ल्म 'ग्रामोफ़ोन सिंगर' (1938)। जिस सुगम संगीत को गैर फि़ल्मी गीतों से जगमोहन या पंकज मल्लिक ने लोकप्रिय बनाया, उसी रूप का अपने ज़माने का बेहद मक़बूल रहा राग मल्हार के स्पर्श के साथ सृजित गीत 'काहे अकेला डोलत बादल' (सुरेन्द्र) इस फि़ल्म की विशिष्ट उपलब्धि थी। 'मैं तेरे गले की माला' (सुरेन्द्र, बिब्बो) भी अपने ज़माने में जबर्दस्त लोकप्रिय रहा था। फि़ल्म के 'एक छोटा-सा मंदिर बनाएँगे' (सुरेन्द्र), 'वो दिल कि जिसको खुदा पर न एतबार आया' (सुरेन्द्र), 'मुझको मेरी ख़बर सुना जाते' जैसे जिया सरहदी के सीधे-सादे बातचीत के अंदाज के लिखे गीतों को मकबूल धुन देकर अनिल विश्वास ने जनसाधारण की रोजमर्रा की जि़ंदगी की सोच में शामिल करा दिया। यह भी उल्लेखनीय है कि ज़ोहराबाई अम्बालेवाली का गाया प्रथम गीत 'पिया घर नाही अकेली मोहे डर-डर लागे' भी इसी फि़ल्म में था।
महबूब निर्देशित 'अलीबाला' (1940) का 'हम और तुम और ये खुशी' (वहीदन, सुरेन्द्र) तो हलके टुकड़ों पर विराम के साथ आगे बढ़ती अपनी अदायगी के कारण एक सदाबहार गीत ही बन चुका है। मूलत: राग सारंग पर आधारित इस गीत में अनिल विश्वास ने कहीं लगने ही नहीं दिया है कि हम कोई दुरूह, जटिल शास्त्रीय रचना सुन रहे हैं—ऐसी सरल और सरस रचनाओं को बिना शास्त्रीयता का आधार खोए शास्त्रीयता की पारम्परिक परिपाटियों से निकालकर जनमानस तक बोधगम्य तरीके से पहुँचाना ही अनिल विश्वास की ख़ासियत थी। 'अलीबाबा' में अरबी शैली के संगीत को अनिल विश्वास लेकर आए थे। 'दिल का साज बजाए जा' और 'तेरी आँखों ने किया बीमार हमें' जैसे सुरेन्द्र-वहीदन के गीत भी इसी शैली के थे। मैडोलिन और ट्रम्पेट का उपयोग भी पहली बार फि़ल्मों में इस फि़ल्म में उनके ही द्वारा किया गया। यह फि़ल्म हिंदी और पंजाबी दोनों में बनी थी, और शुरू में पंजाबी में संगीत देने से आनाकानी कर रहे विश्वास के अहम को उनके बारे में अखबारों में अनाप-शनाप छपवाकर और इस प्रकार चुनौती देकर पंजाबी में भी संगीत दिलवाने के वाकिये का शरद दत्त ने अपनी पुस्तक में दिलचस्प वर्णन किया है। महबूब की मशहूर फि़ल्म 'औरत' (1940—जिसे बाद में महबूब ने दोबारा 'मदर इंडिया' के नाम से करीब दो दशकों बाद बनाया) के ग्रामीण शोषण के कथ्य के बीच स्थित ग्रामीण राग-रंग की अभिव्यक्ति के लिए तो अनिल विश्वास ने जनमानस के बीच प्रचलित लोकरंग के गीतों की छटा ही विखेर दी। 'बादल आए गगरी सूखी' फि़ल्मों में ग्रामीण सामूहिक व्यथा की अपनी तरह की पहली लोक-अभिव्यक्ति थी। कोरस के लाजवाब प्रयोग के रूप में 'काहे करता देर बराती' (अनिल विश्वास, साथी), 'मोरे आँगना में लाया बबुआ', पारम्परिक शैली का 'मैं न कहूँगी मेरा भैया री अनोखा', होली गीत 'आज होली खेलेंगे साजन के संग' (अनिल विश्वास, साथी), 'मेरे बाँके साँवरिया' (हरीश, वत्सला कुमठेकर), 'बोल बोल रे बोल वन के पंछी' (सुरेन्द्र, ज्योति), 'सुनो पंछी के राग करे कोयल पुकार' (अनिल विश्वास, ज्योति, सरदार अख्तर, सुरेन्द्र, हरीश, साथी) जैसे गीत फि़ल्म की ग्रामीण पृष्ठभूमि के साथ खूब जमे थे। वहीं नौटंकी शैली में 'अपने मस्तों को बेसुध बना दे' (सुरेन्द्र, ज्योति) भी खूब हिट रहा था। 'तुम रूठ गईं प्यारी सजनिया' (सुरेन्द्र, ज्योति) एक लोकप्रिय प्रेम गीत की तरह वर्षों गाया जाता रहा।
सागर स्टूडियोज़ से अम्बालाल पटेल के जाने के बाद फज़़लभाई ने कार्यभार सँभाला। नाम भी बदलकर 'नेशनल स्टूडियोज़' कर दिया गया। 'औरत', जो सागर के पर्चम तले बनी थी, नेशनल के बैनर तले रिलीज़ हुई। ए.आर. कारदार की प्रगतिशील फि़ल्म 'पूजा' (1940) भी इसी के बैनर तले निर्मित हुई। हालाँकि फि़ल्म के 'एक बात कहूँ मैं साजन' (सरदार अख्तर, ज़हूर रजा), 'आज पिया घर आएँगे' (मितरा, सरदार अख्तर), 'लट उलझी सुलझा जा बालम' (ज्योति) जैसे गीत शृंगारप्रधान थे, पर संगीतकार अनिल विश्वास ने अब तक अपनी खास शैली और विशिष्ट पहचान बना ली थी।
पाँचवें दशक में तो अनिल विश्वास एक बहुत बड़ा नाम बन कर प्रतिष्ठित हो चुका था। एक तरफ़ प्रगतिशील गीतों—देश प्रेम और मानव-प्रेम की भावना से ओतप्रोत सामाजिक- राजनीतिक रूप से सजग गीत तो दूसरी तरफ़ लोक या शास्त्रीय आधार को लेकर अपनी ख़ास सरस सहज शैली में उसका रूपांतरण। और इन सबके पीछे ऑरकेस्ट्रा का विस्तार और 'रोटी' में सितारा और शेख मुख्तार कोरस का विलक्षण प्रयोग, जिन विधाओं का तो फि़ल्मी बम्बई संगीत की दुनिया में उन्हें संस्थापक ही माना जा सकता है। हम कह ही चुके हैं कि जनचेतना की अभिव्यक्ति के लिए कोरस का व्यापक प्रयोग सबसे पहले अनिल विश्वास ने ही किया।
दशक के उनके उल्लेखनीय प्रगतिशील राष्ट्रवादी गीतों में नेशनल स्टूडियो की 'अप्सरा' (1941) के 'कदम बढ़ाओ नारियो', 'हमारी बात' (1943)—जो देविका रानी की बतौर अभिनेत्री अंतिम फि़ल्म थी—के कोरस के अच्छे प्रयोग के साथ क्रांतिकारी गीत 'करवटें बदल रहा है आज सब जहान' (सुरैया, अरुण कुमार, साथी) और उत्प्रेरक, उत्तेजक मतवाला गीत 'बादल सा निकल चला यह दल मतवाला रे' (अनिल विश्वास, साथी) आज भी सुनने के बाद जोश और रोमांच से भर देते हैं। दरअसल अनिल विश्वास का संगीत एक तरह की राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा को फि़ल्म संगीत के मध्य परिभाषित करने का प्रयास बनकर अपनी ऐतिहासिक जगह रखता है। 'रोटी' (1942) के 'रोटी रोटी रोटी क्यूँ रटता' (अशरफ़ खान), 'हे मक्कार ज़माना' और 'गरीबों पर दया करके बड़ा एहसान काहे हो' (अशरफ़ खान) जैसे मौखिक संगीत का उपयोग फि़ल्मों में नया था और एक प्रकार से ठतमबीजपंद उवकम का भारतीय रूपांतरण भी कहा जा सकता है। यही अशरफ़ खान बाद में जाकर पीर बन गए थे। 'क्यूँ रहता रोटी रोटी' के दर्द को उभारने के लिए विश्वास द्वारा रचनात्मक तरीके से राग मिश्र मालकौंस का उपयोग किया गया।
अनिल विश्वास ने जिस राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा को स्थापित किया, उसकी सबसे बड़ी लहर बॉम्बे टॉकीज की अपने ज़माने की सुपरहिट फि़ल्म 'किस्मत' (1943) बनकर आई। इस लहर का एक अतरंग हिस्सा बने मध्यप्रदेश से हिंदी साहित्य की धारा को फि़ल्मों में ले कर आने वाले कवि प्रदीप। प्रदीप का लिखा 'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है' (अमीरबाई, अन्य स्वर, कोरस) तो इतना मशहूर हुआ कि अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे इस गीत को सुनने के लिए सिनेमा हॉल में भीड़ उमडऩे लगी और लोग उत्साह और उत्तेजना से अपनी कुर्सियों पर खड़े होने लगे। यहाँ तक कि ब्रिटिश सरकार ने सी.आई.डी. को यह जाँच सौंप दी कि देखें कि इस गीत का क्या असर हो रहा है। पर ब्रजेन्द्र गौड़ के भाई धर्मेन्द्र गौड़ (जो सी.आई.डी. में थे और जिन्हें यह काम सौंपा गया था) ने हक़ीकत को दरकिनार कर रिपोर्ट ऐसी दी कि इस गीत को रंगमंच का हिस्सा बताते हुए इसका कोई ख़ास असर ही नहीं दर्शाया। इस गीत की धुन को बाद में वर्षों तक आकाशवाणी ने फौजी भाइयों के लिए कार्यक्रम में बजाया गया। अनिल विश्वास ने इस गीत में भी कोरस का लाजवाब प्रयोग किया था। जैसा पहले भी रेखांकित किया गया है, दरअसल अनिल विश्वास की राजनीतिक-सांस्कृतिक धारावाले संगीत में कोरस का प्रयोग एक विशिष्ट और ख़ास तत्व लगातार रहा। इस गीत के कोरस में स्वयं प्रदीप का भी स्वर था। 'किस्मत' के गीत ऐसे चले कि फि़ल्म कलकत्ते के रॉक्सी थियेटर में पूरे तीन वर्षतक चली। अनिल विश्वास की इस समाजवादी-साम्यवादी राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा के अन्य गीतों में 'भूख' (1947) के डॉ. सफ़दर आह लिखित 'सारे जग में पेट का धंधा' (अनिल विश्वास), 'जय जननी भारत माता', 'सोना-चाँदी खाओ अमीरो', 'इस जग के गरीबों का नहीं कोई ठिकाना' (गीता), 'दो सितारे' (1951) के 'सो जा सो जा बेटे गरीब के' (सुरैया) आदि गीतों को गिना जा सकता है।

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'आसरा' के 'साँझ भई बंजारे' (अनिल विश्वास) की रेकॉर्डिंग का किस्सा कम रोचक नहीं है। इसी वक्त अनिल विश्वास को मुकेश से मोतीलाल ने मिलवाया था और अनिल विश्वास ने उस आवाज़ में एक गजब की कशिश और आकर्षण पर प्रशिक्षण का अभाव पाया था। कई रिहर्सलों के बाद भी मुकेश इस गीत में वह बंगाल की माटी मिश्रित दार्शनिकता नहीं ला पा रहे थे जो अनिल विश्वास चाहते थे। अंतत: यह गीत अनिल विश्वास ने अपने स्वर में ही रेकॉर्ड किया और गीत अमर भी हो गया। मुकेश काफ़ी निराश हुए और उन्होंने यह भी कहा कि अगर अनिल विश्वास अपने गीतों को स्वयं ही गाते रहेंगे तो उनके जैसे नए गायकों को मौका कैसे मिलेगा। पर अनिल विश्वास ने मुकेश को भुलाया नहीं और 'पहली नजऱ' के 'दिल जलता है तो जलने दे' की कहानी और उसका परिणाम तो सर्वविदित हो ही चुके हैं।
