संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  6 नवंबर : यह कैसा लोकतंत्र, न संसद न सरकार, अदालतें उठा रही हैं सामाजिक इंसाफ के मुद्दे!
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 नवंबर : यह कैसा लोकतंत्र, न संसद न सरकार, अदालतें उठा रही हैं सामाजिक इंसाफ के मुद्दे!
Date : 06-Nov-2019

मद्रास हाईकोर्ट ने अभी मेडिकल दाखिला इम्तिहान के लिए होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा, नीट, को लेकर यह फिक्र जताई है कि नतीजे बताते हैं कि तकरीबन उन्हीं लोगों को इसमें कामयाबी मिल पाती है जो कि निजी कोचिंग सेंटरों को मोटी फीस देकर दाखिला इम्तिहान की तैयारी करते हैं। अदालत ने तमिलनाडू के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले को लेकर दायर की गई एक याचिका की सुनवाई करते हुए यह तंज भी कसा कि जब केन्द्र सरकार पिछली सरकार की लागू की हुई लगभग हर योजना को पलट रही है तो इस नीट को ही क्यों छोड़ दिया गया है? सरकारी वकील से अदालत ने सवाल पूछा कि गरीब बच्चे किस तरह ऐसी महंगी कोचिंग का खर्च उठा सकते हैं? अदालत ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों के दरवाजों कभी भी गरीबों के लिए नहीं खुले रहते, और जब नीट को शुरू किया गया था तो दावा किया गया था कि इससे पैसों से खरीदी जाने वाली मेडिकल सीटों का धंधा खत्म होगा। लेकिन अब यह खर्च कोचिंग सेंटरों पर करके सीटें हासिल की जा रही हैं। अदालत ने केन्द्र सरकार द्वारा जमा की गई जानकारी को देखते हुए ये बातें कही हैं जिनके मुताबिक तमिलनाडू में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पहुंचने वाले तीन हजार से अधिक छात्रों में से कुल 48 ऐसे थे जो कोचिंग सेंटरों में नहीं गए थे। इसी तरह निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले करीब 16 सौ छात्रों में से कुल 52 ऐसे थे जिन्होंने कोचिंग नहीं ली थी। 

ये आंकड़़े एक ऐसी हकीकत को उजागर करते हैं जिसे गरीबों के वोटों और अमीरों के नोटों से चुनकर बनने वाली सरकारों को देखना चाहिए था, लेकिन अफसोस यह है कि हाईकोर्ट के जजों को यह बात दिख रही है, केन्द्र सरकार को नहीं दिख रही कि गरीबों की अब ऊंची पढ़ाई में जगह तकरीबन खत्म हो चुकी है। इस कड़वी सामाजिक हकीकत को बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा रहना चाहिए था, लेकिन दिक्कत यह है कि वामपंथियों को छोड़कर बाकी किसी भी पार्टी के सांसद संसद पहुंचने तक इतने नोट देख चुके होते हैं कि वे गरीबों की तकलीफों से ऊपर उठ जाते हैं। इसके बाद संसद में सवाल पूछने के लिए जो कमाई होती है, वह संसद के रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और उसके स्टिंग ऑपरेशन देश की जनता सुन चुकी है। इनमें से कोई भी सांसद जेल नहीं गए, और संसद के विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए तमाम लोग बाहर हैं। अब ऐसे सांसदों की ऐसी संसद, ऐसे विधायकों की विधानसभाएं, और राजनीतिक दान के लिए लागू की गई पूरी तरह दोनंबरी सी बॉंड योजना से जिस तरह पार्टियों को सैकड़ों करोड़ मिल रहे हैं, जिस तरह सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त पर सैकड़ों करोड़ खर्च की चर्चा है, ऐसी राजनीतिक संस्कृति के बीच यह सोचना भी ज्यादती होगी कि कोई संपन्न पार्टी, और उसकी सरकार गरीब बच्चों के कॉलेज दाखिले में समानता के मौके के बारे में सोचेंगी भी। 

यह देश गरीबों की लाशों पर खड़ी होने वाली व्यवस्था का देश हो गया है। गरीब की जगह बुनियाद के पत्थरों की जगह पर है, और इन पत्थरों को कभी रौशनी देखना नसीब नहीं होता। जो आंकड़े सामने हैं वे बताते हैं कि देश किसी भी कोने से आजाद नहीं हैं, और नागरिकों के बीच समान अवसर की बात फिजूल है। नौकरी के लिए हो या ऊंची पढ़ाई में दाखिले के लिए, सरकारों ने ऐसे इम्तिहान गढ़ रखे हैं कि सत्ता पर बैठे हुए ताकतवर लोग और उनका संपन्न तबका ही इन इम्तिहानों की तैयारी कर सके। मीडिया कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से पटा हुआ है, और ऐसा मीडिया इस बात को खुलकर सामने इसलिए भी नहीं रख सकता कि यह आत्मघाती काम होगा, और अपने ही पेट पर लात मारने सरीखा होगा। कुदरत को ऐसी दिक्कत का अंदाजा था, इसलिए उसने इंसानी बदन में लात को इस तरह डिजाइन किया है कि कितना भी घुमाकर उसे अपने पेट पर नहीं मारा जा सकता। इसलिए देश का संपन्न और मलाईदार तबका, सत्तारूढ़ तबका, अपने तबके के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे इम्तिहान बनाता है जिनको पार पाना सिर्फ उसी तबके के बस की बात हो। जिस तरह दो-चार फीसदी बच्चे बिना कोचिंग के मेडिकल कॉलेज पहुंच पा रहे हैं, उसे भी उनकी प्रतिभा या कोई संयोग मानना बेहतर होगा, ऐसा सोचने का हमारे पास कोई कारण नहीं है कि सत्ता ने दो-चार फीसदी की गुंजाइश भी गरीबों के लिए छोड़ी होगी। 
इस देश के लिए यह सबसे शर्मिंदगी की बात है कि सामाजिक न्याय के मुद्दे न सरकार उठाती है, न संसद, इन्हें बीते बरसों में अक्सर अदालतों ने ही उठाया है जिन पर चुनाव लड़कर जीतकर आने का कोई दबाव भी नहीं रहता। यह सिलसिला इस देश में ताकतवर तबके को और अधिक ताकतवर बनाने की एक ऐसी साजिश है जिसे करने वाले लोग आज भी अंग्रेजों की शिक्षा नीति को इतनी गालियां देते हैं कि आज की शिक्षा नीति की तरफ किसी का ध्यान न जाए। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को रावण के पुतले की तरह खड़ा रखा जाता है, ताकि उसकी ओट में आज 21वीं सदी में भी गरीबों को उच्च शिक्षा से दूर रखा जाए, और संपन्न तबका एक कुलीन तबके की तरह एकाधिकार बनाए रखे। 
-सुनील कुमार

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