विशेष रिपोर्ट

तीन महीने से काम बंद,सैकड़ों प्रवासी मजदूर दुखी और चिंतित
तीन महीने से काम बंद,सैकड़ों प्रवासी मजदूर दुखी और चिंतित
29-May-2020 8:17 PM

कहते हैं-अभी दिन बीता रहे, आगे रोजी-रोटी कैसे चलेगी?

तिलक देवांगन

रायपुर, 29 मई। लॉकडाउन में करीब तीन महीने से लगातार काम बंद होने से सैकड़ों प्रवासी मजदूर दुखी और चिंतित हैं। वे कहते हैं कि क्वारंटाइन सेंटर में जैसे-तैसे दिन बीता रहे हैं, लेकिन उनकी चिंता आगे परिवार के भरण-पोषण को लेकर हैं। गांव में खेती बहुत कम है या नहीं है। ऐसे में ही उन्हें बाहर कमाने-खाने के लिए जाना पड़ा था। उनकी मांग है कि सरकार गांव में ज्यादा से ज्यादा समय के लिए उन्हें रोजगार मुहैया कराएं।

‘छत्तीसगढ़’ ने आज लखनऊ से लौट कर क्वारंटाइन सेंटर में रखे गए कई मजदूरों से फोन पर चर्चा की। इस दौरान इन मजदूरों ने क्वारंटाइन सेंटर की व्यवस्था से लेकर अपनी रोजी-रोटी पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि गांव में उनके पास आय का कोई जरिया नहीं है। थोड़ी बहुत खेती-खार के भरोसे घर के बड़े बुजुर्गों का पेट चलता है। बाकी लोग रोजगार की तलाश में अलग-अलग जगहों पर चले गए थे और वहीं रेजा, कुली, राजमिस्त्री वगैरह का काम करते हुए परिवार चला रहे थे। लॉकडाउन में उन सभी का काम बंद हैं और अब वहां से आकर यहां क्वारंटाइन सेंटर में पड़े हैं।

बेमेतरा के आटेबंध गांव का दुखित साहू बताता है कि उसके घर खेती नहीं है और वह पिछले कुछ साल से लखनऊ में रोजी-मजदूरी कर रहा था। उसके साथ गांव के 80-85 और लोग भी गए थे। सभी मकान-भवन निर्माण काम से जुड़े थे। 12 मार्च के बाद से सभी का काम बंद है। सरकार ने 17 मई की रात घर वापसी करा उन्हें गांव के क्वारंटाइन सेंटर में रखा है। लेकिन आगे यहां रोजगार मिलेगा या नहीं, इसकी कहीं कोई गारंटी नहीं है। सभी दिन-रात यहीं सोचते हैं कि सेंटर से घर जाने के बाद आगे क्या होगा। उनका परिवार कैसे चलेगा।

नवागढ़ के झाल गांव का हरिशंकर, अपनी पत्नी लक्ष्मीन व एक बच्चे के साथ लखनऊ कमाने-खाने के लिए गया था। 12 दिन से ये लोग भी गांव के स्कूल में क्वारंटाइन में हैं। इन दोनों पति-पत्नी की चिंता भी रोजगार को लेकर बनी हुई है। लक्ष्मीन कहती है कि क्वारंटाइन सेंटर में उनकी दिन लगभग बीत गया। अब वापस घर जाने की बारी है। लेकिन चिंता यह है कि गांव में खाएंगे क्या और कमाएंगे क्या। उन्हें डर है कि उनके घर की हालत पहले जैसे फिर से खराब न हो जाए। राज्य सरकार से आग्रह है कि उन्हें गांव में पूरे दिन रोजगार दिलाएं।

साजा के बीजा गांव का राजू साहू 17 की रात अपने मां-बाप के साथ लखनऊ से गांव वापस आया। सभी क्वारंटाइन सेंटर में हैं। राजू बताता है कि गरीबी के चलते वे लोग पिछले दो-तीन साल से लखनऊ जा रहे थे। वहां उन्हें निर्माणाधीन मकान में मजदूरी मिल जा रही थी। घर में उसके दादा के पास आधा एकड़ खेती है, जिसके भरोसे पूरे परिवार को चलाना कठिन था। कुछ लोग बता रहे हैं कि मनरेगा के तहत गांव में रोजगार चल रहा है। सेंटर से निकलने के बाद उनका भी प्रयास होगा कि वहीं उन सबको भी रोजगार मिल जाए। काम न मिलने पर उसके घर फिर से गरीबी हावी हो जाएगी। क्योंकि तीन महीने से सभी तीनों खाली बैठे हैं।

