संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 नवंबर  : ...क्योंकि सुधार धीमा होता है, बर्बादी घोड़े पर चढ़ी आती है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 3 नवंबर : ...क्योंकि सुधार धीमा होता है, बर्बादी घोड़े पर चढ़ी आती है
Date : 03-Nov-2019

दिल्ली की एक चर्चित अदालत, तीस हजारी कोर्ट, में कल वकीलों और पुलिस के बीच जिस तरह का हिंसक टकराव हुआ, गोलियां चलीं, गाडिय़ां जलाई गईं, और दोनों तरफ के लोगों पर यह आरोप है कि उन्होंने दूसरे पक्ष के लोगों को बुरी तरह पीटा। कम से कम एक ऐसा वीडियो अभी ट्विटर पर दिख रहा है जिसमें दर्जनों वकील दो पुलिसवालों को घेरकर उन्हें लात-घूसों से देर तक बुरी तरह पीट रहे हैं, बेल्ट से मार रहे हैं, और उनके गिर जाने के बाद बड़ी संख्या में पुलिस के आ जाने के बाद वकील वहां से हटे। वकीलों की तोहमत है कि पुलिस लॉकअप में वकीलों को बेल्ट से पीटा गया। यह पूरा झगड़ा एक कार की पार्किंग को लेकर हुआ था, और बढ़ते हुए इसने इतनी हिंसा दिखा दी। 

सोचने के कुछ मुद्दे हैं। वकील और पुलिस, दोनों ही तबके कानून के पेशे से जुड़े हुए हैं। पुलिस के जिम्मे कानून बनाए रखना है, मुजरिमों को पकडऩा है, और उन्हें सजा दिलाने के लिए अदालत में जुर्म साबित करना है। दूसरी तरफ वकीलों में से कम से कम कुछ तो ऐसे रहते ही हैं जो कि पुलिस और जांच एजेंसियों की तरफ से सजा दिलाने का काम करते हैं, और बाकी वकील ऐसे भी रहते हैं जो मुजरिमों को बचाने का वकालत का अपना जिम्मा निभाते हैं। इन दोनों से परे बहुत से और वकील रहते हैं जो कि दूसरे मुजरिमों के बीच तरह-तरह के कानूनी काम करते हैं। कुल मिलाकर इन दोनों तबकों के बारे में एक बात साफ है कि ये लगातार अपराधियों के साथ काम करते हैं, उनके इर्द-गिर्द रहते हैं, और इसका असर इनके मिजाज पर दिखने लगता है। देश भर में ऐसे कई मौके आए हैं जब वकीलों ने कानून तोड़ा है, और जमकर तोड़ा है। कई बार जब बहुत ही खराब किस्म के अपराधी, बच्चों के बलात्कारी अदालत पहुंचते हैं, तो वकील भी उनको पीटने के लिए टूट पड़ते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि पुलिस हो या वकील उनके भीतर इंसान रहते हैं जो कि उनसे सही-गलत दोनों काम करवाते हैं। वकील और पुलिस जो कि आमतौर पर एक-दूसरे को देखने के आदी होते हैं, अक्सर ही एक-दूसरे के साथ काम करते हैं, एक-दूसरे की मदद भी करते हैं, वे जब इस तरह आपस में भिड़ते हैं, तो उसकी वजहों को भी समझना चाहिए। 

