संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 दिसंबर : दलित-आदिवासी मलाईदार तबके पर भी सोचा जाए...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 दिसंबर : दलित-आदिवासी मलाईदार तबके पर भी सोचा जाए...
Date : 03-Dec-2019

केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची है कि अदालत के पिछले बरस के एक फैसले को एक बड़ी बेंच सुने। सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की बेंच ने अनुसूचित जाति-जनजाति के पदोन्नति में भी मलाईदार तबके को फायदे से बाहर करने का फैसला दिया था, और अब केंद्र सरकार एक बार फिर अदालत के फैसले को पलटवाने के लिए इस मामले को सात जजों की बेंच को भेजने की अपील दाखिल कर चुकी है। सरकार के वकील ने अदालत को कहा कि यह एक भावनात्मक मामला है और सरकार चाहती है कि अधिक बड़ी बेंच इसे सुने। सुप्रीम कोर्ट में इसके पहले 2006 में पांच जजों की एक बेंच प्रमोशन से एसटी-एससी के मलाईदार तबके को बाहर कर चुकी थी, और 2018 में भी एक दूसरी बेंच ने ऐसा ही आदेश दिया था।

केंद्र सरकार की यह अपील पूरी तरह नाजायज है, और एसटी-एससी तबकों की क्रीमीलेयर को पदोन्नति से बाहर तो रखना ही चाहिए, इसके साथ-साथ देश के आरक्षण कानून में भी इन तबकों के मलाईदार हिस्से को तमाम फायदों से बाहर करना जरूरी है। हम इसके बारे में पहले भी दर्जनभर बार लिख चुके हैं कि इन तबकों को जिस आधार पर आरक्षण दिया गया था, वे आधार आज भी जारी हैं, इसलिए आरक्षण जारी रहना चाहिए। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात यह है कि दलित-आदिवासी तबकों के भीतर भी आरक्षण का फायदा पाने वाली पीढ़ी सरकारी नौकरियों से लेकर संसद और विधानसभा तक पहुंच चुकी है, और ऐसी ताकत पाने वाली पीढ़ी की संतानों को अतिरिक्त फायदे की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। ऐसे मलाईदार तबके का बड़ा सहज तर्क यह रहता है कि वे आज भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं, और इसलिए उन्हें आरक्षण का फायदा जारी रहना चाहिए, यह बात कुछ हद तक अगर सही भी है, तो भी इन तबकों के भीतर इनसे कमजोर नौबत वाली एक बहुतायत वाली आबादी है जो कि किसी फायदे तक नहीं पहुंच पाई है। इन तबकों के भीतर ताकतवर हो चुकी पीढ़ी के बच्चे संपन्नता और पढऩे-लिखने की सहूलियत, कोचिंग के चलते हुए इतने ताकतवर हो जाते हैं कि उनके स्वजातीय या स्वधर्मी बच्चे उनके आसपास भी नहीं फटक पाते। ऐसे में इस मलाईदार तबके को इन तबकों के ऊपर से ठीक उसी तरह हटाने की जरूरत है जिस तरह कढ़ाई में खौलते दूध के ऊपर से मलाई को किनारे किया जाता है, तब नीचे का दूध औंट पाता है। इन तबकों के लिए आरक्षित अवसरों और इनकी आबादी के बीच कोई अनुपात नहीं है। ऐसे में आरक्षण के फायदे घूम-फिरकर अगर उन्हीं सीमित लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलते चले जाएंगे, तो वह एक असंतुलित तबका बनने के अलावा और कुछ नहीं होगा। यह सामाजिक हकीकत समझना चाहिए कि क्रीमीलेयर को बाहर किए बिना उसी समाज के सबसे कमजोर लोगों की कोई संभावना नहीं बनती। जिस तरह और जिस तर्क के आधार पर ओबीसी के भीतर क्रीमीलेयर को फायदे से परे किया गया है वह तर्क एसटी-एससी पर भी लागू होता है और इसे अनदेखा करना सत्ता पर काबिज एसटी-एससी लोगों के पारिवारिक हित में जरूर है, लेकिन इन तबकों के बाकी गैरमलाईदार बहुतायत लोगों के हितों के ठीक खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी यह व्यापक मुद्दा गया नहीं है, लेकिन इसके बारे में  दलित-आदिवासी तबकों के गरीब-कमजोर लोगों को जाना जरूर चाहिए।
-सुनील कुमार

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