विचार / लेख

जेएनयू जैसा है, वैसा यूं ही नहीं है
जेएनयू जैसा है, वैसा यूं ही नहीं है
Date : 13-Nov-2019

सुशील कुमार झा
जेएनयू की एडमिशन पॉलिसी जैसी है वैसी नहीं होती तो मुझ जैसे लोअर मिडिल क्लास परिवार के छात्र का झारखंड के जादूगोड़ा से दिल्ली पहुंचना आसान नहीं होता। एडमिशन मिल भी जाता तो मैं शायद पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाता, अगर जेएनयू जैसी व्यवस्था नहीं होती।
मोदी राज में कितना बदल गया है जेएनयू
पहले तो कुछ फैक्ट्स हो जाएं, फिर मूल्यों की बात हो।
1.जेएनयू की स्थापना संसद के एक एक्ट से हुई थी।
2.सिर्फ जेएनयू में ही एडमिशन की ऐसी पॉलिसी रही है जिसमें पिछड़े जिलों से आने वालों को इसके लिए अतिरिक्त नंबर दिए जाते हैं। मसलन, आप ओडिशा के कालाहांडी जिले से हैं तो आपको पांच नंबर मिलेंगे क्योंकि वो इलाक़ा पिछड़ा है।
3. जेएनयू में ये कोशिश की जाती है कि भारत के सभी राज्यों से छात्र पढऩे आ सकें हालांकि बिहार और उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्यों के छात्र-छात्राओं की संख्या अधिक होती है।
4. जेएनयू संभवत पूरे भारत में सोशल साइंस के मल्टी डिसीप्लिनरी रिसर्च का एकमात्र संस्थान है।
5. यूनिवर्सिटी में अनेक विदेशी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, अंडर ग्रैजुएट कोर्स सिफऱ् विदेशी भाषाओं में होते हैं, बाक़ी सारे कोर्स मास्टर्स से शुरू होते हैं।
इन पर लंबी बहस की संभावना है। खास कर कन्हैया, उमर खालिद मामले के बाद। यूं तो कांग्रेस के शासन काल में जेएनयू की स्थापना हुई थी और नाम भी कांग्रेसी नेता पर रखा गया था लेकिन जेनयू कभी भी राजनीतिक रूप से कांग्रेसी नहीं रहा। शुरुआती दौर में भी जेएनयू के छात्रों का झुकाव वामपंथी राजनीति की तरफ रहा।
सत्तर के दशक में आपातकाल के दौरान जेएनयू सरकारी दमन के विरोध में आगे रहा और बाद में इसी कैंपस से निकले सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने वामपंथी राजनीति में नाम कमाया।
आपातकाल का मशहूर किस्सा है कि जब इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं तो जेएनयू से छात्रों का एक दल सीताराम येचुरी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के पास गया और एक पर्चा पढ़ा जिसमें वर्णन था कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते आपातकाल के दौरान क्या क्या गलत हुआ।
छात्रों की मांग थी कि वो जेएनयू के चांसलर पद से इस्तीफा दें और इंदिरा गांधी ने बाद में इस्तीफा दे दिया।
आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान जेएनयू में आरक्षण के विरोध में और समर्थन में आंदोलन चले लेकिन बाद में विश्वविद्यालय की छवि मूल रूप से आरक्षण समर्थक यूनिवर्सिटी के रूप में ही बनी।
छात्र चुनाव और बोलने की आज़ादी
जेएनयू के छात्र चुनाव कई वर्षों से अपने आप में यूनिक रहे हैं। कारण ये है कि ये चुनाव छात्र ही करवाते हैं और इन चुनावों में कभी किसी हिंसा या धांधली की ख़बर नहीं आई है।
