संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 नवंबर : ...सालगिरह मनाने के बजाय नोटबंदी की बरसी का माहौल
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 8 नवंबर : ...सालगिरह मनाने के बजाय नोटबंदी की बरसी का माहौल
Date : 08-Nov-2019

जिन वजहों को बताकर तीन बरस पहले मोदी सरकार ने हिन्दुस्तानी जनता पर नोटबंदी थोपी थी, उनमें से एक भी वजह जायज साबित नहीं हुई। न एक धेले का कालाधन कम हुआ, न आतंक की घटनाएं घटीं, और न ही डिजिटल लेन-देन बढ़ा। वैसे भी जब कालेधन को घटाने के नाम पर हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार के नोट शुरू किए गए, तो सरकार की सोच की खामी सिर चढ़कर दिखने लगी थी, और हमने कई बार इस बात पर लिखा भी था। अब वह गलती साबित भी हो रही है और सरकार एटीएम से दो हजार के नोट बंद कर रही है, उन्हें प्रचलन से कम कर रही है क्योंकि वे कालेधन के लिए हजार के पुराने नोटों के मुकाबले दुगुने आसान साबित हो रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ कुछ और बातें भी नोटबंदी के बाद के इन तीन बरसों में हुई हैं जिन्होंने नोटबंदी के वक्त की सरकारी सोच को पूरी तरह नाकामयाब साबित किया है। 

आज जिस तरह एक-एक कर कई बैंक डूब रहे हैं, लोग अपनी ही रकम को अपने ही इलाज के लिए निकाल नहीं पा रहे हैं, उससे लोगों का बैंकों पर भरोसा घटा है, और लोग पहले के मुकाबले अधिक नगदी घर पर इसलिए रखने लगे हैं कि पता नहीं कब बैंक डूब जाए, पता नहीं कब कोई साइबर मुजरिम लोगों के खातों की रकम गायब कर दे, और पता नहीं कब बैंक और एटीएम रकम निकासी पर तरह-तरह की नई बंदिशें लाद दें। बिना दवा मरते हुए ऐसे लोग खबरों में दिख रहे हैं जिनके खातों में दसियों लाख रूपए जमा हैं, लेकिन बैंक की धोखाधड़ी-जालसाजी की वजह से रिजर्व बैंक ने लोगों के रकम निकालने पर रोक लगा दी है। यह भी समझ पड़ रहा है कि किसी बैंक के डूबने पर एक खातेदार को महज एक लाख रूपए मिलना है, और बाकी डूब जाना है। ऐसे में लोग घर पर नगदी रख रहे हैं, या कुछ दिन पहले तक सोना भी खरीद रहे थे। अब नई बंदिश सामने आते दिख रही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी घरेलू सोने की सीमा तय करने वाले हैं, लोगों को उसके कागजात सहित सरकार के सामने घोषणा करनी पड़ेगी, और उसके पुराने बिल अगर नहीं होंगे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगने की खबर है। 

अब जनता के सामने दिक्कत यह है कि वह जाए तो जाए कहां? बैंकों में रकम डूब जाने का खतरा है, ब्याज बहुत कम है, और रकम निकालने पर किसी भी दिन नई रोक लग जाने का तजुर्बा लोगों का है। जब एटीएम काम नहीं भी करते हैं, तब भी कुछ बार कोशिश करने पर एक दिन में कोशिश करने की सीमा खत्म हो जाती है, और स्क्रीन पर लिखा दिखने लगता है कि एक दिन में ट्रांजेक्शन की सीमा खत्म हो गई है। लोग खाते के लाखों रूपए में से दो हजार निकाल पाते हैं, और सीमा खत्म हो जाती है। यह सिलसिला जनता के भरोसे को तोड़ चुका है, और लोगों को लगता है कि सरकार और बैंकों के हजारों करोड़ खाने वाले लोग तो विदेशों में मस्ती कर रहे हैं, और मेहनत की कमाई बैंकों में रखने वालों की रकम डूब रही है, या उनकी अपनी जिंदगी बचाने के लिए भी काम नहीं आ रही है। कोई हैरानी नहीं है कि ऐसे हाल में यह देश जनता की खुशी के पैमाने पर दुनिया में पाकिस्तान के भी नीचे आ रहा है। अगर लोग अपनी मुसीबत के वक्त अपनी ही खून-पसीने की कमाई को छू नहीं सकते, तो कोई राष्ट्रवादी उन्माद ही उनका भरोसा बनाए रख सकता है। 

आज सुबह से हिन्दुस्तान के हर किस्म के मीडिया में बिना किसी अपवाद के नोटबंदी की सालगिरह पर जो कुछ लिखा जा रहा है, वह इसे एक निहायत ही अवांछित, नाजायज, और नाकामयाब हरकत बता रहा है। खुद केन्द्र सरकार अपने सबसे बड़े फैसले की तीसरी सालगिरह पर इसकी तारीफ में दो शब्द भी नहीं कह पा रही है, और केन्द्र सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी बहुत ही सुविधाजनक याददाश्त का इस्तेमाल करते हुए नोटबंदी को ठीक उसी तरह भुला दे रही हैं जिस तरह अच्छे दिनों के जुमले को भुला दिया गया था, विदेशों से कालाधन लाकर हर किसी को 15 लाख रूपए देने की बात को भुला दिया गया था, जिस तरह डॉलर और पेट्रोल के दाम 30-40 रूपए करने की बात को भुला दिया गया था। नोटबंदी की तीसरी बरसी तो चली जाएगी, लेकिन इसकी वजह से अर्थव्यवस्था की तबाही की भरपाई कभी नहीं होगी।
-सुनील कुमार

Related Post

Comments