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 मुसलमान के संस्कृत पढ़ाने पर बवाल क्यों, ये केवल ब्राह्मणों की भाषा थोड़े है
मुसलमान के संस्कृत पढ़ाने पर बवाल क्यों, ये केवल ब्राह्मणों की भाषा थोड़े है
Date : 18-Nov-2019

मंगलेश डबराल, वरिष्ठ कवि

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से पढ़ाई करने वाले फिऱोज़ ख़ान ने शायद कभी कल्पना नहीं की होगी कि इसी वर्ष राष्ट्रपति से पद्मश्री पाने के बावजूद बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ति पर भारी बवाल खड़ा कर दिया जाएगा और छात्र ही उनके ख़िलाफ़ धरने पर बैठ जाएंगे।
फिऱोज़ उस सामासिक, साझा संस्कृति के नुमाइंदे हैं जिससे हमारे समाज का ताना-बाना निर्मित हुआ है और जिस पर हाल के वर्षों में लगातार चोटें होती रही हैं। संस्कृत में 'कूपमंडूकता' इसके लिए सही शब्द है जिसके नतीजे में व्याकरण और साहित्य की दृष्टि से महान यह भाषा एकांगिता, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता का शिकार हुई है।
हमने यह भुला दिया है कि संस्कृत को वैश्विक स्तर पर सम्मान जिन लोगों के कारण मिला, वे सिफऱ् हिन्दू या ब्राह्मण नहीं थे, बल्कि जर्मन, अँग्रेज़ और मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने कई भाषाओं के बीच आवाजाही और संवाद के पुल तामीर किये।
साल 1953-54 में मुहम्मद मुस्तफ़ा ख़ान 'मद्दाह' ने एक उर्दू-हिंदी शब्दकोश का सम्पादन किया था, जिसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने प्रकाशित किया था। सात दशक बाद भी उर्दू-हिंदी का इससे बेहतर शब्दकोश नहीं बना।
मद्दाह पालि, संस्कृत, अरबी, फारसी, तुर्की और हिंदी के जानकार थे और इन सभी भाषाओं के हिंदीकोश तैयार कर चुके थे। उनके एक हिन्दू दोस्त ने आग्रह किया कि हिंदी-उर्दू कोश के बाद उन्हें हिंदी-उर्दू कोश भी तैयार करना चाहिए क्योंकि 'उर्दू साहित्य का बड़ी तेज़ी से हिंदी लिप्यान्तरण हो रहा है।'
ग़ौरतलब है कि मद्दाह का यह कोश डॉ। सम्पूर्णानन्द को समर्पित है जो राजनेता होने के अलावा संस्कृत के भी विद्वान थे और जिनके नाम पर बनारस में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विद्यापीठ बना है।
यह सिफऱ् एक उदाहरण है। दरअसल, हमारे देश में भाषा और विद्वता के क्षेत्र में संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी, उर्दू के मेलजोल और विनिमय की लम्बी परंपरा रही है जिससे सामासिकता के विकास में मदद मिली। मुग़ल दौर में दारा शिकोह द्वारा उपनिषदों का अनुवाद उस एकता का अहम पड़ाव था।
आज़ादी मिलने के बाद भी दो या तीन भाषाओं के जानकार सुदूर गांवों तक में बख़ूबी मिल जाते थे। जैसे मेरे पिता संस्कृत, उर्दू और हिंदी के अच्छे जानकार थे। उन्होंने 'सत्यनारायण की कथा' का गढ़वाली में छंदबद्ध अनुवाद किया था और वे अपनी निजी डायरी उर्दू में लिखते थे।
साहित्य में हिंदी-उर्दू की घनिष्ठता का लम्बा इतिहास है। प्रेमचंद, रतननाथ सरशार, ब्रजनारायण चकबस्त, फिऱाक गोरखपुरी, कृष्ण चंदर, राजेंद्र सिंह बेदी और उपेन्द्रनाथ अश्क जैसे बड़े लेखको ने उर्दू में लिखा, लेकिन यह सवाल कभी नहीं उठा कि वे उर्दू में क्यों लिखते हैं।
उस समय हिंदी और उर्दू का एक साथ अध्ययन करना स्वाभाविक बात थी और आज भी विदेशी विद्वान हिंदी और उर्दू एक साथ पढ़ते-सीखते हैं।
प्रेमचंद व्यापक पाठक समुदाय तक पंहुचने की गरज से हिंदी में आये, लेकिन उर्दू का दामन उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उनकी आखऱिी कहानी 'कफऩ' मूल रूप से उर्दू में लिखी गयी थी।