अनिल विश्वास के इस दौर के सरस मधुर गीतों में सागर की 'कामरेड्स' (1939) की ठुमरी 'मोपे डार गए' (वहीदन), नेशनल की 'बहन' (1941) के 'हवा बसंत की डोल रही है' (नलिनी जयवंत, हरीश) और 'नहीं खाते हैं भैया मेरे पान' (नलिनी जयवंत, शेख़ मुख्तार) तथा 'आई जवानी जिया लहराए' (शेख मुख्तार) जैसे हिट गीत, नेशनल की ही 'नई रोशनी' (1941) के 'वो पूछते हैं ऐ दिल' (सरदार अख्तर, हरीश), 'अपने पिया को रिझाऊँ मैं' (सरदार, अख्तर), 'गाओ गाओ प्रेम का राग' (हुस्न बानो, हरीश), 'गरीब' (1942) के 'मुहब्बत की दुनिया' (सुरेन्द्र) और 'मुझको जीने का बहाना' (सुरेन्द्र) तथा 'तेरी याद में वो मजा पा रहा हूँ' (सुरेन्द्र), 'विजय' (1942) का 'कौन है तेरा' (राजकुमारी, अनिल विश्वास) आदि के अलावा फि़ल्म 'बसंत' (1942) के गीतों की भी चर्चा की जानी चाहिए। हालाँकि नाम संगीतकार के रूप में पन्नालाल घोष का आता है पर घोष ने इसमें ऑरकेस्ट्रेशन और पाश्र्वसंगीत का काम किया था। गीतों की तजऱ् अनिल विश्वास की थी। यह प्रसिद्ध अभिनेत्री मधुबाला की भी पहली फि़ल्म थी, जिसमें उन्होंने बेबी मुमताज नाम से बाल कलाकार की भूमिका की थी और फि़ल्म में स्टेज पर 'मेरे छोटे से मन में मेरी छोटी-सी दुनिया' गाया था, और काफ़ी अच्छा गा दिया था। एक रोचक तथ्य यह भी है कि फि़ल्म में इस स्टेज शो के बाद छोटी मधुबाला दर्शकों से कहती है कि 'आप लोग कल आइए तो और सुनाऊँगी गाना'। अभिनेत्री निम्मी, जो उस वक्त उतनी ही छोटी रही होंगी, ने अपने माँ-बाप के साथ यह फि़ल्म देखी और मधुबाला के इस संवाद अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे को सुनकर कई दिनों तक अपनी माँ को छिप करके फि़ल्म को बार-बार दिखलाने ले जाती रही, क्योंकि आखिर पर्दे पर छोटी मधुबाला ने फिर आने को कहा था। 'बसंत' (1942) के कई अच्छे गीत 'तुमको मुबारक हो ऊँचे महल में' (पारुल घोष, साथी), 'काँटा लगो रे साजन का मोहे राह चली न जाए' (पारुल घोष, खान मस्ताना) जो कि उत्तरप्रदेश की लोक धुन पर आधारित था, गज़ल शैली में 'उम्मीद उनसे क्या थी और कर वो क्या रहे हैं' (पारुल घोष) आदि खूब ही कर्णप्रिय और खूब लोकप्रिय रहे थे। 'आया बसंत सखी' गीत में बाँसुरी के साथ अनिल विश्वास के ऑरकेस्ट्रा का पन्नालाल घोष ने सुंदर संयोजन किया था। नेशनल की 'अपना-पराया' (1942) में हल्के तरंगित ऑरकेस्ट्रा के साथ 'ओ परदेसी घर आजा' खूब लोकप्रिय रहा और आज भी राजकुमारी के गाए सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में इसकी गिनती होती है। इस गीत की विशेषता इसकी धुन से अधिक गीत के समानांतर निरंतर प्रवाहित होता ऑरकेस्ट्रा के विभिन्न टुकड़ों का बेजोड़ सम्मिश्रण है। 'जवानी' (1942) का सुरेन्द्र का गाया 'ध्यान उसका लगाए बैठे हैं' भी अपने ज़माने में खूब लोकप्रिय रहा था। गज़ल शैली के इस गीत में अंतरे के बोलों की अदायगी के बीच बाँसुरी का प्रयोग भाव अभिव्यक्ति को और भी सशक्त करता है। राग बसंत पर आधारित 'आई बसंत ऋतु मदमाती' (सुरेन्द्र, हुस्न बानो) और 'बदनाम न हो जाना' (सुरेन्द्र, हुस्न बानो) तथा इसी फि़ल्म का 'बीत गई बीत गई' (सुरेन्द्र, हुस्न बानो) भी अच्छे चले थे। फि़ल्म 'रोटी' (1942) न सिर्फ महबूब को कुशल फि़ल्मकार के रूप में स्थापित करनेवाली फि़ल्म के रूप में याद की जाती है, बल्कि समाज की आर्थिक-सामाजिक विषमता को अभिव्यक्त करनेवाली इस फि़ल्म में अनिल विश्वास ने अख्तरी फैजावादी उर्फ बेगम अख्तर से भी 'उलझ गए नैनवा', 'वो हँस रहे हैं आह किए जा रहा हूँ मैं', 'फिर फ़सले बहार आई दिले दीवाना', 'चार दिनों की जवानी मतवाले पी ले', 'ऐ प्रेम तेरी बलिहारी हो' और 'रहने लगा है दिल में अँधेरा तेरे बगैर' जैसे गीतों को ठुमरी, गज़ल शैली में लेकर ऐतिहासिक बना दिया है। यह दूसरी बात है कि बेगम अख्तर ने अपने अद्र्धशास्त्रीय गीतों का फि़ल्म में उपयोग देखकर मुकदमा कर दिया। 'रोटी' की कहानी अनिल विश्वास की ही लिखी थी और इसका विचार उन्हें तब आया था जब महबूब अस्पताल में थे और परहेज के कारण रोटी से महरूम होकर दही खाखरा खाते थे। फि़ल्म में सितारा के स्वर में बंगाली संगीत का प्रभाव लिए 'सजना साँझ भई, आन मिलो' भी एक उल्लेखनीय रचना थी, जिसमें सितार का बड़ा सुंदर प्रयोग था। यह गीत गुलाम हैदर का पसंदीदा गीत था। रोटी के ही 'मेघराज आए' (समूह गीत) में विश्वास ने अनोखे बोलों का उपयोग किया था। पर विशुद्ध संगीत की दृष्टि से बाम्बे टॉकीज लिमिटेड की 'हमारी बात' (1943) अनिल विश्वास की अधिक उल्लेखनीय फि़ल्म कही जाएगी। अनिल विश्वास ने भी नेशनल स्टूडियो छोड़कर बॉम्बे टॉकीज़ का दामन थामा, जहाँ वे वर्षों तक कार्यरत रहे। महबूब की महबूब स्टूडियो के लिए उनके पुराने दोस्त ने उन्हें बुलाया नहीं, वे खुद जाने में संकोच करते रहे और इस तरह महबूब के साथ और आगे काम वे न कर सके।
'हमारी बात' के क्रांतिकारी भावप्रधान गीतों का जिक्र हम पहले ही कर चुके हैं। पर पारुल घोष का गाया 'मैं उनकी बन जाऊँ रे' फि़ल्म का सबसे लोकप्रिय गीत साबित हुआ। 'इंसान क्या जो ठोकरें नसीब की न खा सके' (पारुल घोष, अनिल विश्वास), हलका-फुलका 'बिस्तर बिछा दिया है तेरे दर के सामने' (सुरैया, अरुण कुमार), और कर्णप्रिय 'ऐ वादे सबा इठलाती आ मेरा गुंचा-ए-दिल तो सूख गया' (पारुल घोष) जैसे अन्य अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे उल्लेखनीय गीतों के साथ यह फि़ल्म अनिल विश्वास की उपलब्धियों में गिनी जाएगी। 'हमारी बात' का एक और महत्त्व यह है कि इस फि़ल्म में चपरासी की भूमिका में राज कपूर ने फि़ल्मों में अपना पहला रोल किया था। 'किस्मत' (1945) को भी न सिफऱ् 'दूर हटो ऐ दुनिया वालो' बल्कि अनिल विश्वास की संगीतबद्ध रसपूर्ण 'धीरे-धीरे आ रे बादल' (अमीरबाई, अरुण कुमार) के लिए भी याद किया जाता है। प्रदीप पहली बार अनिल विश्वास जैसी बड़ी हस्ती के साथ काम कर रहे थे, और इस गीत को उन्होंने डरते-डरते ही लिखा था। पर अनिल विश्वाास ने भैरवी और एक ताल में इतनी अच्छी धुन बनाई कि खेमचंद प्रकाश ने भी मुक्तकंठ से गीत में सात मात्रा को आठ मात्रा में बदलने की प्रशंसा की। सीटी का भी पहला प्रयोग हमें इसी गीत में मिलता है। इसी प्रकार अपनी बहन पारुल घोष से अनिल विश्वास ने बड़ी मीठी कीर्तन और लोकमिश्रित तजऱ् में 'पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए' इसी फि़ल्म के लिए गवाया। यह इतनी सुंदर धुन थी कि इसका इस्तेमाल वर्षों बाद प्रदीप ने अपने गीत 'पिंजड़े के पंछी रे' के लिए कर डाला। अनिल विश्वास ने ही इस फि़ल्म में स्वरों के सुंदर उतार-चढ़ाव के साथ 'घर-घर में दीवाली है मेरे घर में अँधेरा' (अमीरबाई) रचा था। प्रदीप तो इस गीत के लिए पूरे बावन अंतरे लिख लाए थे—हर अंतरे के भाव अलग-अलग थे। बड़ी मुश्किल से अनिल विश्वास ने अंतरों को छाँटा—तीन हिस्सों में तीन प्रकार के भावों के लिए और फिर इसकी धुन बनाई। स्वयं अनिल विश्वास के अनुसार यह शैली गुलाम हैदर से आई—और इसे शास्त्रीय ढंग से 'स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग' के अनुसार इस गीत में उन्होंने ढाला। पर केवल रवींद्र संगीत का भी ऐसा ही ढाँचा रहा है। अनिल विश्वास पर केवल रवींद्र संगीत ही नहीं बल्कि बंगाल का लोक संगीत भी उतना ही असर करता था। यह 'किस्मत' के ही 'अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया' (अमीरबाई) सुनकर जाना जा सकता है। इस बंगाली शैली के भजन की पृष्ठभूमि में बाउल कीर्तन संगीत का बड़ा सुंदर प्रयोग है। 'किस्मत' के 'हम ऐसा किस्मत को क्या करें' (अमीरबाई, अरुण कुमार, साथी), 'तेरे हुस्न के दिन फिरेंगे' (अरुण कुमार) और भैरवी आधारित 'पिउ पिउ बोल प्राण' (प्रदीप) भी अपने ज़माने के लोकप्रिय गीत रहे थे।
यदि 'किस्मत' में अनिल विश्वास के साथ प्रदीप थे तो 'चार आँखें' (1944) और 'ज्वार भाटा' (1944) में उनका साथ गीतकार और रसपूर्ण रचयिता नरेन्द्र शर्मा ने दिया। 'चार आँखें' के तो शीर्षक संगीत का भी रेकॉर्ड निराला था। तारा, प्रताप के स्वरों में 'आँखों में आँखें डाल दो' के ऑरकेस्ट्रेशन में पार्श्व में घुँघरू के प्रयोग और धुन के अंतरों की बीच बदलाव इस गीत की विशेषता बन गया। तारा के स्वर में दादरा शैली में 'राम करे कहीं नैना ना उलझे' के साथ भी घुँघरू का प्रयोग लाजवाब था। दिलीप कुमार अभिनीत प्रथम फि़ल्म 'ज्वार भाटा' में 'किस्मत' जैसी बात तो नहीं बनी, पर फिऱ भी इस फि़ल्म का एक गीत 'भूल जाना चाहती हूँ भूल पाती ही नहीं' (पारुल घोष, चितलकर) तो अति सुंदर हैं। यह एक ििव इमंज अलग सी रचना है, बंगाली संगीत शैली का प्रभाव भी है और साथ ही वॉयलिन और पियानो के आधुनिक शैली के टुकड़ों से दर्द की अभिव्यक्ति बहुत खूबी से हुई है। 'ज्वार भाटा' के होली गीत 'सा रा रा' में शुद्ध ग्रामीण उल्लास की लाजवाब अभिव्यक्ति भी यादगार रही। दरअसल 'ज्वार भाटा' के गीत भले ही विश्वास के 'किस्मत' के गीतों के समान सुपरहिट न रहे हों, पर विश्वास की लाक्षणिक शैली-जो आगे के वर्षों में स्थापित होती गई-के सभी अवयव कमोबेश इस फि़ल्म के संगीत में हमें मिलते हैं—पूरबी लोकशैली, बंगाली कीर्तन का अंदाज़, पियानो का प्रयोग आदि।