14 दिन के राशन के लिए मिला है पांच सौ रुपये

साजा के बेलतरा गांव का थानेश्वर साहू अपनी पत्नी व बच्चे के साथ पिछले 12 दिन से गांव के क्वारंटाइन सेंटर में हैं। वह बताता है कि उसके यहां क्वारंटाइन सेंटर में सब कुछ अस्त-व्यस्त जैसा है। उसे यहां 14 दिन के राशन के लिए पांच सौ रुपये दिया गया था, जो कुछ ही दिन में खत्म हो गया। अब उनकी समस्या राशन को लेकर बनी हुई है। वे पंचायत सचिव वगैरह को कई बार बोल चुके हैं, पर उसकी यह समस्या दूर नहीं हो रही है। उन्हें और पैसा नहीं दे रहे हैं। उसका कहना है कि बीमारी के डर से किसी भी तरह से क्वारंटाइन सेंटर में दिन बीता रहा हैं, बाकी यहां कोई इंतजाम नहीं है।

नाश्ते में मिलता है थोड़ा सा पोहा या एक बिस्किट

पेंडरीकला(साजा) का बीरसिंग लखनऊ में राजमिस्त्री का काम करता था और उसे वहां साढ़े 6 सौ रुपये मजदूरी मिलती थी। साथ में उसकी पत्नी कीर्ति भी मजदूरी कर रही थी। अब दोनों यहां गांव में क्वारंटाइन सेंटर में हैं। उसका कहना है कि सेंटर में नाश्ता में कभी सिर्फ चाय तो कभी सिर्फ एक बिस्किट मिलती है। कभी-कभी मुश्किल से सौ ग्राम पोहा देते हैं। इस नाश्ते से उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं है, पर बच्चों की तकलीफ बढ़ गई है। सेंटर में जो 25-30 परिवार हैं, उनके बच्चे नाश्ते के समय रोते हुए और बिस्किट या पोहा मांगते हैं, पर उन्हें दोबारा कुछ नहीं मिल पाता। यह देखकर बड़ा दुख पहुंचता है।

क्वारंटाइन सेंटर में खुद खाना बना रहे मजदूर

बेरला के खिसोरा गांव का कृपा साहू अपनी पत्नी पुन्नी औ दो बच्चों के साथ लखनऊ से वापस आया है। वह पिछले 12 दिन से गांव के एक क्वारंटाइन सेंटर में है। यह मजदूर बताता है कि वह पिछले 18 साल से लखनऊ में रोजी-रोटी चला रहा था। उसके पास आधा एकड़ की खेती है, जिससे परिवार चला पाना कठिन है। इसी मजबूरी के चलते वह लखनऊ में पड़ा था। क्वारंटाइन सेंटर में आने के बाद उसे सब्जी, राशन, लकड़ी आदि सब सामान दे दिए गए हैं। वे लोग खुद खाना बना रहे हैं। उसके साथ सेंटर में 10-12 मजदूर और हैं, और सभी ऐसा ही कर रहे हैं।

सेंटर में 13 दिन बीत गए घर जाने पर रोजगार नहीं

माडरा(साजा)का सियाराम का भी यही कहना है कि क्वारंटाइन सेंटर में उन्हें दाल-चावल, सब्जी व अन्य सभी सामान दिए गए हैं और सभी इसी सेंटर में खुद खाना बनाकर खा रहे हैं। सेंटर में उनका 13 दिन बीत गया है और अब घर जाने की बारी है। सियाराम बताता है कि लखनऊ मेंं वह अपनी पत्नी संतोषी, एक बच्चे साथ रहता था। साथ में उसका एक छोटा भाई टेकराम भी था। सभी मकान में मजदूरी कर रहे थे और साढ़े तीन से चार सौ रुपये मजदूरी मिल रही थी। उनकी चिंता अब घर पहुंचने के बाद की हो रही है। क्योंकि गांव में उनके पास कोई रोजगार नहीं है।

शौचालय नहीं, गर्मी से बेहाल

ग्राम-कुर्रा(साजा)का रहने वाला मकसूदन अपनी पत्नी शकुंतला के साथ लखनऊ कमाने-खाने के लिए गया था। 17 की रात ये लोग भी टे्रन से रायपुर होकर वापस अपने गांव पहुंचे। उनके साथ गांव के आठ-दस लोग और हैं। उनका कहना है कि पिछले 12 दिन से सभी क्वारंटाइन सेंटर में हैं और भीषण गर्मी से बेहाल हैं। सेंटर में खाने-पीने के इंतजाम ठीक है, पर शौचालय नहीं है। उन्हें बाहर खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। सेंटर में सिर्फ एक पंखा है। ऐसे में भारी गर्मी से सभी लोग बेहाल हैं।

 

 

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