संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 दिसंबर : मोमबत्तियों के जुलूस अदालतों से नहीं केन्द्र सरकार से मांग करें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 12 दिसंबर : मोमबत्तियों के जुलूस अदालतों से नहीं केन्द्र सरकार से मांग करें
Date : 12-Dec-2019

सुप्रीम कोर्ट की खबर है कि उसने केन्द्र सरकार को कहा है कि हाईकोर्ट जजों के खाली पद छह महीने में भर दिए जाएं। केन्द्र सरकार के इस महीने की पहली तारीख के आंकड़े बताते हैं कि सभी हाईकोर्ट मिलाकर 1079 पद मंजूर हैं जिसमें से 669 पर जज तैनात हैं, और 410 पद खाली हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में ही एक तिहाई कुर्सियां खाली पड़ी हैं। देश के अधिकतर प्रदेशों में हाईकोर्ट की खाली कुर्सियां नया रिकॉर्ड कायम कर रही हैं। जाहिर है कि निर्भया हो, या कोई और हो, उन्हें जल्द इंसाफ देने की बात पूरी तरह बोगस है। 

हिन्दुस्तान के हाईकोर्ट में दो तरह से जज बनाए जाते हैं, राज्य की न्याय सेवा में जिला अदालतों से शुरू करके पदोन्नति पाने वाले जज, और वरिष्ठ वकीलों से सीधे जज बनाए जाने वाले लोग। इनका एक अनुपात भी निर्धारित है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज बनाने के लिए एक प्रक्रिया बनाई हुई है जिसमें सबसे अधिक ताकत खुद उसी के हाथ है। लेकिन केन्द्र सरकार उसे सुझाए गए नामों में से छांटकर कुछ पर पहले फैसला लेती है, कुछ पर सुप्रीम कोर्ट से दुबारा पूछताछ करती है, और कुछ के नाम मंजूर नहीं करती। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने खुद होकर जजों की नियुक्ति में अपने आपको सबसे ऊपर बना लिया है, और कुछ लोग इस बात से भी असहमत हैं। लेकिन हम अभी उस तकनीकी बारीकी तक जाना नहीं चाहते और जो भी प्रक्रिया या व्यवस्था जजों की नियुक्ति के लिए है, उसी पर बात करना चाहते हैं। अगर हाईकोर्ट के 40 फीसदी जज हैं ही नहीं, तो बाकी जजों पर काम का बोझ इतना बढ़ जाना तय है कि लोगों के मामले पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते रहते हैं, लोग अदालती प्रक्रिया में भरोसा खो बैठते हैं, और जब पुलिस मुठभेड़ में कुछ संदिग्ध आरोपियों को मारती हैं, तो फूल भी बरसाते हैं, और पटाखे भी फोड़ते हैं। अदालत की रफ्तार अपनी साख पूरी तरह खो चुकी है, और इस मुद्दे पर आज हम यहां इसलिए लिख रहे हैं कि इसके लिए अदालत जिम्मेदार नहीं हैं, इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, केन्द्र सरकार, जो कि वक्त रहते जजों के चयन को मंजूरी नहीं देती है। 

जैसे ही हाईकोर्ट में जज का कोई पद मंजूर होता है, उसके महीनों पहले से इसकी फाईल चलती रहती है, और केन्द्र सरकार अगर चाहे तो उसके पास पड़े हुए नामों में से पद के साथ ही नियुक्ति भी कर सकती है जिसकी तैनाती बाद में सुप्रीम कोर्ट करता रहे। इसी तरह रिटायर होने वाले जजों के जाने की तारीख उनके आने के दिन से ही तय रहती है, और ऐसे में कोई वजह नहीं बनती कि उनके आखिरी दिन को अगले जज का पहला दिन न बनाया जा सके। जनता की तकलीफें अदालतों को लेकर इतनी अधिक हैं, इंसाफ एक मजाक बन गया है, और सजा एक बहुत ही धूमिल संभावना, ऐसे में लोकतंत्र में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए सरकार को अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, तेजी से करनी चाहिए। लेकिन एक दूसरी खबर को देखें तो लगता है कि सरकार सोच-समझकर जजों की कुर्सियों को खाली रखती हैं। संसद और विधानसभाओं में इतने किस्म के मुजरिम या आपराधिक मामले झेल रहे लोग पहुंचे हैं कि अगर जज की हर कुर्सी भरी हो, तो तेजी से इनमें से बहुत से लोग जेल चले जाएंगे। इसलिए हो सकता है कि राजनीतिक तबके की यह एक वर्गहित की सोच हो कि न्यायपालिका की रफ्तार धीमी चलती रहे। अब अदालतें अगर तेज रफ्तार होतीं, तो लालू यादव दस बरस पहले ही जेल चले गए होते, और बहुत बड़े-बड़े मंत्री, अफसर भी जेल में होते। न्याय व्यवस्था तेज होती तो भोपाल गैस त्रासदी से लेकर बाबरी मस्जिद गिराने के मुजरिम कबके जेल में रहते, और जेल की दिक्कतों को झेलते हुए हो सकता है अब तक वे अगली सजा पाने के लिए ऊपर पहुंच चुके होते। इसलिए ऐसा भी लगता है कि सत्ता अपने हित में अदालतों की कुर्सियों को खाली रखना चाहती है, वरना संसद या विधानसभा की कोई कुर्सी खाली होती है, तो छह महीने के भीतर उसे भर ही दिया जाता है। ऐसा जजों की कुर्सियों के साथ क्यों नहीं हो सकता? आज सड़कों पर जितने लोग बलात्कारियों को फांसी की मांग करते हुए मोमबत्ती लेकर चल रहे हैं, उन्हें इस मांग के पहले जजों की कुर्सियां भरने की मांग केन्द्र सरकार से करनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना बाकी मोमबत्तियां इस लोकतंत्र को कोई राह नहीं दिखा सकतीं। 
-सुनील कुमार

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