यह वह दौर था जब अधिकांश कलाकार स्टूडियो प्रथा से अलग होकर स्वतंत्र पेशेवर रूप अख्तियार कर रहे थे। अनिल विश्वास भी बॉम्बे स्टूडियो से अलग अब एक स्वतंत्र संगीतकार बने। उनकी संगीतबद्ध मज़हर आर्ट प्रोडक्शन की 'पहली नजऱ' (1945) तो मुकेश के गाए प्रथम अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे पाश्र्वगीत 'दिल जलता है तो जलने दे' के कारण हिंदी फि़ल्म इतिहास में अमर हो चुकी है। निर्माता पहले इस गीत को किसी और से गवाना चाहते थे, पर फि़ल्म के नायक मोतीलाल (जिन्होंने मुकेश को दिल्ली में एक शादी में गाते सुना था और जिनके पास मुकेश दिल्ली से रहने और किस्मत आज़माने आए थे) अड़ गए कि यह गीत या तो वह स्वयं गाएँगे या फिर मुकेश। अनिल विश्वास मुकेश के ख़ैरख्वाह थे ही। इस गीत की रेकॉर्डिंग का समय, कहा जाता है, मुकेश के ज़हन से ही निकल गया था और वे काफ़ी देर से पहुँचे। कहते हैं, इस पर अनिल विश्वास को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने मुकेश को चाँटा मार दिया। मुकेश शर्म से अकेले जाकर फूट-फूटकर रोए, पर उसके बाद उन्होंने इस गीत को सहगल की शैली में ऐसा गाया कि राग दरबारी आधारित इस गीत ने उन्हें रातों-रात विख्यात कर दिया। लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह गीत सहगल ने नहीं बल्कि एक नए लड़के ने गाया है। यह तथ्य भी कम रोचक नहीं है कि रेकॉर्डिंग के बाद भी निर्माता इस गीत को फि़ल्म से निकालना चाहते थे। मुकेश को जब यह पता चला तो वे भागे-भागे निर्माता के पास गए, विनती की और बड़ी मुश्किल से निर्माता इसे फि़ल्म में रखने को राजी हुए। आज यदि 'पहली नजऱ' को याद किया जाता है तो इसी गीत के कारण—यह विडम्बना नहीं तो और क्या है! और यह भी विडम्बना देखिए कि 1976 में अमेरिका-कैनेडा की यात्रा पर गए मुकेश के आखिरी शो में पार्श्वगायक के रूप में उनका यह पहला गाना स्टेज पर उनका गाया आखिरी गीत साबित हुआ। स्टेज की उस रेकॉर्डिंग को सुनिए और लगता है जैसे गीत के अंत में 'दिल जलता है' के आरोह में मुकेश मानो ऊँचाई के चरम पर ही पहुँच गए हैं। हालाँकि यह गीत सहगल शैली में था और बहुत लोकप्रिय भी रहा ही, पर फिर भी मुकेश को सहगल की शैली से हटकर अपना अलग अंदाज़ विकसित करने की सलाह अनिल विश्वास ने दी जो आगे चलकर मुकेश को मुकेश के रूप में स्थापित करने में बहुत लाभकारी रही।

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'पहली नजऱ' के अन्य गीत आज़ हमसे खो गए हैं पर तेज रिद्म पर 'तय कर के बड़ी दूर की पुरपेच डगरिया' (मुकेश), 'पहली नजऱ का तीर रे' (मुकेश, नसीम अख्तर), 'जवानी ये भरपूर दिकलश अदाएँ' (मुकेश, नसीम अख्तर) जैसे गीत भी कर्णप्रिय ही थे। अनिल विश्वास के कुछ अच्छे मधुर गीतों में दिलीप कुमार अभिनीत बॉम्बे टॉकीज़ की 'मिलन' (1946) के क्लैरिनेट के सुंदर प्रयोग के साथ 'सुहानी बेरिया बीता जाए' (पारुल घोष), 'मैं किसकी लाज निभाऊँ' (पारुल घोष), भैरवी आधारित 'जिसने बजा दी बाँसुरी' (पारुल घोष), बंगाल की संगीत शैली का स्पर्श लिए 'भूख' (1947) का संजीदा सा 'आँखों में क्यों अश्क' (गीता) और तेज लय में 'देखो हरा हरा वन' (अनिल, शमशाद, साथी), पहाड़ी सी शैली में धीमी लहरों जैसा प्रभाव लिए 'मँझधार' (1947) के 'मेरा चाँद आ गया मेरे द्वारे' (सुरेन्द्र, खुर्शीद), 'नैया' (1947) के ज़ोहराबाई के गाए 'आई मिलन की बहार रे' और 'सावन-भादों नैन हमारे' शामिल किए जा सकते हैं। पर जिन फि़ल्मों से उनको सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, उनमें 'अनोखा प्यार' (1948) का नाम बहुत ऊपर आएगा। दिलीप कुमार और नर्गिस अभिनीत इस फि़ल्म में तो अनिल विश्वास ने खूबसूरत धुनों की झड़ी ही लगा दी। 'याद रखना चाँद-तारो इस सुहानी रात को' की सुंदर धुन तो भुलाए नहीं भूलती। इसे मीना कपूर ने भी गाया है, लता ने भी और मुकेश ने भी। दरअसल फि़ल्म के साउंड ट्रैक पर कई गीत मीना कपूर की आवाज़ में है पर उनके बीमार हो जाने के कारण रेकॉर्ड लता मंगेशकर की आवाज़ में जारी किए गए। ऐसे गीतों में यमन कल्याण पर आधारित 'एक दिल का लगाना बाकी था सो दिल भी लगाकर देख लिया', यमन कल्याण पर ही आधारित 'मेरे लिए वो ग़म-ए-इंतज़ार छोड़ गए', पारम्परिक दादरा ताल पर सृजित 'ऐ दिल मेरी वफ़ा में कोई असर नहीं है' और बेहद कर्णप्रिय 'अब याद न कर भूल जा ऐ दिल वो फ़साना' (मुकेश के साथ) को सुनकर ऐसा लगता है कि लता तो लता थी हीं, पर मीना कपूर भी कुछ कम नहीं थी। इसी आवाज़ पर मोहित होकर अनिल अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे विश्वास ने आगे चलकर अपनी पहली पत्नी आशालता विश्वास के रहते हुए भी मीना कपूर से विवाह किया। वैसे तो बड़ी मीठी सी धुन लिए 'मेरे फूलों में छिपी है जवानी', 'घड़ी-घड़ी पूछो ना जी' और लोक धुन पर आधारित 'भोला भाला री मोरा बलमा' जैसे लता के गीत भी अच्छे ही थे, पर पहले उल्लिखित गीतों के सामने फीके कहे जाएँगे। अलबत्ता मुकेश की परिचित शैली में 'जीवन सपना टूट गया' का स्थायी प्रभाव अभी तक क़ायम है। यह गीत मूलत: विश्वास ने सहगल-नूरजहाँ को लेकर बनने वाली एक फि़ल्म के लिए कम्पोज़ किया था जिसका निर्देशन नूरजहाँ के पति शौकत रिजबी करने वाले थे। पर शौकत के पाकिस्तान जाने के कारण फिल्म खटाई में पड़ गई, और इसी धुन को तब 'अनोखा प्यार' के लिए अनिल विश्वास ने लता और मुकेश से गवा लिया। इस दौर में नौशाद और अनिल विश्वास दोनों ने ही मुकेश के स्वर को दिलीप कुमार के लिए बखूबी इस्तेमाल किया। वैसे भी पर्दे के ट्रैजेडी किंग के लिए पाश्र्वगायन के दर्दीले सुरों के बादशाह की आवाज़ बेमेल तो कभी लग ही नहीं सकती थी, भले ही आगे इस द्वय को एक साथ कम ही प्रस्तुत किया गया हो।

मुकेश इस दौर में बिलकुल चोटी पर तेजी से पहुँच रहे थे, और इस दौर में उनके कई खूबसूरत गीत आए। अनिल विश्वास की संगीतबद्ध 'वीणा' (1948) में उनके गाए तीन दुर्लभ अमूल्य रत्न शामिल हैं। सन् 2000 में एक चैरिटी शो के सिलसिले में नितिन मुकेश जब बैतूल आए तो मैंने उन्हें 'वीणा' का ही 'गोकुल की एक नार छबीली जमुना तट पर आई रे' कैसेट पर बजाकर सुनाया। नितिन इस गीत को पहली बार सुन रहे थे और गीत की अद्भुत रिद्मिक धुन को सुनकर गद्गद हो उठे थे। 'वीणा' में ही गज़लनुमा शैली में कुछ तेज लय का समावेश करते हुए अनिल विश्वास ने मुकेश से 'वो तीखी नजऱों से मेरे दिल पर' बहुत आकर्षक तरीके से गवाया था। मुकेश के स्वर में ही 'मेरे सपनों की रानी रे तू लाखों में लासानी रे' उपरोक्त दोनों गीतों के सामने कुछ कमज़ोर लगता है। 'वीणा' में अनिल विश्वास ने चितलकर उर्फ सी. रामचंद्र से नरेन्द्र शर्मा का लिखा 'कोई श्याम रंग कोई भोरी' भी बड़े मोहक अंदाज़ में गवाया। 'राही चल तू प्रीत नगरिया' (मन्ना डे), विषादभरा सुंदर 'पंछी और परदेसी दोनों नहीं किसी के मीत' (शमशाद) और 'चंद्र किरण के डाल हिंडोले' (शमशाद) जैसे सुंदर गीत भी 'वीणा' में थे, पर 'पंछी और परदेसी' को छोड़कर अधिक लोकप्रियता इस फि़ल्म के संगीत को नहीं मिली। 'वीणा' ही वह अंतिम फि़ल्म थी जिसमें अनिल विश्वास और नरेन्द्र शर्मा ने एक साथ काम किया।
सुरैया, मोतीलाल अभिनीत 'गजरे' (1948) का अनिल विश्वास का संगीत अधिक लोकप्रिय रहा, विशेषकर सुरैया का गाया 'दूर पपीहा बोला रात आधी रह गई' और सुरों के बेहतरीन परिवर्तन और ऑरकेस्ट्रा के सुसंगत प्रयोगवाला 'कब आओगे बालमा बरस-बरस बदली भी बिखर गई' (लता)। 'अंदाज़' की रेकॉर्डिंग की तरह 'बरस-बरस बदली' की रेकॉर्डिंग पर भी राज कपूर मौजूद थे, और लता के अनुसार तो इसी गीत से प्रभावित होकर (हालाँकि 'अंदाज़' के गीतों का प्रभाव भी रहा ही होगा) राज कपूर ने 'बरसात' के लिए गाने का लता को आमंत्रण भेजा था। बहरहाल, धीमी लय में 'घर यहाँ बसाने आए थे' (लता), कर्णप्रिय 'प्रीतम तेरा मेरा प्यार' (लता), विरह की धीमी लहरों को बिखेरती 'कब तक करेगी जि़ंदगी' (लता), रसपूर्ण 'ओ दुपट्टा रंग दे मेरा रंगरेज' (सुरैया), 'जलने के सिवा मन क्या है यहाँ' (सुरैया) जैसे फि़ल्म गीत भी अनिल विश्वास के सहज लावण्य की छटा बिखेरते चलते हैं।