कैंपस के छात्र ही एक चुनाव समिति बनाते हैं और वही समिति चुनावी प्रक्रिया को पूरा करती है। चुनाव के दौरान हर दल को पूरे कैंपस में जगहें दी जाती हैं जहां वो अपने पोस्टर बैनर लगा सकें।
कैंपस में छपवा कर पोस्टर बैनर लगाने का चलन नहीं है, सारे बैनर पोस्टर हाथ से बनाए जाते हैं, और अगर कोई दल ऐसा करता है तो इसे बुरा माना जाता है। छात्र चुनावों में जीत चुके कई छात्र बाद में राजनीतिक दलों में भी सक्रिय रहे हैं।
जेएनयू को धुर वामपंथी मानने वाले लोग ये भूल जाते हैं कि कैंपस में 2001 में हुए चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संदीप महापात्र ने एक वोट से चुनाव जीता था। कैंपस में छात्रों को बोलने की आज़ादी का आलम कुछ-कुछ ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज़ जैसा है जहां सरकार की, सरकारी नीतियों की आलोचना करने की पूरी छूट है।
सेना, राष्ट्र, राष्ट्रवाद, लोकतंत्र की अवधारणाओं पर स्वस्थ बहस को अच्छा माना जाता है और छात्रों को ऐसी बहसों में हिस्सा लेने के आमंत्रित किया जाता है। इन विषयों पर जेएनयू में आए दिन पर्चे छपते हैं और कई बार दूसरे को आपत्तिजनक लगने वाली सामग्री भी छपती है जिसका जवाब लोग अपने पर्चों से दे सकते हैं।
जेएनयू का माहौल और स्वच्छंद लड़कियां
बीजेपी के विधायक ज्ञान आहूजा को वो विवादित बयान पर लोग अक्सर चर्चा करते हैं कि जेएनयू में कंडोम फेंके जाते हैं। बता दूं कि जेएनयू पहली यूनिवर्सिटी थी जहां पर कंडोम की वेंडिंग मशीन लगाई गई थी। हालांकि इस्तेमाल न होने के कारण वो हटा ली गई।
जेएनयू का माहौल ऐसा है कि रात के बारह बजे तक लड़कियां आराम से घूमती फिरती हैं। छेड़छाड़ की घटना शायद ही कभी हुई हो रात में।
हां लेकिन जैसे कि यौन शोषण की घटनाएं हर जगह होती हैं वैसे ही जेएनयू में भी होती हैं और इनसे निपटने का जेएनयू का अपना तरीका है। जीएसकैश नाम का एक आयोग जेएनयू में ही सबसे पहले बना था जहां कोई भी लडक़ी यौन शोषण या छेड़छाड़ की शिकायत कर सकती है।
इस आयोग में शिक्षक, छात्र और प्रशासन के लोग होते हैं और शिकायतों की बकायदा सुनवाई कर के सज़ा का प्रावधान होता है। ये अपने आप में अनोखा कहा जा सकता है।
जेएनयू के माहौल में लड़कियों के साथ छेड़छाड़ पर अनकहा प्रतिबंध हैं और शायद यही कारण है कि यहां पढऩे वाली लड़कियों का प्रतिशत किसी भी और यूनिवर्सिटी की तुलना में ज्यादा ही होगा कम नहीं।
यूनिवर्सिटी के लोकप्रिय गंगा ढाबे पर रात के दो बजे भी लडक़े लड़कियों को गंभीर विषयों पर बहस करते आसानी से देखा जा सकता है।
कई लोग यह पूछते हैं कि जब वामपंथ पूरे देश में ढलान पर है तो फिर जेएनयू में इस विचारधारा को मानने वाले लोग बढ़ क्यों रहे हैं।
इसके कई जवाब हो सकते हैं मसलन
1. पिछड़े इलाकों से आने वाले गरीब छात्रों को वामपंथ के नारे अच्छे लगना स्वाभाविक है जो गरीब-गुरबा की बात करते हैं। उनकी राजनीति कितनी अव्यवहारिक है ये छात्रों को दो चार साल में समझ में आता है और यही कारण है कि कैंपस से निकल के ज्यादातर छात्र वाम राजनीति में सक्रिय नहीं होते।
 

 

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