संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 अक्टूबर : साजिश कर सजा दिलाने वाली पुलिस को उसी जुर्म के लिए तय सजा जितनी सजा मिले..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 23 अक्टूबर : साजिश कर सजा दिलाने वाली पुलिस को उसी जुर्म के लिए तय सजा जितनी सजा मिले..
Date : 23-Oct-2019

जम्मू-कश्मीर के जम्मू इलाके में आठ बरस की एक मुस्लिम खानाबदोश बच्ची के साथ मंदिर में पुजारी से लेकर पुलिस तक, एक घर की दो पीढिय़ों तक के लोगों ने जिस तरह गैंगरेप किया था, और अपने परिचितों को बुला-बुलाकर बलात्कार करवाया था, बाद में उस बच्ची की हत्या कर दी थी, उस मामले की जांच करने वाली राज्य की पुलिस के खिलाफ अदालत ने साजिश करने की एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। देश को याद होगा कि कठुआ रेप-मर्डर नाम से चर्चित इस मामले में हिन्दू बलात्कारियों को बचाने के लिए देश के कई हिन्दू संगठनों ने तिरंगे झंडे लेकर जुलूस निकाले थे, इनमें राज्य के दो भाजपा मंत्री भी शामिल थे जिन्हें बाद में इस्तीफा देना पड़ा था। और जम्मू में तो हालत यह थी कि इस बच्ची का मामला लडऩे से वकीलों को रोका गया था, और वैसे बागी माहौल में एक हिन्दू महिला वकील ने बड़े हौसले के साथ हत्यारे-बलात्कारियों को सजा दिलवाने में कामयाबी पाई थी। अब इस बच्ची के रेप-मर्डर की जांच करने वाली विशेष पुलिस टीम के खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज हो रही है कि उसने कुछ बेकसूर लोगों के खिलाफ गवाही देने के लिए दूसरे लोगों की हिंसक प्रताडऩा की थी। जाहिर है कि मामले की जांच में राज्य पुलिस की यह टीम जिसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही अधिकारी-कर्मचारी शामिल थे, उन्होंने बेईमानी की थी, और बाद में सुबूत नष्ट करने के लिए भी कुछ पुलिसवाले गिरफ्तार हुए थे। आज मुद्दे की बात यह है कि इस भयानक रेप-हत्या मामले में झूठे गवाह तैयार करने के जुर्म में अदालत के आदेश से पुलिस की विशेष जांच टीम पर एफआईआर हो रही है। 

इस मामले को देखकर छत्तीसगढ़ राज्य के शुरू के तीन बरसों का सबसे चर्चित जग्गी हत्याकांड याद पड़ता है जिसमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश कोषाध्यक्ष और तत्कालीन एनसीपी नेता विद्याचरण शुक्ल के एक करीबी, रामावतार जग्गी, को खुली सड़क पर मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बंगले पर आने-जाने वाले लोगों ने मार डाला था। इस मामले में हत्या के तुरंत बाद हत्यारों को भगाने के लिए, जांच को बर्बाद करने के लिए, और बेकसूरों को फंसाने के लिए रायपुर पुलिस के उस वक्त के कुछ अफसरों को अदालत से सजा हुई थी, वे बर्खास्त हुए थे। रायपुर का वह हत्याकांड उस वक्त सत्ता का संरक्षण प्राप्त हत्यारों को बचाने के लिए था, लेकिन वह सबसे पहले साजिश में शामिल पुलिसवालों पर भारी पड़ा था, और बर्खास्तगी के बाद भी ऐसे कई पुलिसवाले अभी ऊपर की अदालत में मुकदमा झेल ही रहे हैं। देश में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें पुलिस की साजिश, उसकी हिंसा, और उसके जुर्म पर दस-बीस बरस बाद भी सजा होती है, और लंबी-चौड़ी सजा होती है, बहुत से लोग बहुत बरसों के लिए, पूरी जिंदगी के लिए जेल चले जाते हैं। 

ऐसे मामलों को देखकर यह लगता है कि पुलिस को सत्तारूढ़ नेताओं या अपने बड़े अफसरों के कहे हुए भी किसी जुर्म में भागीदार नहीं बनना चाहिए क्योंकि अब अदालतों में कई किस्म के सुबूत जुर्म को साबित करने के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं। मोबाइल फोन के डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज, और फोरेंसिक लैब में साबित सुबूत लगातार अधिक कारगर होते जा रहे हैं। लोगों की कानूनी जागरूकता भी बढ़ी है, और कमजोर तबकों की कानूनी मदद के लिए कुछ जनसंगठन भी सामने आए हैं। बस्तर जैसे नक्सलग्रस्त इलाके में सरकारी बंदूकों की लंबी मौजूदगी से वहां सत्ता की हिंसा के भी अनगिनत मामले सामने आए हैं जिनमें से कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे हुए हैं। लोगों को याद होगा कि पंजाब के आतंकवाद के दिनों में वहां के पुलिस-मुखिया केपीएस गिल की अगुवाई में पुलिस और सुरक्षा बलों ने जो हिंसा की थी उसे लेकर दशकों बाद भी अदालतों से गिल के पुलिसवालों को उम्रकैद जैसी सजा हुई हैं, और आज के कुछ बरस बाद अगर बस्तर में कई बरस पहले पुलिस और सुरक्षा बलों के जुर्म सजा पाएं, तो भी किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। 

हमारा ख्याल यह है कि बेकसूरों को जैसे गंभीर जुर्म में फंसाने की बात साबित होती है, उन जुर्मों के लिए जिन सजाओं का प्रावधान होता है, उतनी सजा साजिश करने वाले पुलिसवालों को दी जानी चाहिए। हत्या या बलात्कार का झूठा जुर्म किसी पर थोपने की साजिश के लिए पुलिस को उतनी ही कैद देनी चाहिए जितनी कि हत्या या बलात्कार के जुर्म में दी जा सकती थी। ऐसा इसलिए जरूरी है कि अगर किसी बेकसूर को ऐसी सजा दिलवाना कामयाब हो गया होता, तो पुलिस को बनाने का पूरा मकसद ही उल्टा साबित हो जाता। मुजरिम पुलिस को जल्द से जल्द, और अधिक से अधिक सजा इसलिए भी होनी चाहिए कि देश में दूसरी जगहों पर भी पुलिस को ऐसी साजिश का हौसला न हो।
-सुनील कुमार

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