संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 नवम्बर : देश में हिंसा को कतरे-कतरे में काबू नहीं किया जा सकता
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 5 नवम्बर : देश में हिंसा को कतरे-कतरे में काबू नहीं किया जा सकता
Date : 05-Nov-2019

दिल्ली में आज एक अभूतपूर्व प्रदर्शन हो रहा है जिसमें पुलिस मुख्यालय पर वर्दी में पुलिसकर्मी अपने लिखे हुए पोस्टरों सहित प्रदर्शन कर रहे हैं और पिछले दो-चार दिनों में वकीलों के हमलों का विरोध कर रहे हैं। यह नजारा हैरान भी करता है, और परेशान भी करता है। जब आमतौर पर अपनी किसी हिंसा की तस्वीर या वीडियो के साथ पुलिस लोगों के सामने अपनी एक हिंसक छवि के लिए जानी जाती है, उसमें जब वकीलों ने एक भीड़ की शक्ल में पुलिस पर हमले किए, एक से अधिक बार, एक से अधिक अदालतों में, और सड़कों पर पुलिस को पीटा, तो यह नजारा आम तस्वीर से बिल्कुल उल्टा था। दिल्ली पुलिस ऐसी हिंसा का विरोध करते खड़ी थी और पुलिस के बड़े अफसर उन्हें समझाते हुए माईक पर बोल रहे थे। और यह एक ऐसा मामला है जिसकी तोहमत दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर नहीं थोपी जा सकती क्योंकि दिल्ली की पुलिस केंद्र सरकार की मातहत है, और वकील भी किसी सरकार के तहत काम नहीं करते हैं। ऐस मेें यह टकराव एक फिक्र खड़ी करता है, दिल्ली के बाहर भी।

इस मामले पर लिखते हुए तेलंगाना की कल की एक घटना को भी देखने की जरूरत है जिसमें एक महिला तहसीलदार को दिन-दहाड़े उसके दफ्तर में जिंदा जलाकर मार डाला गया है। लोगों को याद होगा कि हाल ही के महीनों में छत्तीसगढ़ में जगह-जगह लोगों ने पुलिस को पीटा है, लेकिन वह बिखरी हुई छोटी-छोटी वारदातों में हुआ इसलिए पुलिस की ओर से ऐसा कोई संगठित विरोध सामने नहीं है जो कि दिल्ली में आज दिख रहा है। लेकिन हर कुछ हफ्तों में देश के किसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टरों की पिटाई होती है, और हड़ताल चलती है। इन तमाम बातों का आपस में वैसे तो कोई रिश्ता नहीं दिखता, लेकिन इनके बीच एक रिश्ता है जरूर और उस पर सोचने की जरूरत है।

यह याद रखना चाहिए कि एक वक्त जब देश में जगह-जगह मॉबलिंचिंग होती है, और हमें मजबूर होकर उसके लिए भीड़त्या जैसा शब्द गढऩा पड़ता है, तो वह किसी एक इंसान की मौत नहीं होती, देश के लोगों में तथाकथित इंसानियत की मौत भी होती है, और फिर ऐसे समाज में दूसरी जगहों पर भी यह मौत असर डालती है। पुलिस को इस तरह पीटते हुए वकीलों के जहन में वे तस्वीरें और वे वीडियो जरूर रहे होंगे जिसमें कहीं पर, खासकर उत्तरप्रदेश में, पुलिस बेकसूरों को बुरी तरह पीट रही है, या किसी भी जगह हिंसक भीड़ के बिना दिमाग वाले बहुत से सिरों के चलते किसी बेकसूर को पीटा जा रहा है। जब पीटना, या पीट-पीटकर मार डालना देश की संस्कृति होने लगती है, और बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बड़बोले बड़े-बड़े मुंह भी ऐसी भीड़त्याओं पर जरा सा भी नहीं खुलते, तो वह इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में देश में स्वीकार्य संस्कृति बन जाती है, बन चुकी है। इसलिए काले कोटों वाली भीड़ खाकी वर्दी पर ऐसा संगठित हमला करती है, और हिंसा पर पुलिस का एकाधिकार खत्म करने की एक नुमाइश भी करती है। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि यह आज देश की राजधानी में, केंद्रीय गृहमंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, और सुप्रीम कोर्ट के ठिकानों के बीच चल रहा है, और वर्दीधारी पुलिस वाले ऐसे प्रदर्शन को मजबूर हुए हैं। यह मामला किसी न्यायिक जांच से निपट भी सकता है, लेकिन यह तो तय है कि भीड़ की हिंसा किसी जांच रपट से सुलझेगी नहीं। आज देश में कदम-कदम पर भीड़ कानून अपने हाथ में ले रही है, और फिर पैरोंतले रौंद भी रही है। ऐसे में जरूरत देश के पूरे माहौल को इंसाफ की तरफ मोडऩे की है। ऐसा नहीं हो सकता कि देश में जगह-जगह गाय के नाम पर हिंसक भीड़त्याओं को अनदेखा किया जाए, और महज वकीलों की, या पुलिस की हिंसा पर काबू पाया जा सके। आज देश का माहौल लोकतंत्र के खिलाफ है, इंसाफ के खिलाफ है, और तथाकथित इंसानियत के भी खिलाफ है। एक जगह की अराजकता दूसरी जगह अराजकता को हवा देती है, और देश में हिंसा को कतरे-कतरे में काबू नहीं किया जा सकता।
-सुनील कुमार

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