विशेष रिपोर्ट

बीवी-बच्चों संग कानपुर में फंसे, परेशानहाल कबीरधाम, बेमेतरा, मुंगेली के दर्जनों मजदूर
बीवी-बच्चों संग कानपुर में फंसे, परेशानहाल कबीरधाम, बेमेतरा, मुंगेली के दर्जनों मजदूर
24-Apr-2020

पैसे नहीं, घंटों लाइन लगाने पर मिल रही 2-4 रोटी

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता

रायपुर, 24 अप्रैल। प्रदेश के कबीरधाम, बेमेतरा, मुंगेली जिले के अलग-अलग गांवों से कमाने-खाने कानपुर उत्तरप्रदेश गए दर्जनों मजदूर अपने बीवी-बच्चों के साथ लॉकडाउन में फंस गए हैं। उनके पास पर्याप्त पैसे भी नहीं है, जिससे वहां उनका गुजारा चल सके। पास की चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद दो-चार रोटी मिल पाती है। बाकी भूखे पेट उनका दिन बीत रहा है। दूसरी तरफ उनके एक-दो छोटे बच्चे गांव में बूढ़े मां-बाप के साथ हैं, जिसकी चिंता भी उन्हें सता रही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार से जल्द वापसी की गुहार लगाई है।

प्रदेश के इन तीनों जिलों के फंसे मजदूरों ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में बताया कि करीब सौ मजदूर यहां होली मनाकर कमाने-खाने के लिए उत्तरप्रदेश के कानपुर पहुंचे। वे सभी वहां गुजैनी कच्ची बस्ती-सी ब्लॉक व अन्य जगहों पर रहकर दो-चार दिन मजदूरी कर पाए थे, कि लॉकडाउन लग गया। वे सभी वहां से  किसी भी तरह निकलकर अपने गांव वापस लौटना चाह रहे थे, लेकिन पुलिस सख्ती के चलते वहां से बाहर नहीं निकल पाए। ट्रेन-बस बंद होने से उनकी गांव वापसी का रास्ता बंद हो गया। अब वे सभी वहीं जैसे-तैसे पड़े हैं और लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उनकी गांव वापसी हो सके।

कबीरधाम जिले के भगतपुर गांव का श्रवण चंद्रवंशी ने बताया कि उसके साथ उनके क्षेत्र से आए करीब 35-40 मजदूर हैं, जो कबीरधाम जिले के अलग-अलग गांव से कमाने-खाने पहुंचे हैं। सभी मजदूर कानपुर में एक ही जगह पर हैं और लॉकडाउन में जैसे-तैसे दिन बीता रहे हैं।

वह खुद अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ वहां फंसा है। होली त्योहार में यहां गांव आए थे। त्योहार के बाद सभी यूपी गए हैं। इस दौरान सभी लोग एक-दो या तीन-चार दिन ही मजदूरी कर पाए थे। करीब हफ्तेभर किसी सामाजिक संस्था ने मुफ्त खाना दिया। इसके बाद उन सभी लोगों को पास की एक पुलिस चौकी में खाने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ रही है।

ग्राम-सोढ़ा (कबीरधाम) का कोमल चंद्रवंशी अपने परिवार के लक्ष्मण, कमला, प्रमिला, विकास, रोहित और रानी समेत 9 लोगों के साथ कानपुर में पड़ा है। होली के बाद वे सभी लोग वहां कमाने-खाने के लिए पहुंचे थे। लॉकडाउन में उन सभी की हालत पतली हो गई है। न खाने का ठिकाना, न सोने का। बदहाली में जिंदगी बीत रही है। उसका कहना है कि दो-चार दिन के लिए वे लोग छत ढलाई काम में जा पाए थे। बस, इसके बाद सभी फंसे पड़े हैं। कोमल व साथ रहने वाले मजदूरों का कहना है कि  गांव में थोड़ी बहुत खेती है, जिससे गुजारा नहीं चल पाता। ऐसे में उन्हें कमाने खाने के लिए यूपी तक दौड़ लगानी पड़ी। उन सभी को वहां चावड़ी से हर रोज काम मिल जाता है। चाहे वह भवन निर्माण संबंधी हो या और कोई।  मानिकचौरी (कबीरधाम)गांव के अजय साहू का कहना है कि यूपी में छग से उन्हें दो-तीन सौ ज्यादा मजदूरी मिल जाती है, इसलिए त्योहार के बाद वह वहीं कमाने के लिए चला गया। उसके साथ रूसे गांव का उसका एक साथी राकेश भी है। दोनों की शादी नहीं हुई है। उसका कहना है कि उसके क्षेत्र के करीब 40 लोग एक ही जगह फंसे हैं और सभी के सामने एक ही जैसी दिक्कत बनी हुई है। सभी के पास पैसे की कमी बनी हुई है। कई लोग के पास पैसे ही नहीं है। खाना पैकेट कड़ी धूप में पसीना बहाने के बाद मिल पाता है। गांव में खेती नही के बतौर होने से लोग वहां मजदूरी के लिए पहुंचे हैं। अब सभी को गांव वापसी की चिंता लगी हुई है।