आज भी हिन्दू घरों में जन्मे कई उर्दू शायर ख़ूब लिख रहे हैं। शीन काफ़ निजाम, जयंत परमार और चन्द्रभान खय़ाल जैसे कई नाम गिनाये जा सकते हैं। उर्दू की महान परंपरा में मीर और ग़ालिब ऐसे शायर हैं जिनके यहां हिंदी या खड़ीबोली के शब्दों का जगह-जगह इस्तेमाल मिलता है:
'पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है', 'सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो, अभी टुक रोते रोते सो गया है' या 'है ख़बर गर्म उन के आने की, आज ही घर में बोरिया न हुआ' या 'मेरे दु:ख की दवा करे कोई' (ग़ालिब)।
फिऱाक़ गोरखपुरी की शायरी भी हिंदी-उर्दू एकता की अनोखी मिसाल है- 'ज्यूं कोई नार सितार बजावे है', 'बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ जि़ंदगी हम दूर से पहचान लेते है', 'इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए, इन्ही से काम चलाओ बड़ी उदास है रात।'
रोज़मर्रा के व्यवहार की भाषा में भी हिंदी के देशज शब्दों और उर्दू की दोस्ती ने कितनी सुंदरता पैदा की है, इस पर फिऱाक़ साहब ने पूरी किताब ही लिखी थी जिसमें सैकड़ों उदाहरण दिए गए हैं- शादी-ब्याह, रोटी-सब्ज़ी, हुक्का-पानी, जात-बिरादरी, रस्मो-राह, बोरिया-बिस्तर आदि। लेकिन राजनीति भाषा को अपना हथियार बना लेती है, उसे क्रूर और खोखला बना देती है। जर्मनी में हिटलर की तानाशाही के दौरान लाखों यहूदियों की हत्या के बाद दार्शनिक थियोडोर अडोर्नो ने कहा था कि 'अब जर्मन भाषा में कविता लिखना मुमकिन नहीं है।'
आज़ादी के बाद हिंदी और उर्दू के साथ भी इसी ढंग की दुर्घटना हुई है और आज हम देखते हैं कि हिंदी को हिन्दू और उर्दू को मुस्लिम बनाया जा रहा है, जिसकी सबसे बड़ी चोट उर्दू को झेलनी पड़ती है।
आधुनिक समय में संस्कृत को कैसे पढ़ाया जाए? भाषा को 'बहता हुआ नीर' माना जाता है जिसमें देशकाल के अनुरूप बदलाव होते हैं। ऐसा न होने पर वह एक रुका हुआ और सड़ता हुआ पानी बन सकती है।
संस्कृत के साथ भी यही हुआ है क्योंकि उसके पठन-पाठन से जुड़े लोगों, उसके संचालक तंत्र ने उसे नए ज़माने के अनुकूल बनाने के बहुत कम प्रयास किये जबकि संस्कृत का स्वभाव इतना लचीला है कि वह किसी भी नए वातावरण या नयी अभिव्यक्ति का समावेश कर सकती है।
दुर्भाग्य से, यह लचीलापन उसके शिक्षण में नहीं अपनाया गया और वह पुराने, संकीर्ण और सामंती ढंग से ही चलता रहा। इसी का नतीजा है कि यह महान भाषा परिवर्तनों से अछूती और अप्रासंगिक बनती गयी।
आज़ादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत के संस्थान ज़रूर खोले गए, लेकिन उनका पाठ्यक्रम वही रहा, जिसे संस्कृत में 'गतानुगतिक' कहा जाता है।
डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी और बलराम शुक्ल जैसे कुछ विद्वान ज़रूर अपवाद हैं जिन्होंने संस्कृत साहित्य की दूसरी परम्पराओं की खोज की और यह बताया कि वह सिफऱ् ब्राह्मणवादी धरोहर नहीं है, उसमें सिर्फ 'तन्वीश्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्टि' का सौंदर्य और शृंगार नहीं, बल्कि अपने समय के अभावों और संकटों का चित्रण भी है जो आज की काव्य-संवेदना से जुड़ता है। संस्कृत का वास्तविक विकास चोटी रखने और आचार्यों को दंडवत करने वाले गुरुकुलों से नहीं, आधुनिक उदार नज़रिए से ही हो सकता है जिसमें धर्म विद्वता के आड़े न आये और दूसरे धर्मों में जन्म लेने वालों का प्रवेश वर्जित न हो। (बीबीसी)

 

 

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