सुरैया, देव आनंद अभिनीत चर्चित फि़ल्म मोहन सिन्हा निर्देशित 'जीत' (1949) में श्यामबाबू पाठक के साथ अनिल विश्वास भी संगीतकार थे। लता का गाया मुरकियों से भरा 'हँस ले गा ले ओ चाँद' खूब लोकप्रिय रहा था। राजनीतिक-सामाजिक चेतना के प्रति विश्वास की प्रतिबद्धता दिखाने वाला गीत 'चाहे कितनी कठिन डगर' भी इसी फि़ल्म में था। वहीं 'गजऱे' की तरह सुरैया भी 'तुम मीत मेरे तुम प्राण मेरे' और 'कुछ फूल खिले अरमानों के' की प्रणय संवेदनाओं के साथ खूब जमी हैं। लता के स्वर की मिठास इस दौर में बड़ी लुभावनी लगती है—'मस्त पवन है चंचल धारा' में तो यह अपने चरम पर है। वहीं 'गल्र्स स्कूल' (1949) में दो संगीतकार थे—सी. रामचंद्र और अनिल विश्वास। दोनों ही शीर्षस्थ। पर सी. रामचंद्र के चुलबुले फड़कते गीतों के बीच भी अनिल विश्वास की कमसिन प्रेम भरी धुन 'नये रास्ते पे हमने रखा है कदम' (लता) अपना प्रभाव छोडऩे में सफल रही। 'गल्र्स स्कूल' के लिए ही अनिल विश्वास ने पहली बार लता को रेकॉर्ड किया था—'तुम्हीं कहो मेरा मन क्यों रहे उदास' के लिए—भले ही फि़ल्म 'अनोखा प्यार', 'गजरे' आदि के बाद रिलीज़ हुई हो।
लता मंगेशकर भी यह मानती हैं, रेकॉर्डिंग के समय इस तरह साँस लेना कि उसकी आवाज़ माइक्रोफ़ोन में न आए, यह उन्होंने अनिल विश्वास से ही सीखा। ऑरकेस्ट्रा के बीच आवाज़ के इंद्राज़ और फिर उसके फ़ेड आउट की ऐसी तकनीक कि साँस सुनाई न दे और ऑरकेस्ट्रा के प्रवाह में कोई कमी न आए, लता को अनिल विश्वास से ही मिली। लता के उच्चारण को बोलों के हिसाब से विकसित करने और मराठी लहजे से मुक्ति दिलाने में भी अनिल विश्वास का बड़ा योगदान था। मुकेश की तरह लता को भी नूरजहाँ के प्रभाव से मुक्त कराकर उनकी स्वतंत्र शैली विकसित कराने में अनिल विश्वास का ही सबसे बड़ा हाथ था। अनिल विश्वास ही वह संगीतकार थे जिन्होंने कभी यह बयान दिया था कि 'लता की आवाज़ में आत्मा है जब कि आशा की आवाज में शरीर'। लेकिन इस सब के बावजूद लता ने 1967 की अपनी पसंदीदा 10 गानों की फेहरिस्त में विश्वास का एक भी गीत नहीं रखा—कारण क्या था, यह तो विचार का ही विषय होगा वरना भले ही अपनी पत्नी मीना कपूर को भी विश्वास ने कई सुंदर गीत दिए हों, पर यह तो उन्होंने लता के लिए ही कहा था कि फिल्म-जगत में एक बार जब लता आ गईं तो फिर वे जटिल से जटिल रचनाएँ भी इस आत्मविश्वास से कम्पोज़ कर सकते थे कि लता उन्हें सहजता से गाने में पूर्णत: सक्षम रहेंगी। लता के गाए 'लाडली' (1949) के गीतों में गुरु अनिल विश्वास और शिष्या लता की युगल जोड़ी माधुर्य और सटीकता के उत्कर्ष पर है। भैरवी आधारित 'तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है' की मिठास तो आज तक कम नहीं हुई है। पियानो की तरंगों पर सजे इस गीत को कई श्रोता तो लता के साथ अनिल विश्वास का सर्वश्रेष्ठ गीत मानते हैं। यह गीत फि़ल्म के अन्य गीतों पर भारी पड़ता है वरना ढोलक के सुंदर प्रयोग वाला 'जि़ंदगी की रोशनी तो खो गई' (लता), चुलबुले भाव वाला 'कैसे कह दूँ बजरिया के बीच' (लता) और बेहद लोकप्रिय और प्रभावशाली 'आँखें कह गईं दिल की बात' (बातिश) भी इसी फि़ल्म की सुंदर प्रस्तुतियांँ थीं, जो 'तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है' की लावण्य-भरी विराटता के आगे दब-सी गईं।
तलत महमूद को भी बंबई की फि़ल्मी दुनिया में स्थापित करने का श्रेय भी अनिल विश्वास को ही जाता है। तलत कलकत्ते में तो गा चुके थे, पर शाहिद लतीफ़ निर्देशित 'आरज़ू' (1950) के लिए वे पहली बार बंबई की फि़ल्मी दुनिया में कदम रख रहे थे। तलत अपनी आवाज़ की जिस लजिऱ्श या कम्पन के लिए जाने जाते हैं, उसे कायम रखने की सलाह भी अनिल विश्वास ने ही दी थी, वरना दूसरों के कहने पर तलत अपने स्वर की स्वाभाविक कम्पन को दबाने में लग गए थे। और तलत का बंबई की फि़ल्मी दुनिया का वह पहला गीत भी क्या लाजवाब बना था! 'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो' के साथ तो तलत रातोंरात लोगों के दिलों में बैठ गए। दरबारी के सुरों के साथ तलत की आवाज़ की वह भावुक लजिऱ्श इस गीत को बेमिसाल बना गई। आज भी इसे एक बार सुनकर मन नहीं भरता—बार-बार सुनने को जी चाहता है।
आसावरी थाट के राग अनिल विश्वास के चहेते रहे हैं और 'आरज़़ू' (1950) का 'कहाँ तक हम उठाए ग़म' (लता) का शिल्प और हुनर इस तथ्य को भली भाँति रेखांकित करता है। क्या कशिश-भरी धुन है इसकी भी! 'आरज़़ू' के गीत बड़े मीठे थे। बाँसुरी की तानों के बीच 'मेरा नरम करेजवा डोल गया' (लता) धीमी लहराती तजऱ् लिए 'उन्हें हम जो दिल से' (लता), प्यार—भरे निवेदन के बीच बाँसुरी के मीठे छितराए टुकड़ों वाले 'आँखों से दूर जा के जाना न दिल से दूर' (लता) और 'आई बहार जिया डोले' (लता, साथी) इसके बहुत अच्छे उदाहरणों में गिने जाएँगे। अनिल विश्वास के स्वर में 'हमें मार चला ये खय़ाल ये ग़म' नौटंकी शैली का जबर्दस्त गीत था जो आज दुर्भाग्य से भुला दिया गया है। इसके अलावा तीन भागों में एक बहुत अच्छा स्टेज ड्रामा भी संगीत की विभिन्न शैलियों को समाहित करते हुए कम्पोज़ किया गया था—'जाओ सिधारो...लो ये आफ़त भी टली ...अपने पहलू में समझता था कि दिल रखती है तू' (शमशाद, बातिश, मुकेश, साथी)। इसी प्रकार 'बेकसूर' (1950) में भी कव्वालीनुमा 'ख़बर किसी को नहीं वो किधर को देखते हैं' (दुर्रानी, मुकेश, रफ़ी, साथी) भी बहुत आकर्षक कम्पोज़ीशन थी। पर अधिक मक़बूल हुई लता की गाई मिठास-भरी तीन धुनें—लोकशैली का ताल पक्ष पर जोर डालता अति सुंदर 'हुए उनसे नैना चार अब मैं क्या करूँ', मुजरा शैली में 'मतवाले नैनों वाले मैं वारी वारी जाऊँ', और  शास्त्रीय रंग लिए हुए भैरव आधारित 'आई भोर सुहानी आई'। 'मतवाले नैनों वाले के मैं' गीत के पहले लता के स्वर में वही पँक्तियाँ हैं जो वर्षों बाद 'अनीता' में मुकेश के गाए गीत का मुखड़़ा बना—'गोरे-गोरे चाँद से मुख पर काली-काली आँखे हैं...'। आरज़ू लखनवी का क़लाम आनंद बख्शी का गीत बन गया।
'लाजवाब' (1950) में भी लता के कई गीत थे, पर सबसे मशहूर रहे लता-मुकेश का बेहतरीन ऑरकेस्ट्रेशन के साथ वाल्ट्ज की शैली में सदाबहार दर्दीला दोगाना 'ज़माने का दस्तूर है ये पुराना' और मीना कपूर के स्वर में बेहद मोहक सी कशिश लिए 'जब कारी बदरिया छाएगी और याद तेरी तड़पाएगी' जिसे अनिल विश्वास ने पूरब अंग में कम्पोज़ किया था। 'डिंगू नाचे रे गोरी डिंगू' (लता, अनिल विश्वास, साथी) भी लोकशैली की एक अच्छी रचना थी।
अनिल विश्वास ने अपनी आग़ामी फि़ल्मों में भी लता और मीना कपूर दोनों को ही बराबर का मौका दिया। अच्छी गायिका के अलावा मीना कपूर का व्यक्तिगत मोह तो था ही, और लता से तो कोई संगीतकार अलग रहना ही नहीं चाहता था। इसी प्रकार पुरुष गायकों में मुकेश और तलत अनिल विश्वास के पसंदीदा गायक बने रहे। डी.डी. कामथ की देव आनंद अभिनीत 'आराम' (1951) में एक तरफ़ पियानो और हारमोनियम की बेहतरीन संगत के साथ 'शुक्रिया ऐ प्यार, तेरा शुक्रिया' को लेकर तलत थे (पर्दे पर भी यह गीत तलत पर ही फि़ल्माया गया था) तो दूसरी ओर बड़ी दिलक़श सी धुन और आकर्षक अंदाज़ में 'ऐ जाने जिग़र दिल में समाने आ जा' के साथ मुकेश थे और इन सबके साथ इठलाती अदा के साथ 'रूठा हुआ चंदा है रूठी हुई चाँदनी', 'मन 'सीने में सुलगते हैं' की रेकॉर्डिंग पर अनिल विश्वास लता और तलत के साथ अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे में किसी की प्रीत बसा ले', काउंटर मेलोडी के इस्तेमाल के साथ 'मिल- मिलकर बिछड़ गये नैन' और जौनपुरी आधारित 'बालमवा नादान' जैसे लोकप्रिय गीतों को लेकर लता थीं। अनिल विश्वास के फि़ल्म निर्माण के क्षेत्र में पदार्पण को इंगित करती 'वेरायटी प्रोडक्शन्स' की आशालता विश्वास (उनकी पत्नी) द्वारा निर्मित 'बड़ी बहू' (1951) में पन्नालाल घोष की सुंदर शैली के इंटरल्यूड्स के साथ पंजाबी लोक 'बोलियाँ' की शैली पर 'काहे नैनों में कजऱा भरो' (लता, मुकेश), चाल की अलमस्ती को अभिव्यक्त करता अनूठे ताल में 'प्यार की राह पर क्या भटकने का डर' (लता, मुकेश), और मीठी-सी लोक धुन लिए 'निंदिया आई रे, नन्ही को मोरी' (राजकुमारी) तथा 'बदली तेरी नजऱ तो नज़ारे बदल गए' (लता) जैसे गीत भी खूब लोकप्रिय रहे थे। वहीं सुरैया, देव आनंद अभिनीत 'दो सितारे' (1951) में जलतरंग के सुंदर प्रयोग वाला 'मेरे दिल की धड़कन में ये कौन समा गया' (सुरैया), भड़कती रिद्म पर उछलती-कूदती लता की आवाज़ में 'इधर खो गया या उधर खो गया' या सुरैया के स्वर में 'मुझे तुमसे मुहब्बत है मगर अब तक कहाँ हो तुम' की आकर्षक धुनें भी अच्छी चली थीं। मीना कपूर और साथियों के स्वर में 'दे दे कन्हैया' लोकधुन पर आकर्षक रचना थी।
