संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 जनवरी, 2020 एक बड़े अपहरण के बाद, और रिहाई की कामयाबी के बाद...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 जनवरी, 2020 एक बड़े अपहरण के बाद, और रिहाई की कामयाबी के बाद...
Date : 23-Jan-2020

एक बड़े अपहरण के बाद, और
रिहाई की कामयाबी के बाद...

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक उद्योगपति के अपहरण, और 25 करोड़ फिरौती की मांग के बाद पुलिस उसे छुड़ाकर लेकर आई तो यह एक  बड़ी कामयाबी की बात रही। एक पखवाड़ा जरूर लगा, लेकिन बिहार के पेशेवर अपहरणकर्ता-गिरोह को ढूंढना, और इस चौकन्नेपन के साथ ढूंढना कि अपहरण किए गए आदमी का कोई नुकसान भी न हो, जाहिर तौर पर एक मुश्किल काम था। कल आधी रात जब पुलिस इस उद्योगपति को लेकर लौटी तो मीडिया के सामने प्रदेश के पुलिस मुखिया ने बताया कि कितने अफसर और कितने कर्मचारी इस तलाश में झोंके गए थे। आज सुबह के अखबारों में बड़ी-बड़ी सुर्खियों में यही खबर पहले पन्ने पर थी।

लेकिन आज सुबह के अखबारों में ही, कम से कम एक प्रमुख अखबार में भीतर के एक पन्ने पर एक बड़ी सी सुर्खी थी कि इसी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के सौ से अधिक बच्चे महीनों से गायब हैं, और रोती हुई एक मां कह रही है कि कोई उसके बेटे को ढूंढकर लाए। खबर में यह भी छपा है कि चेन्नई और हैदराबाद में ऐसे नाबालिग मजदूर बच्चों को दो-तीन हजार रूपए में बेचा जा रहा है। इन बच्चों में पंडो-आदिवासी समुदाय के बच्चे भी महीनों से गायब हैं, और लोगों को याद होगा कि इस जनजाति को राष्ट्रपति की दत्तक संतानें भी कहा जाता है। बच्चों की यह बिक्री सरकार की जानकारी में है, और देश की सर्वोच्च अदालत लंबे समय से इस बात की फिक्र कर रही है कि देश भर में लापता बच्चों की तलाश के लिए सरकार क्या कर रही है। 

यह बात सही है कि एक उद्योगपति का अपहरण, और करोड़ों की फिरौती की मांग एक बड़ी खबर बनती है, और उसकी तलाश में एक पखवाड़े पुलिस जुटी रहती है, कई राज्यों तक जाती है, लेकिन ऐसे ही दिन आई हुई यह दूसरी खबर यह सोचने पर मजबूर करती है कि इसी छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके जशपुर से किस तरह हजारों लड़कियां महानगरों में मजदूरी के लिए ले जाई जाती हैं, और उनमें से बहुत से बेबस लड़कियों से गलत धंधा भी करवाया जाता है। किस तरह छत्तीसगढ़ से हर बरस दसियों हजार लोग बेहतर मजदूरी की तलाश में उत्तर भारत से लेकर कश्मीर और लद्दाख तक जाकर बंधुआ मजदूरों की तरह काम करते हैं, कहीं वे आन्ध्र के ईंट भट्टों से रिहा करवाए जाते हैं, तो कहीं किसी और प्रदेश से। जब उनके बंधुआ होने की खबर आ जाती है, उसके बाद पुलिस या सरकार के दूसरे महकमे के लोग जाकर उनको छुड़ाते हैं। लेकिन जब ट्रेन और बसों से थोक में लोगों को ले जाया जाता है, तो वैसे मजदूर-दलाल पुलिस की निगाह में रहने के बावजूद उन इलाकों में लगातार काम करते हैं, और छत्तीसगढ़ के मजदूरों को, यहां की लड़कियों को, बच्चों को बाहर ले जाकर बेचते हैं, बंधुआ बनाते हैं। 

जिस तरह छत्तीसगढ़ का मीडिया दो उड़ानों के लेट होने को लेकर खबर बनाने में जुट जाता है, और दर्जन भर ट्रेनें उससे अधिक लेट हों, तो भी खबर नहीं बनती, उसी तरह का रूख सरकार और पुलिस का भी रहता है। किसी संपन्न की तलाश, और किसी विपन्न की तलाश में बहुत फर्क दिखाई पड़ता है। जिंदगी तो सबकी एक बराबर ही होनी चाहिए, लेकिन लोगों की संपन्नता उनको सरकार में, या मीडिया में, कम या अधिक महत्वपूर्ण बना देती है, और फिर खबरों के दबाव में, सत्ता तक पहुंच के दबाव में सरकारी कार्रवाई होती है। किसी संपन्न को बचाना अच्छी बात है क्योंकि उसका भी हक देश के कानूनी इंतजाम पर पूरा है। लेकिन आधी रात मीडिया से बात करने वाली पुलिस क्या आज मीडिया में ही आई इस दूसरी खबर पर कुछ बोलेगी? क्या सैकड़ों बच्चों के लापता होने, बाहर जाकर बंधुआ हो जाने या बिक जाने के बारे में कुछ कहेगी? क्या इन जिलों के जिम्मेदार अफसरों की कोई जवाबदेही तय होगी? क्योंकि कल इस बड़ी रिहाई के बाद तो यह बात भी कही गई कि डीजीपी से लेकर सीएम तक किस तरह लगातार इस मामले की जांच पर नजर रखे हुए थे, और दरियाफ्त कर रहे थे। यह बात जाहिर है कि सूरजपुर के सैकड़ों बच्चों की मिलकर भी उतनी न्यूजवेल्यू नहीं है जितनी कि एक बड़े उद्योगपति की है, लेकिन अब जब पुलिस का एक बड़ा अमला जुर्म को सुलझाने से फारिग हो चुका है, तो फिर सीएम से लेकर डीजी तक, और जिलों की पुलिस तक को विपन्न बच्चों की तलाश के सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर भी कुछ अमल कर लेना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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