जिस दिल्ली में आज सांस लेना मुश्किल हो गया है, वहां पर एक वकील के कार पार्क करने को लेकर यह झगड़ा शुरू हुआ। ऐसी हवा के बीच जीने वाले लोग एक जाने-अनजाने बड़े से तनाव के बीच जीते हंै, और आपा खोने के करीब वे जल्दी आ सकते हैं। यह बात सिर्फ वकील और पुलिस की नहीं है, बल्कि दिल्ली के हर इंसान की है, हर जानवर और पंछी की भी है, जिसके सिर पर सांस की बीमारी में जकड़े जाने का खतरा टंगा रहता है। ऐसे में लोग आपा जल्दी खो सकते हैं, अगर वे अस्पतालों में डॉक्टरों के कमरे के बाहर किसी लंबी कतार में लगे हुए नहीं हैं तो। ऐसी दिल्ली को ऐसी हवा के बीच उस पार्किंग के बारे में भी सोचना चाहिए जिसकी वजह से कल का यह झगड़ा हुआ। जिन लोगों को दिल्ली रूबरू देखना नसीब होता है, या देखने की मजबूरी होती है, वे जानते हैं कि दिल्ली किस तरह गाडिय़ों से लबालब भरी हुई है। गाडिय़ां खड़ी करने की जगह नहीं है, और साथ-साथ सड़कों पर भी गाडिय़ां चलने की गुंजाइश नहीं है। कल तीस हजारी कोर्ट में पूरी तरह अवांछित यह हिंसा इस तरफ ध्यान खींचती है कि वहां गाडिय़ों को कम करना कितना जरूरी है, और क्यों जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ बाकी हिन्दुस्तान को भी यह समझने की जरूरत है कि तमाम शहर ऐसी ही एक मौत की तरफ बढ़ते चले जा रहे हैं क्योंकि गाडिय़ां बढ़ रही हैं, उनका इस्तेमाल बढ़ रहा है। शहरीकरण की एक परले दर्जे की बेवकूफी अधिक से अधिक पार्किंग बढ़ाते हुए इसके लिए आसमान छूती इमारतें बनाने में लगी हैं, मानो वहां आने-जाने वाली गाडिय़ां सड़कों से हुए बिना ही आना-जाना करेंगी। 

यह समझने की जरूरत है कि जिंदा रहने के लिए शहरीकरण को ट्रैफिक घटाना होगा, और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाना होगा। बाकी शहर वक्त रहते इसका इंतजाम कर सकें, तो उन्हें दिल्ली के लोगों की तरह नाक और मुंह पर नकाब पहनकर चलने की मजबूरी नहीं रहेगी, जिसके बारे में एम्स के डॉक्टरों ने कह दिया है कि दिल्ली सरकार के बांटे गए ये मास्क प्रदूषण को रोक नहीं सकते। आज यहां पर लिखी गई टुकड़ा-टुकड़ा बातें एक-दूसरे से असंबद्ध लग सकती हैं, लेकिन ये सब एक-दूसरे से रिश्ता रखती हैं, और ये सब एक धीमी मौत की चचेरी बहन भी हैं। लोगों को अपने, पूरी जिंदगी जीकर, या बेवक्त, मर जाने के बाद के बारे में भी सोचना चाहिए कि वे आने वाली पीढिय़ों को कारों की शक्ल में फौलादी ताबूत देकर जाना चाहती हैं, या फिर सांस लेने लायक खुली हवा? जिन शहरों को जिंदा रहना है, और धरती पर कोई शहर बाकी शहरों के प्रदूषण से दूर अकेले टापू की तरह नहीं रह सकता, तो जिन शहरों को जिंदा रहना है, उन्हें यह भी समझना होगा कि अगर वे आज से तैयारी करेंगे, तो दस-बीस बरस बाद जाकर उन बातों का असर होगा क्योंकि सुधार धीमा होता है, बर्बादी घोड़े पर चढ़कर आती है।

अभी जैसे ही ऊपर का लिखना पूरा हुआ, एक खबर सामने आई है कि वायु प्रदूषण सिर्फ सेहत पर ही नहीं, व्यवहार पर भी असर डालता है। 1970 के दशक में अमरीका में पेट्रोल से शीशे को निकाल दिया गया, और इसके बाद 1990 के दशक में अमरीका के हिंसक अपराधों में 56 फीसदी तक की कमी आ गई। इसे पेट्रोल से शीशा निकालने से जोड़कर देखा गया। दरअसल शीशे के संपर्क में आने से, खासतौर पर बच्चों में, आवेग और आक्रामकता बढऩे लगती है, और उनका आईक्यू घट जाता है, जो उनमें आपराधिक व्यवहार को बढ़ा सकता है। ऐसा ही एक अध्ययन चीन के शंघाई में हुआ कि प्रदूषण के दौर में मानसिक अस्पताल में भर्ती होने वाले रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। अमरीका के करीब 10 हजार शहरों में किए गए एक अध्ययन से भी पता चला है कि वायु प्रदूषण से जुर्म बढ़ते हैं। इसलिए दिल्ली में वकीलों ने और पुलिस ने जो किया है, उसकी कुछ तोहमत वायु प्रदूषण को भी दी जानी चाहिए। 
-सुनील कुमार

Related Post

Comments