तलत अनिल विश्वास के लिए उतने ही प्रिय हो चले थे, जितने मुकेश। 'दोराहा' के गीत पहले रफ़ी के स्वर में रेकॉर्ड कराए गए थे पर हीरो शेखर के कथानक के हिसाब से उभरे चरित्र में जो नरमी, जो आभिजात्य आना चाहिए था, वह रफ़ी के स्वर में अनिल विश्वास नहीं खोज पाए। इसलिए वे गीत तलत के स्वर में पुन: रेकॉर्ड कराए गए, और 'दिल में बसा के मीत बना के' तथा 'तेरा खय़ाल दिल से भुलाया नहीं अभी' को आज सुनकर लगता है कि इन्हें तलत से बेहतर कोई गा ही नहीं सकता था। जो दर्द, जो संगीत के साथ अपनी कम्पित आवाज़ का तादात्म्य तलत स्थापित करते हैं, वह अनूठा ही है। 'दोराहा' का राग मल्हार की छाया लिए एक अन्य बेहद खूबसूरत गीत है 'मुहब्बत तर्क की मैंने' (तलत)। इस गीत का ऐतिहासिक महत्त्व भी है, क्योंकि सम्भवत: यह फि़ल्मों में साहिद लुधियानवी की लिखी पहली नज़्म है।  दरअसल अनिल विश्वास ने रफ़ी को कभी भी अपने गीतों के लिए उपयुक्त नहीं समझा। बकौल उनके रफ़ी की खुली, उन्मुक्त आवाज़ उनके नर्म कोमल भावों को अभिव्यक्त करने के लिए उपयुक्त नहीं थी। यही कारण है कि दिलीप कुमार के लिए 'तराना' (1951) में उनकी आवाज़ बनकर तलत आए और क्या खूब आए! राम दरयानी की निर्देशित इस चर्चित फि़ल्म का संगीत तो आज तक सुपरहिट है—विशेषकर यमन कल्याण पर आधारित तलत (लता के साथ) के दर्दीले सोज़-भरे स्वर में 'सीने में सुलगते हैं अरमाँ'। यह गीत तलत के सर्वश्रेष्ठ गीतों में हमेशा ही शुमार होता रहेगा। इस गीत के सामने 'तराना' के अन्य उत्कृष्ट गीतों भी नहीं ठहर पाते वरना 'नैन मिले नैन हुए बावरे' (लता, तलत) की मदहोश करती तजऱ्, काफ़ी थाट पर आधारित 'बेईमान तोरे नैनवा' (लता) का शिल्प, 'एक मैं हूँ एक मेरी बेबसी' (तलत) और 'वो दिन कहाँ गए बता' (लता) का दर्द, 'मोसे रूठ गयो मोरा साँवरिया' (लता) और 'यूँ छुम-छुम के मेरा आना' (लता) की मिठास किसी भी तरह से कमतर नहीं थे। 'आराम' और 'तराना' फि़ल्मों के ऑरकेस्ट्रा के लिए अनिल विश्वास ने ए.बी. अल्ब्युकर्क, पीटर डोरैडो तथा राम सिंह (जिसे ए.आ.पी. पार्टी के नाम से जाना जाता था) जैसे गोवा के वादकों से बजवाया था। गोवा से फि़ल्म संगीत में कई वादक इस दौर में आए थे। दरअसल गोवा में संगीत लिपि भी शासकीय विद्यालयों के पाठ्यक्रम में विषय के रूप में शामिल थी।
यह अफ़सोसजनक है कि तलत और मुकेश दोनों ने ही कम गीत गाए, वरना अनिल विश्वास के साथ हमें उनके और भी कई लाजवाब गीत सुनने की इच्छा तो होती है। तलत के स्वर में सुरैया के साथ उनकी अभिनीत 'वारिस' (1959) के गीत तो आज तक लोकप्रिय हैं। धीमी लय  में मेलोडी से भरी गज़ल 'कभी है ग़म कभी खुशियाँ' (तलत), सितार के सुंदर प्रयोग के साथ गज़ल शैली में ही अति सुंदर 'दूर होते नहीं जो दिल में रहा करते हैं' (सुरैया, तलत), सुंदर ऑरकेस्ट्रेशन के साथ 'घर तेरा अपना घर लागे' (सुरैया, तलत), मुजरा शैली में गाई राजकुमारी की प्रसिद्ध ठुमरी 'सौतन घर न जा' और सबसे बढ़कर आज तक उतना ही लोकप्रिय रवींद्र संगीत पर आधारित 'राही मतवाले तू छेड़े इस बार' (तलत, सुरैया) इसके अनन्य उदाहरण हैं। अप्रदर्शित 'जासूस' में भी अनिल विश्वास से तलत एक बहुत ही सुकोमल सरस गीत गवाया था—'जीवन है मधुवन तू इसमें फूल खिला'। इस गीत की नर्म कम्पोज़ीशन को तो आज भी संगीतप्रेमी याद करते हैं। पियानो का प्रयोग इस गीत में बहुत ही सुंदर लगता है। मुकेश तो इस दौर में फि़ल्म-निर्माण के चक्कर में पाश्र्वगायन से लगभग दूर से ही गए थे और इस कारण हम अनिल विश्वास और मुकेश के साथ के बहुत से सम्भावित गीतों से वंचित रह गए। इस दौर में बस 'मान' (1954) में मुकेश और अनिल विश्वास एक साथ आए और 'दम भर का था दौर खुशी का' मुकेश की विशिष्ट शैली में आज तक लोकप्रिय है।
पर इस दौर की अनिल विश्वास की तीन सर्वाधिक उल्लेखीन फि़ल्मों—'हमदर्द' (1953), 'महात्मा कबीर' (1954) और 'फरेब' (1953)—में गायक तलत या मुकेश न होकर मन्ना डे और किशोर कुमार थे। 'हमदर्द' (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन्स के लिए हिंदी फि़ल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन 'वेरायटी प्रोडक्शन्स' (निर्मात्री—आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फि़ल्म में 'ऋतु आए ऋतु जाए सखी री' (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खय़ाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुंदर उदाहरण फि़ल्म संगीत में कम ही  मिलते हैं। मन्ना डे के दो और बेजोड़ गीत इसी फि़ल्म से हैं—शास्त्रीय रंग पर द्रुत लय के ऑरकेस्ट्रेशन के इंटरल्यूड्स के साथ 'मेरे मन की धड़कन में कोई नाचे' और गज़ल शैली में मजरूह का अति सुंदर कलाम 'तेरा हाथ हाथों में आ गया'। लता का गाया दादरा ताल पर सृजित और सुंदर 'उधर तेरी नजऱ बदली' और मन्ना डे, साथियों की कव्वाली 'न तो हमसा ज़माने में', 'हमदर्द' के लाजवाब गीतों के अन्य उदाहरण हैं। 'तेरे नैना रसीले कटीले' (मन्ना डे), 'सपने तुझे बुलाएँ' (गीता), 'तेरे सब ग़म मिले' (लता) भी बड़े अच्छे गीत थे। 'हमदर्द' में विश्वास ने खय़ाल, गज़ल, रवीन्द्र संगीत, सुगम संगीत, कव्वाली—सभी विधाओं का प्रयोग किया था। इस फिल्म में पं. रामनारायण ने सारंगी बजाई थी। 'महात्मा कबीर' में पुन: मन्ना डे के स्वर में 'झीनी झीनी रे बीने चदरिया', 'घूँघट का पट खोल रे', 'बाबुल मोरा नैहर', 'मनुआ तेरा दिन-दिन बीता जाए' और 'सतगुरु मोरा रगरे ँ ज' (अनिल विश्वास के साथ) जैसी रचनाएँ निर्गुण भक्ति की एक बेहद प्रभावशाली संगीत धारा का सृजन करती हैं। फि़ल्म संगीत में कबीर के दोहों, भजनों का इतना सुंदर उदाहरण फिर नहीं मिलता है। सी.एच. आत्मा के स्वर में 'राम रस बरसे रे मन' चंद्रशेखर पांडे द्वारा लिखा गया था और अपने ज़माने में बेहद लोकप्रिय रहा था। 'मोरे मंदिर अब...घूँघट का पट' आशा और मन्ना डे के द्वारा राग जयजयवंती की बहुत सुंदर रसपूर्ण प्रस्तुति थी। अनिल विश्वास के संगीत की एक और विशिष्टता थी—बंगाली कीर्तन की ताल का प्रयोग। यह और भी दिलचस्प है कि इस ताल का प्रयोग उन्होंने कीर्तन गीतों के अलावा अन्य भावों के गीतों के लिए भी किया—उदाहरण के तौर पर 'फऱेब' का 'मेरे मन में समा', 'बड़ी बहू' का 'रमैया बिन नींद न आवे', 'दो सितारे' का 'सो जा रे सो जा', 'मेहमान' का 'आँखों में चितचोर समाए' और 'संस्कार' के 'दिल शाम में डूबा जाता है' के पृष्ठभूमि संगीत का जिक्र किया जा सकता है।
शाहिद लतीफ़ और इस्मत चुगतई की निर्देशित 'फरेब' (1953) के हीरो किशोर कुमार थे और ज़ाहिराना तौर पर गीत उनके ही स्वर में थे। नर्म और मुलायम अंदाज़ के दो लोकप्रिय गीत—'हुस्न भी है उदास उदास' और 'आ मुहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम' (लता के साथ), इस फि़ल्म की दो उत्कृष्ट उपलब्धियाँ रही हैं—शास्त्रीय आधार लेकर उसका इतना सुगम रूपांतर और वॉयलिन का कोमल उपयोग 'आ मुहब्बत की बस्ती' में शायद अनिल विश्वास से बेहतर कोई नहीं ला सकता था। लता के स्वर में 'जाओगे ठेस लगा के बहुत' भी अत्यंत सुंदर रचना थी।
यह अफ़सोसजनक है कि तलत और मुकेश दोनों ने ही कम गीत गाए, वरना अनिल विश्वास के साथ हमें उनके और भी कई लाजवाब गीत सुनने की इच्छा तो होती है। तलत के स्वर में सुरैया के साथ उनकी अभिनीत 'वारिस' (1959) के गीत तो आज तक लोकप्रिय हैं। धीमी लय अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे में मेलोडी से भरी गज़ल 'कभी है ग़म कभी खुशियाँ' (तलत), सितार के सुंदर प्रयोग के साथ गज़ल शैली में ही अति सुंदर 'दूर होते नहीं जो दिल में रहा करते हैं' (सुरैया, तलत), सुंदर ऑरकेस्ट्रेशन के साथ 'घर तेरा अपना घर लागे' (सुरैया, तलत), मुजरा शैली में गाई राजकुमारी की प्रसिद्ध ठुमरी 'सौतन घर न जा' और सबसे बढ़कर आज तक उतना ही लोकप्रिय रवींद्र संगीत पर आधारित 'राही मतवाले तू छेड़े इस बार' (तलत, सुरैया) इसके अनन्य उदाहरण हैं। अप्रदर्शित 'जासूस' में भी अनिल विश्वास से तलत एक बहुत ही सुकोमल सरस गीत गवाया था—'जीवन है मधुवन तू इसमें फूल खिला'। इस गीत की नर्म कम्पोज़ीशन को तो आज भी संगीतप्रेमी याद करते हैं। पियानो का प्रयोग इस गीत में बहुत ही सुंदर लगता है। मुकेश तो इस दौर में फि़ल्म-निर्माण के चक्कर में पाश्र्वगायन से लगभग दूर से ही गए थे और इस कारण हम अनिल विश्वास और मुकेश के साथ के बहुत से सम्भावित गीतों से वंचित रह गए। इस दौर में बस 'मान' (1954) में मुकेश और अनिल विश्वास एक साथ आए और 'दम भर का था दौर खुशी का' मुकेश की विशिष्ट शैली में आज तक लोकप्रिय है। 