भानपुर (कबीरधाम) का विजय साहू कानपुर में अपनी पत्नी कमला के साथ वहां है। उसके साथ करीब 12-15 मजदूर और हैं। उसका कहना है कि सभी लोग होली मनाकर कानपुर पहुंचे थे। वह खुद वहां सिर्फ एक दिन काम कर पाया था। अब सभी वहां लॉकडाउन में फंस गए हैं। उसका कहना है कि पास की एक पुलिस चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद उन्हें वहां खाने का पैकेट मिल पाता है। कई बार खाना नहीं मिलने पर अपने पास रखे बिस्किट आदि खाकर खाकर सो जाते हैं। कई बार पुलिस वाले वहां खाना देने के बजाय कई लोगों को भगा देते हैं। इस तरह उन सभी का दिन वहां बहुत ही कठिन हो गया है।

बेमेतरा जिले के बाघुल गांव का राजू साहू अपने भाई विजय साहू, लक्ष्मण, भांजा छोटू व अन्य रिश्तेदारों के साथ कानपुर यूपी गया है। उसका कहना है कि होली मनाकर सभी लोग एक साथ टे्रन से कानपुर पहुंचे। कोई दो दिन तो कोई चार दिन काम कर पाए थे, फिर लॉकडाउन लग गया और वे सभी फंस गए। उसका कहना है कि छत्तीसगढ़ में डेढ़ से दो सौ रुपये मजदूरी मिलती है।

यूपी में उन्हें तीन से पांच सौ रुपये तक मजदूरी मिल जाती है। चावड़ी से अलग-अलग जगहों पर मजदूरी के लिए जाते रहे। अब स्थिति यह है कि पास की एक पुलिस चौकी में घंटों लाइन लगाने के बाद खाना मिल पाता है। पैकेट में कभी दो तो कभी चार रोटी मिलती है। ऐसे में उन्हें कई बार भूखे पेट रात गुजारनी पड़ रही है।

मुंगेली जिले के ग्राम-डोणा का दिनेश साहू अपने परिवार समेत दो महीने पहले कानपुर पहुंचा। वहां उसका काम ठीक चल रहा था, कि लॉकडाउन लग गया। लगातार लॉकडाउन में उसका पास का राशन खत्म हो गया है। उसकी बस्ती में कभी-कभी कोई संस्था वाले खाना बांटकर चले जाते हैं। इस तरह उन लोगों का दिन बीत रहा है। उसका कहना है कि यूपी सरकार की ओर से उन्हें न कोई पैसा मिला और न कोई राशन। ऐसे में बस उन्हें अब गांव वापसी का इंतजार है। इसी जिले के पौनी गांव का मुंशी साहू का कहना है कि गांव में काम न मिलने से उसे मजदूरी के लिए यूपी जाना पड़ा। गांव में उसके मां-बाप के साथ उसकी पत्नी है और वह खुद कानपुर में फंसा है, जहां खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं है। वह गांव वापस जाना चाहता है, पर अब उसके पास पैसे भी नहीं है।

कानपुर कमाने-खाने के लिए कबीरधाम जिले के गांव निगापुर का ठाकुर राम साहू भी पहुंचा है  और वह लॉकडाउन के चलते परेशान है। उसका कहना है कि वह पिछले तीन साल से वहां कमानेे-खाने के लिए कानपुर जा रहा था, लेकिन इस बार वह बुरी तरह से फंस गया है, जहां से उसका निकल पाना कठिन हो गया है। गांव में उसके छोटे बच्चे हैं और पिता बिस्तर पर बीमार पड़ा है। मजदूरी कर अपने पिता का इलाज कराने का सोच रहा था, पर अब वह खुद कंगाल हो गया है। न उसके खाते में पैसा बाकी है और न घर में राशन। ऐसे में उसे एक-एक दिन निकाल पाना बहुत कठिन हो गया है। बहुत ही मुश्किल से खाने-पीने का इंतजाम हो पा रहा है।

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