पर इस दौर की अनिल विश्वास की तीन सर्वाधिक उल्लेखीन फि़ल्मों—'हमदर्द' (1953), 'महात्मा कबीर' (1954) और 'फरेब' (1953)—में गायक तलत या मुकेश न होकर मन्ना डे और किशोर कुमार थे। 'हमदर्द' (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन्स के लिए हिंदी फि़ल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन 'वेरायटी प्रोडक्शन्स' (निर्मात्री—आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फि़ल्म में 'ऋतु आए ऋतु जाए सखी री' (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खय़ाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुंदर उदाहरण फि़ल्म संगीत में कम ही मिलते हैं। मन्ना डे के दो और बेजोड़ गीत इसी फि़ल्म से हैं—शास्त्रीय रंग पर द्रुत लय के ऑरकेस्ट्रेशन के इंटरल्यूड्स के साथ 'मेरे मन की धड़कन में कोई नाचे' और गज़ल शैली में मजरूह का अति सुंदर कलाम 'तेरा हाथ हाथों में आ गया'। लता का गाया दादरा ताल पर सृजित और सुंदर 'उधर तेरी नजऱ बदली' और मन्ना डे, साथियों की कव्वाली 'न तो हमसा ज़माने में', 'हमदर्द' के लाजवाब गीतों के अन्य उदाहरण हैं। 'तेरे नैना रसीले कटीले' (मन्ना डे), 'सपने तुझे बुलाएँ' (गीता), 'तेरे सब ग़म मिले' (लता) भी बड़े अच्छे गीत थे। 'हमदर्द' में विश्वास ने खय़ाल, गज़ल, रवीन्द्र संगीत, सुगम संगीत, कव्वाली—सभी विधाओं का प्रयोग किया था। इस फिल्म में पं. रामनारायण ने सारंगी बजाई थी। 'महात्मा कबीर' में पुन: मन्ना डे के स्वर में 'झीनी झीनी रे बीने चदरिया', 'घूँघट का पट खोल रे', 'बाबुल मोरा नैहर', 'मनुआ तेरा दिन-दिन बीता जाए' और 'सतगुरु मोरा रगरे ँ ज' (अनिल विश्वास के साथ) जैसी रचनाएँ निर्गुण भक्ति की एक बेहद प्रभावशाली संगीत धारा का सृजन करती हैं। फि़ल्म संगीत में कबीर के दोहों, भजनों का इतना सुंदर उदाहरण फिर नहीं मिलता है। सी.एच. आत्मा के स्वर में 'राम रस बरसे रे मन' चंद्रशेखर पांडे द्वारा लिखा गया था और अपने ज़माने में बेहद लोकप्रिय रहा था। 'मोरे मंदिर अब...घूँघट का पट' आशा और मन्ना डे के द्वारा राग जयजयवंती की बहुत सुंदर रसपूर्ण प्रस्तुति थी। अनिल विश्वास के संगीत की एक और विशिष्टता थी—बंगाली कीर्तन की ताल का प्रयोग। यह और भी दिलचस्प है कि इस ताल का प्रयोग उन्होंने कीर्तन गीतों के अलावा अन्य भावों के गीतों के लिए भी किया—उदाहरण के तौर पर 'फऱेब' का 'मेरे मन में समा', 'बड़ी बहू' का 'रमैया बिन नींद न आवे', 'दो सितारे' का 'सो जा रे सो जा', 'मेहमान' का 'आँखों में चितचोर समाए' और 'संस्कार' के 'दिल शाम में डूबा जाता है' के पृष्ठभूमि संगीत का जिक्र किया जा सकता है। शाहिद लतीफ़ और इस्मत चुगतई की निर्देशित 'फरेब' (1953) के हीरो किशोर कुमार थे और ज़ाहिराना तौर पर गीत उनके ही स्वर में थे। नर्म और मुलायम अंदाज़ के दो लोकप्रिय गीत—'हुस्न भी है उदास उदास' और 'आ मुहब्बत की बस्ती बसाएँगे हम' (लता के साथ), इस फि़ल्म की दो उत्कृष्ट उपलब्धियाँ रही हैं—शास्त्रीय आधार लेकर उसका इतना सुगम रूपांतर और वॉयलिन का कोमल उपयोग 'आ मुहब्बत की बस्ती' में शायद अनिल विश्वास से बेहतर कोई नहीं ला सकता था। लता के स्वर में 'जाओगे ठेस लगा के बहुत' भी अत्यंत सुंदर रचना थी।
यह अफ़सोसजनक है कि वह राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा जिसके संगीत पक्ष का विश्वास पाँचवें दशक में प्रतिनिधित्व करते थे, अब उनके संगीत से लुप्त-सी हो गई। उस प्रकार की फि़ल्में एक तो स्वतंत्रता उपरांत कम बनने लगी थीं, क्योंकि नई-नई प्राप्त स्वतंत्रता का उत्साह और आशाओं की लहर ने कुछ अरसे तक समाज में व्याप्त विसंगतियों, वर्ग-विभेद, कुरीतियों आदि के आक्रोश को कुछ हद तक दबाए रखा, पर वक्त के साथ-साथ मोहभंग भी तेजी से होने लगा और सामाजिक विडम्बनाओं, आर्थिक विषमताओं को प्रकट करनेवाली फि़ल्मों और फि़ल्म-निर्माताओं को पुन: कुछ जगह मिलने लगी। ख्वाजा अहमद अब्बास की 'आकाश' (1953), 'राही' (1953) और गीतविहीन 'मुन्ना' (1954) जैसी फि़ल्मों में पुन: अनिल विश्वास को बतौर संगीतकार चुना गया। 'आकाश' में अनिल विश्वास ने शंकर दासगुप्ता से 'अजीब है जि़ंदगी की मंजिल' जैसे सुंदर गीत गवाए, मीना कपूर से भी पियानो के हलके सुरों पर पाश्चात्य शैली में 'भीगी भीगी रात आई' और 'मेरे दिल के गीत चुप के' जैसे कर्णप्रिय गीत गवाए, और इन सबसे बढ़कर नीची पट्टी पर लता के स्वर 'वारिश' में तलत और सुरैया में 'सो गई चाँदनी, जाग उठी बेकली' और 'सारा चमन था अपना' जैसे प्रभावशाली गीतों की सृष्टि की। मुल्क राज आनंद के उपन्यास पर बनी फि़ल्म 'राही' (1953) के संगीत में राजनीतिक-सामाजिक चेतना का पहलू अधिक मुखर था। लंबा गीत 'एक कली और पतियाँ...क्या क्या जुल्म हमपे ढाए रे विदेसिया...हमारे भी तो दिन हैं आने वाले...मशाल से मशाल जलाकर निकले' (हेमंत, लता, मीना, साथी) में हालाँकि प्रतीक विदेशी सत्ता का था, पर भोजपुरी लोकशैली के भिन्न प्रकारों से सँवारे इस गीत में जुल्म और सत्ता के विरुद्ध जिन सुंदर लाक्षणिक भावाभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया था उनमें कई दूरगामी राजनीतिक चेतनाएँ निहित थीं। मार्चिंग सांग की बीट के बीच बाँसुरी के सुंदर मीठे टुकड़ों के संयोजन से सृजित 'ये जि़ंदगी है इक सफऱ' (हेमंत), अपने ज़माने में बेहद लोकप्रिय रहा। पंजाब की लोक धुन पर आधारित 'ओ जाने वाले राही इक पल रूक जाना' (लता) जैसे गीतों में भी अनिल विश्वास एक लम्बे अंतराल के बाद फिर अपनी चिर परिचित भारतीय ंअंदज हंतकम की ज़मीन पर लगते हैं। 'जालियाँवाला बाग की ज्योति' (1954) का 'मत रो धरतीमाता' (समूह गीत) भी इसी शैली का गीत था। वैसे 'राही' का सबसे लोकप्रिय गीत 'राही मतवाले, तू छेड़ इक बार मन का सितार' (तलत, सुरैया) अनिल विश्वास ने रवींद्र संगीत पर आधारित किया था और इसकी मधुर धुन आज तक लोगों के बीच गाई-गुनगुनाई जाती है।1 चाँद सो गया तारे सो गए' जैसी मधुर लोरी भी इसी फि़ल्म में थी जिसे विश्वास ने पूर्वोत्तर की खासी जनजाति की लोकधुन पर आधारित किया था। इसी प्रकार 'मुन्ना' हालाँकि गीतविहीन फि़ल्म थी, पर अनिल विश्वास ने इस फि़ल्म में अलग-अलग पात्रों के चरित्र को उभारने के लिए अलग-अलग वाद्यों को चुनकर एक नया प्रयोग किया।
पर यह भी सच है कि शंकर-जयकिशन, ओ.पी.नैयर और सचिन देव बर्मन की बढ़ती लोकप्रियता के बीच अनिल विश्वास की कुछ सुंदर  रचनाओं के साथ श्रोताओं ने उतना न्याय नहीं किया जितना होना चाहिए था। 'मेहमान' (1954) का सुकोमल 'मन का पंछी मस्त पवन में उड़ता झोंके खाए' (मीना कपूर) और मेलोडी भरा 'आती है लाज' (लता), 'मान' (1954) का कशिश भरा 'मैं क्या करूँ रुकती नहीं अश्कों की रवानी' (मीना कपूर), राग देस पर आधारित 'मेरे प्यार में' (लता) तथा सामाजिकता से चैतन्य गीत 'ये पहाड़...कह दो कि मुहब्बत से', फ़णि मजुमदार द्वारा निर्देशित फऱार' (1957) का 'इक नया तराना, इक नया फ़साना' (गीता), 'पैसा ही पैसा' (1956) के किशोर के स्वर की पूरी संभावनाओं को प्रत्यक्ष करता 'पैसे का मंतर, पैसे का जंतर' और लता, साथियों के स्वर में नतृ्यात्मक 'पायल मोरी बाजे', महेश कौल की निर्देशित 'अभिमान' (1952) के घरेलू 'घर की रानी हूँ जी' (गीता) और शगारयु ृं क्त 'कल रात पिया ने बात कही कुछ ऐसी' (गीता) जैसे गीत आए-गए होकर ही रह गए। छठे दशक के मध्य से ही अनिल विश्वास को मिलनेवाली फि़ल्मों की संख्या भी तेजी से घटने लगी थी। वैसे 'मान' फि़ल्म में अनिल विश्वास का कम्पोज़ किया सुंदर-सा एक गीत था—'अल्लाह भी है मल्लाह भी है, कश्ती है कि डूबी जाती है' (लता)। दरअसल यह गीत अनिल विश्वास ने 'मुग़ल-ए-आज़म' के लिए रेकॉर्डकिया था। के.आसिफ़ ने 'मुगल-ए-आज़म' की योजना बहुत पहले ही बनाई थी, और बतौर संगीतकार गोविंदराम और फिर अनिल विश्वास को चुना था। पर जब 'मुगल-ए-आज़म' का निर्माण रुक गया तो अनिल विश्वास ने इस गीत को 'मान' के लिए ले लिया।
अनिल विश्वास पियानो का उपयोग भावनाओं को उभारने के लिए बहुत सुंदरता से करते थे। 'बसंत' के 'एक दुनिया बसा ले', 'आराम' के गीतों, 'आकाश' के 'भींगी-भींगी रात आई', 'लाडली' के 'तुम्हारे बुलाने को', 'जासूस' के 'जीवन है मधुवन', 'ज्वार भाटा' के 'भूल जाना चाहती है', 'फरेब' के 'हुस्न भी है' जैसे गीतों के अलावा 'नाज़' (1954) के 'झिलमिल सितारों के तले, आ मेरा दामन थाम ले' (लता) में भी इसका प्रयोग बेहतरीन था। गीत का आरम्भ पियानो के कोमल तरंगों से करके गीत में रिद्म परिवर्तन करते हुए आह्लाद भरे मूड का रूपांतरण भी अनिल विश्वास ने बड़े कलात्मक ढंग से किया है। 'नाज़' ऐसी पहली हिंदी फि़ल्म थी, जिसकी शूटिंग विदेश में की गई थी। फि़ल्म में लता के गाए 'ऐ दिन दुखड़ा किसे सुनाएँ', 'कहती है अब तो जि़ंदगी करने के इंतजार में' और ऊँची पट्टी पर गाया 'आँखों में दिल है होंठों पर जान' भी अच्छे गीत थे। वर्षों बाद अनिल विश्वास फिर इस फि़ल्म में अरबी संगीत का प्रभाव लेकर आए थे। अनिल विश्वास ने अपने कोमल रूमानी गीतों में अक्सर बहुत हलके ऑरकेस्ट्रेशन का प्रयोग किया। उदाहरण के तौर पर 'दोराहा' के 'लूटा है ज़माने ने' (लता) को सुनिए और संगीतकार का कौशल बिल्कुल प्रत्यक्ष हो जाएगा। भिन्न स्थायी के लिए भिन्न धुनों का प्रयोग भी उनकी रचनाओं में कहीं-कहीं मिलता है। सैक्सोफ़ोन का प्रयोग उन्होंने कई बार धुन से अलग हटकर एक तरह की बवनदजमत.उमसवकल बनाते हुए बिलकुल स्वतंत्र रूप से किया।

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'दोराहा' की ही तरह 'पैसा ही पैसा' में भी रफ़ी की रेकॉर्डिंग रद्द हुई थी। किशोर कुमार हीरो थे और उस वक्त कई फि़ल्मों में अभिनय की व्यस्तता के कारण वे रेकॉर्डिंग के लिए समय नहीं निकाल पा रहे थे। इसलिए उनके ही सुझाव पर 'पैसे का मंतर' गीत रफ़ी की आवाज़ में रेकॉर्ड कर लिया गया था। पर बाद में जब पिक्चराइज़ेशन का मौका आया तो किशोर अड़ गए कि इसे वे खुद गाएँगे। जब मनाने पर भी वे नहीं माने तो अंतत: रफ़ी की रेकॉर्डिंग रद्द की गई और किशोर ने इस गीत को गाया। पर यह रफ़ी की महानता थी कि दो-दो बार अनिल विश्वास के निर्देशन में उनके रेकॉर्ड किए हुए गीत कैंसिल होने के बावजूद जब 'हीर' (1956) के लिए अनिल विश्वास ने उन्हें बुलवाया तो वे बिना किसी गिला-शिकवा के चले आए।10 'हीर' में अनिल विश्वास के निर्देशन में 'ओ ख़ामोश ज़माना है' (गीता के साथ), बेहद प्रभावशाली 'ले जा उसकी दुआएँ' और 'अल्लाह तेरी ख़ैर करे' जैसे उनके गीत आए। 'हीर' की पंजाबी थीम के लिए रफ़ी की ख़ुली आवाज़ का कोई विकल्प अनिल विश्वास के पास भी न था। फि़ल्म की नामावली के साथ रफ़ी के स्वर में पंजाबी में भी कुछ पंक्तियाँ थीं—'जदों इश्क दे कम नूँ हथ लाइए'। 'बेकसूर' (1950) की कव्वाली, अप्रदर्शित 'शिकवा', 'पैसा ही पैसा' के अलावा 'हीर' और 'संस्कार' ही ऐसी फि़ल्में थीं, जिनमें अनिल विश्वास और रफ़ी साथ आए। 'संस्कार' (1958) में भी रफ़ी के स्वर में 'भगवान भी खुश-खुश, शैतान भी हो राजी' एक अच्छी रचना थी। 

पर रफ़़ी के साथ अनिल विश्वास कभी भी जमे नहीं। 'हीर' में भी रफ़ी के गाए गीतों से अधिक (संभवत: 'ले जा उसकी दुआएँ' को छोड़कर) लोकप्रियता मिली 'ओ साजना छूटा है जो दामन तेरा' (हेमंत, गीता, साथी) की बहुत सुंदर धुन को। यह गीत आज तक लोकप्रिय है, और रेडियो पर फऱमाइशी गीतों के प्रोग्राम में अभी भी यदा-कदा सुनाई दे जाता है। हेमंत के गुंजायमान अंदाज़ में 'एक चाँद का टुकड़ा' की रूमानी धुन और एच.एम.व्ही. द्वारा गीता दत्त के 'रेयर जेम्स' कैसेट्स में शामिल 'बुलबुल में है चमन के' भी फि़ल्म की अच्छी कृतियाँ थीं। हेमंत कुमार के साथ एक और सुपरहिट गीत अनिल विश्वास ने 'जलती निशानी' (1957) में दिया था। 'कह रही है जि़ंदगी, जी सके तो जी' हेमंत के ख़ास आधुनिक अंदाज़ में खूब जमा और इस गीत को चाहने वाले आज तक हैं। इस फि़ल्म में अनिल विश्वास ने पृष्ठभूमि में कोरस का उयोग पुन: इस विधा में अपनी चिरपरिचित पारंगता से किया है। 'रूठ के तुम तो चल दिए' (लता) भी राग हेमंत पर आधारित इस फि़ल्म का एक मेलोडीप्रधान खूबसूरत गीत था जो लोकप्रिय भी रहा। 'ओ साकी रे ऐसा जाम पिला नजऱों से' (लता, हेमंत, साथी) में अनिल विश्वास ने पुन: आलाप और कोरस का बहुत अच्छा इस्तेमाल किया था। इसी फि़ल्म में अपनी वापसी के लिए संघर्षरत मुकेश को अनिल विश्वास ने पुन: मौका दिया लता के साथ एक सुंदर दोगाने 'दिल है बेकरार क्यों' में। 
फि़ल्मों में मामले में घटती संख्या के इस दौर में अनिल विश्वास के संगीत को सर्वाधिक सफलता मिली अपने मित्र निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास की नर्गिस, बलराज साहनी, ओलिग अभिनीत 'परदेसी' (1957) में। नेहरू-युग की भारतीय-रूस मैत्री के आधार पर भारत-सोवियत सहनिर्माण के बैनर तले इस फि़ल्म को संगीत-प्रेमी आज भी मीना कपूर के गाए सर्वाधिक लोकप्रिय गीत 'रसिया रे मनबसिया रे' के कारण याद करते हैं। इस गीत में पन्नालाल घोष की बाँसुरी, सितार और संतूर के इंटरल्यूड्स तो लाजवाब हैं ही, पर जयजयवंती की छाया लिए इस गीत की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसकी लोकशैली लिए अतिकर्णप्रिय धुन और मीना कपूर की बेहद मीठी गायकी। यह गीत तो मन-मस्तिष्क पर जादू-सा कर देता है। 'परदेसी' के निर्माण के दौरान ही विश्वास और मीना कपूर की शादी भी हुई। फि़ल्म में मीना कपूर के गाए दो और बड़े सुंदर गीत थे—तानपूरे की पृष्ठभूमि में हलकी बाँसुरी के साथ सुकोमल लोकशैली की लोरी—'रो मत ललना, झुलाऊँ तोहे पलना' और मराठी लोक धुन पर मन्ना डे के साथ गाया 'रिम झिम झिम बरसे पानी'। सितार, तबले की अद्भुत संगत के साथ 'नादिर धीम ताना देरे ना...ना जा ना जा बलम' भी राग गौड़ सारंग पर आधारित लता की गाई एक अद्भुत शास्त्रीय रचना थी, जिसे लता के लिए अनिल विश्वास की बनाई श्रेष्ठ कम्पोज़ीशन्स में आसानी से गिना जा सकता है। 'परदेसी' का 'ये हिंदुस्तान है प्यारे' (मन्ना डे, साथी) भी लोक-शैली पर आधारित एक सशक्त रचना थी। 'फिर मिलेंगे जाने वाले यार दसवी दानिया' भी कव्वाली की शैली में एक अद्भुत कोरस गीत था। 
अनिल विश्वास की लता के लिए बनाई सर्वश्रेष्ठ कम्पोज़ीशन पर तो विवाद हो सकता है, पर आशा के लिए उनकी कम्पोज़ की हुई सर्वश्रेष्ठ रचना को चुनने पर तो सभी 'संस्कार' (1958) के 'दिल शाम से डूबा  अनिल विश्वास 'बादल-सा निकल चला, यह दल मतवाला रे जाता है' पर आसानी से सहमत होंगे। जयजयवंती का पुट लिए अद्भुत धुन, बेहद सुंदर गायकी और पृष्ठभूमि में बंगाली कीर्तन व बाउल गीतों में प्रयुक्त शैली की तबले की गत—कुल मिलाकर इसे अनिल विश्वास की एक उल्लेखनीय रचना बनाती है। 
ख्वाजा अहमद अब्बास की चर्चित फि़ल्म 'चार दिल चार राहें' (1959) में गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार अनिल विश्वास का साथ हुआ। राज कपूर और मीना कुमारी अभिनीत इस फि़ल्म में पुराने संगीतकार बद्रीप्रसाद की भी एक प्रमुख भूमिका थी। फि़ल्म का सबसे चर्चित दृश्य था जब पूरा जनसमूह मिलकर एक समाजवादी गीत 'साथी रे कदम कदम से दिल से दिल मिल रहे हैं हम' (मुकेश, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, मीना कपूर, साथी) गाता है। इस गीत में अनिल विश्वास पुन: अपनी परिचित राजनीतिक-सामाजिक ज़मीन पर दिखाई देते हैं। फि़ल्म के अन्य गीत भिन्न प्रकृति के थे, जिनमें रागमाला की तरह यमन कल्याण, बिहाग, भैरव पर आधारित लता का लम्बे अंतरोंवाला गीत 'इंतज़ार और अभी और अभी' बहुत प्रभावशाली और लोकप्रिय रहा था। इस गीत के फि़ल्मांकन में हर अंतरे के पहले घड़ी के घंटों की ध्वनि का संगीत से सम्मिश्रण बहुत अच्छा बन पड़ा था। पंजाबी लोकशैली पर 'कच्ची है उमरिया' (मीना कपूर, साथी) तो बिलकुल अलमस्त करनेवाला गीत था। लोकसंगीत पर अनिल विश्वास की पकड़ का यह एक श्रेष्ठ उदाहरण है। 'नहीं किया तो कर के देख' (मुकेश), 'होली खेलें नंदलाल' (मीना कपूर, साथी), 'कोई माने न माने मगर जानेमन' (लता) भी ठीक-ठाक ही थे। एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि भले ही इस प्रकार की फि़ल्मों के अभाव के कारण स्वतंत्रता के बाद के दशकों में विश्वास द्वारा कम्पोज़ किए गए राजनीतिक-सामाजिक चेतना के गीतों की संख्या कम हो गई हो, पर अन्य थीम के गीतों के लिए भी लोक शैली और कोरस का प्रयोग उन्होंने कायम रखा, और इस कारण उनका संगीत अभी भी इस दृष्टिकोण से जनमानस की आवाज़ को केंद्र में रखकर चलने वाला संगीत कहा जा सकता है। यदि स्वतंत्रता-पूर्व की 'ज्वार भाटा' के होली गीत 'सा रा रा' लोक अभिव्यक्ति का विशुद्ध रूप था, तो स्वतंत्रता पश्चात की 'राही' के रसिया गीत 'होली खेले नंदलाला' और 'महात्मा कबीर' की होरी 'सियावर रामचंद्र' भी ग्रामीण सामूहिक संस्कृति को उतनी ही कुशलता से उभारते थे। हालाँकि यदा-कदा उन्होंने पंजाबी लोकशैली ('कच्ची है उमरिया—चार दिल चार राहें'), गोआ की लोकशैली ('दिल चुरा लूँ—फऱार) या मराठी लावणी ('पल्ला डोरी पल्ला'—अभिमान) जैसी लोकशैलियों का भी प्रयोग किया पर ज्यादातर प्रेम उन्हें पूरबी या बाँग्ला लोकसंगीत से ही रहा। शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत के भेद को सुगम रचनाओं द्वारा किस तरह खत्म करके शास्त्रीय आधार को लोकरंग में समाहित किया जा सकता है, यह कल उन्होंने तिलंग और बिहाग जैसे रागों को पूरबी लोकरंग की ओर मोड़कर दिखा दिया। उसी प्रकार बाँग्ला लोकशैली के अंदर ख़माज राग के अंशों का भी रचना—निर्माण में उनका प्रयोग इसी कौशल को इंगित करनेवाला बना। उदाहरण के तौर पर 'मिलन' के 'सुहानी बेरिया नीली जाए' और अन्य कई गीतों में बिहाग तथा बाँग्ला लोकशैली का सुंदर सम्मिश्रित प्रयोग, 'हमारी बात' के 'इंसान क्या जो' में ख़माज आधारित बंगाली लोकशैली का प्रयोग और 'घर यहाँ बसा ले' (गजरे), 'आँखें भर-भर के जीने' (आकाश) और 'कुछ शरमाते' (गर्ल्स स्कूल) में बिहाग के प्रयोग से लोक रंग की खुशबू लाने में अनिल विश्वास की प्रयोगात्मकता अपने चरम पर थी।
राग बसंत के प्रति विश्वास के प्रेम के उदाहरण हम पहले देख ही चुके हैं। यहाँ यह भी इंगित करना आवश्यक है कि राग बसंत पर आधारित गीत बनाना तो एक तरफ़, विश्वास कई बार दूसरे रागों पर आधारित गीतों के बीच भी बसंत के टुकड़ों का मिश्रण बड़ी खूबी से करते थे। 'आ मुहब्बत की बस्ती' के यमन कल्याण में बसंत का पुट, 'ओ मेरे राँझना' के इंटरल्यूड के बीच बसंत का सुंदर टुकड़ा—ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। बिहाग, बसंत, ख़माज और आसावरी थाट के रागों के अतिरिक्त मल्हार और यमन कल्याण का स्पर्श भी विश्वास की कई रचनाओं में मिलता है। 'काहे अकेला डोलत बादल' (ग्रामोफ़ोन सिंगर), 'बदली तेरी नजऱ' (बड़ी बहूद्ध, 'सो गई चाँदनी' (आकाश), 'उधर तेरी नजऱ' (हमदर्द), 'मुहब्बत तर्क की मैंने' (दोराहा) आदि अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं।
अनिल विश्वास को भले ही अब इक्का-दुक्का फि़ल्में ही मिलती हों, पर संगीत वे अभी उत्कृष्ट ही दे रहे थे। विजय भट्ट की निर्देशित ऐतिहासिक फि़ल्म 'अंगुलिमाल' (1960) का अद्भुत शीर्षक गीत 'बुद्धम् शरणम् गच्छामि' इसका सशक्त उदाहरण है। आराधना के बौद्ध रूप को प्रकट करता यह गीत अंदर तक आंदोलित कर देता है—मन्ना डे की अभूतपूर्व गायकी और कोरस के अद्भुत प्रयोग दोनों ही गीत की रिद्म के साथ बढ़ते हुए मन को बड़ा सम्बल प्रदान करते हैं। राग बहार पर आधारित 'आई आई बसंती बेला' (लता, मन्ना डे, मीना कपूर) भी एक लोकप्रिय सराहनीय कम्पोज़ीशन की जो लोकप्रिय भी रही। गीत तो सभी अच्छे थे—चाहे आरती मुखर्जी का गाया प्रथम गीत 'धीरे धीरे ढल रे चंदा' हो, रवींद्र संगीत पर आधारित 'मेरे चंचल नैना, मधु रस के भरे' (मीना कपूर, साथी) और 'तेरे मन में कौन नैनन में कौन' (लता, मीना कपूर, साथी) हो या फिर 'मुरलीवाले गोपाल तेरी शरण में' (आशा) और 'बड़े आए शिकारी शिकार करने' (मन्ना डे, आशा) लेकिन इन लावण्य-भरे गीतों को अधिक लोकप्रियता नसीब नहीं हुई। अपने इस असफल दौर में अनिल विश्वास को 'रिटर्न ऑफ़ मिस्टर सुपरमैन' (1960), 'लकी नम्बर' (1961), 'हमें खेलने दो' (1962) जैसी स्टंट या बच्चों की फि़ल्मों से समझौता करना पड़ा। महेश कौल निर्देशित 'सौतेला भाई' (1962) में उन्होंने पुन: उत्कृष्ट संगीत दिया। मुजरा शैली में राग अडाना  पर आधारित 'जा मैं तोसे नाही बोलूँ' (लता) तो लाजवाब शास्त्रीय आधारित कम्पोज़ीशन थी। मुजरे और कव्वाली की मिली-जुली शैली में 'अब लागी नाहीं छूटे रामा' ( मीना कपूर, लता, अनिल विश्वास), मीठे सुरों के साथ असमिया लोकशैली बीहू के खिलते सुरों को लेकर सृजित 'फूले बन बगिया खिली कली कली' (मीना कपूर, मन्ना डे) आदि भी बड़े अच्छे गीत थे। पर इस सबसे अनिल विश्वास के कैरियर को कोई फ़ायदा नहीं हुआ। 'मीरा का चित्र' के भजन 'मैं तो गिरधर के घर जाऊँ' (मीना कपूर) और 'म्हाणे चाकर राखो जी' (मीना कपूर, स्वप्ना सेना) रेडियो पर खूब बजे पर फि़ल्म ही रिलीज़ नहीं हो पाई।
फि़ल्म-जगत में अनिल विश्वास की अंतिम फि़ल्म मोतीलाल द्वारा निर्मित और निर्देशित 'छोटी-छोटी बातें' (1965) रही। फि़ल्म मोतीलाल के सहज अभिनय के कारण भी यादगार बन गई है, इस फि़ल्म के तुरंत बाद मोतीलाल के निधन के कारण भी, और अनिल विश्वास के बेहतरीन संगीत के कारण भी। कोमल सारंग पर आधारित 'कुछ और ज़माना कहता है, कुछ और है जि़द मेरेे दिल की' मीना कपूर के स्वर में मुशायरे की शैली में ज़बर्दस्त असर करता है। सारंगी, तबले और सितार के साथ यह गीत अपनी सुंदर तर्ज़ और गायकी के कारण मीना कपूर और अनिल विश्वास दोनों की ही सर्वेश्रेष्ठ रचनाओं में अपना स्थान रखता है। बिहार की लोकशैली पर 'मोरी बाली रे उमरिया' (लता, साथी) और 'अंधी है दुनिया' (मन्ना डे, साथी) भी अच्छे गीत थे। 'मोरी बाली रे उमरिया' की धुन अपने कलकत्ता के दिनों में विश्वास ने बिहार के कुछ मजदूरों को आग तापते हुए गाते सुना था और यह धुन उनके मन में रच-बस गई थी। वहीं 'दिल का करे न कोई मोल' सिंधी लोकधुन पर आधारित था। राग नंद कल्याण पर 'जि़ंदगी का अजब फ़साना है' (मुकेश, लता) शायराना अंदाज़ में रचित एक अन्य बहुत सुंदर तजऱ् थी। इस फि़ल्म में शैलेन्द्र के लिखे कुछ गीतों को अनिल विश्वास ने बहुत अच्छी शायराना तर्ज दी थी। पर इस फि़ल्म का सबसे अच्छा गीत में दर्द से सराबोर मुकेश के स्वर में 'जि़ंदगी ख्वाब है या हमें भी पता' को मानूँगा। यह गीत एक तरह से मोतीलाल को श्रद्धांजलि की तरह था और कहते हैं कि इसे मुकेश ने खुद ही कम्पोज़ किया था पर नाम अनिल विश्वास का रहा। इस फि़ल्म के पाश्र्वसंगीत का काम बाकी था और मोतीलाल को अनिल विश्वास को कुछ पारिश्रमिक देना शेष रह गया था। उन्होंने इसके लिए अनिल विश्वास को दिल्ली से बुलवाया। पर जब अनिल विश्वास दिल्ली से फि़ल्म के रिलीज़ होने के समय बंबई पहुँचे, तो पहुँचकर पता चला कि मोतीलाल अत्यंत गंभीर हालत में हैं। विश्वास ने आनन-फानन में फि़ल्म का पाश्र्वसंगीत तैयार किया पर इसके एक दिन बाद ही मोतीलाल गुजऱ गए। विश्वास के लिए भी यह वक्त अच्छा नहीं था। फि़ल्मों की कमी तो थी ही, अचानक भाई और बड़े बेटे की हुई मौतों ने अनिल विश्वास को तगड़ा सदमा पहुँचाया। उन्होंने बम्बई पूरी तरह ही छोड़ दी और दिल्ली का रुख किया, जहाँ वे ऑल इंडिया रेडियो में चीफ़ प्रोड्यूसर बन गए।
ऑल इंडिया रेडियो में रहते हुए रूस की यात्रा के बाद अनिल विश्वास के मन में एक 'नेशनल ऑरकेस्ट्रा' बनाने की धुन सवार हुई, पर सरकारी तंत्र से अधिक सहयोग उन्हें नहीं मिल पाया। वैसे ऑल इंडिया रेडियो के लिए अनिल विश्वास ने नरेंद्र शर्मा के कुछ बेहद मधुर गीतों को संगीतबद्ध किया था जिसमें मन्ना डे के स्वर में शास्त्रीय बंदिश 'नाच रे मयूरा' बहुत मशहूर हुई थी। ऑल इंडिया रेडियो के विविध भारती सेवा के उद्घाटन के अवसर पर पहला गीत 'नाच रे मयूरा' ही प्रसारित किया गया था। ऑल इंडिया रेडियो में रहते हुए उन्होंने वाद्यवृंद की 21 रचनाएँ तैयार कर ली थीं जिसमें रवींद्रनाथ की कविता से प्रेरित 'वासवदत्ता' की बहुत तारीफ़ हुई थी। दिल्ली में स्टेज पर प्रस्तुत किए जानेवाले 'कृष्ण जन्माष्टमी' के पाश्र्वसंगीत का भार भी अनिल दा ने वर्षों तक सँभाला।
बाद में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संगीत के सलाहकार भी  रहे। संगीत की कक्षाएँ भी वे चलाते रहे और कलकत्ते की एक कम्पनी के लिए उत्तरी क्षेत्र में रेकॉर्डनिर्माण का दायित्व भी सँभाला। अंतरराष्ट्रीय बाल वर्ष में दिल्ली के विद्यालयों में बच्चों के समूहों का गान भी उन्होंने करवाया था। 'हम लोग', 'बैसाखी' और 'फिर वही तलाश' जैसे टी.व्ही. सीरियलों में उन्होंने संगीत दिया। 'हम लोग' के शीर्षक गीत के लिए अनिल विश्वास ने फ़ैज़ की रचना 'आइए हाथ उठाएँ हम भी' को लिया था। भारतीय वाद्यों के आकार में परिवर्तन कर उनसे ज्यादा सुर निकालने का उनका प्रयास भी इसी दौर में वर्षों चलता रहा। 'ऋतु आए ऋतु जाए' नाम से उन पर शरद दत्त द्वारा एक पुस्तक भी लिखी गई है। अनिल विश्वास ने खुद भी गज़ल पर बाँग्ला में एक पुस्तक लिखी है—'गज़लेर रंग'। गज़लों पर उनका शोध कार्य तो बहुत महत्त्वपूर्ण है, चाहे 'गज़लेर रंग' हो, या चुनिंदा गज़लों का संग्रह 'रंगे तजज्ज़ुल' हो। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने उनका सम्मान करते हुए उन्हें 'नेशनल फ़ैलो एमेरिट्स' बनाया। मध्यप्रदेश शासन के लता मंगेशकर पुरस्कार से भी अनिल विश्वास को सम्मानित किया गया। दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन में रहते हुए ही 31 मई, 2003 को उनकी मृत्यु हुई।
संदर्भ
 1. डॉ. श्याम परमार-0 माधुरी, 29 दिसम्बर, 1967
 2. शरद दत्त- ऋतु आए, ऋतु जाए
 3. वही
 4. आशीष राज्याध्यक्ष और पॉल विलमैन : एन इनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन सिनेमा
 5. रजनी कुमार पंड्या : आपकी परछाइयाँ
 6. हृषि दीक्षित- 'अभी तो मैं जवान हूँ' शृंखला, इंटरनेट
 7. रजनी कुमार पंड्या-वही
 8. वही
 9. वही
10. वही

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